गाम मे सब किछु अछि मुदा गाम नहि अछि

चिन्तन-विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

हँ भैया, गाम मे छी!

 
“बड गर्मी पड़ि रहल अछि। भोरे सुरुजदेव ततेक टाइट भऽ उगि जाइत छथि जे देखिते घबराहट होबय लगैछ। पंखा तर जे बैसैत छी से ओतय सँ हंटबाक एको रत्ती इच्छा नहि होइत अछि। जँ लाइन कटि गेल त बुझू जे मोन अलबलाय लगैत अछि।” अजय अपन जेठ भाइ सँ फोन पर बात करैत गामक गर्मीक बखान कय रहल छल। मौसम बड़ा अजीब छैक सच मे। ग्लोबल वार्मिंग आ जलसंकट आदिक बात जे किछेक दशक पूर्व सँ वैज्ञानिकक चिन्ताक बात अखबार आ टीवी पर पढैत-सुनैत छल लोक से आब मानू सोझाँ प्रकट भऽ गेल छैक। “गाम त एखनहुँ शुद्ध हवा आ चारूकात खुल्ला आवोहवा लेल जानल जा सकैछ?” अमेरिका मे रहि रहल जेठ भाइ अपन अनुज सँ सवाल केने छलखिन। हुनका सदिखन जिज्ञासा गामहि केर बारे मे लागल रहैत छन्हि।
 
कुल ३ भाइ अनिल, अमर आ अजय – अनिल शुरुए मे अमेरिका चलि गेलाह आर ओ आब सपरिवार, धिया-पुता सहित ओतहि सेटल छथि। अमर दक्षिण भारतक बंगलुरु मे अपन आशियाना ठाढ कय लेलनि। अजय सब सँ नजदीक बनारस मे, ताहि सँ गाम बेसीकाल वैह अबैत रहैत छथि। गाम मे गोटेक बीघा जमीन एखनहुँ बाँचल छन्हि। अनिल अपन हिस्साक सारा खेत-गाछी अजय केँ रेख-देख मे छोड़ि देने छथि। चेन्नई वला अमर अपन हिस्साक लगभग सब किछु बेचि लेलनि, डीह बाँचल छन्हि। किछु एहि तर्ज पर पढल-लिखल समाज आइ मिथिला मे भेटैत अछि। जे गाम मे छुटल छथि हुनकर अलगे एकटा संसार छन्हि, हुनक चलबाक आ बढबाक प्रक्रिया पहिने सँ बहुत अलग आ पूर्ण भौतिकतावादी युग केर शहरक सब सुविधा आ पूर्वाधार हुनकर जीवनशैलीक अभिन्न हिस्सा बनि गेल अछि। खेतीपाती हो आ कि व्यवसाय या उद्योग – उद्यमशीलताक सहारे गामहु मे जीवन शहरक अनुकूल अछि, जँ किछु नहि अछि त ओ ‘गाम’ जे छल से कतहु नहि अछि।
 
गाम केर अवस्था अपन उत्कर्ष सँ नितान्त दूर आ अत्यन्त विरान-सुनसान देखाइत अछि। तखन त बीच-बीच मे डीजे वला आवाज पर ४-बीट म्युजिक बजैत छैक जे एहि विरानगी केँ चीरैत रहैत छैक, लेकिन सेहो कमजोर हृदय वला शहरी बाबू केँ नहि पचैत छन्हि। मौलिकताक ह्रास चारू दिश देखल जा सकैछ। यदाकदा परदेशी बाबू सब जखन गाम मे एकत्रित होइत छथि त भौतिकतावादी देखाबाक बड़ा बेजोड़ प्रदर्शन होइत अछि। कियो अपन कार केर मोडेल आ डिजाइन सँ कम्पीटिशन करैत देखाइत छथि, कियो अपन शहरक तौर-तरीका वर्णन करैत देखाइत छथि… एहि सब बीच गाम जे हेरा रहल अछि, संस्कृति जे चौपट भेल जा रहल अछि, ताहि सब प्रति किनकहु मे कनिकबो टा चिन्तन नहि देखाइत अछि। आब त प्रकृति केर तांडव सेहो शुरू भऽ गेल… देखा चाही हम सब आगू कतय जा कय रुकब… रुकबो करब कि बढिते-बढिते सर्वनाश करब।
 
हरिः हरः!!
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