मिथिलाक वैवाहिक उत्सव आ ‘स्वयंवर’ प्रथा पर एक सुझाव

विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

मिथिलाक विवाह मे नवका प्रचलन ‘स्वयंवर’ केर रीत – एक सुझाव

मानैत छी जे हमरा लोकनि आब मूल गाम-ठाम सँ प्रवासक जीवन जिबाक लेल बाध्य छी। बहुत रास विध-व्यवहार सँ जानि-बुझिकय मुक्ति पेबाक नियति बनि गेल अछि सेहो सच। लेकिन किछु कुरूप आ विद्रूप व्यवहार दोसर संस्कृति सँ नकल करब आरम्भ केलहुँ ओतय हमर विमति अछि।

उचित परिछन आ आरम्भिक विध व्यवहार भेल नहि, वैदिक रीति सँ वेदी तर अग्नि केँ साक्षी मानि पति-पत्नी सम्बन्ध बनेबाक शपथ लेल गेल नहि, कन्यादान आ सिन्दुरदान भेल नहि, सोहाग-भाग श्रेष्ठजन द्वारा देल गेल नहि, ताहि सँ पहिनहि एकटा विध होबय लागल ओ थिक ‘स्वयंवर’। ई स्वयंवर एहि समय जे कियो प्रारम्भ केलहुँ अछि तिनकर बौद्धिकता पर हमर सवाल अछि।

१. स्वयंवर प्रथा सँ जँ विवाह नहि भेल हो तखन एकर प्रयोग स्वयं सवाल मे अछि, कारण पहिने सँ निर्धारित वैवाहिक सम्बन्ध मे दूल्हिन लेल दूलहा चयन करबाक खुला विकल्प आ जिनका ओ वरण करय चाहती तिनका माला पहिरेबाक विकल्प त ओतय रहिते नहि अछि… तखन एकर प्रयोग हमरा बुझने गलत अछि। एहि पर गम्भीरता सँ सब विचार करू।

२. जँ ‘माला पहिरेबाक’ एकटा दृश्य जेकरा आइ-काल्हि स्वयंवर कहल जाइछ तेकर उपयोग सरेआम बरियाती-सरियाती आ समाजक संग पाहुन-अतिथि लोकनि सोझाँ सिर्फ एकटा देखाबा लेल करैत छी त एकर औचित्य आ अनुकूलता पर विचार करू।

३. माला पहिरेबाक दृश्य केँ जँ स्वयंवर कहैत होइ त ई कम सँ कम परिछन, वेदी तरक विधान ओ कन्यादान उपरान्त वर द्वारा शपथपूर्वक अपन धर्माधिकारिणी-अर्धांगिनी स्वीकार कयलाक बाद यानी सिन्दुरदान कयलाक बाद वरक पिता व अभिभावक आदिक द्वारा सोहाग-भाग दान देबाक समय समारोहपूर्वक वैवाहिक विधिक समापन पर एक-दोसरा केँ माला पहिराकय कथित ‘स्वयंवर’ कयला सँ एकर सुखद परिणाम अवश्य भेटत।

अस्तु! आउ, एहि अवसर जानकी जी केर स्वयंवर प्रसंग केँ स्मरण करी। जनक जी संकल्प कय लेने छलाह जे जानकीक विवाह हुनकहि संग करब जे हुनका देल गेल शिव धनुष जेकरा जानकी अपन कुमारि वयस मे बामा हाथ सँ उठाकय भगवतीक घर निपने रहथि, ताहि शिव-धनुष केँ भंग कयनिहार वीर राजा-राजकुमार सँ करब।

जानकी जी लेल स्वयंवर प्रथा सँ वर चयन करबाक लेल विश्व भरिक राजा-राजकुमार पहुँचलाह। एकरा धनुष यज्ञ सेहो कहल जाइछ। धनुष भंग किनको सँ नहि भेल छल सिवाये एक दशरथपुत्र श्री रामचन्द्र जी छोड़ि… आर एहि तरहें रामचन्द्र जी केर गला मे जानकी जी अधिकार सहित माला पहिरौलनि। ई छल असल स्वयंवर।

आउ, आब एकटा लोकप्रिय भजन गुनगुना लीः

आजु मिथिला नगरिया निहाल सखिया
चारू दूलहा मे बड़का कमाल सखिया

माथ पर मउरिया कुण्डल सोहे कनमा
कारी कारी कजरारे जुलमी नयनमा
लाल चन्दन सोहे हिनकर भाल सखिया
चारू दूलहा मे बड़का कमाल सखिया

साँवर-साँवर गोरे गोरे चौड़िया जहान हे
अँखियो न देखली न सुनली ई कान हे
जुग-जुग जोड़ी जिये बेमिसाल सखिया
चारू दूलहा मे बड़का कमाल सखिया

गगन मगन आजु मगन धरतिया
देखि देखि दूलहा जी के साँवरी सुरतिया
बाल वृद्ध नर नारी सब बेहाल सखिया
चारू दूलहा मे बड़का कमाल सखिया

जिनका लागि जोगी-मुनि जप-तप कयलनि
से हमरा मिथिला मे मेहमान भयलनि
आजु लोढा से पिटाई हिनकर गाल सखिया
चारू दूलहा मे बड़का कमाल सखिया
चारू दूलहा मे बड़का कमाल सखिया….

आजु मिथिला नगरिया निहाल सखिया….

हरिः हरः!!

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