मनुष्य कियैक दुःख आ अशान्ति भोगैत अछि?

जीवन मे सभक कियो न कियो आदर्श पुरुष होइत छैक। हमर आदर्श हमर पिता भेलाह। हुनकर कइएक महत्वपूर्ण शिक्षा मे एक गोट शिक्षा होइत छल जे कोना अपना केँ एकदम शान्ति मे राखि सकब। ओ बेर-बेर कहथिन जे ऊपर मुंहें नहि ताक। नीचाँ देख। माने जे ऊपर मे अनन्त आकाश छैक। कतबो ऊँचाई धरि कियो पहुँचि जाइत अछि, ओकरा अपन उच्चताक अनुभूति नहि भऽ सकैत छैक। हँ, नीचाँ आधार छैक। नीचाँ अन्त छैक। अपना सँ नीचाँ केँ देखला पर अपन ऊँचाई केर भान शीघ्र होयब शुरू भऽ जाइत छैक।

दोसर बात – अशान्तिक जैड़ होइत छैक ‘अनेकों इच्छा’ धारब। जेना-जेना इच्छा केँ सीमा मे बन्हैत जाइत अछि, लोक तहिना-तहिना विभिन्न बन्धन सँ मुक्त होइत जाइत अछि। जीवन एक महत्वपूर्ण अवसर थिकैक, एकरा यदि हम सब अशान्ति सँ बचाबय चाहि रहल छी तऽ सब सँ पहिने अनन्त इच्छा आ अनन्त आकाश मे विचरण करब बन्द करी। केकरो सँ अनेरे बहुत बेसी अपेक्षा नहि पोसि ली। गीता मे सेहो कहल गेल छैक जे विषय मे चिन्तन करैत रहब तऽ विभिन्न प्राप्तिक इच्छा होयत आ फेर जखन कोनो वस्तुक अभिलाषा पूरा नहि होयत त क्रोध आओत। क्रोध, लोभ, मोह, आदि केँ नरकक द्वार सेहो कहल गेल छैक।

बेसी उपदेश देबाक लेल नहि, बस एतबे चिन्तन करय लेल कहब – पहिने स्वयं अपना आप केँ आ फेर अपना सँ जुड़ल हरेक मनुष्य केँ – कृपया उपरोक्त दुइ बात पर विशेष ध्यान दी। तैयो जँ ई दुइ गोट बात – यानि अपना सँ ऊपर केँ देखि मोन मे उद्वेलन् पैदा करब आ इच्छा पर इच्छा धारैत चलि जायब आ ताहि कारण अशान्त आ दुःखी रहब तऽ एहि मे अहाँ केँ कियो कोनो मदति नहि कय सकत। अपन समय, जीवन आ उपलब्धि – सब किछु अहाँ व्यर्थ कय रहल छी जँ एतेक बात नहि बुझि पबैत छी।

हरिः हरः!!

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