कहियो मनन केलहुँ जे कि कयला सँ कि भेटल – आत्मचिन्तन केर एक अद्भुत दर्शन

दर्शन

– प्रवीण नारायण चौधरी

उद्विग्न मोनक उद्विग्नता
 
ओकर मालिक जहाँ सोझाँ अबैक कि ओ एकटा देवाल पर धक्का लगेनाय शुरू करय; मालिक देखैक जे ओ काज कय रहल अछि। ड्युटीक पक्का अछि। मालिक चलि जाय। फेर किछु कालक बाद जहाँ मालिकक एबाक बेर होइक कि ओ अपन पोजिशन मे फेरो वैह देवाल पर धक्का देनय शुरू कय दैत छल। मालिक अबैक, देखैक आ फेर ओकरा काज मे लागल देखि ओतय सँ चुपचाप चलि जाय। ई क्रम करीब-करीब सब दिन चलैक। मालिक केँ एतबे सँ सन्तोष जे ओ किछु काज मे लागल छल, ओकरा एहि सँ सन्तोष जे ओ मालिक केर नजरि मे काज कय रहल छल। नहि त मालिक केँ एहि लेल कहियो फुर्सत भेलैक जे पुछितैक जे रे तोँ ओहि देवाल पर सब दिन धक्का मारैत रहैत छँ से कि उद्देश्य छौक, काज भेलौक कि नहि, आ नहिये ओहि कामदार केँ एकरा लेल स्वयं मालिक लग किछु बजबाक छलैक। पगार पाकि जाय आ ओ अपन तलव उठाकय घर आबि जाइत छल।
 
एकर नाफा आ नोक्सान केकरा कि भेलैक ताहि पर हर पाठक स्वयं केँ एक बेर ओहि कामदार आ पुनः ओहि मालिक केर स्थान पर राखिकय सोचब, शायद पता चलि जायत, मालिक धरि मालिके रहलैक आ ओ कामदार भरि जीवन मे ओतबे काजक जे ब्यर्थहि एकटा देवाल पर धक्का मारिकय मालिकक नजरि मे काज मे इंगेज रहबाक नियत रखलक, ओहो एहि सँ फाजिल ऊहि नहि सीखि सकल। भगवानक घर सँ लिखबाकय आयल छल जे ओकर मालिक ओकरा अहु लेल पगार दैत रहलैक। एकर रहस्य मालिक बहुत बाद मे खोललाह जे पिताजी कहने छलखिन जे ई आदमी किछु करौक, एकरा नौकरी सँ बाहर नहि करिहें, एकर बाप-पुरुखा बहुत धर्म अर्जित कएने छैक, एकर कोढिपना सँ परित्यक्त धर्म तूँ एकरा पगार दय केँ हासिल करैत रहिहें।
 
आब अहाँ गौर करू आ देखू – मिथिलाक लोक केकर प्रजा थिक – राजा जनकक। राजा जनक केर मिथिला मे आध्यात्मिक स्थिति कतेक प्रबल छल जे भैर संसारक लोक गृहस्थी धर्म निर्वाह करैत आध्यात्मिक बल कोना अर्जित कयल जाय ताहि शिक्षा लेल जनकक दरबार मे आबथि। एक सँ बढिकय एक विद्वान्, ऋषि-मुनि, संत-महात्मा, कर्मठ-पुरुषार्थ सँ भरल किसान, व्यवसायी, पेशाकर्मी, न्यायविद्, पंडित आ अपन कर्म आधारित भिन्न-भिन्न घरेलू पेशा वला जाति-बिरादरीक आम जन समुदाय – सब कियो धर्मक आचरण मे धर्म केना अर्जित करब, बस ताहि जीवन पद्धति मे अपना केँ अग्रसर करय। चोर-ढोंढाई-मंगनू सेहो जरूरे हेता, लेकिन तेहेन कोनो खास कथा ताहि समयक मिथिला सँ बदनाम लोकक, दुर्जनक, दुष्टक, क्षुद्र आदिक नहि कतहु पढय लेल भेटल अछि एखन धरि।
 
तखन कालान्तर मे पारम्परिक खिस्सा मे कतेको ठकविद्या मे माहिर महान् गोनू झा टाइप केर कथा-गाथा जरूर भेटैत अछि। स्वयं जाहि डार्हि पर बैसल छलाह तेकरे काटि रहल देखि मूर्खाधिराज मनुक्ख मानिकय विद्योतमा सँ विवाह करौनिहार कतेको कुटिल पंडित-विद्वान् लोकनि जाहि महामानव ‘कालीदास’ केँ तकलनि सेहो मूर्खाधिराज मिथिलाक माटि-पानि मे सुशिक्षित पंडित बनिकय मेघदूत समान महान् काव्य केर रचना कय दैत छथि, लेकिन धीरे-धीरे एहि मिथिला मे आध्यात्मिक उपलब्धि घटैत चलि जाइत अछि, लोक सब विदेहपंथ सँ इतर हाँव-डाँव करैत डोकहर आ शुतुरमुर्ग बनिकय लालच, लोभ, संग्रह प्रवृत्ति, हिंसक, आ घातक बनैत चलि जाइत छथि। एकटा कहबी चलैत छैक मिथिला मे जे पहिने धान नहि चाउरे फरैत रहैक, मुदा मिथिलाक लोकक धर्मक जखन ह्रास होबय लागल आ कतहु सँ भैर-पोख भोज खा कय लौटि रहल छलाह, तखन ओ चाउर फरल देखि नहि रहल गेलनि त चाउरे सुरैरि-सुरैरि फक्का मारब शुरू कय देलनि – एहि तरहें दरिद्रा ओहेन लोक पर सवार भऽ गेल।
 
