अष्टावक्र संहिता – दोसर अध्याय – आत्मानुभूतिक आनन्द

स्वाध्याय

तिला-संक्रातिक समस्त पाठक लोकनि मे हार्दिक शुभकामना। आजुक दिवस केँ विशेष संकल्प लय पूरा करबाक लेल सेहो आध्यात्मिक चेतनशील लोक वर्णन करैत छथि। बस, अपन-अपन जीवनक महत्व बुझैत सब कियो अपन धर्म प्रति सचेत बनी, यैह विशेष कामना। आउ, प्रथम अध्याय मे जनक-अष्टावक्र बीच पहिल विषय ‘आत्मानुभूतिक परिचिति’ उपरान्त आब दोसर अध्याय ‘आत्मानुभूतिक आनन्द’ पर ध्यान दी।

अष्टावक्र संहिता
 
दोसर अध्याय – आत्मानुभूति केर आनन्द
 
जनक उवाच।
अहो निरञ्जनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः।
एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडम्बितः॥१॥
 
राजा जनक कहैत छथि,
 
अहो! हम निरञ्जन (निष्कलंक), शांत, प्रकृति सँ परे ज्ञान स्वरुप थिकहुँ। आइ धरि हम मोह सँ संतप्त कयल गेल रही।
 
King Janaka says: Oh! I am flawless, peaceful, beyond nature and of the form of knowledge (Pure Consciousness). All this time I have been merely duped by illusion.
 
यथा प्रकाशयाम्येको देहमेनं तथा जगत्।
अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किञ्चन॥२॥
 
जाहि तरहें हम एहि शरीर केँ प्रकाशित करैत छी, तहिना हमहीं एहि विश्व केँ सेहो प्रकाशित करैत छी। तैँ हम ई समस्त विश्वहि छी, वा फेर किछु नहि छी।
 
As I alone reveal (illumine) this body, even so do I reveal (illumine) this universe. Therefore, mine is all this universe or nothing is mine.
 
Continued……
 
हमर नोटः
 
प्रिय पाठक जे लोकनि अध्याय १ केर जनकक प्रश्न आ पुनः अष्टावक्र केर सुन्दर जबाब क्रमिक रूप मे पढि रहल होयब, तिनका जनकक अनुभूति सँ ओहिना आनन्द प्राप्त होयत जेना विद्यमान प्रसंग मे जनक केँ होइत छन्हि। बस, क्रमिक अध्ययन आवश्यक छैक।
 
संसारहु मे जँ रमल छी त एतहु सिद्धान्त परमानन्द प्राप्तिक यैह टा छैक जे हरेक विन्दु पर आत्मीय चिन्तन करैत लब्धि सँ वगैर उन्माद वा चिन्ता मे पड़ने अपन समय केर महत्व टा बुझैत बढैत चलू। अस्तु! क्रम बनल रहय। 🙂
सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाधुना।
कुतश्चित् कौशलादेव परमात्मा विलोक्यते॥३॥
आब शरीर सहित एहि विश्व केँ त्यागिकय किछु विशेष कौशल सँ हमरा द्वारा परमात्माक दर्शन कयल जाइत अछि।
Now abandoning this world along with the body, Lord is seen through some skill.
यथा न तोयतो भिन्नास्तरङ्गाः फेनबुद्बुदाः।
आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम् ॥४॥
जेना पानि तरंग, फेन तथा बुलबुला सँ अलग नहि अछि, तहिना आत्मा सेहो स्वयं सँ निकलल एहि विश्व सँ अलग नहि अछि। 
Just as waves, foam and bubbles are not different from water, similarly all this world which has emanated from Self, is not different from It.
तन्तुमात्रो भवेदेव पटो यद्वद्विचारितः।
आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद्विश्वं विचारितम्॥५॥
विचार कयला पर (विश्लेषण सँ) जेना वस्त्र केवल ताग (तंतु) टा होयब ज्ञात होइत अछि, तहिना ई समस्त विश्व आत्मा टा थिक।
As cloth, when analysed, is found to be nothing but thread, so this universe, when analysed, is nothing but the Self.
यथैवेक्षुरसे क्लृप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा।
तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम्॥६॥
जाहि तरहें कुशियारक रस सँ बनल गूड़ (शक्कर) ओकरहि सँ व्याप्त होइत अछि, ओहि तरहें ई विश्व हमरहि सँ बनल अछि आर निरन्तर हमरहि सँ व्याप्त अछि।
Just as sugar generated in sugarcane juice is wholly pervaded by that juice, so the universe produced in me is permeated by me through and through.

