श्री राम केर ओ प्रेम भरल सन्देश जे सुनि सीता भेल छलीह आश्वस्त, हनुमान जी केँ देलीह आशीर्वाद

आध्यात्मिक चर्चाः सीता जी संग हनुमान जीक पहिल भेंट
 
(श्री सीता-हनुमान्‌ संवाद)
 
रामायण सँ सब कियो परिचित छी। एक राजकुमार केँ युवराज घोषित कयलाक बाद हुनका संग परिस्थिति बिपरीत होइत छन्हि। युवराज बनबाक बदला हुनका १४ वर्ष लेल वनवास केर कठोर आज्ञा भेटैत छन्हि। राजा पिता द्वारा विमाता (सत-माय) प्रति देल वचनबद्धताक गलत लाभ उठबैत जीवन मे सुख आ सत्ता भेटबाक बदला दंड समान राज्य निर्वासन भेटब कतेक बिपरीत परिस्थिति भेलैक से सहजहि अनुमान लगा सकैत छी। लेकिन, मर्यादा केँ निर्वहन करबाक पौरूष सँ सम्पन्न श्रीराम पिताक ओहि आज्ञा केँ हँसैत-विहुँसैत शिरोधार्य करैत वन लेल प्रस्थान करबाक तैयारी मे लागि जाइत छथि। परिवार मे बड़ा कौतुक केर विषय बनि जाइत छन्हि, अपन माय कौसल्या काफी दुःखी होइत छथि, दोसर विमाता सुमित्रा सेहो दुःखी छलीह, एक कैकेयी आ हुनकर कुटिल सहायिका छोड़ि दोसर कियो एहि सँ सुखी नहि भेल। नव-नव विवाह भेल छलन्हि – श्रीराम भार्या सीता पर कि बीतल हेतनि से स्वतः सोचय योग्य विषय भेल। तथापि, सीता जे धर्म आ कर्तव्य परायण स्त्री शक्ति छलीह, ओ विपत्ति मे पतिक संग स्वयं वनवास हेतु निर्णय कय लेलीह। कतबो लोक बुझेलकनि, ओ नहि मानलीह। स्वयं राम सेहो थाकि गेलाह, सीता संग जेबाक जिद्द पर अड़ल रहलीह। अनुज लक्ष्मण सेहो हुनका (राम) केर संग सेवक केर रूप मे जेबाक निर्णय केलाह। वनगमन जे करबाक छल से तपस्वीक वेश मे, नहि कि युवराज आ राज्यक सहायता मे सब सुविधाक संग….! ई सब कथा-गाथा सँ बहुतो गोटे परिचित छी।
 
आइ जे प्रसंग विशेष तौर पर हम एतय राखब ओ थिक जानकी जी केर रावण द्वारा अपहरण केलाक बाद एक दिश राम-लखन हुनका ताकैत-ताकैत सुग्रीव आ जाम्बवंत जी धरि पहुँचल छथि, दोसर दिश सीता जी अशोक वाटिका मे रावण केर राक्षसी पहरेदार सभक बीच दुःख-दारुण सँ भरल अत्यन्त शोक मे डूबल समय बिता रहली अछि। एम्हर जाम्बवंत जी द्वारा हनुमानजी केँ प्रेरित कय हुनकर आत्मबल सँ हुनका साक्षात्कार करबैत एहि चुनौतीपूर्ण कार्य लेल तैयार कयलनि तदनुसार हनुमानजी सेहो समुद्र लांघिकय लंका पहुँचैत छथि आर विभीषण जी सँ सीता जीक अशोक वाटिका मे रहबाक बात बुझि बहुत छोट बानर केर रूप धय अशोकक गाछ पर बैसि सीता जी संग भऽ रहल व्यवहार देखैत छथि। रावण केर एनाय, सीता जी केँ अपना दिश एक बेर देखबाक दुराग्रह पर सीता जी द्वारा फटकार लगायब आ हजारों सूर्य समान तेजस्वी श्रीराम केर शक्तिक सोझाँ खद्योत (भगजोगनी) रूपक रावण केँ अपन सीमा बुझेनाय – राक्षसी सब द्वारा त्रास आ पुनः त्रिजटा नामक राक्षसी द्वारा ओकरा द्वारा देखल गेल सपना मे लंका आ रावणक हानिक दृश्य सब कहला पर राक्षसी सभ डरे ओतय सँ किनार लगैत अछि – ई सब बात जे सुन्दरकांड मे तुलसीदास जी द्वारा सुन्दर भावक संग वर्णन कयल गेल अछि, ताहि मे ‘सीता-हनुमान संवाद’ केर प्रसंग अत्यन्त प्रेरणादायक, मनमोहक आ बेर-बेर हृदयंगम् करय योग्य अछि। एहि सब स्थिति सँ सीता जी एकदम शोक आ विरहाग्नि मे जरि रहली अछि, लेकिन आब अवस्था एहेन छन्हि जे ओ जियय लेल नहि चाहि रहली अछि…. ओ आकाश दिश ताकि अंगाररूपी तारा केँ अग्नि प्रकट करबाक इच्छा रखैत छथि…. ओ अशोक गाछ सँ शोक हरण लेल अग्नि प्रकट करबाक इच्छा रखैत छथि…. आर फेर……
 
