प्रवीण डायरी – २०१२ – भाग ४

पूर्व केर ३ भाग उपरान्त

१ अक्टूबर २०१२

चलू चलै छी पिता मिलन लऽ!

पंछी छी हम हुनकहि पोसा, नाम हमर छी मनु तोता।
खन विचरी पसरी आ ससरी, पिपर छी अपन खोता॥
उपजा हेतु कर्म के हरवाह वसुधा पूरा निज जोता।
भाग के बरखा पिता के हाथे द्वन्द्व फसल लगबी गोता॥

आत्मारूपी परमात्माक तोता आ शरीररूपी स्वतंत्र या परतंत्र विशाल पिपरक गाछमें खोंता; ताहि खोंतामें मौसमी बुखार सँ लैत अनेको प्रकार के आधुनिक बैक्टीरिया-वायरस द्वारा पसैर रहल रोग-व्याधि…

Now it is time to move ahead. Delusion is over. Did a lot, but still the construction of my residence could not finally complete in this world. I must go! I must leave!!

Good bye!

– A soul cries and say this at the time of leaving this abode!

Harih Harah!

**

बहुत दिन सँ दिनचर्या अनुरूप लेखनी नहि भऽ पाबि रहल अछि। तथापि एहेन कोनो दिन नहि जे किछु न किछु लिखियो नहि सकी। परिस्थिति मन के दौगबैत छैक आ कलम तहिन चलैत छैक। आइ भिनसरे किछु एहेन दृश्य आँखिक सोझाँ आयल जे देखि हृदय सेहो छहोंछित भऽ गेल छल। आखिर अन्त घड़ी लोक के मनोदशा केहेन होइत छैक…. कि ईश्वर के नाम लेब तक कठिन आ हर्ष केर तऽ बाते कि कहू? शरीरमें नाड़ी के गति एतेक ऊपर-निचां जे सामान्य घड़ी सँ बिपरीत चलबाक खुलेआम नजारा देखाबैछ आ बुझनुक लोक डूबैत नाड़ी सँ पकैड़ लैछ जे आखिर कतेक समय धरि ई तोता एहि शरीररूपी पिपरक धोंधरिमें बास करत। लेकिन संत आत्मा लेल एतेक कठिन यात्रा नहि होइत छैक, केओ सुतल तऽ सुतले रहि गेल आ केओ इच्छा केलक तहिना यात्रा संभव भऽ गेल। मनुष्यके जीवनक गति सँ मौतक गति तय होइत छैक। मैथिली में एक प्रसिद्ध कथनी छैक – मरनी देखबौ करणी गुणे! यथार्थ आ सत्य! लेकिन हम फेर प्रार्थना करब – इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले! गोविन्द नाम ले के! तब प्राण तन से निकले!

हरिः हरः!

**

३ अक्टूबर २०१२

मिडिया आ बेवकूफी

कहीं एहेन नहि हो जे हड़ही-सुरही मिडिया-हाउस खोलि फेसबुक वा अन्य ब्लॅग पेज सभ सँ लोक के अपन विचार के समाचार मानि मैथिली-मिथिला के गप्पक खेतीकेँ मात्र पोषित करय – एहि तरफ हम किछु सम्भ्रान्त मिडियाकर्मीके ध्यान आकृष्ट करय लेल चाहब। आइ धरि जे अपन परिवार के मायाजाल सँ, अपन कुन्ठित विचारधारा के चाप सँ आ अपन प्रभावक्षेत्र के परिधिसँ बाहर नहि आयल हो आ जेकरा गंदगी छोड़ि आम मानव-समाज लेल अन्य कोनो जनकल्याणकारी काज के अनुभव नहि हो ओ यदि कोनो मंचपर ठाड़्ह भऽ के अन्य स्थापित व्यक्ति वा संस्थाके विषयमें नकारात्मक भाषण करय ओ एहि समाज के पकिया दुश्मन थीक आ ओकर लक्ष्य कदापि सौहार्द्र वा रचनात्मक नहि बल्कि अपन स्वार्थपूर्ति हेतु सार्थक, सकारात्मक व सशक्त माध्यम के दुरुपयोग करैत ओकरो निरर्थक, नकारात्मक व प्रभावविहीन बनाबय के षड्‌यन्त्र मात्र करैछ। एहेन लोक के कोनो घोषणा केँ आम जन तक तखनहि पहुँचाबी जखन ई विश्वास हो जे एहेन लोक वा संस्था-समिति द्वारा आमजनके हितक काज यदा- कदा कहियो भेल अछि, होमय जा रहल अछि वा होयत। जे स्वयं ओहि लोमड़ी जेकाँ दस बेर कूदय-फांगय जे अंगूर कोहुना हमहीं खाइ आ अथक प्रयास के बावजूद यदि अंगूर दूर हो तऽ लागय अंगूर के गारि पढऽ तऽ बुझि जाय जे लोमड़ी कोन मानसिकता सऽ एना कय रहल अछि। सच पूछी तऽ जे काज करनिहार लोक होइछ ओ एहेन-एहेन किरदानी करनिहार घिनायल मानसिकता के कोनो तरहें मोजर नहि दैछ; लेकिन मैथिली के नाम पर मिडिया के संचालन करनिहार द्वारा एहेन फालतू समाचार के प्रकाशन पर अवश्य गंभीर प्रश्न ठाड़्ह करैछ। कि एहि सँ हेतैक मिथिलाक मुद्दा के पोषण?

*फेसबुक सँ दूर वा अन्य प्रकाशित समाचार सँ हँटिके किछु प्रासंगिक समाचार प्रकाशित करू।

*हर क्षेत्र के बात – विकास के अवस्था – शिक्षा, स्वास्थ्य व समाजके वर्तमान परिदृश्य व सुधार हेतु प्रयास के समाचार प्रकाशित करू।

*ऐतिहासिक धरोहर – रखरखाव व संरक्षण, पर्यटन-विकास एवं संभावना, आदि सृजनशील विषय पर आलेख प्रकाशित करू।

*समाजिक कूरीति दूर करबाक लेल जन जागृति हेतु लेख व रचना आदि प्रकाशित करू।

*नव पीढी में रचनात्मकता व सृजनशीलता हेतु प्रयास के बढावा दियौक – आइ जापान के सुडोकु दिमागी खेल हिन्दुस्तान पहुँचि गेल लेकिन मिथिला के विभिन्न महत्त्वपूर्ण दिमागी खेल गुमनामीके अन्हरि्या में डूबि गेल। कम से कम ललितकला के संग अन्य बाल-प्रतिभा के पहचान करैत कार्य कैल जा सकैत छैक, तेहेन सामग्रीके प्रकाशन करू।

*मिथिला में युवा एकमात्र रोजगार लेल एतेक बेहाल छथि, परदेश पलायनमें पगलायल छथि… स्वरोजगार व स्वदेष संवरण के समुचित साहित्यिक रचना सऽ पोषण हो, तेहेन प्रकाशन करू।

एहि लेल हमर उपरोक्त विचार भऽ सकैत अछि, अहाँ के रुचि अलग भऽ सकैत अछि, लेकिन विषय-वस्तु तऽ हमर आ अहाँके एक रहत तखनहि समग्र विकास के संभावना बनि सकैत छैक।

विशेष अपन-अपन क्षेत्रमें सभ बम रहू!

