पापनाशक आ शक्तिवर्धक तपश्चर्या

(मूल आलेख ‘पापनाशक और शक्तिवर्धक तपश्चर्याएँ’ – अखिल विश्व गायत्री परिवार केर साहित्यालेख केर मैथिली अनुवाद)

tapashcharyaआइगक उष्णता सँ संसारक समस्त पदार्थ या तऽ जरि जाइत अछि, या बदैल जाइत अछि या गैल जाइत अछि। एहेन कोनो वस्तु नहि जे आइगक संसर्ग भेला पर परिवर्तित नहि होइत अछि। तपस्याक आइग सेहो एहने होइत छैक। ई पापसमूह केँ गला कय नरम कय दैत छैक, बदैल कय मनभावन बनबैत छैक या फेर जरा कय भस्म कय दैत छैक।

पापक गलनाय – जे प्रारब्ध- कर्म समय केर परिपाक सँ प्रारब्ध आर भवितव्यता बनि गेल छैक, जेकरा भोगल जेनाय अमिट रेखा जेकाँ सुनिश्चित भऽ गेलैक अछि, ओहेन कष्टसाध्य भोग तपस्या केर आइगक कारण गलिकय नरम भऽ जाइत छैक, जेकरा भोगनाय आसान भऽ जाइत छैक। जे पाप परिणाम दुइ मास धरि लेल भयंकर उदरशूल बनिकय प्रकट होमय वला छल, ओ साधारण कब्ज बनिकय दुइ मास धरि मामूली गड़बड़ी कऽ कय आसानी सँ चलि जाइत छैक। जाहि पाप केर कारण हाथ या पैर कटि जइतै, भारी रक्तस्राव होयबाक संभावना छलैक, ओ मामूली ठोकर लगला सँ या चक्कू आदि चुभि गेला सँ दस- बीस बूँद खून बहिकय निवृत्त भऽ जाइत अछि। जन्म- जन्मान्तरक संचित ओ पाप जे कतेको जन्म धरि भारी कष्ट देवयवला छल, ओ थोड़-मोड़ चिह्नपूजा केर रूप मे प्रकट भऽ एहि जन्म मे निवृत्त भऽ जाइत अछि आ मृत्युक पश्चात् स्वर्ग, मुक्ति केर अत्यन्त वैभवशाली जन्म भेटबाक मार्ग प्रशस्त भऽ जाइत छैक। देखल गेलैक अछि जे  तपस्वी सबकेँ विद्यमान जन्म मे प्राय: किछु असुविधा टा रहैत छैक। एकर कारण यैह जे जन्म- जन्मान्तरक समस्त पाप समूह केर भुगतानी अही जन्म मे करैत आगाँक मार्ग साफ भऽ जाय, अही द्वारे ईश्वरीय वरदान जेकाँ हलुक-फलुक कष्ट तपस्वी सबकेँ भेटैत रहैत छैक। ई भेल पाप केर गलनाय।

पापक बदलनाय – ई एना होइत छैक जेना पापक फल जे सहय पड़ैत छैक, ओकर स्वाद बड़ स्वादिष्ट भऽ जाइत छैक। धर्मक लेल, कर्तव्यक लेल, यश, कीर्ति आर परोपकारक लेल जे कष्ट सहय पड़ैत छैक, ओ ओहिना छैक जेना प्रसव पीड़ा। परसौती केँ प्रसवकाल मे पीड़ा तँ होइते छैक, मुदा ओहि संग-संग एक तरहक हर्ख सेहो रहैत छैक। चन्द्र-समान मुखाकृतिक सुन्दर बालक/बालिका देखिते ओ सब पीड़ा पूर्णरूपेन बिसरा देल जाइत छैक। राजा हरिश्चन्द्र, दधीचि, प्रह्लाद, मोरध्वज आदि केँ जे कष्ट सहय पड़लनि, ताहि लेल ओहो समय ओ हरखित छलाह। अन्तो-अन्त तक अमर कीर्ति आ सद्गति केर दृष्टि सँ तऽ ओ कष्ट हुनका सब लेल सब तरहें मंगलमय टा रहल। दान देबा मे जतय ऋण सँ मुक्ति होइत छैक, ओतहि यश तथा शुभ गति केर सेहो उपलब्धि हेब्बे टा करैत छैक। तप द्वारा एहि तरहें ‘उधार निपैट जेनाय आर पाहुन सेहो भेट जेनाय’ दुइ कार्य एक संग भऽ जाइत छैक।

