अष्टावक्र संहिता – तेसर अध्याय – आत्मज्ञान केर परीक्षा

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

अष्टावक्र संहिता – तृतीय अध्याय
 
आत्मज्ञान केर परीक्षा
 
प्रिय पाठक लोकनि! अष्टावक्र संहिताक दुइ अध्याय समाप्त भऽ गेल। पहिल मे अष्टावक्र द्वारा स्वयं केर पहिचान यथार्थ रूप सँ, तत्त्व रूप सँ कोना कयल जाय आर सांसारिक अस्तित्व केँ स्वयं सँ कोना जोड़ल जाय ताहि पर परिचिति देल गेल छल। एकरा आत्मज्ञान केर निरूपण कहि सकैत छी। तदोपरान्त, एहि ज्ञान केर अनुभूति – आत्मानुभूति – आत्मज्ञानक प्राप्ति उपरान्त राजा जनक कतेक आनन्दित भेलाह अछि, आर ताहि आनन्द मे ओ कतेको तरहक सांसारिक अवस्था सँ अपना केँ भिन्न देखय लगलाह अछि, ताहि बातक निरूपण अध्याय दुइ मे देखलहुँ। आब तेसर अध्याय प्रस्तुत अछि। स्वामी नित्यस्वरूपानन्द जी महाराज एकरा ‘आत्मज्ञान केर परीक्षा’ शीर्षक सँ संस्कृतक भावानुवाद अंग्रेजी मे कएने छथि। तहिना गूगल पर उपलब्ध एकर हिन्दी अनुवाद सहितक सन्दर्भ संग हम एकरा मैथिली मे रखबाक प्रयास निरन्तरता मे राखय जा रहल छी। आशा करैत छी जे एकर उचित लाभ अपनो लोकनि जरूर उठा रहल होयब।
 
अष्टावक्र उवाच।
 
अविनाशिनमात्मानमेकं विज्ञाय तत्त्वतः।
तवात्मज्ञस्य धोरस्य कथमर्थार्जने रतिः॥१॥
 
आत्मानम् Self तत्त्वतः in its true nature अविनाशिनम् indestructible एकं One विज्ञाय knowing आतम्ज्ञस्य knower of the Self धीरस्य serene तव your कथम् how अर्थार्जने in the acquisition of wealth रतिः attachment (अस्ति is)
 
अष्टावक्र कहैत छथिन – स्वयं केँ अविनाशी आत्मा एवं एक जानिकय, तत्त्वरूप सँ विज्ञ बनलाक बादो, अहाँक रुचि (लगाव) अर्थ आर्जन मे कोना भऽ सकैत अछि?
 
Having known yourself as really indestructible and One, how is it that you, knower of the Self and serene, feel attached to the acquisition of wealth?
 
आत्माज्ञानादहो प्रीतिर्विषयभ्रमगोचरे।
शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभ्रमे॥२॥
 
अहो Alas यथा as शुक्तेः of mother of pearl अज्ञानतः from ignorance रजतविभ्रमे illusion of silver (सति being caused) लोभः greed (भवति is तथा so) आत्माज्ञानात् from ignorance विषयभ्रमगोचरे in the objects of illusory perception प्रीतिः attachment (भवति is).
 
जेना खुरचैन (सीप) मे चाँदीक भ्रम भेला सँ ओहू मे लोभ उत्पन्न भऽ जाइत छैक तहिना आत्मा सँ अज्ञान रहला सँ भ्रमवश विभिन्न सांसारिक विषय मे लगाव भऽ जाइत छैक।
 
Alas, as greed arises from the illusion of silver caused by ignorance of the mother of pearl, even so arises attachment to the objects of illusory perception from ignorance of the Self.
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे।
सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि॥३॥
 
विश्वक उत्पत्ति ओहिना होइत अछि जे समुद्र मे लहर उत्पन्न होइछ, ई जनैत जे ‘हम ओ छी’, तथापि एक दीन समान एतय सँ ओतय कियैक दौड़ैत छी?
 
This world originates from self like waves from the sea. Recognizing, “I am That”, why run like a poor?
 
श्रुत्वापि शुद्धचैतन्यमात्मानमतिसुन्दरम्।
उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति॥४॥
 
ई सुनियोकय जे आत्मा शुद्ध चैतन्य व अति सुन्दर अछि, जननेन्द्रिय मे आसक्त भऽ केना मलिनता केँ प्राप्त करैत छी?
 