हरिः हरः!

**

Ma Bhagavati ke bahut-bahut dhanyavaad je aai Mithilak mahan gaayak evam vibhuti Shri Kunjbihari Jee ke dosaro operation safaltaapoorvak sampann bhel achhi aa just 1 ghantaa pahine o poorn roop sa hosh me ayalaah chhathi. Hosh me abait deri o sampoorn jagat ke hunak dosar janma hoybaak soochnaa apanahi sa phone dwara debaak punya kaarya seho kayalaah chhathi. Apan madhur muda maddhim swar me ekhanturant 5 minute pahile hamaro International (ISD) phone karait o shubh samaachaar sunaulaa aa sabh ke prarthana ke kaaran e dosar jeevan bhetab maanait aagaami kushaltaa hetu seho sabhak sneh-aashirvaad lel vinti kayalaah chhathi.

Isvar ehi sapoot ke dwara Mithila ke aaro bahut uplabdhi diyebaak kaarya avashya karataah – e punarjanma ehi baat ke soochak thik aa sangahi o veebhatsa durghatanaa jaahi me 3 atyant prakhar sahakarmi kalaakaar ke jeevan shahaadati praapt kayalak evam 1 anjaan-nirdosh raahi ke seho apan praan ke aahuti debay paral – tekra vidh ke vidhaan bujhi sweekaar karait samast gat-aatmaa ker cheer shaanti hetu prarthana ke punaraavrutti karait chhi.

Harih Harah!!

**

मिलि रहल छै जोड़ी फुसियाहा संग की कोड़ी
सोझां तऽ कल्ला तोड़ी छुप-छुप बनती गोरी
बहुत दिवस ढोरी देखि लेल नौटंकी चोरी
जखनहि नेह के छोड़ी बस घूमि गेली मोरी

Harih Harah!!

**

४ अक्टूबर २०१२

आइ एक आर सुखद समाचार भोरे-भोर फोन पर डा. भुवनेश, अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली उत्थान परिषद्‌, अररिया (मिथिला) देलनि जे नवम्बर मास में मैथिली साहित्यके संवर्धन हेतु कोनो ने कोनो तरहें अपन योगदान देने छथि तिनका सभकेँ समेटैत एक विशाल गोष्ठी राखल जायत। एहि लेल तैयारी कय रहल छथि, संगहि अगिला रवि दिन एहि विषय पर हमरो आदेश देलाह छथि जे भेंट करैत कार्यक्रम के सफलता लेल प्रयास करी। एहि मादे हुनक कार्यक्रम दिल्ली लेल सेहो अछि आ दिल्लीमें हुनका आवश्यक सहयोग अपने लोकनिक भेटत से आशा करैत छी। एहि तरहक कार्यक्रम के सफलता लेल सभक सहयोग संग शुभकामनाक आवश्यकता छैक।

हरिः हरः!

**

What is good is good! This is the way our leaders must present the logic in support of their progressive steps in public, right in front of the millions and billions of people having lots of hope from them. Who wins and who looses – whom people vote with majority will win and then the winner is more responsible than looser to protect the values of votes cast in their favor. People must win ultimately. That is the major responsibility of the leaders. 

Let us see, Romney proved superior on Obama in first round TV debate. Obama was also hit in his time.

Why our Indian leaders don’t come forward with similar attitude and why media is given the right to keep speculating and creating hypes to misguide common people of India.

All countries following democracy must follow American good to at least prove better on humanitarian ground of running the governance.

Harih Harah!

**

बजैत लाज किऐक?

मेट्रो सऽ उतैरते अभिषेक अपन बालसंगी आ कक्षामित्र ललिता के संग हबड़-दबर सीढी तरफ लपकल – ओम्हर गाम सऽ आयल टुनाजी अभिषेकके हरबड़ायल उतरैत देखि जोर सँ चिकरलक, “रे! अभिषेक! हे रौ छौंड़ा!” ई आवाज किछु एहेन छल जे अभिषेक सुनि के टारि नहि सकैत छल – अनेको वरख संग बितौने छल आ भिनसर के मैदान सँ लऽ के बेरू पहरक कब्बड्डी तकमें संगे गोधियां बनि चुनैत रहल छल – ओ पलैट देखलक जे ई आवाज लगौनिहार ओकर टुनाजी एतय दिल्लीमें आ ताहुपर नवादा स्टेशनमें कोना भेट भऽ रहल अछि…. मुदा किछु सोचि ओ ठमैक गेल – संग में ललिता जे लालबाबुके बेटी छल आ जेकर पिता के टुनाके पिता संग गाममें दूगोला छलन्हि; लेकिन अजीब परिस्थिति छैक ओ नहि तऽ ललिता के छोड़ि सकैत छल आ नहिये टुनाके रोकि सकैत छल। बस ओकरा ठमकल देखि ललिता सेहो परिस्थितिके गंभीरता संग आकलन करय लागल आ अभिषेक केँ अपन स्नेही संग भेंट करय लेल मौन हामी भरैत बस कात लागि दुनू भजार के भेंट में सहयोग देलक। अभिषेक जे आब तेसर साल इन्जिनियरिंग के छात्र छल, टुनाजीके हाथ मिलबैत पूछलक, “अमा यार! तुम दिल्ली में?’ टुनाजी अभिषेक के कहलक जे किछु प्रतियोगितात्मक परीक्षाके तैयारी लेल ओहो आब दिल्ली आबि गेल अछि आ एहिठाम अपन पढाइ करैत आगू कैरियर निर्माण लेल सोचत। मुदा अभिषेक ओकर मैथिली सुनि आ कनखीमें ललिता के घूरैत फेर हिन्दीये में बाजबमें अपन भलाइ बुझलक – “अरे यार! शहरमें इस तरह मैथिलीमें क्या बातें कर रहे हो?” टुना के एतेक दिनक बाद अपन संगी भेटल छलैक, ओ जतेक खुशी देखैत भेल छल ततबे ओकरा एना अपन बाजयके भाषा पर मित्रक आपत्ति दुःखी केलकैक। ललिता मुस्कियैत रहल मुदा एना बैसल रहल जेना अभिषेक आ टुनाके बातमें ओकरा कोनो दिलचस्पी नहि हो। टुना के वर्दाश्त नहि भेलैक – गामक दुगोलाक कारण ललिताके पिताके हाकिमपनी के अपन पिता द्वारा विरोध आ मैथिली मातृभाषा प्रति समर्पण के विरोध के कारण भेल रहैक से सब बात ओकरा मानसपटलमें दोहरा गेलैक… बस ओ आगू किछु बजैत ताहि सऽ बेहतर अपन बालसखा सँ केवल मुस्की दैत विदाइ लेब नीक बुझलक। मने-मन ओ कानि के रहि गेल जे किछु अपनहि लोक के कारण हमर मातृभाषा के एहि तरहें अपमान कैल जैछ… से आइ बाल सखा तक दलाली में अपन प्रेयसीके खातिर हमर अपमान केलक। लेकिन ओकर अन्तर्मन सऽ एक पुकार एलैक जे लोक के छुद्रता सऽ अपन महानताके कदापि कम नहि करबाक चाही।