पापक जरनाय – पापक जरनाय एहि तरहक होइत छैक जेना पाप एखन प्रारब्ध नहि बनल हो, भूल, अज्ञान वा मजबूरी मे बनल हो, ओ छोट-मोट अशुभ कर्म तपक आइग मे जरिकय अपने-आप भस्म भऽ जाइत अछि। सूखल घास-पातक ढेरीकेँ आइगक छोट चिनगी जराकय भस्म कय दैत छैक, तहिना एहि श्रेणीक पापकर्म तपश्चर्या, प्रायश्चित आ भविष्य मे एना नहि करबाक दृढ-निश्चय सँ अपने आप नष्ट भऽ जाइत छैक। प्रकाशक सम्मुख जेना अन्हार विलीन भऽ जाइत छैक, ओनाही तपस्वीक अन्त:करण केर प्रखर-किरण सँ पैछला कुसंस्कार नष्ट भऽ जाइत छैक आर संगहि ओहि कुसंस्कारक छाँह, दुर्गन्ध, कष्टकारक परिणामक आशंका सेहो अन्त पाबि जाइत छैक।

तपश्चर्या सँ पूर्वकृत पाप केर गलब, बदलब या जरब होइत हो – से बात एकदम नहि छैक, मुदा तपस्वी में एक नव परम सात्त्विक आइग उत्पन्न होइत छैक। एहि आइग केँ दैविक विद्युत शक्ति, आत्मतेज, तपोबल आदिक नामसँ सेहो संबोधित कैल जाइछ। एहि बलसँ अन्त:करण मे छिपल सुप्त शक्ति सब जाग्रत् होइत छैक, दिव्य सद्गुण आदिक विकास होइत छैक। स्फूर्ति, उत्साह, साहस, धैर्य, दूरदर्शिता, संयम, सन्मार्ग मे प्रवृत्ति आदि अनेको गुणक विशेषता प्रत्यक्ष परिलक्षित होमय लगैत छैक। कुसंस्कार, कुविचार, कुटेव, कुकर्म सँ छुटकारा पाबय लेल तपश्चर्या एक रामबाण अस्त्र थिकैक। प्राचीन काल मे अनेकों देव- दानव तपस्या करैत मनोरथ पूरा करऽ वला कतेको वरदान पेलनि।

घसलाक रगड़ सँ गर्मी पैदा होइत छैक। अपना केँ तपस्याक पाथर पर घसला सँ आत्मशक्ति केर उद्भव होइत छैक। समुद्रक मंथन सँ चौदह रत्न भेटलैक। दूधक मंथन सँ घी निकलैत छैक। काम-मंथन सँ प्राणधारी बालक/बालिकाक उत्पत्ति होइत छैक। भूमि- मंथन सँ अन्नक उपजा होइत छैक। तपस्या द्वारा आत्ममन्थन सँ उच्च आध्यात्मिक तत्त्व केर वृद्धिक लाभ प्राप्त होइत छैक। पत्थर पर घसला सँ चक्कू तेज होइत छैक। आइग मे तपेला सँ सोना निर्मल बनि जाइत छैक। तप सँ तपल मनुख सेहो पापमुक्त, तेजस्वी आ विवेकवान् बनि जाइत छैक।

