मैथिल – पुराण वर्णित पहिचान

लेख

– प्रवीण नारायण चौधरी

मैथिल
(पौराणिक पहिचान)

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥

मा सरस्वतीक चरणकमल मे बेर-बेर प्रणाम करैत एकटा छोट संस्मरण लिखय लेल चाहब। एहि संस्मरण यात्रा पर पाठक वर्ग केँ आनबाक एकमात्र उद्देश्य यैह अछि जे हमरा लोकनिक उद्गमविन्दु (मातृभूमि) मिथिला एक सिद्धक्षेत्र केर रूप मे प्रचलित रहल अछि आर हम सब कोन हिसाबे मैथिल छी। मैथिल कथमपि कोनो खास जाति या वर्ग या समुदाय लेल नहि, अपितु मनुस्चरित केर एक सर्वश्रेष्ठ रूप मे सुपरिभाषित अछि। आउ बुझबाक प्रयत्न करी।

विष्णुपुराण मे वर्णित निमि-चरित्र तथा निमि-वंशक वर्णन करैत चतुर्थ अंशक पाँचम अध्याय, श्लोक ३२-३४ मे श्री पराशर द्वारा निर्णय देल गेल अछि:

कृतौ सन्तिष्ठतेऽयं जनकवंश:॥३२॥
इत्येते मैथिला:॥३३॥
प्रायेणैते आत्मविद्याश्रयिणो भूपाला भवन्ति॥३४॥

कृति नामक राजा मे जनकवंश केर समाप्तिक घोषणा कैल गेल अछि। इक्ष्वाकुपुत्र निमि सँ प्रारंभ मिथिलाक मैथिल भूपालगण केर पूर्ण चर्चा मे निमि द्वारा एक सहस्रवर्षमे समाप्त होवयवला यज्ञ केर आरम्भ सँ अन्त धरिक समस्त वर्णन, वसिष्ठ द्वारा निमि केँ शाप देबाक बात, पुन: निमि द्वारा वसिष्ठकेँ शाप, ऋत्विगण केर प्रार्थना पर दुनू केँ वरदान देबाक लेल देवगण द्वारा स्वीकृति, निमि द्वारा शरीर छोडबाक कष्टकेँ सब सऽ दु:सह दु:ख मानि पुन: शरीर ग्रहण करबा सँ मना कय देबाक प्रसंग, तदोपरान्त हुनकहि शरीरकेँ शमीदण्ड (अरणि) सँ मथैत एक बालक केर जन्म, विदेह सँ वैदेहक उत्पत्ति रूप मे नामकरण, मन्थन सँ उत्पत्ति हेतु अन्य नाम ‘मिथि’ आ हुनका द्वारा शासित भूमण्डल केर नाम ‘मिथिला’ मानल गेल अछि।

तदोपरान्त भूपालमण्डल एहि क्रम मे वर्णित अछि:
मिथि – उदावसु – नन्दिवर्धन – सुकेतु – देवरात – बृहदुक्थ – महावीर्य – सुधृति – धृष्टकेतु – हर्यश्व – मनु – प्रतिक – कृतरथ – देवमीढ – विबुध – महाधृति – कृतरात – महारोमा – सुवर्णरोमा – ह्रस्वरोमा – सीरध्वज – भानुमान् – शतद्युम्न – कृति – अञ्जन – कुरुजित् – अरिष्टनेमि – श्रुतायु – सुपार्श्व – सृञ्जय – क्षेमावी – अनेना – भौमरथ – सत्यरथ – उपगु – उपगुप्त – स्वागत – स्वानन्द – सुवर्चा – सुपार्श्व – सुभाष – सुश्रुत – जय – विजय – ऋत – सुनय – वीतहव्य – धृति – बहुलाश्व – कृति।

मूल मनन योग्य पाँति अछि – इत्येते मैथिला:। प्रायणैते आत्मविद्याश्रयिणो भूपाला भवन्ति।

अर्थात् ई समस्त मैथिल भूपालगण छथि। प्राय: ई समस्त राजा लोकनि ‘आत्मविद्या’ केँ आश्रय देबयवला छथि।

तऽ एहि लेख मे हमर ध्यान ओहि विन्दु पर जाइत अछि जे आब जखन कलियुग आबि गेल अछि, युगकालीन परिवर्तन मे मैथिल कतय छथि। मिथिला किऐक हेरायल-भोथियायल अछि। समाधान लेल विष्णुपुराण केर चतुर्थ अंशक अध्याय २० जतय कुरु वंशक चर्चा उपरान्त अध्याय २१ मे भविष्य मे होवयवला इक्ष्वाकुवंशीय राजा केर चर्चा शुरु भेल अछि। अध्याय २३ आर २४ पर विशेष ध्यानाकर्षण भऽ रहल अछि। अध्याय २३ मे मगधवंशीय राजा द्वारा भूमण्डल पर शासनक चर्चा अछि। अध्याय २४ मे कलियुग मे आर के सब राज्य संचालक भूपालगण हेता तिनकर विषय मे भविष्यवाणी अछि। कलियुगी राजा व प्रजाक आचरण पर नीक प्रकाश देल गेल अछि। आर अन्त मे कल्कि अवतार भेला उपरान्त पुन: धर्माचरण केर प्रतिष्ठापन होइत सूर्य, वृहस्पति आ चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र मे एक संगे एके राशि मे अबिते सत्ययुग केर प्रारम्भ होयत कहल गेल अछि। हम पाठक सँ अनुरोध करय लेल चाहब जे एहि समस्त अध्याय पर अपन स्वाध्यायकेँ जरुर केन्द्रित करैथ आ स्वयं निर्णय करैत जातीय अभिमान सँ नितान्त दूर निज मानवीय कर्म सँ अपनाकेँ मुक्त बनबैथ।

स्मृति मे रहय, मैथिलक सन्तान सदिखन ‘आत्मविद्या’ केँ आश्रयदाता रहला अछि। माता सरस्वतीक कृपा एतय बनल रहय, मिथिलाक सन्तान केँ बिहारी खिचडी सँ बर्बाद कैल जा रहल अछि, एहि पर वर्तमान कलियुगी भूपालगण केर ध्यानकेन्द्रित हो तथा सबहक आभूषण विद्याकेँ पुनर्स्थापित कैल जाय।

जय मैथिली! जय मिथिला!!

हरि: हर:!!

पूर्वक लेख
बादक लेख

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

2 + 2 =