हरिः हरः!

**

पैघ लोक

“श्वेता! बेटा इधर आना! बाबा हैं, पैर छुओ इनके।” बहुत वर्षक बाद आइ कलेक्टर साहेब गाम आयल छथि आ अपन बेटीके बजबैत एक गाम वृद्ध पित्तीकेँ श्वेताके बाबा कहि प्रणाम करबाक गामक परंपरा निर्वाह करैक लेल प्रेरित करैत छथि। श्वेता अपन पिताक आज्ञा पालन करैत बाबाके गोर लगैत छथिन – चरणके ठाम ठेहुन धरि हाथ नमाड़ि दाँत खिसोरैत बाबा के एना तकैत छथिन जे पुरान जमानाके लोक बाबा के गोर लागबमें सेहो किछु नव शैली के दर्शन होइछ आ अक्खड़ बुद्धिक बाबा आशीर्वादो किछु नवे शैली में दैत छथिन। श्वेताके माथक ऊपरे सऽ अपन हाथ फेरैत कलेक्टर साहेब के माथ ठोकि आशीर्वाद दैत छथिन आ कहैत छथिन जे “बाउ! अहाँ अपन बच्चाके अपन संस्कार में कि सभ देलियैन? अहाँ तऽ बच्चे सऽ बड उचकपनी करी लेकिन अहाँके ओ उचकपनीमें सेहो हमरा सभके अहाँ प्रति सिनेह आ आशीर्वाद दुनू निकलैत छल। आब कहू जे गोर लागयके माने ठेहुन लागब बनि गेल?” कलेक्टर साहेब लजैत छथि लेकिन मरितो कि करितैथ… एहिमें हुनकर हाथ में बचल कि छल… ओ तऽ भैर जीवन साहेबीमें आ ओम्हर कनियैन मैमसाहेबीमें… तखन धियापुतामें ओ संस्कार कतय सँ आओत जे कहियो गाममें अपन पूर्वजक संस्कार सँ कलेक्टर साहेब स्वयं सिखने छलाह। तै ऊपर सऽ बापो हाकिम, शख सऽ बेटाके विवाह बेतियाक लाटसाहेबक बेटी संग करौने छलखिन जे आइ धरि अपन घोरघार मैथिली सँ बाबाक हृदय पर घाव छोड़ने छलीह, तखन कहू जे ओ अपन बच्चा के ओ संस्कार देबा में कतेक हितकारी होइथ। बाबीके सेहो शख लगले रहि गेलैन जे कहियो धियापुता गाम आबि अपन बोली-वचन सँ प्रेम दितन्हि। ओहो रहि-रहिके कलेक्टर साहेब सऽ बस एतबी कहथिन जे “बौआ! केहेन पैघ लोक बनि गेलह? कहऽ जे धियापुताके अपन एकहु टा गुण नहि दऽ सकलह?” कलेक्टर साहेब बड घुरियैत छलाह मुदा करितैथ कि? दू दिन गाम में नहि बितैन आ कि मैमसाहेब आ धियापुता के जिद्द सऽ मन में कनेक दिन आरो गामवास करबाक इच्छा रहितो नहि रहि पबैत छलाह। एम्हर शहरमें आब मोंन औनाइत छलन्हि… लेकिन मैमसाहेब आ धियापुता के क्रमशः संगत के एतेक जोर जे शहरमें रहबाक लेल कोहुना के मोंन लगबय पड़ैत छलन्हि। अन्त में कलेक्टर साहेब एक पुस्तक लिखैत अपन समय बितायब से सोचि मैथिली के सेवा लेल शपथ लेलाह। किछु समय बितल आ बहुत विषय के चुनला उपरान्त हुनका केवल अपनहि कहानी नीक लगलन्हि आ शीर्षक देलखिन ‘पैघ लोक’ आ लिखि बैसलाह अपन मनके पीड़ा! संवाद मूलतः एतबी जे कतबो पैघ लोक बनि जाय अपन मातृभाषा के परित्याग एकदम नहि करी, नहि तऽ बुढापा बड़ कष्टमें बितत।

हरिः हरः!

**

५ अक्टूबर २०१२

महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी बिहार के दौरे पर आये – वहाँ से वो मिथिलाकी पुण्य भुमि दरभंगा भी पधारे और पदीय गरिमा अनुरूप कुछ अलंकृत कार्य करके वापस चले गये। क्या मिथिलाका मान-मर्दन के लिये जिम्मेवार लोगोंके लिये उन्होंने कुछ संदेश दिया? क्या कभी शिक्षा के लिये प्रसिद्ध मिथिलांचलको उन्होंने नये उपहार के तौरपर सही कोई बड़ा संस्थान खोलनेका पहल किया? या फिर जो संस्थान पहले से हैं उनमें किसी प्रकारकी बढोत्तरीकी कवायद किये? और तो और – आज बिहार व केन्द्र से उपेक्षित मिथिला क्षेत्रके आम जागरुक प्रतिनिधियोंके तरफ से १०० से ऊपर स्मारपत्र महामहिम के पास दिल्ली जाकर दिया गया है… क्या उनके मुखारविन्द से दो शब्द भी ऐसे निकले जो मिथिलाकी अस्मिताके लिये जमीन-आसमान एक करनेवाले कार्यकर्ताओंको राहतकी कुछ साँसें दे सकता था?