अपन तपस्या मे गायत्री तपस्याक स्थान बहुत महत्त्वपूर्ण छैक। नीचाँ किछु पापनाशिनी आ ब्रह्मतेजवर्द्धिनी तपश्चर्या बताओल जा रहल अछि —

(१) अस्वाद तप

ओहि कष्ट केँ कहल जाइछ, जे अभ्यस्त वस्तु केर अभाव मे सहय पड़ैछ। भोजन मे निमक आ मधुर ई दुइ स्वाद केर प्रधान वस्तु होइछ। एहि मे सँ एकहु जँ न डालल जाए, तऽ ओ भोजन स्वाद रहित भऽ जाइत छैक। प्राय: लोककेँ स्वादिष्ट भोजन करबाक अभ्यास होइत छैक। एहि दुनू स्वाद तत्त्व केँ या एहि मे सँ एक केँ छोड़ि देला सँ जे भोजन बनैत अछि, ओ सात्त्विक प्रकृतिवला टा कय सकैत अछि। राजसिक प्रकृतिवलाक मन ओहि सँ नहि भरत। जेना-जेना स्वाद रहित भोजन मे सन्तोष भेटत, तहिना-तहिना सात्त्विकता बढ़ैत जायत। सबसँ प्रारम्भ मे एक सप्ताह, एक मास या एक ऋतु केर लेल एकर प्रयोग करबाक चाही। आरम्भ मे बहुत लम्बा समय लेल नहि करबाक चाही। ई अस्वाद-तप भेल।

(२) तितिक्षा तप

सर्दी या गर्मी केर कारण शरीर केँ जे कष्ट होइत छैक, ओकरा कने-कने सहन करबाक चाही। जाड़क ऋतु मे धोती आर दोपटा या कुर्ता दुइ वस्त्र सँ गुजारा केनाय, राति केँ रुइयाक कपड़ा ओढिक़य या कम्बल सँ काज चलेनाय, गरम पानिक प्रयोग नहि कय ताजा जल सँ स्नान केनाय, आइग नहि तपनाय, यैह शीत सहन केर तप थीक। पंखा, छाता आर बर्फ केर त्याग यैह गर्मीक तपश्चर्या थीक।

(३) कर्षण तप

प्रात:काल एक-दुइ घण्टा राति रहिते उठिकय नित्यकर्म मे लागि जेनाय, अपन हाथ सँ बनायल भोजन केनाय, अपना लेल स्वयं जल भरिकय अननाय, अपना हाथ से वस्त्र धोनाय, अपन बर्तन स्वयं मजनाय आदि अपन सेवा केर काज दोसर सँ कम सँ कम करेनाय, जूता नहि पहिरि खड़ाऊ या चट्टी सँ काज चलेनाय, पलंग पर शयन न कय तख्ता या भूमि पर शयन केनाय, धातु केर बर्तन प्रयोग नहि कय पत्तल या हाथ मे भोजन केनाय, पशु आदिक सवारी नहि केनाय, खादी पहिरनाय, पैदल यात्रा केनाय आदि कर्षण तप थीक। एहिमे प्रतिदिन शारीरिक सुविधाक त्याग आर असुविधा आदिकेँ सहन करय पड़ैत छैक।

(४) उपवास

गीता मे उपवासक विषय विकार सँ निवृत्त करयवला बताओल गेल छैक। एक समय अन्नाहार आर एक समय फलाहार आरम्भिक उपवास होइछ। धीरे-धीरे एकर कठोरता बढ़ेबाक चाही। दुइ संध्या फल, दूध, दही आदि केर आहार अहुसँ कठिन होइछ। केवल दूध या छाछ पर रहबाक हो तँ ओकरा कतेको बेर सेवन कैल जा सकैत छैक। जल हरेक उपवास मे कतेको बेर अधिक मात्रा मे बिना प्यासो लागल पर पीबाक चाही।  जे लोक उपवास मे जल नहि पीबैत अछि या कम पीबैत अछि, ओ भारी भूल करैत अछि। एहि सँ पेटक आइग आँत मे पड़क मल केँ सुखाकय गाँठ बना दैत अछि, तैँ उपवासो मे कतेको बेर पानि पीबाक चाही। ओहिमे नेबो, सोडा, शक्कर मिला लेल जाए, तँ स्वास्थ्य आर आत्मशुद्धि लेल आरो नीक हेतैक।