आत्माज्ञानाज्जगद्भाति आत्मज्ञानान्न भासते।
रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्झानाद्भासते न हि॥७॥

आत्म-अज्ञानवश ई विश्व केर रूप मे देखाय दैत अछि, आत्म-ज्ञान भेला पर ई विश्व नहि देखाय दैत अछि। जेना रस्सी मे अज्ञानवश साँप जेहेन देखाय दैत अछि, पुनः रस्सी केर ज्ञान भऽ गेला पर साँप नहि देखाय दैत अछि।

The world appears from the ignorance of the Self and disappears with the knowledge of the Self, just as the snake appears from the non-cognition of the rope and disappears with its recognition.

प्रकाशो मे निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः।
यदा प्रकाशते विश्वं तदाहम्भास एव हि॥८॥

प्रकाश हमर स्वरुप छी, एकर अलावे हम किछुओ दोसर नहि छी। ओ प्रकाश जहिना ई विश्व प्रकाशित होइत अछि तहिना ‘हम’ सेहो भासित (भावोत्पन्न) होइत छी।

Light is my very nature; I am no other than light. When the universe manifests itself, verily then it is I that shine.

अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते।
रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा॥९॥
 
ओहो, ई कल्पित विश्व अज्ञानता सँ हमरा मे ओहिना देखाय दैत अछि जेना सीप (खुरचैन) मे चाँदी, रस्सी मे साँप आ सूर्यक किरण मे पानि।
 
Oh, the universe appears in me, conceived through ignorance, just as silver appears in the mother of pearl, a snake in the rope, and water in the sunbeam.
 
मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति।
मृदि कुम्भो जले वीचिः कनके कटकं यथा॥१०॥
 
हमरा सँ उत्पन्न भेल विश्व हमरहि मे विलीन भऽ जाइत अछि जेना घैला माटि मे, लहर जल मे, कड़ा सोन मे विलीन भऽ जाइत छैक।
 
Just as a jug dissolves into clay, a wave into water, or a bracelet into gold, so the universe which has emanated from me will dissolve into me.
अहो अहं नमो मह्यं विनाशो यस्य नास्ति मे।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगन्नाशेऽपि तिष्ठतः॥११
 
अहो! हम बड़ा आश्चर्य छी! हमरा नमस्कार अछि, समस्त विश्व केर नाशो भऽ गेलापर जेकर विनाश नहि होइत छैक, जे ब्रह्मा सँ लैत घासक टुकड़ा धरि सभक विनाश भेलो पर विद्यमान रहैत अछि।
 
Wonderful am I! Adoration to myself who know no decay and survive even the destruction of the world, from Brahma down to a clump of grass.
 
अहो अहं नमो मह्यं एकोऽहं देहवानपि।
क्वचिन्न गन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः॥१२
 
अहो! हम बड़ा आश्चर्य छी! हमरा नमस्कार अछि, हम एक छी, शरीरवला रहितो नहि कतहु जाइत अछि आर नहि कतहु अबैत अछि आर समस्त विश्व केँ व्याप्त कय केँ स्थित अछि।
 
Wonderful am I! Adoration to myself who, though with a body, am One, who neither go anywhere nor come from anywhere but abide pervading the universe.
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम्।
अज्ञानाद्भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरञ्जनः॥१५
 
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता – ई तीनू वास्तव मे नहि अछि। हमहीं ओ निष्कलंक छी जाहि मे ई तीनू अज्ञानतावश देखाय दैत अछि।
 
Knowledge, knowable, and the knower, these three do not exist in reality. I am that stainless Self in which this triad appears through ignorance.
 
