उपनयन-जनेऊ केर महत्व आ मिथिलाक अनुपम संस्कार पद्धति

जनेऊ केर महत्व
 
ई फोटो साभार फेसबुक सँ लेल अछि। सम्भवतः उपनयन में चरखा कटबाक सूत काटि जनेऊ बनेबाक उपक्रम केर दृश्य देखा रहल य। लेकिन आब ई सब विध-व्यवहार आ शुद्धताक संस्कार हम सब छोड़ि रहल छी। हम सब मशीनक बनल धागा सँ जनेऊ नाम लेल तैयार कयल पहिरतो छी, कतेको लोक सेहो छोड़ि देलहुँ….!
 
जनेऊ संस्कार केर अर्थ मोट मे आश्रम परिवर्तन होइत छैक। बाल्यकाल सँ ब्रह्मचर्य आश्रम मे प्रवेशक आ वेदारम्भ करबाक विशिष्ट आध्यात्म एहि संस्कार जेकरा हम सब उपनयन सेहो कहैत छियैक ताहि मे निहित छैक। मात्र एतबे आध्यात्म केर परिपूर्त्ति वास्ते अनेकानेक कर्मकांडीय विधि-व्यवहार मिथिला मे प्रचलित अछि। उद्योग, बँसकट्टी, मड़बबन्ही, चरखकट्टी, यज्ञ हेतु विभिन्न सामग्री जुटायब, पुनः वैदिक यज्ञारम्भ लेल आचार्य आ ब्रह्मा आदिक संग बरुआ सहित मड़बा पर हवनादि करैत मंत्र ग्रहण करब, जनेऊ धारण करब आर पुनः भिक्षा आदिक मांग करैत सविध मुण्डन आ पवित्र जल सँ स्नान कय नव-वस्त्र आदि धारण कय चुमाउन करैत दुर्वाक्षत सँ जेठजनक आशीर्वाद लैत ब्रह्मचर्याश्रम मे प्रवेश करैत वेद पढबाक अधिकारी बनि ओहि दिशा मे बढब, यैह होइत छैक ‘उपनयन’ संस्कार, जेकर आरो कय गोट नाम सँ विभिन्न स्थान पर जनेऊ पहिराओल जाइत छैक।
 
जनेऊ केँ उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र सेहो कहल जाइछ। जनेऊ धारण करबाक परम्परा बहुते प्राचीन छैक। वेद मे जनेऊ धारण करबाक लेल कहल गेल छैक। सूत सँ बनल ओ पवित्र धागा जेकरा यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बायाँ कंधाक ऊपर तथा दाहिना हाथक नीचाँ सँ पहिरैत छथि, यज्ञ द्वारा संस्कार कयल गेल जनेऊ या यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र केँ विशेष विधि सँ ग्रन्थित कय केँ बनायल जाइछ। एहि मे सात गोट ग्रन्थि लगायल जाइत छैक। ब्राम्हणक यज्ञोपवीत मे ब्रह्मग्रंथि होइत छैक। तीन सूत्र वला दुइ गोट यानी छः तानी जाहि मे तीन अथवा पाँच परवल (प्रवर रूपी बंधन – ब्रह्मग्रन्थ) सहितक एहि यज्ञोपवीत केँ गुरु दीक्षा केर बाद हमेशा धारण कयल जाइछ। तीन सूत्र हिंदू त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश केर प्रतीक होइत छैक। अपवित्र भेला पर यज्ञोपवीत बदैल लेल जाइछ। बिना यज्ञोपवीत धारण कयने अन्न-जल ग्रहण नहि करबाक चाही, सेहो कहल जाइछ।
 
‘उपनयन’ केर अर्थ होइछ ‘समीप अननाय’। यानी ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान केर समीप अननाय। हिन्दू धर्म केर २४ संस्कार मे सँ एक ‘उपनयन संस्कार’ केर अंतर्गत जनेऊ पहिरल जाइछ। यज्ञोपवीत धारण करयवला व्यक्ति केँ सब नियम केर पालन करब अनिवार्य छैक, जेना नित्य संध्या, गायत्री जप, शौच करबाक समय जनेऊ कान (गंगाक्षेत्र) मे राखिकय प्रक्षालन लेल उचित जल सहित शौचालय गमन करब, आदि। जनेऊ केँ मूत्र विसर्जन वा मल विसर्जन करबाक समय मे कान पर चढ़ाकय दु सँ तीन बेर बान्हल जाइछ, कहल जाइछ जे जनेऊ धारण करबाक बहुत रास फायदा होइत छैक जाहि मे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रेन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय केर रोग सहित अन्य संक्रामक रोग नहि होइत छैक।
 
यज्ञोपवीत धारण करबाक मन्त्र छैक –
 
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
 
एहि मे सेहो वाजस्नेयी आ छंदोग सम्बन्धी किछु फरक मंत्र छैक जे एतय उल्लेख नहि कय रहल छी।
 
आइ लोक शहरी परिवेश मे सब काज करय लागल अछि। सुविधाक नाम पर अशुद्ध आचरण करब कतहु न कतहु नीक संकेत नहि मानल जा सकैछ। शुद्धता मे जे संस्कार आ सभ्यताक पृष्ठपोषण छैक ताहि सँ आगामी पीढी लेल सेहो कल्याणक मार्ग प्रशस्त करब। उपनयन मे किछु व्यवहार एहेन छैक जाहि मे कुल-देवताक सान्निध्यक बड पैघ महत्व छैक। मातृका पूजन, नन्दीमुख श्राद्ध, व गोटेक कर्मकाण्डीय व्यवहार जे उपनयन मे निर्दिष्ट अछि ताहि मे गाम-घर बेसी महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन करैत अछि। व्यवहार मे शुद्धता लेल उचित वातावरणक संग सब काज अनुभवी समाजक संग बड़ा आराम सँ पूरा भऽ जाइछ। ताहि हेतु विशेष रूप सँ मैथिल ब्राह्मण समुदाय केँ एहि महत्वपूर्ण यज्ञक आयोजन सदिखन गाम-घर मे आयोजित करबाक चाही। एहि मे संछेपीकरण सँ भविष्यक पीढी केँ आर बेसी विकृति अपनेबाक दिशा मे डेग नहि बढाबी, ई चेतना हो, ताहि लेल एहि लेख केँ एतय प्रकाशित कयल गेल अछि।
हरिः हरः!!
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