सोरठा :
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार लीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥
 
सोरठा – सो रट, से याद करू – कि याद करबः
 
दीन्हि मुद्रिका डारि तब, कपि करि हृदयँ बिचार।
लीन्ह हरषि उठि कर गहेउ, जनु असोक अंगार॥
 
तखन हनुमान्‌जी हदय मे विचारिकय (सीताजीक सामने) अँगूठी फेंकि देलनि, मानू अशोक गाछ हुनक मनोवांछित अग्नि हुनका देलकनि, से बुझिकय हर्षित होइत उठिकय ओकरा हाथ मे लय लेलीह।
 
‘अहो! ई त मुद्रिका थिक। ई त ओ अंगूठी थिक जे स्वयं जानकी जी श्री राम जी केँ पहिरेने छलीह। एहि पर राम जीक नाम अंकित अछि।’ – सीताजी चकित छथि, चित्त चंचल छन्हि लेकिन ओ औंठी चिन्हि रहली अछि। विस्मित सेहो छथि। आखिर ई मुद्रिका एतय केना आबि गेल… चकुआइत चारू कात तकैत छथि सीता।
 
घबराहट मे ओ किछु नहि बुझि रहली अछि, लेकिन रघुराई केर वीरता पर हुनका बड पैघ विश्वास छन्हि। ई विश्वास त ओही दिन भेल छलन्हि जहिया संसार भरिक राजा ‘शिवधनुष’ केँ हिला तक नहि सकल छल, लेकिन देखय मे परम सुकुमार श्रीरामचन्द्र जी ओहि धनुष केँ फूल जेकाँ हाथ मे उठा लेने रहथि। ओकर प्रत्यंचा चढबैत ओ धनुष खंडित भऽ गेल छल। पुष्टवृष्टि आ आकाशवाणी सब बात सीता जी स्वयं ओहि क्षण केर याद कयलीह आर विश्वास करैत कहैत छथिन –
 
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥
 
“श्री रघुनाथजी तऽ सर्वथा अजेय छथि, हुनका के जीति सकैत अछि? और माया सँ एहेन अँगूठी बनायल नहि जा सकैछ।”
 
सीता जी मोन मे अनेकों तरहक बात सब विचारय लगलीह, तखनहि हनुमानजी रामचंद्र जीक गुणक वर्णन करय लगैत छथि जे सुनिते सीता जीक दुःख भागि जाइत अछि। ओ एकदम ध्यानपूर्वक सब कथा सुनय लगैत छथि। आदि सँ अन्त धरि सब कथा हनुमान जी हुनका सँ सब बातक वर्णन करैत छथि जे वास्तव मे घटल अछि, वनगमन सँ अपहरण धरिक आ वर्तमान समय सीता सँ राम केर बिछुड़न धरिक कथा। ई कथा सुनिकय सीता जी केँ अपन मानसिक स्थिति सब बात दोहरायल जेकाँ लगैत छन्हि। ओ आब कथाकार सँ संबोधित होइत कहैत छथि, “अरे, एतेक सुन्दर अमृत समान सुनयवला कथा सुनेनिहार, अहाँ सोझाँ कियैक नहि आबि रहल छी?” तखन हनुमान जी हुनका लग एलाह। लेकिन ई की? लग अबिते देरी सीता जी मुंह फेर लेलखिन! कारण ई कथा कहयवला एक गोट बानर कोना भऽ सकैत छथि! हमहुँ-अहाँ जँ एहि तरहें कतहु घटित होइत देखब त कदापि विश्वास नहि होयत।
 