(५) गव्यकल्प तप

शरीर आर मन केर अनेक विकार केँ दूर करबाक लेल गव्यकल्प अभूतपूर्व तप होइछ। राजा दिलीप जखन निस्सन्तान रहैथ, तँ ओ कुलगुरु केर आश्रम मे गाय चरेबाक तपस्या पत्नी सहित केने छलाह। नन्दिनी गायकेँ ओ चराबैत छलाह आर गोरस केर सेवन करैते ओ रहैत छलाह। गाय केर दूध, गाय केर दही, गाय केर छाछ, गाय केर घी सेवन केनाय, गाय केर गोबर केँ गोइठा सँ दूध गरम करबाक चाही। गोमूत्र केर शरीर पर मालिश करैत माथ मे डालिकय स्नान केनाय चर्मरोग तथा रक्तविकार लेल बहुते लाभदायक होइछ। गाय केर शरीर सँ निकलयवला तेज बड़ सात्त्विक आ बलदायक होइछ, तैँ गाय चरयबाक सेहो बड़ सूक्ष्म लाभ सभ छैक। गाय केर दूध, दही, घी, छाछ पर मनुष्य तीन मास निर्वाह करय, तँ ओकर शरीरक एक तरह सँ कल्प भऽ जाइत छैक।

(६) प्रदातव्य तप

अपना पास जे शक्ति हो, ओहि मे सँ कम मात्रा मे अपना लेल राखि दोसर लेल अधिक मात्रा मे दान देनाय प्रदातव्य तप थीक। धनी आदमी धनक दान करैत अछि। जे धनी नहि अछि, ओ अपन समय, बुद्धि, ज्ञान, चातुर्य, सहयोग आदि केर उधार या दान दऽ कय दोसर केँ लाभ पहुँचा सकैत अछि। शरीरक, मनक दान सेहो धन-दानक भाँति महत्त्वपूर्ण होइछ। अनीति उपार्जित धनक सबसँ नीक प्रायश्चित्त यैह छैक जे ओकरा सत्कार्य केर वास्ते दान कय देल जाय। समयक किछु न किछु भाग लोकसेवाक लेल लगौनाय आवश्यक अछि। दान दैते समय पात्र और कार्यक ध्यान राखब आवश्यक अछि। कुपात्रकेँ देल, अनुपयुक्त कर्मक लेल देल दान व्यर्थ होइछ। मनुष्येतर प्राणी सेहो दानक अधिकारी छथि। गाय, चुट्टी, चिडिय़ाँ, कुत्ता आदि उपकारी जीव-जन्तु केँ सेहो अन्न-जल केर दान देबाक लेल प्रयत्नशील रहबाक चाही।

स्वयं कष्ट सहैत, अभावग्रस्त रहैतो दोसराकेँ उचित सहायता केनाय, ओकरा उन्नतिशील, सात्त्विक, सद्गुणी बनेबामे सहायता केनाय, सुविधा देनाय दान केर वास्तविक उद्देश्य होइछ। दानक प्रशंसा मे धर्मशास्त्र सबहक पन्ना-पन्ना भरल अछि। एकर पुण्य केर सम्बन्ध मे अधिक कि कहल जाए! वेद कहने अछि – “सय हाथ सँ कमाउ आ हजार हाथ सँ दान करू”।

