जानकी जन्म आ जनकपुर मन्दिर केर माहात्म्य

आध्यात्म

– ऋषिकेश झा, जनकपुरधाम

पौराणिक काल मे मिथि नामक राजा मिथिला क्षेत्रक राजा छलखिन्ह । राजा मिथि केर नाम सँ एहि क्षेत्रक नाम मिथिला नगरी कहाय लागल । मिथिला नगर में मिथि राजा पश्चात् जनक राजा भेलाह । एहि मिथिला क्षेत्र में एक बेर बहुत समय बरखा नहि होबक कारण खेती-गृहस्थी में उत्पादन बन्न भऽ होबय लगलैक । प्रजा सब बरखा नै होबय केर कारण कृषिकर्म नहि कय सकलाह । अन्न-पानि लेल चारूकात हाहाकार होबय लागल । अकाली सँ त्रस्त जनता सब राजा जनक ओतय गुहार करय पहुंचि जाय गेल । राजा जनक जी सेहो सोच में  – चिन्ता में पड़ि गेला ।

जनक जी अपन राज्य सलाहकार सब सँ परामर्श कय ऋषि-मुनि आ अपन-अपन गुरु सब सँ राय लय केँ हलेषी नामक यज्ञ केला सँ पानि पड़तैक से सुझाव ग्रहण कय यज्ञ शुभारम्भ केला तथा राजा जनक केँ सोना केर हर बना दराइर फाटल खेत मे हर चलाबय लेल कहल गेलैन । एखन भारतक बिहार प्रान्तक सीतामढ़ी में पुनौरा स्थान छैक जतय राजा जनक जी हर चलेने छलाह । तत्पश्चात् राजा जनक जी स्वयम् हर-बरद लय केँ हर जोतय निकलि गेला । हर खेत मे रखलाक बादे हरक मुंह कोनो वस्तु में ठेकल आ हरक अग्रभाग ‘सीत’ ओतय फँसल जेकाँ बुझायल । तखन राजा ओतय सँ माटि हँटेलनि आ हुनका एक गोट घैला भेटलनि, जाहि मे सँ एक टा छोट बालिका निकललीह । आर बालिकाक प्रकट होइत देरी घनघोर बरखा शुरू भऽ गेलैक। उपस्थित जनता सब जय-जयकार करय लागल ।

जनक जी एहि बालिका केँ अपन निजी निवास जतय जानकी मंदिर अवस्थित अछि ओतय आनि हुनक पोषण-पालन करय लगलाह । जनक जीक गुरुजन सब बालिका केर नाम हर केर मुंह सीत सँ एहि अपूर्व बालिकाक प्रकट होयबाक कारण हुनकर नाम ‘सीता’ रखलखिन्ह । तत्पश्चात् जनक जी सीता केँ अपन धर्मपुत्री बनेलाह । ताहि कारण सीताक दोसर नाम जानकी राखल गेल । भारतक वर्तमान मध्यप्रदेश राज्यक अन्तर्गत प्रसिद्ध टिकमगढ़ केर राजा केँ ऋषि-मुनि सब सलाह दय केँ जनकपुर पठेलनि, ओ पुत्र धन प्राप्ति लेल लालायित रहथि । टिकमगढ केर राजा जनकपुर आबि जानकी जीक पूजा-अर्चना कयलनि । एहि तरहें हुनक मनोकामना पूर्ण भेलनि, ताहि सँ  कबुला अनुसार टिकमगढ केर महारानी द्वारा वर्तमान जानकी मन्दिर बनबाओल गेल अछि ।

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