हनुमान जी परिचय दैत कहैत छथिन –
 
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥
 
हे माता, हम राम जीक दूत छी। शपथपूर्वक कहि रहल छी। ई औंठी हमहीं अनलहुँ। राम जी हमरा अहाँक वास्ते चिन्हबाक निशानीक तौर पर ई देलनि।
 
सीता जी केर प्रश्न फेर छन्हि, “कहू त नर आ बानर केर संग कोना भेल?” फेर हनुमान जी हुनका सँ सब वृत्तान्त कहिकय सुनबैत छथि। सीता जी सप्रेम सब वचन सुनैत छथि। हुनकर मोन मे विश्वास उत्पन्न भेलनि। ओ ई बुझि गेलीह जे ई (हनुमान जी) मन, वचन आ कर्म सँ कृपासागर श्री रघुनाथ जी केर दास थिकाह।
 
भगवानक सेवक केर रूप मे जनैत देरी आरो गाढ प्रीति सँ भरि, आँखि मे नीर भरैत पुलकित शरीर सँ सीता जी हुनका सँ कहलखिन जे विरहसागर मे डूबैत हमरा लेल अहाँ जहाज छी। अहाँक कतेक प्रशंसा करी! कहू कुशल, राम जी छोट भाइ लखन जी सहित केना छथि? हे हनुमान! ओ त बड़ा कोमल हृदय आ कृपालु छथि, तखन एना हमरा सँ दूर कियैक छथि? ओ एहेन निष्ठुर केना भऽ सकैत छथि? सेवक केँ सुख देनाय हुनकर स्वाभाविक बाइन छन्हि। ओ कहियो हमरा यादो करैत छथि की? हे हनुमान! कि कहियो हुनकर कोमल साँवला अंग (शरीर) देखिकय हमर नेत्र शीतल होयत? एतेक कहैत सीता जी फफैक-फफैक कय कानय लगैत छथि, किछु बाजल नहि होइत छन्हि। सिर्फ एतबे कहैत ‘हे नाथ, अहाँ हमरा एकदम बिसैर गेलहुँ!’ कहिकय ओ अत्यन्त भावुक-व्याकुल बनि जाइत छथि।
 
तखन हनुमान जी हुनका सँ विनीत वचन कहैत छथि –
 
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानह जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥
 
माँ! प्रभु अनुज सहित कुशल छथि, लेकिन अहाँक दुःख सँ ओहो दुःखी छथि। हे माता! अहाँ एकदम दुःख नहि करू। श्री रामचन्द्र जी केर हृदय मे अहाँ सँ दुगुना प्रेम छन्हि।
 
तदोपरान्त श्रीरघुनाथ जीक सन्देश जे सुनबैत छथि हनुमान जी तेकर अनुपम प्रस्तुति श्रीतुलसीदास जी केर अनुपम शब्द मे बेर-बेर पढय आ मनन करय योग्य अछि –
 
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥
 
 
श्री रामचंद्रजी कहलनि अछि जे “हे सीते! अहाँक वियोग मे हमरा लेल सब किछु प्रतिकूल भऽ गेल अछि। गाछक नव-नव पत्ता मानू आगिक समान, रात्रि कालरात्रिक समान, चंद्रमा सूर्यक समान, और कमल केर वन भालक वन केर समान भऽ गेल अछि। मेघ मानू खौलैते तेल बरसाबैत हुअय। जे हित करयवला छल, ओहो सब पीड़ा देबय लागल अछि। त्रिविध (शीतल, मंद, सुगंध) वायु साँप केर साँसक समान जहरीला आ गरम भऽ गेल अछि। मन केर दुःख कहि देला सँ सेहो किछु घटि जाइत अछि। मुदा कहू केकरा सँ? ई दुःख कियो नहि जनैत अछि। हे प्रिये! हमरा आर अहाँक प्रेमक तत्त्व (रहस्य) एकटा हमरहि मन टा जनैत अछि। आर से मन सदा अहीं लग रहैत अछि। बस, हमर प्रेमक सार एतबे मे बुझि लेब।
 
प्रभु केर संदेश सुनिते जानकी जी प्रेम मे मग्न भऽ गेलीह। हुनका अपन शरीरहु केर सुधि नहि रहि गेलनि।
 