दरिद्रताक आगमन तखनहि होइत छैक जखन गुरु-आश्रम सँ भेटल चना-चाउरक भुज्जा कृष्ण-सुदामा बीच बराबर नहि बँटायल, कृष्ण गाछ पर चढला जारैन तोड़य, एम्हर चोरा-चोराकय सुदामा असगरे ओहि भुज्जा केँ पाबि गेलाह। दरिद्रा तखनहि दूर भेलनि जखन मांगि-चांगिकय आनल वैह चाउरक भुज्जा केर सनेश लय द्वारकाधीशक दरबार मे गेलाह आर कृष्ण ताहि भुज्जा केँ अनुपम सनेश मानि सुदाम सँ छीनिकय भोग लगौलनि, एम्हर सुदामाक भाग्य मे आयल दरिद्रा स्वतः भागि गेल आ कोठा-सोफा-धन-धान्य आ राजपाट सँ ओ सम्पन्न भऽ गेलाह। जखन कि कृष्णक दरबार सँ लौटैत समय कृष्ण द्वारा ओढायल गेल ओढना सेहो वापस मांगि लेलापर ओ मोने-मोन जरूर सोचने हेताह जे मित्र त खाली हाथ लौटेलनि… लेकिन से बात नहि छलैक, ओ जे स्वयं अपन कर्म मे कोंढ लगेबाक काज बाल्यकाल मे गुरु आश्रम मे कयलनि, से पतिया केँ कटेबाक लेल कृष्ण आइ एतेक कठोर बनि गेल छलाह। लेकिन बाकी सुदामा केर धर्मक जाँच मे कहियो ओ अधर्म, अनीति, क्रोध, हिन्सा, लालच, लोभ, पाप मे नहि फँसि काफी किछु अर्जन कय लेने रहथि, हुनकर वैह जमा पूँजी केँ द्वारकाधीश कृष्ण लौटाकय रातोरात हुनका राज्य केर अधिपति बना देलनि।
 
कहब जे कहय लेल कि चाहि रहल छी..! कहब एतबे अछि जे हम मिथिलावासी आइ दर-दर जे भटकि रहल छी ताहि पर आत्मचिन्तनक बेर अछि। बाबा पोखरि खुनौलनि, ओ संघर्ष केलाह आ सन्तान सब केँ सुखी रहबाक सब उपाय निरूपित कयलनि। लेकिन आइ हमरा लोकनि पानि-पानि लेल तरैस रहल छी। अहिल्या उद्धार भऽ गेलीह, मुदा अहिल्या कियैक शापित भेल छलीह से शाप आइ हमरा लोकनि हँसी-खुशी माथ पर चढा रहल छी। जे अपन पुरुखाक मान-सम्मान नहि राखि सकत, ओ बाकी मैथिलत्व केर बात कि करत? बड़का-बड़का सभा आ आयोजन अगबे देवाल पर धक्का मारय लेल आ मालिक (देव-पितर) केँ देखबय लेल जँ काज भेल बुझि रहल छी, तँ बात बेकारे भेल बुझू। देवता-पितर केँ किछु नहि फर्क पड़तनि, ओ भले गोसाउनिक घर मे बड़का ताला मारल केबाड़क भीतर, मकरजाल, झोल, गन्दगी मे स्वयं केँ देखि रुसि जाइथ – लेकिन तथापि आध्यात्मिक स्वरूप “निर्गुण रूप” हुनकर ओतबे तेजस्वी आ विदेह नीति पर जाज्ज्वल्यमान रहत, हम-अहाँ सोची जे हमर-अहाँक गन्तव्य कतय-कतय विश्व भरि मे भटैककय आ झूठक देखाबा मे मटैककय बीति रहल अछि।
 
हरिः हरः!!
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One Response to कहियो मनन केलहुँ जे कि कयला सँ कि भेटल – आत्मचिन्तन केर एक अद्भुत दर्शन

  1. Hemant Kumar Jha

    बहुत सुन्दर उपमाक सँग आलेख लिखल। यथार्थ पूछी त’ आई काल्हि यैह भइये रहल अछि देवार के धक्का लगबय बला। बहुतो लोक के शायद बुझबा में नहि आबनि लेकिन गंतव्य त’ निश्चित करहि पड़तैन्ह।

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