द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्याऽस्ति भेषजं।
दृश्यमेतन्मृषा सर्वं एकोऽहं चिद्रसोऽमलः॥१६॥
 
ओह! सब दुःखक मूल कारण द्वैत (दू-मर्जा होयब) थिक। आर, एकर अन्य कोनो निदान नहि अछि सिवाये ई बुझबाक जे सब दृश्य-अनुभव योग्य चीज असत्य (मृषा) थिक तथा केवल हम टा एक विशुद्ध चैतन्य एवं निर्मल छी।
 
Oh, the root of misery is duality. There is no other remedy for it except the realization that all objects of experience are unreal and that I am pure, One, Consciousness, and Bliss.
बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः कल्पितो मया।
एवं विमृशतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम॥१७॥
 
बोध (विशुद्ध चैतन) मात्र हम छी। अज्ञानता सँ अपना पर सीमितताक कल्पना कय लेने छी। एहि तरहक निरन्तर ध्येय (परिलक्षण) सँ हम निर्विकल्पक (ब्रह्म) स्थिति मे छी।
 
वा,
 
हम केवल ज्ञान स्वरुप छी, अज्ञानहि सँ हमरा द्वारा स्वयं मे अन्य गुण कल्पित कयल गेल अछि, एना विचारिकय हम सनातन और कारणरहित रूप सँ स्थित छी।
 
I am Pure Consciousness. Through ignorance I have imposed limitations upon myself. Constantly reflecting in this way, I am abiding in the Absolute.
 
Or,
 
I am of the nature of light only, due to ignorance I have imagined other attributes in me. By reasoning thus, I exist eternally and without cause.
 
न मे बन्धोऽसि मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्ता निराश्रया।
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्॥१८॥
 
नहिये हमरा बन्धन अछि नहिये मोक्ष। बिना कोनो आश्रय (मदतिक) हम भ्रान्ति (भ्रम) मे पड़ल छी। ओहो! ई विश्व जे हमरहि मे अछि सेहो हमरा मे यथार्थ रूप सँ स्थित नहि अछि।
 
I have neither bondage nor freedom. Having lost its support, illusion has ceased. Oh, the universe, though existing in me, does not in reality so exist.
 
एक अन्य व्याख्या द्वाराः
नहिये हमरा कोनो बंधन अछि आर नहिये कोनो मुक्ति केर भ्रम। हम शांत आ निराश्रय (आश्रयरहित) छी। हमरा मे स्थित ई विश्व सेहो यथार्थतः हमरा मे स्थित नहि अछि।
 
For me there is neither bondage nor liberation. I am peaceful and without support. This world though imagined in me, does not exist in me in reality.
 
हमर नोटः श्लोक १८ केर प्रथम अनुवाद बेसी सटीक बुझा रहल अछि। विद्वान् आ संस्कृतक जानकार केर ध्यानाकर्षण चाहब। हमरा पास आधार-पुस्तक स्वामी नित्यस्वरूपानन्द केर संस्कृत-अंग्रेजी आ वेदिक इन्स्क्रीप्चर केर गूगल अनुवाद केर आधार पर ई दू भाव भेटल अछि। एहि सँ पूर्वहु मे एहि तरहक दुविधाक स्थिति छल, लेकिन स्व-विवेक सँ निर्णय लैत एक गोट मात्र लिखने रही। आजुक दुनू लिखि रहल छी, पाठकक चेतना मे सेहो जिज्ञासा आ यथार्थ स्थितिक बोध लेल। अस्तु।

सशरीरमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चितम्।

शुद्धचिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन् कल्पनाधुना॥१९॥

ई निश्चित अछि जे ई शरीर आ विश्व किछुओ नहि थिक, केवल शुद्ध आ चैतन्य आत्मा टा अछि। तखन एहि सब मे केकर कल्पना कयल जाय?

Definitely this world along with this body is non-existent. Only pure, conscious self exists. What else is there to be imagined now?

