कैकेयी केर सती होयबाक प्रयास

मानस मर्मज्ञ पं. श्रीरामकिंकरजी उपाध्याय केर केर प्रवचन पर मूल आलेख संकलनकर्ता श्री अमृतलालजी गुप्ता

मैथिली अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी

दशरथजीक मृत्यु भेलाक बाद  कैकेयी मनहि-मन सती होयबाक निर्णय लेलीह। सती होयबाक पाछाँ कैकेयीजीक मनोभाव कि छलन्हि? वस्तुतः जखन ओ भरतजीक द्वारा सेहो तिरस्कृत भऽ गेलीह तखन हुनका एना लगलनि जे आब समाज मे एको टा एहेन व्यक्ति नहि बचल, जेकरा मोन मे हमरा प्रति एको रत्ती प्रेम हो या अपनत्वक भाव हो। जँ हम जीबित रहब त समूचा समाजक लोक हमरा सँ घृणा करत तथा उपेक्षाक दृष्टि सँ देखत आर तखन कैकेयी केर अहं कहलकैन जे आब एहि कलंक केँ मेटेबाक एक्के गोट उपाय अछि जे हम महाराजक संग सती भऽ जाय। एहि सँ लोक हमरा दोख केँ बिसैरि जायत आर ओकरा सब केँ याद रहतय जे कैकेयी त बड़े सती छलीह, ओ अपन पतिक संग अपन प्राणक परित्याग कय देलीह। एहि सँ पुरनका गलतीक परिमार्जन भऽ जायत तथा हम सतीक रूप मे याद कयल जायब।

लेकिन भरतजी अपन माँ कैकेयी केँ सती नहि होमय देलनि, आगि मे नहि जरय देलनि आर ओ कैकेयीजी केँ मानू याद दिया देलनि जे अन्य माता लोकनि जे सती होमय चाहि रहल छथि हुनका लोकनिक भावना केँ त हम बुझि सकैत छी जे हुनका सभक मोन मे पतिक प्रति बड पैघ प्रीति छन्हि, मुदा अहाँ कियैक सती होमय चाहैत छी? संगहि-संग ओ ईहो पूछि लेलखिन जे हम त सुनने छी जे स्त्री लोकनि जखन सती होइत छथि त ओहो पतिक संग पतिलोक केँ जाइत छथि, त कि महाराजक संग रहिकय हुनका और कष्ट देनाय बाकी अछि जे अहाँ हुनका लोक मे जाय चाहैत छी? ओ अहाँ केँ एतहि छोड़िकय चलि गेलाह। ओ अहाँ केँ देखनाइयो तक पसीन नहि कयलनि। अहाँ सती भऽ कय स्वर्ग मे जायब तऽ कि पिताजी ओतय अहाँ केँ देखब पसीन करता? भरतजी कहलखिन – अहाँ यदि जरैये लेल चाहि रहल छी त जरय सँ हम अहाँ केँ नहि रोकैत छी। हम नहि कहब जे अहाँ जुनि जरू। हम चाहैत छी जे अहाँ जरू, लेकिन अहाँक कल्याण ओहि आगि मे जरय मे नहि अछि। अहाँक कल्याण तऽ पश्चात्तापक आगि मे जरय मे अछि। अहाँ जँ अपना-आप केँ पश्चात्तापक अग्नि मे जरायब तँ अहाँक अपराध जरिकय नष्ट भऽ जायत। एकर अभिप्राय ई भेल कि अहाँ गलती (भूल) केर कारण जे रामराज्य नहि बनि पाओल, पिताजीक मृत्यु भेल, एहेन स्थिति मे जँ अहाँ अपन गलती केँ बुझिकय ग्लानि आर पश्चात्तापपूर्वक श्रीराम केँ लौटा लायब आर हुनका सिंहासन पर बैसेबाक चेष्टा करब तऽ ग्लानि एवं पश्चात्तापक उदय होयत, गोस्वामीजी कहैत छथि –

गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई॥

अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई॥

– रामचरितमानस २/२७३/१, २/२५२/६

कुटिल कैकेयी मनहि-मन ग्लानि (पश्चात्ताप) सँ गलल जाइत छथि। केकरा सँ कहब आर केकर दोख देब? ओ पृथ्वी तथा यमराज सँ याचना करैत छथि, मुदा धरती बीचहि मे फाटिकय समा जेबाक बाट नहि दैत छथिन आर विधाता मृत्यु नहि दैत छथिन।

ई तीव्रतम पश्चात्ताप हुनकर अन्तःकरण मे उत्पन्न भेलनि। ओ देख लेलनि जे लोभ एवं क्रोध केर कतेक भयंकर परिणाम भेल। कैकेयीजी जखन चित्रकूट गेलीह तऽ भगवान् श्रीराम तीनू मायक बीच सब सँ पहिने कैकेयीजीक पैर मे प्रणाम कय हुनकर सीना सँ लिपैट गेलाह। गोस्वामीजी लिखैत छथि – ‘प्रथम राम भेंटी कैकेई।’ (रामचरितमानस २/२४४/७)

तीनू माताक बीच श्रीराम जखन कैकेयीजीक हृदय सँ लागि गेलाह तखन ओ कानय लगलीह। हुनका लगलनि – अरे! राम पर क्रोध कय केँ हम वनवास देने छलहुँ, मुदा एकर व्यवहार आइयो हमरा प्रति ओहने अछि। पहिने ओ अपन मायक अपेक्षा हमरा बेसी मानैत रहय, ई त एक साधारण बात छल, लेकिन जखन हम एकरा एतेक कष्ट देलियैक तैयो हमरा प्रति एकर पुरनके भाव छैक। आयो अपन मायक बदला हमरे बेसी महत्त्व दैत अछि आर भगवान् राम तऽ कैकेयी अम्बाक हृदय सँ लागिकय कहय लगलाह – माँ! तूँ एकदम नहि घबरा। हमर हृदयक बात तऽ मात्र तूँही टा जनैत छँ। अगर तूँ हमरा वन नहि पठेने रहितें तऽ भरतक चरित्र – भरतक प्रेम समाजक सोझाँ कोना अबैत? ई दिव्य औषधि कोना प्रकट होइत? ताहि लेल तूँ दुःख नहि करे। – आर कैकेयी अपन मोनक तीव्र लोभ केर निरर्थकता केँ देखलनि। अरे! जाहि भरतक लेल हम एतेक लोभ केलहुँङ ओ हमरा सँ केहेन व्यवहार केलक, हमर भर्त्सना केलक, हमर राज्यक प्रस्ताव केँ अस्वीकार केलक, जेकरा कारण हम विधवा भऽ गेलहुँ, हमरा पर कतेक पैघ कलंक लगौलक, समाज सँ तिरस्कृत भऽ गेलहुँ आर अन्त मे ओ भरत राज्य केँ अस्वीकार कय त्यागक जीवन स्वीकार कय लेलक। – कैकेयी केँ लोभक व्यर्थता स्पष्ट देखाय देबय लगलनि आर भगवान् राम केँ हृदय सँ लगलाक बाद क्रोधक व्यर्थता सेहो स्पष्ट देखाय देबय लगलनि। परिणाम ई भेल जे सन्निपात शान्त भऽ गेल और रामराज्यक स्थापना भेल। गोस्वामीजी मानू बतौलनि जे बुराइ-बदनियतीक संग हमरा लोकनि मोन मे ग्लानि उत्पन्न भेनाय – यैह रोग केँ विनष्ट करयवला पहिल शर्त थिक।

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