(७) निष्कासन तप

अपन बुराइ आ पाप केँ गुप्त रखला सँ मन भारी रहैत छैक। पेट मे मल भरल रहय तँ ओहि सँ नाना प्रकारक रोग उत्पन्न होइत छैक; ओहिना अपन पाप केँ छिपाकय राखल जाए, तँ यैह गुप्तता रुकल मल जेकाँ गन्दगी आर सड़न पैदा करयवला समस्त मानसिक क्षेत्र केँ दूषित कय दैत छैक। तैँ किछु एहेन मित्र चुनबाक चाही जे बेस गम्भीर और विश्वस्त हो। ओकरा अपन पाप-कथा सब कहि देबाक चाही। अपन कठिनाइ, दु:ख-गाथा, इच्छा, अनुभूति सेहो एहि तरहें किछु एहेन लोक केँ कहैत रहबाक चाही, जे एतेक उदार हो जे ई सब सुनिकय घृणा नहि करय आ कदापि विरोधी भऽ गेलाक बावजूद ओहि बात सबकेँ दोसर सँ प्रकट कय हानि नहि पहुँचाबैथ। एहेन गुप्त बात सबहक प्रकटीकरण एक प्रकारक आध्यात्मिक जुलाब थीक, जाहि सँ मनोभूमि निर्मल होइत अछि।प्रायश्चित्त मे ‘दोष प्रकाशन’ केर महत्त्वपूर्ण स्थान होइछ। गो-हत्या भऽ गेलाक प्रायश्चित्त शास्त्र यैह बतौलक अछि जे मरल गाय केर पूँछ हाथ मे लैत एक सौ गाम मे ओ व्यक्ति उच्च स्वर सँ चिकैर-चिकैर यैह कहय जे हमरा सँ गौ-हत्या भऽ गेल। एना दोष प्रकाशन सँ गौ-हत्याक दोख छूटि जाइत अछि। जिनका संग बुराई कैल गेल हो, ओकरा सँ क्षमा माँगक चाही, क्षतिपूर्ति करबाक चाही आर जाहि तरहें ओ सन्तुष्ट भऽ सकय तहिना करबाक चाही। यदि सेहो नहि हो, तँ कम सँ कम दोष प्रकाशन द्वारा अपन अन्तरात्मा केँ एक भारी बोझ सँ हल्का करबाक चाही। एहि तरहक दोष प्रकाशन लेल ‘शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार’ केँ एक विश्वसनीय मित्र मानि पत्र द्वारा अपन दोष केँ लिखिकय ओकर प्रायश्चित्त तथा सुधार केर सलाह प्रसन्नतापूर्वक लेल जा सकैत छैक।

(८) साधना तप

गायत्री केर चौबीस हजार जप नौ दिन मे पूरा केनाय, सवालक्ष जप चालीस दिन मे पूरा केनाय, गायत्री यज्ञ, गायत्रीक योग साधना, पुरश्चरण, पूजन, स्तोत्र पाठ आदि साधना सँ पाप घटैत छैक और पुण्य बढ़ैत छैक। कम पढ़ल लोक ‘गायत्री चालीसा’ केर पाठ नित्य करैत अपन गायत्री भक्ति केँ बढ़ा सकैत अछि और एहि महामन्त्र सँ बढ़ल शक्ति द्वारा तपोबलक अधिकारी बनि सकैत अछि।

(९) ब्रह्मचर्य तप

वीर्य-रक्षा, मैथुन सँ बचनाय, काम-विकार पर काबू रखनाय ब्रह्मचर्य व्रत थीक। मानसिक काम-सेवन शारीरिक काम-सेवनक भाँति हानिकारक होइछ। मन केँ कामक्रीड़ाक दिशि नहि जाय देबाक सबसँ नीक उपाय ओकरा उच्च आध्यात्मिक एवं नैतिक विचार मे लगेनाय होइत छैक। बिना एना केने ब्रह्मचर्यक रक्षा नहि भऽ सकैत अछि। मन केँ ब्रह्म मे, सत् तत्त्व मे लगाकय रखला सँ आत्मोन्नति सेहो होइत छैक, धर्म साधना सेहो आ वीर्य रक्षा सेहो होइत छैक। एहि तरहें एक मात्र उपाय सँ तीन लाभ करऽ वला ई तप गायत्री साधना वला लेल सब तरहें उत्तम होइछ।

