जानकी नवमी विशेष – हुनक विभिन्न स्वरूप आ भिन्न-भिन्न चरित्र-लीला सँ अनुकरणीय शिक्षा

जानकी नवमी विशेष – आध्यात्मिक चिन्तन

– प्रवीण नारायण चौधरी

जानकी नवमी पर प्रवीण शुभकामना

१९३५ ई. मे उपेन्द्र महारथी द्वारा बनायल गेल ई चित्रालेख मे सीताजी फूल लोढबाक क्रम मे गिरिजास्थान मन्दिर समीप देखाइत छथि! साभार – शंकरदेव झा

पराम्बा जानकी – जगदम्बा जानकी – जनकसुता जानकी – भगवतीक ओ स्वरूप जाहि मे ओ परम साधारण मानवीय नारीक भूमिका मे बिना कोनो खास चमत्कारिक शक्ति प्रदर्शन कएने अपन मानवीय लीलाक प्रस्तुति कयलीह – विवाहोपरान्त पति केँ वनवासक आदेश भेलापर स्वयं सेहो पतिक संग वन जेबाक जिद्द रोपिकय सिया सुकुमारि वनवास जेहेन कठोर यातना केँ वीर पतिक एकमात्र छाया मे जीबय लेल वन गेलीह, वर्षों धरि वन केर निर्जन जीवन बितेलीह आ पति ओ दिअर लक्ष्मण संग वन-जीवन मे रमि गेलीह, ई सब सहज चरित्र सदिखन मोन केँ छू दैत अछि।

 
चमत्कार त ओ बच्चे मे कयलनि जे माता सुनयना केँ सहयोग करय वास्ते कहियो भगवती घर निपय गेलीह त शिवधनुष जे ओतय राखल छल तेकरा बाम हाथ सँ उठाकय बड़ा अलौकिक कार्य कय देलीह, जे बात जनक-सुनयना देखि लेने छलाह आर ताहि कारण ओ सब सीता लेल वर केर स्वयंवर रचेबाक लेल धनुष यज्ञ केर संकल्प कय लेने रहथि। हमर आध्यात्मिक गुरुदेव केर अनुसार सीताजी सर्वश्रेष्ठ देवनारी सिद्ध भेलीह। ब्रह्मा जी ओतय एहि बातक निर्णय सर्वसम्मति सँ सिद्ध भेल जे दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, आदि विभिन्न जगज्जननी स्वरूप मे ‘सीता’ सर्वश्रेष्ठ सिद्ध भेलीह। एकरो बहुत रास तर्क आ समर्थन विन्दु सब छैक। ताहि पर चर्चा अन्य लेख मे।
 
सर्वसुलभ रामचरितमानस वा रामायण मे वर्णित सीताक साधारण मानवीय नारीक चरित्र आ एकटा आम नारी जेकाँ कष्ट, विपत्ति, संकट आदिक सामना करैत पतिक अनुगामिनी नारी बनिकय हिनका द्वारा प्रस्तुत चरित्र सर्वश्रेष्ठ आ अनुकरणीय अछि।
 
जानकी जी केर चरण मे बेर-बेर प्रणाम!!
 
भगवान् राम और सीता केर चरित्र व लीला केँ प्रणाम!! भगवान् राम अपन गुणक कारण मर्यादा पुरुषोत्तम कहाइत छथि। आउ, सीता जी केर बारे मे किछु विशेष बात बुझबाक प्रयत्न करैत छी।
 
१. सीताक नाम रामचरितमानस मे १४७ बेर उपयोग कयल गेल अछि।
 
२. सीताक विवाह राम संग बाल्यकालहि मे संपन्न, १८ वर्ष मे ओ पति संग वनगमन कयलीह। ३३ वर्षक अवस्था मे अयोध्या नरेश श्रीराम केर पत्नीक रूप मे महारानी बनलीह।
 