After hearing self to be pure, conscious and very beautiful, how can you be attracted to sexual objects and get impure?
उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः।
आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत् कालमन्तमनुश्रितः॥७॥
 
अंत समय केर समीप पहुँचि चुकल व्यक्ति केर उत्पन्न ज्ञान केँ अमित्र काम केर इच्छा राखब, जेकरा धारण करय मे ओ अत्यंत अशक्त अछि, आश्चर्ये त अछि।
 
For a person having reached his last time, incapable of enjoying and knowing it to be enemy of the gained knowledge, it is surprising to be after sexual desires.
 
(It is strange that knowing lust to be an enemy of Knowledge, a man who has grown extremely weak and reached his last days, should yet be eager for sensual enjoyment!)
 
इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः।
आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षाद् एव विभीषिका॥८॥
 
एहि लोक और परलोक सँ विरक्त, नित्य और अनित्य केर ज्ञान रखनिहार और मोक्ष केर कामना रखनिहार केँ मोक्ष सँ डरनाय, आश्चर्ये त अछि।
 
Surprise, unattached to this and the other world, those who can discriminate between the permanent and the impermanent, and wish to liberate are afraid of liberation.
 
(It is strange that one who is unattached to the objects of this world and the next, who discriminates the eternal from the transient, and who longs for emancipation, should yet fear dissolution of the body!) 🙂

धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा।
आत्मानं केवलं पश्यन् न तुष्यति न कुप्यति॥९॥

सदा केवल आत्मा केर दर्शन करयवला बुद्धिमान व्यक्ति भोजन करेलापर अथवा पीड़ा पहुँचेला पर नहिये प्रसन्न होइत छथि आर नहिये क्रोधे करैत छथि।

The wise who always see self only, are neither pleased nor get angry whether they are feted or tormented.

(Feted and feasted or tormented, the serene person ever sees the Absolute Self and is thus neither gratified nor angry.)

चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत्।
संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः॥१०॥

अपन कार्यशील शरीर केँ दोसराक शरीरे जेकाँ देखयवला महापुरुष लोकनि केँ प्रशंसा या निंदा केना विचलित कय सकैत अछि!

How can noble men be perturbed by praise or blame who see their bodies alike to others.

(The high-souled person witnesses his own body acting as if it were another’s. As such, how can he be disturbed by praise or blame?)

मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः।
अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः॥११॥
 
एहि विश्व केँ सिर्फ माया मे कल्पित देखनिहार, समस्त जिज्ञासादि सँ रहित लोक, स्थितप्रज्ञ (धीर) मनुष्य केँ मृत्यु भेटबाक भला डर केहेन थिक?
 
Devoid of any questions, seeing this world as imagined in Maya, how can one with resolute intelligence be fearful of even the incident death?
 
(Realizing this universe as mere illusion and losing all curiosity, how can one of steady mind yet fear the approach of death?)
 
निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः।
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते॥१२॥
 
निराशा भेलो पर सब इच्छा सँ रहित, स्वयं केर ज्ञान सँ प्रसन्न महात्मा केर तुलना भला केकरा सँ कयल जा सकैत अछि?
 
Who can be compared to the saint, free from desires even in disappointment and satisfied with the knowledge of self?
 
(With whom can we compare that great-souled one who is content with Self-Knowledge and does not hanker even after liberation?) 🙂
स्वभावाद् एव जानानो दृश्यमेतन्न किञ्चन।
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः॥१३॥
 
स्वभावहि सँ ई विश्व केँ दृश्यमान बुझब, एकर कोनो अस्तित्व नहि य – से बुझनिहार व्यक्ति (स्थितप्रज्ञ) सेहो ई ग्राह्य आ ई त्यज्य अछि से केना देखैत अछि?
 
Why should that steady-minded one who knows the object of perception to be in its own nature nothing, consider one thing acceptable and another unacceptable?
(Know this world to be visible due to its very nature, it is non-existent actually. How can a person with resolute intelligence discriminate things as to be taken or to be rejected?)
 
अंतस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः।
यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये॥१४॥
 
विषय केर आतंरिक आसक्तिक त्याग करनिहार, द्वंद्व (संदेह) सँ दूर, बिना कोनो इच्छा वाला व्यक्ति केँ स्वतः आबयवला भोग नहि दुःखी कय सकैत अछि आर नहिये सुखी।
One who has given up inner passions, is beyond doubts and is without any desires does not feel pain or pleasure due to random events.
 
(He who has given up worldly attachment from his mind, who is beyond the pairs of opposites, and who is free from desire – to him no experience coming as a matter of course causes either pleasure or pain.)

 

हरिः हरः!!
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