अष्टावक्र संहिता – अध्याय ५ – विलय केर चारि तरीका

अष्टावक्र संहिताः अध्याय ५ – विलय केर चारि तरीका
 

मैथिली जिन्दाबाद पर अष्टावक्र संहिता केर धारावाहिक स्वाध्याय २०१९ केर संकल्प

अष्टावक्र संहिता मे जनक समान प्रखर ज्ञाता एक शिष्य छथि, अष्टावक्र समान महान् ज्ञानी आ ऋषि समान गुरु छथि। शिष्य आ गुरुक बीच वार्ताक स्तर सेहो अत्यन्त उच्च अछि। हम मुमुक्षु स्वाध्यायी जँ स्वयं केँ एहि उच्च स्तर पर स्थापित कय केँ हिनका लोकनिक बीच भेल वार्ता केँ बुझबाक, मनन करबाक चेष्टा करब तऽ ज्ञानक पराकाष्ठा प्राप्ति होयत। एखन धरि अध्याय १ सँ ४ धरिक यात्रा मे आत्मज्ञानक परिचिति सँ जुड़ल विभिन्न पक्ष पर चर्चा देखैत आयल छी। परिचय प्राप्ति उपरान्त आत्मज्ञानक अनुभूति मे केहेन परमानन्द भेटैत छैक से देखि चुकल छी, तदोपरान्त गुरु अष्टावक्र किछु अवस्थाक चर्चा करैत पुनः आत्मज्ञानी जनक केर परीक्षा कयलनि, जेकर उत्तर मे बड़ा ठोस भाव सँ जनक जी अपन विचार चारिम अध्याय केर मात्र ६ श्लोक मे देलनि अछि। आब, आगू बढी आ देखी जे पाँचम अध्याय मे गुरु अष्टावक्र कि निर्देशन आ मार्गदर्शन सब दैत छथि।

 
अष्टावक्र उवाच।
 
न ते सङ्गोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि।
सङ्घातविलयं कुर्वन्नं एवमेव लयं व्रज॥१॥
 
अष्टावक्र कहैत छथिन –
 
अहाँ केँ केकरहुँ सँ संग (संयोग) नहि अछि, अहाँ शुद्ध छी, तखन अहाँ कथी त्याग करय चाहैत छी? एहि (अवास्तविक) सम्मिलन केँ विलय (समाप्त) कय केँ ब्रह्म सँ लय (योग – एकरूपता) केँ प्राप्त करू।
 
Ashtavakra says:
 
You are not connected with anything. You are pure. What do you want to renounce? Dissolve this unreal connection and be one with Self.
 
(You are free from contact with anything whatsoever. Therefore, pure as you are, what do you want to renounce? Destroy the body-complex and in this way enter into the state of dissolution.)
 
 
उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुद्बुदः।
इति ज्ञात्वैकमात्मानं एवमेव लयं व्रज॥२॥
 
जाहि प्रकारे समुद्र सँ बुलबुला उत्पन्न होइत छैक, ताहि प्रकारे विश्व एक आत्मा टा सँ उत्पन्न होइत अछि। एतेक जानिकय ब्रह्म सँ लय (योग – एकरूपता) केँ प्राप्त करू।
 
As bubbles rise in the sea, the world originates from non-dual Self. Know this and be one with Self.
 
(The universe rises from you like bubbles rising from the sea. Thus know the Self to be One and in this way enter into the state of dissolution.)
प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद् विश्वं नास्त्यमले त्वयि।
रज्जुसर्प इव व्यक्तं एवमेव लयं व्रज॥३॥
 
यद्यपि ई विश्व आँखि सँ देखाय दैत अछि लेकिन अछि अवास्तविक। विशुद्ध अहाँ मे एहि विश्व केर अस्तित्व ओहि प्रकारक नहि छैक जाहि प्रकार कल्पित सर्प रस्सी मे नहि रहैछ। ई जानिकय ब्रह्म सँ लय (योग – एकरूपता) केँ प्राप्त करू।
 
In spite of being visible from eyes, this world is unreal. You are immaculate and this world does not exist in you like an imagined snake in a rope. Know this and be one with Self.
 
(The universe, because it is unreal, being manifested like the snake in the rope, does not exist in you who are pure, even though it is present to the senses. Therefore in this way enter into the state of dissolution.)
 
समदुःखसुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः।
समजीवितमृत्युः सन्नेवमेव लयं व्रज॥४॥
 
स्वयं केँ सुख और दुःख मे समान, पूर्ण, आशा और निराशा मे समान, जीवन और मृत्यु मे समान, सत्य जानिकय ब्रह्म सँ लय (योग – एकरूपता) केँ प्राप्त करू।
 
Know yourself equal in pleasure and pain, complete, equal in hope and disappointment, equal in life and death and eternal and be one with Self.
 
(You are perfect and the same in misery and happiness, hope and despair, and life and death. Therefore in this way enter into the state of dissolution.)

 

हरिः हरः!!
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