(१०) चान्द्रायण तप

ई व्रत पूर्णमासी सँ आरम्भ कैल जाइत अछि। पूर्णमासी केँ अपन जतेक पूर्ण खूराक हो, ओकर चौदहम भाग प्रतिदिन कम करैत जेबाक चाही। कृष्ण पक्षक चन्द्रमा जेकाँ १-१ कला नित्य घटैत छैक, तहिना १-१ चतुर्दशांश नित्य कम करैत चलबाक चाही। अमावस्या आ प्रतिपदा केँ चन्द्रमा एकदम नहि देखाइ पड़ैत अछि। तैँ ओहि दुइ दिन एकदमे आहार नहि लेबाक चाही। फेर शुक्ल पक्ष केर दुतिया केँ चन्द्रमा एक कला सँ निकलैत अछि आ धीरे-धीरे बढ़ैत अछि, तहिना १-१ चतुर्दशांश बढ़बैत पूर्णमासी तक पूर्ण आहार पर पहुँचि जेबाक चाही। एक मास मे आहार-विहार केर संयम, स्वाध्याय, सत्संग मे प्रवृत्ति, सात्त्विक जीवनचर्या तथा गायत्री साधना मे उत्साहपूर्वक संलग्न रहबाक चाही।

अर्ध चान्द्रायण व्रत पन्द्रह दिन केर होइत अछि। ओहिमे भोजनक सातम भाग सात दिन कम केनाय आ सात दिन बढ़ेनाय सँ होइता छैक। बीचक एक दिन निराहार रहनाय सँ होइत छैक। आरम्भ मे अर्ध चान्द्रायण टा करबाक चाही। जाबत एक बेर सफलता भेटए, तखनहि पूर्ण चान्द्रायण लेल डेग बढ़ेबाक चाही।

उपवास स्वास्थ्यरक्षाक बड़ा प्रभावशाली साधन होइछ। मनुष्य सँ खान-पान मे जे त्रुटि स्वभाव या परिस्थितिवश होइत रहैत छैक, ताहिसँ शरीर मे दूषित या विजातीय तत्त्वक वृद्धि होइत रहैत छैक। उपवास काल मे जखन पेट खाली रहैत छैक, तँ जठराग्रि ओहि दोष सबकेँ पचाबय लगैत छैक। एहि सँ शरीर शुद्ध होइत छैक आ रक्त स्वच्छ होइत रहैत छैक। जेकर देह मे विजातीय तत्त्व नहि हेतैक आर नाड़ी मे स्वच्छ रक्त परिभ्रमण करैत रहतैक, ओकरा एकाएक कोनो रोग या बीमारीक शिकायत कदापि नहि भऽ सकैत छैक। तैँ स्वास्थ्यकामी पुरुष लेल उपवास बहुत पैघ सहायक बन्धु केर समान होइछ। अन्य उपवास सँ चान्द्रायण व्रत मे ई विशेषता छैक जे एहि मे भोजन केँ घटेनाय और बढ़ेनाय एक नियम और क्रम सँ होइत छैक, फलस्वरूप ओकर बिपरीत प्रभाव तनिकबो नहि पड़ैत छैक। अन्य लम्बा उपवास मे जाहिमे भोजन केँ लगातार दस-पन्द्रह दिनक लेल छोड़ि देल जाइत अछि, उपवास खत्म करैत समय बहुत सावधानी राखय पड़ैत छैक और अधिकांश व्यक्ति ओहि समय अधिक मात्रा मे अनुपयुक्त आहार ग्रहण कय लेला सँ कठिन रोग केर शिकार बनि जाइत अछि। एना चान्द्रायण व्रत मे कथमपि नहि होइत छैक।

हरि: हर:!!

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