मिथिला और बंगालकी संस्कृतिको आपसमें मिलता-जुलता और फिर वही पुरानी विवादकी बातें जो विद्यापतिको बंगालियोंने बहुत दिनोंतक अपने भाषाका कवि मानते रहे और दरभंगा का एक अर्थ द्वार-बंग भी है आदि कहकर बिहारके मुख्यमंत्रीने भी अपनी वही छवि को दुहराया कि बस मंच मिला है तो कुछ भी बोलकर महामहिमको प्रसन्न कर दो। अजी! ये बातें आजके विकास के युगमें आखिर क्या मायना रखता है? मिथिला और बंगलामें क्या समानता और क्या अन्तर-विभेद है इसके लिये आज भी कलकत्ताके रग-रगमें बसे मैथिलोंसे कभी पूछे मुख्यमंत्रीजी? कभी समय निकालो और घूमो, देखो मैथिल संसारमें ही अपनी विशिष्ट छवि से सभीके साथ सहकार्य करनेमें सक्षम हैं। वो चाहे हस्तिनापुर हो या मराठा या पुद्दुचेरी हो या जम्मु – हर जगह मिथिलाकी अलग ही शान है। हमें गर्व है कि हम मिथिलावासी हैं और इस मिट्टी-पानीमें जन्म लेकर पले-बढे हैं… पर हमारी सहिष्णुताका गलत अर्थ निकालकर हमारी उपेक्षा ठीक नहीं है। हमारे पास भी दिल है और दिमाग भी। और ज्यादा मत तोड़ो हमें। मुहब्बतमें वर्दाश्तकी भी सीमा होती है! 

हरिः हरः!

**

ई केहेन प्रेम?

“एहि प्रेम के हम कि मानी सैलेश?” नताशा खौंझाइत बाजि उठली। लेकिन सैलेश के हिम्मत नहि भऽ रहल छन्हि जे ओ एखनहु किछु स्पष्ट कहैथ अपन प्रिया सँ – प्रेम तऽ सही में ओ करैत छथि आ विश्वास छन्हि जे जीवन हुनकहि संग आगू बढौता… विश्वास के नींब कमजोर छन्हि कारण मेडिकल में पढेबाक लेल हुनकर पिता एखन धरि ३ बीघा खेत बेचि चुकल छथि आ किछु खेत भरना सेहो लागल छन्हि। जानि पैसा कमा के कहिया ई कर्जा सभ खत्म हेतैक – ई चिन्ता सेहो खाइत छन्हि आ पिताक आशा जे डाक्टरके विवाह में वरके जरसीमन नहियो किछु तऽ पचास लाख टाका होइत छैक आ एहिसँ डोनेशनके सभटा पाइ (लगभग २९ लाख टाका) सेहो असूल भऽ जेतन्हि आ सुइद के संग-संग ढहनाइत घटक नहि बेसी तऽ ग्रेजुएट कनियां जरुर बियैह देथिन…। तखन उमरके दोख जे नताशा संग प्रेम भऽ गेल छन्हि आ नताशा के पिता यदि नताशाके डाक्टरी पढाबय लेल एतेक पाइ खर्च कय सकैत छथि तऽ एक डाक्टर दूलहा करय लेल सेहो जरुर किछु सोचनहिये हेताह। बड माथापच्चीमें पड़ल छथि सैलेश। नताशा फेर जोर सँ बाँहि पकैड़ि झुलबैत… “हे सैलेश! अहाँ कि सोचि रहल छी? हमर गप के जबाब किऐक नहि दैत छी?” सैलेश पुनः नजरि झुकौने बस एतेक कहैत छथि – “नताशा! हमर पारिवारिक संस्कार अछि जे बिना माता-पिता के आज्ञा हम किछु निर्णय नहि लऽ सकैत छी। आखिर हुनकहु किछु सपना छन्हि हमरा लऽ के! हम केना कहू जे हमर विवाह अहीं संग होयत एकर १००% गारंटी अछि?” नताशा छुब्ध छथि… जहिया दोस्ती बढय लागल छल तहिया ओ सोचनहियो नहि छलीह जे एतेक स्मार्ट लड़का हुनका संग एहेन परंपरावादी विचार के प्रदर्शन तहिया करत जहिया ओ अपन सर्वस्व हुनका ई सोचि सौंपि चुकल रहती कि ईश्वर सैलेश के हुनकहि लेल बनेने छथि आ दुनू गोटे डाक्टर बनैत जीवनक गाड़ी सेहो बड़ रमनगर ढंग सऽ आगू बढेती।

ऊफ! ई दहेज थिक आ कि प्रेमके दुश्मन? कि एहेन प्रेमके सम्बन्धमें सेहो ई एहि तरहें बाधक बनि सकैत अछि? इन्तजार करू। एहि पर सऽ सेहो पर्दा उठत! आखिर कि होइत अछि नताशाके सपना के आ सैलेश के दुविधा के अन्त कतय जा के खत्म होयत! केना सैलेशक पिताक कर्जा आ बिकायल जमीन के मूल्य असुलायत…! (अगिला अंक में!)

हरिः हरः!

**

Ekhan ta Hariyana – kanek din ke baad vishwa ke sabh sa shant aa sambhraant Mithila me seho kichhu ehane haal rahat. Be aware of unbalanced gender ratio, abolish the dowry system and make Mithila dowry free. Read below the alerting news.

Harih Harah!!

उनके मुताबिक यहां के युवक ऐसा काम उस हताशा की वजह से कर रहे हैं जो उन्हें शादी न कर पाने से हो रही है. वे इसका कारण इसमें भी देख रहे हैं कि यहां के लोग अपनी ज़मीन खोते जा रहे हैं जिसकी वजह से उनमें एक डर पैदा हो गया है.

हरियाणा में 1000 पुरुषों की तुलना में 830 महिलाएं है जो देश में सबसे कम है.

इसके कारण बहुत सारे पुरुष कुंवारे ही रह जाते हैं. ज़रा गौर कीजिए कि हरियाणा में 0-6 वर्ष की आयु के लड़के 18 लाख से अधिक हैं लेकिन लड़कियां 15 लाख से कम है. इस आयु में लड़कों की तुलना में लड़कियां 3.63 कम हैं.

**

Kudos ‘Nepali Youth: Youth For Blood’!

