सजा आ इनाम – मैथिली कथा

कथा – सजा आ ईनाम

– डा. लीना चौधरी

घर मे चारिटा एकतुरिया नेना रहय आर सब कियो शांति सँ मिलिकय रहि जाय से आश्चर्येक गप्प हैत। घरक मुखिया केर अनुशासन बहुत कड़क छलैक। ओ कहथिन दुलार खेबा-पीवा आ पहिरबा-ओढबा मे ठीक परंच पढ़ाई मे ढ़िलाई बरदाश्त नइ। अपने सब नेना केँ ऑफिस सँ आबि पढ़ाबय बैसि जाथिन। कनियां केँ कहि देने छलखिन्ह जे पढ़ाई केर बीच मे कोनो बाधा नहि करय लेल। कनियों पूर्णरूपेन समर्थन करथिन। बच्चा सब केँ सांझ सँ पहिने बेर मे खुआ-पिया पढ़य लेल बैसा देथिन। सब बच्चा मे एकटा बच्चा केँ कनी बेसी मानथिन, कियैक कि ओ चंचल आ हाजिरजबाब आ कुशाग्र छलाह। हुनका दुलार सँ बाबुसाहेब कहथिन। अपने रोज बच्चा सब केँ नहबथिन आ तैयार करथिन। रोज नहाबय के क्रम मे सबसँ पहिने बाबुसाहेब केँ बजबथिन। ओहू दिन हुनका बजेला लेकिन बाबुसाहेब कोनो बदमाशी मे छलाह तेँ अन्ठिया देलखिन। ताहि पर अपने पहिने बेटी केँ नहाबय लगलखिन। आब बाबुसाहेब केँ ई बात बरदाश्त नहि भेलनि आ ओ लड़य लगलाह समतुर भतीजी सँ। अपने बहुत समझाबय के कोशिश केलखिन पर बाबुसाहेब जिद्द पर आबि गेल छलाह। एहि बात पर तामश मे मारिकय नहा देलखिन्ह आ कनियां केँ कहलखिन कपड़ा पहिरा देबय, अपना ऑफिस केर बेर भ रहल छलन्हि। अपने त चलि गेला ऑफिस, एम्हर घर मे बाबुसाहेब नंग-धरंग पलंगक नीचाँ घुसि गेला। भरि दिन ओतहि बैसल रहला। भौजी कतबो मनौलखिन मुदा नहि मानला। हारिकय भौजी ओतहि खाना-नाश्ता सब देलखिन्ह आ ओ ओतहि खेला। सांझ केँ जखन ऑफिस सँ एला त बाबुसाहेब पढ़ाई मे नहि बैसल छलाह। पुछला पर कनियां भरि दिनक घटना बता देलखिन्ह। तखन अपने कमरा मे जा बाबुसाहेब केँ मना बाहर निकालिकय पुछलखिन्ह कपड़ा कियैक नइ पहिरलहुँ… बाबुसाहेब केर कहनाम छलन्हि.. अहां सजा दैत छी त ईनाम सेहो दैत छी। हमरा जखन ईनाम देब तखन हम कपड़ा पहिरिकय जिलेबी आनब। ओ तुरंत अपन जेबी सँ चवन्नी निकालिकय देलखिन्ह जे कि नियम छल ओही घर मे, जेकरा सजा केर तौर पर मारि लागत ओकरा चवन्नी भेटत जिलेबी खेबा लेल। बाबुसाहेब तुंरत जिलेबी आनि खाय लेल बैसला आ आन बच्चा सब केँ ललचाबैत स्वयं जिलेबीक आंनद लैत रहला।
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बादक लेख

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