विडंबनाः बच्चा नहि बनल तैयो आफद आ बनि गेल तैयो आफद?

लघुकथा

– रूबी झा

केहेन जुग आबि गेलैक से नहि बुझाइत अछि, माय-बाप केँ दोसरा सँ परिचय करबैय मे या माय-बापक नाम सँ संतान केँ जे सब चिन्हैत छन्हि ताहि में बड लाज होइत छन्हि कतेको बाबू-भैया केँ। सुनील पढि-लिखिकय कौल सेंटर में काज करैत छलथि। माय हुनक दोसराक घर मे झाड़ू-पोछा आ बर्तन माँजि हुनका ईंग्लिश स्कूल में पढौलखिन्ह-लिखौलखिन्ह। उमर भेला बाद जहन देह काज नहि करनि तँ मालिश केर काज करैय लगलीह। पिताजी सुनीलक केराक ठेली लगबैत छलखिन्ह। सुनील नौकरियो करैत छलथि तैयो अपन माय-बाप केँ घर बैसाकय खुआयल पार नहि लगलनि। लेकिन माय-बाप केँ कहैय छलखिन्ह हमरा बाट-घाट अहाँ सब टोकल नहि करू, हमरा लाज भऽ जाइयऽ। बाद मे जखन माय बूढ भऽ गेलखिनह आ घर बैसि गेलखिन्ह तऽ दिन-राति माय-बाप केँ सुनील कहैय लगलखिन्ह, “अहाँ सब एतय सँ दोसर जगह चलू, एतय सब हमरा मालिश वालीक बेटा त ठेली वालाक बेटा कहिकय सम्बोधन करैयऽ।” माय-बाप कहथिन्ह जे पूरा जिन्दगी एतय बितेलहुँ आ आब अहि अवस्था मे कतय लऽ जायब? दोसरा जगह कि हमरा सब केँ नीक लागत। एतय कखनो कियो आबि जाइयऽ त कखनहुँ कतहु हमहीं सब चलि जाइत छी। एतय घरक आगु मे बैसि रहय छी। सब रस्ता धेने जाइत रहैत छैक तैयो भेंट-घाँट भऽ जाइयऽ। ‘राम-राम’ कहैत हाल-चाल पुछैत सब चलि जाइत रहैयऽ, दोसर ठाम मोने औना कय मरि जायब। सुनील माय-बापक एक नहि सुनलाह आ लय केँ दोसर इलाका मे चलि गेलाह। पाठक लोकनि! देखैय जाय-जाउ! बच्चा बनि गेल तइयो आफद, आ नहि बनल तँ बड़का आफद। कि सुनिल केँ अपन माय-बाप पर शर्मिन्दगी केर जगह गौरवबोध नहि हेबाक चाहियनि?

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