In today’s Nepal, your services are highly respectable. I was very fortunate to have got introduced with you guys. It has been after a long time I got to interact with social youths in Nepal. Earlier when I was in teaching profession then also I had the same experience as I gathered this time working with you jointly for this great event – a charity show for a noble cause to have a fixed office for Youth for Blood in hospital areas. Although I have a habit of visiting the emergency ward of any hospital to see the sufferers and contemplate on strange divine mechanism for how the humanity alone is the supreme and rest is nothing. There are my regrets too, the youths are diverted from humanity and driven politically to create the rifts. However, I became so much confident after meeting with youths of YFB. They are doing commendable job by arranging fresh blood donations from the donors available in their data bank. They collect the data from records of Blood Bank, by direct interaction with public mass, by contacting the institutions and organizations collecting the names of people interested to donate the blood right to the needy. Even during this event, they have appealed in public to provide them with the names, blood group and contact numbers together with willingness and commitment to donate the blood as soon as contacted. Moreover, they organize the public meetings and play various dramas to spread the awareness about the significance of blood donations and its benefits. They will resolve the ‘LACK OF BLOOD’ – the most serious thread in world of health and hygiene. They are committed to give the best of humanitarian services to mankind. They have already extended the works of charity through the country and most of Indian friends of mine have informed that they want to extend it into India too. We shall be glad for such extension of such a noble services to mankind which will give youth a fresh energy to unite for sharing love and mercy with fellow human beings.

Now they would establish an office – a place where these facilitators would meet on regular basis and think over improving the services, the charity show is for that only. I express my thankfulness to all those people who have helped them today by donating a little fund in support and also bought the tickets for the shows and helped them even by words of encouragement for such a righteous duty towards humanity, the best religion of mankind.

In coming days, I will personally dedicate more to see them doing better and for that anything and everything will be done, I assure you guys. In my first meeting I noted your frustration for how people don’t believe you, but within a week time we have done the strange and we can do it is also proved, hope you believe it now as you have seen me working and seen the world responding. Never loose hope and never get afraid from doing positive works. Begging is bad, but it is pious for the purpose of human welfare. So, I am also ready to become a beggar but take you to the height of your dream.

Thanks and well done dear Saroj, Subhash, Madan, Fanindra, Natasha, Pravin and all dear youths once again from core of my heart for giving me an opportunity to do the work of coordination, forgive me for my failures but don’t forget you have to continue despite those failures to prove the real caliber you have.

Regards,

Pravin N. Choudhary
Program Coordinator.

**

६ अक्टूबर २०१२

सपना देखय पर सभक प्राकृतिक अधिकार छैक, मुदा इच्छा के पूरा होयबमें भाग्यके भुमिका बड़ पैघ। नताशा सैलेश संग सम्बन्ध निर्माण मादे अपन हरेक निर्णय पर आब सवाल अपन अन्तरात्मा संग उठा रहल अछि। ओकरा डर तऽ छलैक एहि दुनियाके फरेबी रंग सऽ लेकिन आजुक आधुनिक युगमें एक मोडेल यूथ एहि तरहक दाकियानूसीपन देखाओत एकरा लेल ओ एखनहु अपन भीतर द्वन्द्व देखि रहल अछि। एम्हर सैलेश के सेहो छटपटी लागल छैक आ ओकरा समझ में नहि आबि रहल छैक जे हर तरहें समस्याके समाधान कोना संभव – प्रेम सेहो बचय आ पिताके सम्मान सेहो ओकरा लेल ओतबी महत्त्वपूर्ण! संसार ओकरा दोषी मानत सेहो ओकरा मंजूर नहि छैक। तखन सशक्त बुद्धिमतापूर्ण निर्णय एहेन परिस्थितिमें कारगर हेतैक से सोचि ओ बिलकुल अपना आपकेँ अक्सीजन लागल इमरजेन्सीके ओहि पेशेन्ट जेकाँ देखैत अछि जेकरा विज्ञ विशेषज्ञ डाक्टरके टोली बहुत समझदारी सँ प्राणदान दैत छैक। राइत बहुत भऽ गेल छैक, तखनहु ओकरा आँखि सऽ निन्न गायब छैक। ओ केकरो जोर सँ शोर करैत अपन समस्या के निदान लेल भीख माँगय लेल तत्पर अछि। सहसा आँगूर मोबाइल पर नंबर दबा देलकैक आ पिता संग चर्चा करैत समाधान के एकमात्र राह देखायल ओकरा। एतेक देरी सँ दुलरुआ बेटा के फोन आयल देखि पिता चौंकैत तऽ छथि लेकिन सम्हरल जिज्ञासा करैत छथि – “किछु खास बात बेटा?” सैलेश सेहो अपन पिता के बेसी चिन्ता नहि होइन्ह तेकर पूरा खियाल करैत अछि – “नहि बाबु! बस मनके किछु भारीपन घेरने अछि से अहाँ संग बात करैत हल्लूक करय चाहैत छी।” “कहू! पिता संग बात करयमें भले लाजक कोन बात! खुलि के कहू बौआ!” पिता भरोस दैत छथिन। सैलेश सब किछु एकहि साँसमें कहय चाहैत अछि – “बात एहेन छैक बाबुजी जे ओ नीक परिवार के छथि आ हमर संगे पढाइ सेहो करैत छथि। बड मेधावी छात्रा सेहो छथि। आ उम्मीद अछि जे हमर सभक जीवन एक संग नीक सऽ चलत।” पिता बात कटैत छथिन – “कि बात छैक से? कि अहाँ…” “नहि-नहि बाबुजी! हम बस अहाँ संग अपन मनके बोझ बाँटि रहल छी, हम कोनो कदम अहाँ के अनुमति बिना भले कोना उठाबी?” “देखू! यदि बात बहुत आगू बढि गेल हो तऽ ओकर जानकारी कराओ।” “नहि तेहेन कोनो बात नहि छैक। लेकिन हमर इच्छा हम प्रकट कय देलहुँ।” “सैलेश! अहाँके पता अछि जे हमर आश अहीं छी। आब कि बचल अछि हमरा लग सिवाये अहाँके?” “पता अछि बाबुजी! लेकिन हम एहि लेल अपनेकेँ आश्वस्त करय चाहब जे नताशाके पिता एक अधिकारीवर्गके लोक छथि आ अहाँके मान-सम्मानमें कमी कहियो नहि करताह। नताशा बड नीक लड़की छथि बाबुजी आ हमर सभके मन आपसमें रिझ गेल अछि।… बाकी… ” “सुनू! मन रिझब के मतलब भेल हमर मान-सम्मान के बात पाछू केनाय…” “कदापि नहि बाबुजी! एहेन तऽ अपने सोचबे नहि करू।” “अहाँ एखन धियापुता छी बौआ!” “एहि दुनियाके व्यवहार जे किछु हो, हम अहाँके पुत्र एहि लेल आश्वस्त करय चाहब जे अहाँके त्याग के प्रतिफल हम आ नताशा दुनू मिलिके पूरा कय देब।” “हम बहुत कर्जमें छी आ उम्मीद छल जे ई कर्जा जल्दिये खत्म होइत।” “जीवनमें मित्र भेटब बड कठिन छैक बाबुजी आ ताहू में एहेन जीवनसंगी जे एकहि पेशामें रहैत जीवनक गाड़ी सकुशलतापूर्वक आगू खींचब..।” “लेकिन हमरो किछु पूर्व नियार सभ छल…” “बस बाबुजी! अहाँके समस्त नियार के सूची हमरा थमाउ आ हम नताशा मिलिके ओकरा पूरा करब। हमर एहि मान के सम्मान करू बाबुजी! हम बिना अहाँके आदेशके किछु नहि कय सकैत छी।” … बाबुजी अकबका गेल छथि आ बेटाजी चढल-बढल बात कहि हुनका एहि अर्धरात्रिमें हिलेने छथिन। अन्ततः बेटाके बुधियारीके जीत भेल। पिता के माया दूर भेल। ओ कहि देलाह जे “सभ किछु तऽ अहींके छल, अहींमें लागल… बेटी भावना लेल किछु नहि बाँचल अछि। सोचने रही में एम्हर ले आ ओम्हर दे करैत ओकरो एक नीक घर-वर में विदाह कऽ के अहाँके माय संग तीर्थपर निकलि जायब। लेकिन अहाँके प्रेमके पलड़ा एतेक भारी अछि जे हमर समस्त नियार अनिश्चितताके सागरमें जुमाके फेकल बुझा रहल अछि। खैर… ईश्वर पर सभटा छोड़ैत छी। अहाँ विवेकाधीन कार्य करब से विश्वास अछि।”