हनुमान्‌जी कहलखिन – “हे माता! हृदय मे धैर्य धारण करू आर सेवक केँ सुख देनिहार श्री राम जी केर स्मरण करू। हुनकर प्रभुता केँ हृदय मे आनू आर हमर वचन सुनिकय अपन हारल मानसिकता केँ बदलू। हृदय मे धैर्य धारण कय श्रीरामचन्द्र जी केर प्रताप आ वीरताक आगाँ एहि सब राक्षस केँ मारले गेल बुझू। जँ हुनका पहिने सँ खबर भेटि गेल रहितनि त ओ थोड़बे न देरी करितथि। रामबाणरूपी सूर्य केर उदय होइते राक्षसक सेनारूपी अन्हरिया कतय रहि सकैत अछि? हम त अहाँ केँ एखनहिं लय केँ चलि दीतहुँ, मुदा से प्रभुजीक आज्ञा नहि अछि। तेँ हे माता! किछु दिन आरो धीरज धरू। श्री रामचंद्र जी वानर सहित एतय औता आर सब राक्षस सब केँ मारिकय अहाँ केँ लय जेता। नारद आदि (ऋषि-मुनि) तीनू लोक मे हुनकर यश गायल जायत।
 
सीता जीः हे पुत्र! सब वानर अहीं जेकाँ छोट-छोट होयत, राक्षस सब तँ बड़ा बलवान योद्धा सब अछि? अतः हमर हृदय मे बड़ा भारी संदेह होइत अचि जे अहाँ सब जेहेन बंदर एहि राक्षस सब केँ कोना जीति सकब?
 
हनुमान जी तखन अपन विशालकाय शरीर प्रकट करैत छथि। सोनाक पर्वत सुमेरु केर आकार केर विशाल शरीर रहनि जे युद्ध मे शत्रु सभक हृदय मे डर उत्पन्न करयवला अत्यंत बलवान आ वीर छल। सीताक मोन मे तखन विश्वास भेलनि हनुमानजी फेर छोट रूप धारण कय लेलनि।
 
हनुमान जीः
 
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥
 
हे माता! सुनू माता, वानर मे बहुत बल-बुद्धि नहि होइत छैक, लेकिन प्रभु केर प्रताप सँ बहुत छोट साँप सेहो गरुड़ केँ खा सकैत अछि। अर्थात् अत्यन्त निर्बल बहुत अधिक बलवान् केँ मारि सकैत अछि।
 
भक्ति, प्रताप, तेज और बल सँ भरल हनुमान जी केर वाणी सुनिकय सीताजीक मोन मे काफी संतोष भेलनि। ओ श्रीरामजीक प्रिय मानिकय हनुमान जी केँ आशीर्वाद दैत कहलखिन, “हे तात! अहाँ बल और शील केर निधान होउ।”
 
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥
 
हे पुत्र! अहाँ अजर (बुढ़ापा सँ रहित), अमर और गुणक खजाना होउ। श्री रघुनाथजी अहाँ पर बहुत कृपा करथि।
 
‘प्रभु कृपा करथि’ एतेक अपन कान सँ सुनिते हनुमान जी पूर्ण प्रेम मे मग्न भऽ गेलाह। बेर-बेर सीताजीक चरण मे सिर नवौलनि आर फेर हाथ जोड़िकय कहलाह – “हे माता! आब हम कृतार्थ भऽ गेलहुँ। अहाँक आशीर्वाद अमोघ (अचूक) होइछ, ई बात प्रसिद्ध अछि। हे माता! सुनू, सुंदर फल फरल एहि गाछ-वृक्ष सब केँ देखिकय हमरा बड भूख लागि गेल अछि। आब अपने हमरा आज्ञा दी जे हम अपन भूख मेटाबी।”
 
सीता जी हुनका फेरो कहैत छथिन जे बौआ, एतय बड़का-बड़का पहलमान राक्षस सब रखबारि करैत अछि, से सावधान रहब। हनुमान जी हुनका कहलखिन जे ओकरा सभक चिन्ता हमरा नहि अछि, अहाँ खाली हुक्म दऽ दिअ।
 
आर फेर … सब केँ बुझले अछि। नहि त फेर कोनो दिन कहब… हम अपन शैली मे!! 🙂
 
हरिः हरः!!
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