मिथिलाक ब्राह्मण समुदाय मत्स्य-मांस भक्षण कियैक करैत छथि?

दर्शन-विचार

(पंडित महेन्द्र ठाकुर संग वार्ता पर आधारित)

मिथिलाक द्विजवर्ग पर एकटा आरोप लगबैत छथि अन्यत्रक विद्वान् जे ई लोकनि मत्स्य-मांस कियैक भक्षण करैत छथि।
 
एहि सन्दर्भ आइ प्रखर पंडित श्री महेन्द्र ठाकुर सँ किछु शिक्षा ग्रहण करबाक अवसर भेटल। ओ कहलनिः
 
द्विजा: शाक्ताः सर्वेप्रोक्ताः न च शैव न वैष्णवा:
गायत्री उपासन्ते च वेदमातरं,
यतीनां अश्वारूढ़म रजोमतीनां खटवारुढं
ब्राह्मणानां काष्टधारणम यत्नतः परित्यजेत॥
 
हम श्लोक सुनिकय लिखने छी। एकर शुद्धि-अशुद्धि पर नहि जायब। एतय स्पष्ट अछि जे एहि ठामक ब्राह्मण केँ नहि त शिव केर साधक कहल गेल अछि, नहिये विष्णु केर, बल्कि ओ शक्ति यानि माता केर आराधक छथि। माताक आराधक लेल शैव आ वैष्णव धर्म केर निर्वहन करब आवश्यक नहि अछि।
 
ओना, मांसाहार केँ बहुत दृष्टिकोण सँ उचित नहि मानल जाइछ आर ओ बहस अलग अछि। लेकिन धर्म आ मीमांसा मे जँ कियो सवाल ठाढ करैत छथि, तिनका वास्ते ई बुझब आवश्यक अछि जे मिथिलाक अपन परम्परा मे बहुत रास बात आन सँ भिन्न अछि।
 
आर बहुत रास गम्भीर आ गूढ रहस्य सभ पर प्रकाश देलनि। काली जी केर ओहि प्रतिमाक वर्णन कयलनि जाहि मे एक हाथ मे नरमुंड, दोसर मे तरुआरि, तेसर मे जपमुद्रा आ चारिम अभयदान करबाक मुद्रा मे अछि, ताहि समय शिव पर लात पड़िते जिह्वा बाहर करैत लज्जानुभूति मे अबैत छथि महामाया! आर विस्तार सँ पुनः लौटब!!
 
जय शिव प्रिये शंकर प्रिये जय मंगले मंगल करो
जय अम्बिके जय त्र्यंबिके जय चण्डिके मंगल करो
 
हरिः हरः!!
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2 Responses to मिथिलाक ब्राह्मण समुदाय मत्स्य-मांस भक्षण कियैक करैत छथि?

  1. Dr. Sundar Narayan Jha

    वेद-वेदाङ्ग एवं धर्मशास्त्र-पुराण-साहित्यादिमे जीवहिंसा सर्वत्र निन्दित अछि| जीव जड एवं चेतन द्विविध अछि | जड जीवशरीर मे प्रवहणशील रक्त लाल नहि किन्तु चेतनजीवक शरीर मे प्रवाहित रक्त लाल होइत अछि | तात्पर्य ई भेल जे लता-गुल्म-वृक्ष-वनस्पति-अन्नादि जीव रहितहुं ओषधि कोटि मे अबैत अछि | ओष अर्थात् प्राण, धय अर्थात् रक्षा, तात्पर्य भेल जे प्राणरक्षार्थ ओषधिक सेवन शास्त्रानुमोदित भेल|*कलावन्नगतप्राणाः* सत्यनारायणव्रतकथा मे अतः भक्ष्य अछि | परन्तु चेतन जीव जेकर रक्त लाल होएत अछि ओ समस्त अण्डज जरायुजादि जाहि मे मत्स्यादि स्वतः अबैत अछि से अभक्ष्य बुझबाक चाही| मिथिला प्राचीन काल ई कहू जे वेदकाल सं शास्त्रमर्यादाक पालन मे तत्पर रहय वाला यज्ञीय देश अछि | ओहि वैदिक मैथिलपरम्परा मे ई अभक्ष्य सामग्री कथमपि ग्राह्य नहि छल | किछु वाममार्गी तान्त्रिक लोकनिक परम्परा मे ई अभक्ष्य नुका नुका क व्यवहार मे आयल| वाममार्गी तन्त्रक अनुष्ठाता विद्वान् दक्षिणमार्गी तान्त्रिक सं अधिक अपन महत्त्व स्थापित करबाक लेल लीचे लोकलुभावन चमत्कारादि करैत छलाह | बाद मे वाममार्गी कुकुरमुत्ता जकां घर घर पसरि गेला | फलतः ई अभक्ष्य घर घर अपन वास ल् लेलक | ई मैथिलव्यवहारक संवर्धन मे महान् अडङ्गा ठाढ अछि | एकर सर्वथा परित्याग होयबाक चाही |

  2. डा सुन्दर नारायण झा सुन्दरजी

    सुन्दर नारायण झा: लशुनं गृञ्जनं चैव पलाण्डुं कवकानि च |
    अभक्ष्याणि द्विजातीनाममेध्यप्रभवाणि च || (मनु-5/5)
    वृथा कृसरसंयावं पायसापूपमेव च | अनुपाकृतमांसानि देवान्नानि हवींषि च || (मनु-5/7)
    क्रव्यादाञ्छ कुनान्सर्वांस्तथा ग्रामनिवासिनः | अनिर्दिष्टांश्चैकशफांष्टिट्टिभं च विवर्जयेत् | | (मनु-5/11)
    बकं चैव बलाकां च काकोलं खञ्जरीटकम् | मत्स्यादान्विड्वराहांश्च मत्स्यानेव च सर्वशः || (मनु-5/14) एहि सब मे जे वर्जित अछि ओ आइ मिथिलाक विद्वत्परिवार मे प्रशस्त भ गेला सं विकृति अपन सीमोल्लङ्घन क चरम पर पहूंचि रहल छैक | तें चिन्तनीय जरूर|
    ओना हमरा ई दृढ विश्वास अछि जे मैथिलक नजरि मे हम विद्वेषी भ जायब, किन्तु जीवक हत्या हिंसा थिक “तत्र हिंसा नाम मनो वाक्कायकर्मभिः परक्लेशजननम् ” ई हिंसाक परिभाषा शास्त्र मे देल गेल अछि | आब् ओ हिंसा माँछक हो किंवा मानवक हिंसा त हिसा थिक| हिंसा मात्र नहि ई त जीवहत्या थिक | ह्त्या केनिहार हत्यारा भेला | ओही हत्यारा कें हत्यारा कहबाक जे पाप हेतैक से त हमरा लागत | किन्तु मिथिलाक विज्ञ जन एहि बात सं अवगत होथि आ जीवह्त्या सन अधार्मिक कृत्य सं परहेज करथि आनहु कें कराबथि त उत्तम होयत |
    जय सियाराम

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