सैलेश लेल पिताक अन्तिम बोली बड गहिर तक हिला देलकैक। ओ किंकर्तब्यविमूढावस्थामें पहुँचि गेल। ओकर हाथ पुनः मोबाइल पर गेल आ दोसर तरफ लेलक नताशाके! “कि सुति रहल छलहुँ?” “खाख सुतब! हमर नीन्द तऽ अहाँके चन्द्रमुख चोरा लेलक अछि आ आइ अहाँके ओ चोर मनके बदमाशी देखि चकित छी।” “एना नहि छैक नताशा! सुनू! हमर पिता संग हम बात केलहुँ आ अहाँ संग एक निवेदन करब जे अहाँ अपन पिता संग बात करी।” “कि बात करू? पिता संग बात करयके हिम्मत हमरा में नहि अछि।” “अहाँ या हम कोनो धियापुता नहि रहलहुँ… आ जीवनक कोनो निर्णय माता-पिता संग खुलिके करब जरुरी।”… क्रमशः…

हरिः हरः!

**

देवाधिदेव महादेवकेर असीम अनुकम्पा सँ ‘यूथ फर ब्लड’ द्वारा आयोजित चैरिटी शो में नेपाली नाटक ‘पर्खाल’ के दुनू शो सफलतापूर्वक सम्पन्न भेल आ युवा सभ संग कार्य करबाक एक अलग आनन्द हमरो प्राप्त भेल। प्रभुजीकेँ पुनः धन्यवाद जे संयोजनक जिम्मा सफलतापूर्वक सम्पन्न करवौलन्हि। आगामी समय में एहि संस्थाके पुनः नीक-नीक कार्यक्रम सऽ मानव-सेवा: माधव-सेवा के तर्ज पर हमर योगदान महत्त्वपूर्ण रहत ताहि लेल प्रतिबद्धता जाहिर कैल।

नेपाली युवा: यूथ फर ब्लडके शालीन आ लगनशील युवासँ सभके समुचित प्रेरणा भेटत से हमरा विश्वास अछि, विशेषतः मैथिल युवा जे स्वभाव सऽ गप्पी आ निकम्मा बेसी, अपन काज कम करब आ दोसर के अढौती बेसी देब प्रवृत्तिके पालन करब – ई कोइढपन के परित्याग जरुरी अछि।

पैछला शनि दिन विचार भेलैक, टास्क देल गेलैक आ केवल ७ दिन के भीतर एतेक पैघ जिम्मेवारी के पूरा केलक समूचा यूथ – शब्दमें धन्यवाद नहि कय सकब, बल्कि एहेन युवा सभके संग जल्दिये नव ऊँचाइ निर्माण करब ई वादा करैत छी।

हरिः हरः!

**

७ अक्टूबर २०१२

नताशाक कथा निरन्तरता मे…..