स्वामी नित्यस्वरूपानन्दजीक मुताबिकः

I have known for certain that the body and the universe are nothing and that the Self is Pure Consciousness alone. So on what is it now possible to base imagination?

शरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा।

कल्पनामात्रमेवैतत् किं मे कार्यं चिदात्मनः॥२०॥ 

शरीर, स्वर्ग, नरक, बंधन, मोक्ष तथा भय – ई सबटा केवल कल्पना टा थिक। एहि सब सँ हम चिदात्मन (विशुद्ध चैतन्य) केँ कोन काज?

The body, heaven, hell, bondage, liberation and fear – these are all unreal (simply imagination). What have I, as a Pure Consciousness, to do with all these?

Or,
The body, heaven and hell, bondage and liberation, and fear, these are all unreal. What is my connection with them who is conscious.॥20
अहो जनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम।
अरण्यमिव संवृत्तं क रतिं करवाण्यहम्॥२१॥
 
अहो! जनसमूहो मे हमरा दोसर कियो नहि देखाइत अछि, अरण्य (निर्जन भूमि) समान लगैछ सबटा – कथी मे मोह करू हम!
 
Oh! I do not see duality even in a crowd, it appears as if wilderness. To what should I attach myself?
 
नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित्।
अयमेव हि मे बन्ध आसीद् या जीविते स्पृहा॥२२॥
 
नहि हम शरीर छी, नहिये ई देह हमर थिक। न हम जीवे थिकहुँ, हम केवल विशुद्ध चैतन्न छी। हमर जीबाक इच्छा टा हमर बन्धन छल।
 
I am not the body, nor is the body mine. I am not Jiva, I am Pure Consciousness. This indeed was my bondage that I had thirst for life. 🙂
अहो भुवनकल्लोलैर्विचित्रैर्द्राक् समुत्थितम्।
मय्यनन्तमहाम्भोधौ चित्तवाते समुद्यते॥२३॥
 
अहो!, हम अनंत महासागर मे चित्तवायु उठला पर ब्रह्माण्ड रूपी विचित्र तरंग सभ उपस्थित भऽ जाइत अछि।
 
(Amazingly, as soon as the mental winds arise in the infinite ocean of myself, many waves of surprising worlds come into existence.)
 
Oh, in me, the limitless ocean, on the rising of the wind of the mind, diverse waves of worlds are produced forthwith.
 
मय्यनन्तमहाम्भोधौ चित्तवाते प्रशाम्यति।
अभाग्याज्जीववणिजो जगत्‌पोतो विनश्वरः॥२४॥
 
हम अनंत महासागर मे चित्तवायु केर शांत भेला पर जीव रूपी वणिक केर संसार रूपी जहाज जेना दुर्भाग्य सँ नष्ट भऽ जाइत अछि।
 
(As soon as these mental winds subside in the infinite ocean of myself, the world boat of trader-like ‘jeeva’ gets destroyed as if by misfortune.)
 
With the calming of the wind of the mind in the infinite ocean of myself, the ark of the universe, unfortunately for jiva the trader, meets destruction.
 
मय्यनन्तमहाम्भोधावाश्चर्यं जीवविचयः।
उद्यन्ति घ्रन्ति खेलन्ति प्रविशन्ति स्वभावतः॥२५॥
 
आश्चर्यं wonderful अनन्तमहाम्भोधौ in the limitless ocean मयि in me जीवविचयः the waves of individual selves स्वभावतः according to their nature उद्यन्ति rise घ्रन्ति strike खेलन्ति play प्रविशन्ति enter (च and)
 
आश्चर्य अछि जे हम अनंत महासागर मे जीव रूपी लहर उठैत अछि, एक-दोसर सँ मिलैत अछि, खेलाइत अछि आर फेर स्वाभाविके हमरहि मे फेर प्रवेश कय जाइत अछि।
 
How wonderful! In me, the limitless ocean, the waves of individual selves, according to their nature, rise, strike each other, play for a time, and disappear.
 
हरिः हरः!!
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