अपना सँ पैघ सर्जक केर अनुकरण करैत छी, नव लेखिका केँ प्रोत्साहनक जरूरतः ममता झा

विचार

– ममता झा

कोनो आदमी जन्म सँ न मूर्ख होइयऽ आ ने विद्वान्। बच्चा केर देख-रेख मे सब पैघ केर हाथ होइत छैक। ओहि मे परिवार, समाज दुनू केर बहुत पैघ योगदान होइत छैक। सब बच्चा रंग, रूप, व्यवहार, पद, प्रतिष्ठा मे अलग-अलग होइयऽ। सब चाहैत छैक जे संतान खूब पैघ लोक बनय, लेकिन सभक बुद्धि, विवेक, विचार, रहन-सहन सब अलग होयबाक कारण विकास सेहो अलग-अलग होइत छैक।

हम सब एखन बच्चा छी लिखय केर मामिला मे। तखन ई जरूर होइत रहैत य जे नीक लिखी। अपना मिथिलाक विकास करी। अइ पर जे नीक चर्चा करैत छथि हुनका सुनी, आ गर्व सँ लिखी कि हमर मिथिला मे अनेकों नीक-नीक लोक छथि। जिनका जानकारी नहि छन्हि ओहो ई सब जानिकय गर्वान्वित हेताह। उत्साहित केनाय बहुत नीक काज लेकिन हतोत्साहित केनाय उचित नहि।

हम अपना सँ पैघ केर अनुकरण करैत छी। अनुकरण केर मतलब हुनक स्थान या पद लेनाय नहि य, हुनकर गुण केँ चोरेनाय नहि। सागर मे सँ एक लोटा जल लेला सऽ जल कम नहि होइत छैक बल्कि बढैत छैक। हमर कलम सँ अगर तकलीफ पहुँचल त हम क्षमाप्रार्थी छी लेकिन एहि बातक प्रचारक तरीका हमरा उचित नहि लागल। मिथिला केँ बदनाम नहि करियौक, हम अपन कलम रोकि सकैत छी, लेकिन मिथिला एखनो मिथिला छैक ताहि पर हमरा गर्व अछि।

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