नताशा किछु गड़बड़ायल जरुर जे आखिर सैलेश ई नव पैंतरा सेहो एतेक राइत के .. लेकिन ओ सैलेशके गंभीरता संग बुझबाक प्रयास करय लागल। सैलेश के हाँ-हुँमें फोन पर जबाब दैतो ओ सैलेशक बातके गहराइ के नापय लागल। “देखू! हम एखन तुरन्त अपन पिता संग अहाँके विषयमें बात रखलहुँ आ अपन भावना हुनका सुना देलियैन, लेकिन एक पुत्र के नाते हमर ई कर्तब्य बनैत अछि जे हुनकर आज्ञा बिना कोनो काज नहि करी।” नताशा बीचे में टोकैत – “एहेन आज्ञाकारी पुत्र के तऽ सभ किछु करऽ से पूर्व पिता संग सल्लाह-विचार करबाक चाही। कतय छल ई विवेक जहिया हमरा संग दोस्तीके सीमा नाँघि रहल छलहुँ?” नताशा सैलेशके बात के मौन सहमति दैतो अपन मजबूरीके आगू झुकल बस आँखि सऽ नोर टा बहा सकैत अछि। ओकरा आजुक परिस्थितिमें हर तरहक निर्णय सैलेश द्वारा करबाक मात्र क्षमता रहि गेल छैक। स्त्रीके ई एक लक्षण होइत छैक, गंभीर परिस्थितिमें केवल माथ टा धूनब – से सोचि सैलेश पुनः नताशा के एतबी टा कहि सकल जे “ठीक छैक, अहाँ हमरा अपन पिताके नंबर मेसेज में पठाउ आ हम काल्हि धरि सभ किछु समाधान निकालि लेब। अहाँ निःफिक्र रहू। जखन निर्णय हमरे पर छोड़ि रहल छी तऽ हम एकर समाधान अपन तरीका सऽ निकालब आ हर सुरत में अहाँ हमर जान छी, ई मान राखब।” नताशा लेल एहि क्षण सैलेशक मुँह सँ निकलल एतेक बहादुर हिरो सनक बात काफी छलैक। ओ बस अपन सर्वांङ्गशरीरमें सुखक अनुभूति केलक आ जेना सैलेश ओकरा संग एखनहु विद्यमान हो तहिना फोनके संग एना चिपकल मानू ओकरा सैलेश पर विश्वास दूना भेल हो। “वाउ! सैलेश! आइ ट्रुली लव यू सो मच।” कहैत तुरन्त लाइन काटैत तखनहि अपन पिताक नंबर सैलेश के मेसेज द्वारा पठा देलीह आ बहुत चैन संग शयन कयलीह। एम्हर सैलेश अपन, अपन पिता आ नताशाके हर बात दिमागमें सुस्पष्ट रास्ता देखा देने छलैक जे ओकरा कि करबाक छलैक। ओकर एक आत्मविश्वास आ नताशाके देल वचन जे जीत हर तरहें सत्य-प्रेम के हेतैक से ओकरा लेल बड पैघ बात छलैक। लेकिन दुनियाके आडंबर आ बहिनिक विवाह एकमात्र समस्या ओकरा सोझां छलैक। एक भाइ अपने तऽ प्रेम कऽ सकैत अछि लेकिन अपन बहिन के सेहो प्रेम करैत प्रेमी संग बियैह देब नहि सोचि सकैत अछि। आ नहिये ओकर या ओकर परिवार कदापि ई इच्छा रहैत छैक जे बिना परिवार के सहमतिक कोनो बात-व्यवस्था हो। एतेक रास बात आ डाक्टरी पढाई के आखिरी वर्ष – तेकर दबाव… लेकिन ए वन्डरफुल माइन्ड कैन रिजोल्भ बड़बड़ैत ओ हिम्मत बनबैछ। कोहुना-कोहुना रात्रि बितैछ। भोरे जल्दी फ्रेश होइत ओ एक मेसेज लिखैछ नताशा के पिताकेँ आ करय लगैछ इन्तजार – कनेक काल बाद ओकरा रिटर्न काँल अबैत छैक आ अपन बात किछु एना रखैत अछि – “प्रणाम अंकल! हम नताशाके क्लासमेट सैलेश, पिता हमर हरिहरपुरके प्रसिद्ध कृषक आ समाजिक कार्यकर्ता बिलट झा, हम एक भाइ आ एक बहिन, नताशा संग अपन जीवनक सपना देखैत छी आ एहि में नताशाके सेहो मंजूरी छन्हि; आब अपने माता-पिता-परिजन के सौहार्द्र सऽ हम सभ अपन जीवन आगू सफलतापूर्वक निर्वाह करय चाहैत छी। विशेष अपनेक जेना आज्ञा हो… लेकिन अपन परिवार के एकलौता पुत्र होयबाक कारण हमर एक अनुरोध जे हमर ई प्रस्ताव हमरो परिवार सऽ अपनहिये के लेबय पड़त। यदि कोनो तरहक दान-दहेज के बात हो तऽ पिताके नहि नञि कहि हमरा सभपर भार दऽ ओकरा आइ पूरा करैत कार्य आगू बढाबी।..” नताशा के पिता सैलेशक बात के धरल्लेसँ सुनैत फिल्मी डाऍलॅग जेकाँ बुझलाह आ किछु बजितैथ कि सैलेश हुनका सँ अपन बात पूरा सुनला उपरान्त मात्र किछु बाजय के अनुरोध कएलन्हि आ फेर कहय लागल “.. अपनेक स्वेच्छा आ शख – ओम्हर हमर माता-पिताके इच्छा आ विचार सऽ मेल खायत सेहो हमरा विश्वास अछि। बस हम सभ अपने लोकनिक सन्तान, आब जेना हमर सभके हृदय के इच्छा पूरा करी।” नताशा के पिता सैलेशक दिलेरी आ बात राखय के तरीका सऽ बड प्रभावित भेलाह आ हर तरहें हिनकर प्रेम के जीत होयत कहि सभ दबाव अपना ऊपर लेलाह। ओ कहि देलाह जे दू परिवार एक भेल, दुनू के समस्या मिलि-बाँटि पूरा करब। तेकर बाद ओ स्वयं सैलेशके पिता संग एकान्तमें एक मिटींग करैत सभ स्थिति सँ परिचित करबैत दुनिया के जालिम व्यवहार सऽ दूर सभ कार्य एहि तरहें कय लेलाह जे अन्य केकरो समझ में शायदे एलैक… एबाको नहि छलैक… बस सैलेश आ नताशा एक बनि गेलाह, सैलेशके बहिन केर विवाह सेहो २ वर्ष बाद दुनू परिवार एकत्रित मिलि-जुलि सम्पन्न कयलन्हि। आ कोनो लंफ-लंफा देखाबा सऽ बहुत दूर बस अपन औकात अनुसार अपन परिस्थितिके अनुरूप सभ कार्य प्रसन्नतापूर्वक सम्पन्न कयलन्हि। सैलेश आ नताशा प्रण लेलन्हि जे एहि दू परिवार के समस्याके एक मानि ता-जिनगी हम सभ भार उठायब, कर्ज कोनो तरफ हो ओ सन्तान के पूरा करबाक फर्ज होइछ। यदि विवाह में दू परिवार के संयोग छैक तऽ समस्या भले दुनू के दू कोना भऽ सकैत छैक।

एहि कथामें सैलेश आ नताशा के हिम्मत आ प्रतिबद्धता सँ सभ कार्य सम्पन्न होइछ। दहेज के चाप जानिके चढौनिहार लेल होइत छैक, यदि सहज व्यवहार आ प्राकृतिक सम्बन्धमें विश्वास करब तऽ लड़का-लड़की के काबीलियत असल पूँजी थीक आ एहि के बुनियाद पर नवजीवन के महल ठाड़्ह करू। सफलता भेटत आ मिथिला दहेज मुक्त बनत।

हरिः हरः!

**

आउ कुटुम्ब!
कहू कि हाल?
अपन सभ ठीक,
सगरो बेहाल!

चलू चलय छी
घूमी संसार!
देखी रीत
जगके व्यवहार!

यात्रा जरुरी नहि
बस क्लीक करू!
ईन्टरनेट संग
बस प्रीत करू!

एतहु मिथिला
मैथिली के धार!
गद्य-पद्य
साहित्य टघार!

मुदा कुटुम्ब!
मुजरा छै बेसी,
लिखू किछुओ
अपनहि खुशी!

हरिः हरः!

**

८ अक्टूबर २०१२

Dear All,

Please ponder: We dream of doing big but we are no way ready to resolve the crisis of ill-shaped traditions – dowry is one of the social devil, but we hardly have the courage to vow –

“Neither we will take nor we will give and we will neither demand dowry while marrying the youth of our families nor we will ever make any demand of it to anyone; even we will never participate in such wedding events where demands of dowries are made or fulfilled.”