३. लंकेश द्वारा अपहृत भेलाक बाद कुल ४३५ दिन लंका मे रहलीह। कहल जाइछ जे असल सीताक स्वरूप अग्निदेव केर पास छल, अपहृत सीता सिर्फ हुनकर छाया-स्वरूप छलीह।
 
४. विवाहक बाद सीता कहियो अपन नैहर नहि आबि पेलीह। वनगमन केर समय पिता जनक द्वारा आग्रह कयलाक बादो ओ पतिक संग वनगमन करबाक इच्छा जतेलीह।
 
५. जतय भगवान् श्रीराम सरयू मे जलसमाधि लय शरीर त्याग कयलनि ओतय सीताजी सशरीर परलोक गमन कयलीह।
 
ई ५ गोट जनतबक एक गोट छोट युट्यूब जानकारी सुनलहुँ से आइ रखलहुँ एतय।
 
हमर मिथिलाक एक विद्वत् परम्परा मे सीता जी द्वारा सहस्रबाहु संग युद्ध जखन ओ राम केँ बन्दी बना लेने छलथि, ताहि युद्धवीरा परमयोद्धा सीताक एक स्वरूप आइ-काल्हि काफी चलैत अछि। एहि स्वरूप मे मूर्त्तिकारक कल्पना हुनक बाम हाथ मे धनुष देने अछि, त दाहिना हाथ अभय मुद्रा मे देखौने अछि। चमकैत-दमकैत आभामंडल सँ परिपूर्ण सीताक ई चित्र हमर उपरोक्त भाव मे द्वंद्व सृजन करैत अछि, तथापि गुरुदेव कहैत छथि जे अहाँ के होइत छी द्वंद्व मे फँसनिहार… जखन ओ सर्वशक्तिमान् भगवती छथि आर विभिन्न भक्त हुनका जाहि कोनो रूप मे भावपूर्ण ढंग सँ देखि रहल छथि, ताहि मे अहाँ अपन भावनाक स्वरूप मात्र निर्णीत कहनिहार के होइत छी… तऽ हम द्वंद्वहीन भाव सँ जगन्माता जानकीक हर रूप प्रति नमस्कार अर्पण करैत छी। हमरा हुनकर सहज भाव स्वरूप नीक लगैत अछि, दर्शन सँ मोन नहि अघाइत अछि।
 
एकटा आरो नव स्वरूप उपेन्द्र महारथी द्वारा चित्रकारिता मार्फत राखल जेबाक सत्य हालहि मैथिलीक साहित्यकार शंकरदेव झा केर मार्फत भेटल। ओहि मे जानकी जी केर चित्रण फुलबारी मे फूल लोढय कालक प्रस्तुत कयल गेल अछि। ईहो स्वरूप मे हुनकर रमणीय लीला जतय पहिल बेर दशरथ राजकुमार संग भेंट होयबाक बात रामायण गेलक अछि ताहि समयक होयबाक कारण बुझू जे मोन केँ एकदम हर्षान्वित करयवला अछि।
 
बेसी बात नहि – आइ जानकी नवमी जाहि दिन भगवती महान् अकाल सँ मिथिला केँ मुक्त करबाक उद्देश्य सँ कयल गेल राजा जनकक हलेष्ठि यज्ञ सँ अवतरित भेलीह – हरक अग्रभाग ‘सीत’ सँ हुनक जन्म भेल आर ओ ‘सीता’ कहेलीह, बस हुनका बेर-बेर प्रणाम करैत अपन मानव जीवन केँ पार लगेबाक प्रार्थना करैत छी।
 
जगज्जननी जानकी जी की जय!!
 
अपना किशोरी जी के टहल बजेबय यौ हम मिथिले मे रहबय
हमरा नहि चाही चारू धाम…. हम मिथिले मे रहबय!
साग-पात खोंटी हम दिवस गमेबय… यौ हम मिथिले मे रहबय
हमरा नहि चाही सुख आराम… हम मिथिले मे रहबय!
अपना किशोरी जी के टहल बजेबय…..!!
 
हरिः हरः!!
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