अष्टावक्र संहिताक चारिम अध्याय – आत्मज्ञानक महिमामंडन

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

अष्टावक्र संहिता – चारिम अध्यायः आत्मज्ञान केर महिमामंडन
 

मैथिली जिन्दाबाद पर अष्टावक्र संहिता केर धारावाहिक स्वाध्याय २०१९ केर संकल्प

पूर्व तीन अध्याय मे पहिल आत्मज्ञान केर परिचिति, दोसर आत्मज्ञान सँ आनन्दक अनुभूति, पुनः तेसर अध्याय मे आत्मज्ञान प्राप्त भेल तथापि द्वंद्व व आसक्ति तथा सांसारिकता मे रमण करबाक नियति कोना – इत्यादि प्रश्न सँ परीक्षा कयला उत्तर पुनः चारिम अध्याय मे आत्मज्ञान पर केन्द्रित विषय, “आत्मज्ञान केर महिमामंडन” प्रस्तुत अछि। क्रमिक अध्ययन कयला पर एकर असल लाभ भेटत, ताहि लेल मैथिली जिन्दाबाद केर ‘दर्शन’ पेज पर क्रमिक रूप सँ सब अध्याय व श्लोक केँ मैथिलीक संग अंग्रेजी भावानुवाद केँ पढी आ मनन करी। विदिते अछि जे स्वाध्यायक लाभ हम मानव समुदाय अनेकों रूप मे प्राप्त कय सकैत छी, खासकय अपना आप सँ पहचान आ अपन कर्तव्यनिर्धारण मे एहि सब बड पैघ सहजता होइत अछि, सदिखन प्रकाश भरल मार्ग पर चलबाक एकटा अन्तर्शक्तिक संग भेटैत अछि। अस्तु, आउ आरम्भ करी चारिम अध्याय।

 
जनक उवाच –
 
हन्तात्मज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।
न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता॥१॥
 
अष्टावक्र कहलखिन – स्वयं केँ जाननिहार बुद्धिमान व्यक्ति एहि संसारक परिस्थिति केँ खेल जेकाँ बुझैत अछि, ओकर सांसारिक परिस्थिति केँ बोझ (दबाव) जेकाँ बुझनिहार मोहित व्यक्ति केर संग एको रत्तियो समानता नहि छैक।
 
Janaka said:
 
The self-aware wise man takes the worldly matter sportively, he just cannot be compared to a deluded person taking burdens of the situations.
 
(Oh, the man of understanding, the knower of the Self, who plays the game of life has no similarity to the deluded beasts of burden of the world.)
 
यत् पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।
अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति॥२॥
 
जाहि पद केर प्राप्तिक इच्छा इन्द्र आदि समस्त देवता इच्छा रखैत छथि, ताहू पद मे स्थित भऽ कय योगी हर्ष नहि करैत छथि।
 
A yogi feels no joy even after attaining a state for which Indra and all other demigods yearn for.
तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते।
न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः॥३॥
 
ताहि (ब्रह्म) केर ज्ञेय (जाननिहार) केर अन्तःकरण सँ पुण्य और पाप केर स्पर्श नहि होइत छैक जेना आकाश मे देखायवला धुआँ सँ आकाश केर संयोग नहि होइत छैक।
 
He who has self-knowledge remains untouched by good and bad even internally, as the sky cannot be contaminated by the presence of smoke in it.
 
(Surely the heart of one who has known the Self is not touched by virtue and vice, just as the sky is not touched by smoke, even though it appears to be.) 🙂
 
आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना।
यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः॥४॥
 
जे महापुरुष स्वयं केँ मात्र एहि समस्त जगत केर रूप मे जानि लेने अछि, ओकरा स्वेच्छा सँ वर्तमान मे रहय सँ रोकबाक सामर्थ्य केकरा मे छैक?
 
Who can prevent a great man from living in the present as per his wish as he knows himself as this whole world?
 
(Who can prevent that great-souled one, who has known this entire universe to the Self alone, from acting spontaneously?)
 
आब्रह्मस्तंबपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे।
विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने॥५॥
 
ब्रह्म सँ तृण तक, चारू प्रकार केर प्राणी सब मे केवल आत्मज्ञानी टा इच्छा और अनिच्छा केर परित्याग करय मे समर्थ अछि।
 
From Brahma down to the grass, in all four categories of living creatures, who else can give up desire and aversion except an enlightened man.
 
(Of the four kinds of created beings, from Brahma down to a clump of grass, it is the wise one alone who is capable of renouncing desire and aversion.)
 
Four kinds, etc.: namely, jarayuja, born from a womb; andaja, born from an egg; svedaja, generated by warm vapor or sweat; and udbhija, sprouting up. Here it means the entire creation comprising also gods and other subtle beings. 🙂
 
आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानाति जगदीश्वरम्।
यद्वेत्ति तत् स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्॥६॥
 
आत्मा केँ एक और जगत केर ईश्वर कियो कियो टा जनैत अछि, जे एना जानि लैत अछि ओकरा केकरो सँ कोनो प्रकारक भय नहि छैक।
 
It is very rare to know Self as One and Lord of the world, and he who knows this does not fear anyone or anything.
 
(Rare is the man who knows the Self as One without a second and as lord of the universe. He does what he considers worth doing and has no fear from any quarter.)
 
हरिः हरः!!
पूर्वक लेख
बादक लेख

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

6 + 7 =