Take this vow and support the cause of social awareness as being spread by Dahej Mukt Mithila. Join the stream at:

www.dahejmuktmithila.org

www.dahejmuktmithila.org/Vivah.aspx

https://www.facebook.com/groups/dahejmuktmithila/

Thanks and good luck!

Harih Harah!!

**

बचपन आ दुर्गा पूजा

अन्हर भोरे उठि संगी-संङोर के उठबैत दौड़ा-दौड़ी शुरू! बाबी-काकी-माय-बहिन सभ अपन फूलबारीके रक्षा करैत छथि आ छौंड़ा-मांरड़ि सभ दौड़ि पड़ैछ सार्वजनिक फूलबारी सँ विभिन्न तरहक फूल तोड़ि फूलडाली भरि-भरि भगवती घर केँ पूर्ण सुवासित राखय लेल। जेना जीवनक सभ सँ पैघ लक्ष्य के प्राप्तिसँ केकरो खुशी होइत छैक, किछु तहिना धिया-पुता अवस्थामें दुर्गा-पूजा में बेसी सऽ बेसी प्रकार के फूल भैर-भैर फूलडाली तोड़ला-बिछला-अनला सँ होइत छैक जेना आइ स्मृतिमें आबि रहल अछि। फूल कनैल (उजरा, पीरा, ललका), सिंगहार, अरहुल (ललका, उजरा, पीरा – एकहारा एवं बहुधारा आदि), लंकेसर (उजरा, ललका, पीरा, छीट रंगके एकहारा-दोहारा-बहुधारा आदि), अपराजिता, गुलाब (अनेको प्रकारक), बेली, चमेली, गेंदा, तीरा (अनेको प्रकारक)…. ऊफ आब तऽ नामो नहि स्मृतिमें आबि रहल अछि। कम से कम दू सऽ अढाइ घंटा तक घूड़दौर मचल रहैछ जे अधिक सँ अधिक रास फूल तोड़ि जमा करी। सभके हिस्सा लागल रहैत छैक आ सभके जेना अपन कर्तब्य ईशक भक्तिमें स्वाभाविक रूपमें लीन रखैत छैक। देखादेखी सही, लेकिन अबोध बच्चोपर दैविक कार्यके जोश सवार रहैत छैक। एकरा शुरुआत के चरण मानी।

दोसर चरणमें स्नान-ध्यान-पूजा-पाठ के रहैछ। सभसँ पहिल कार्य भगवती घर के पवित्र बनायब रहैछ। घरके वृद्ध-वृद्धा सँ लैत बच्चा-बच्चा भोरे-भोर स्नान करैत भगवती घरमें खूब लगनसँ पूजा आ सस्वर पाठ करैछ। भजन-कीर्तन-विनती आदि के सहयोग जोर पर रहैछ। परिवारके सभ सदस्य लयबद्ध गबैछ –

जय शिव प्रिये शंकर प्रिये, जय मंगले मंगल करू।
जय अम्बिके जय त्र्यंबिके, जय चण्डिके मंगल करू!

अनन्त शक्तिशालिनी, अमोघ शस्त्रधारिणी,
निशुम्भ-शुम्भ मर्दिनी, त्रिशूल चक्र पाणिणी!

जय भद्रकाली भैरवी, जय भगवती मंगल करू!
जय वैष्णवी विश्वंभरी, जय शांभवी मंगल करू!
जय शिव प्रिये…

कराल मुख कपालिनी, विशाल मुण्डमालिनी,
असीम अट्टहासिनी, त्रिमूर्ति सृष्टिकारिणी,

हे ईश्वरी परमेश्वरी, सर्वेश्वरी मंगल करू!
कात्यायनी नारायणी, माहेश्वरी मंगल करू!
जय शिव प्रिये…

प्रकृति अहीं सुकीर्ति अहीं, दया जे अहीं, क्षमा जे अहीं,
स्वधा जे अहीं छटा जे अहीं, कला जे अहीं प्रभा जे अहीं,ज

दुःखहारिणी सुखकारिणी, हे पार्वती मंगल करू!
हे ललितशक्ति प्रदायिनी, सिद्धेश्वरी मंगल करू!
जय शिव प्रिये…

तदोपरान्त भगवतीस्थान जाय ओहिठाम पुरनका मन्दिर आ नव-निर्मित मूर्तिक मन्दिर – दुनू जगह क्रमशः जल-फूल-पाती अर्पण करैत माँके कोरा में बैसि किछु क्षण हुनकहि पाठ आ विनती गबैत पुनः घर वापसी आ जलखै कयलाके बाद मेला घूमय जाय। मेलामें मित्र सभ संग अलगे आनन्द भेटय। पुनः खाय के समय घर वापसी, आ फेर मेले पर चलि जेनाय। एहि बीच भगवतीके विधिवत्‌ पूजा सेहो सम्पन्न होइक आ प्रसाद लय बेरहट लेल घार एनाय। पुनः संध्याकाल मन्दिर जाय साज-सज्जा-रोशनी आदिक इन्तजाममें बानरी सेना बनि काज केनाय। सैकड़ों-हजारों-लाखों माटिक दिवारी में दीप-दर्शन उपरान्त पुनः सभटा के किनार लगौनाइ। रातिक दस-एगारह बजे धरि मन्दिरके परिसरमें कीर्तन-भजन-गायन के आनन्द लैत पुनः रात्रि-विश्राम लेल मात्र घर लौटनाइ। किनसाइद कोनो नटुआ-नाच, रामलीला, ग्रामीणक द्वारा खेलायवाला नाटक आदि भेल तऽ ओहिमें रमि जेनाय। हाय रे बचपन आ दुर्गा पूजा!

आब बात किछु आर छैक! हम सभ धिया-पुताके बाप बनि गेल छी आ धिया-पुता मजबूरीमें गामक संस्कार सऽ दूर भऽ गेल अछि। तदापि हमर स्मृति सऽ ओकर संस्कार बनल रहैक एहि लेल ई कथा अपन चारू बच्चा आ पाठकवृंदके बच्चा सभ लेल समर्पित करैत छी।

हरिः हरः!

**

Thanks Vanaja Ma! It was a fantastic task indeed. Shri Rama and Rishi Valmiki talk for us. Please read all and contemplate.

देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे॥॥
अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई॥1॥

हे मुनिराज! आपके चरणों का दर्शन करने से आज हमारे सब पुण्य सफल हो गए (हमें सारे पुण्यों का फल मिल गया)। अब जहाँ आपकी आज्ञा हो और जहाँ कोई भी मुनि उद्वेग को प्राप्त न हो-॥1॥

मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥
मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू॥2॥

क्योंकि जिनसे मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा बिना अग्नि के ही (अपने दुष्ट कर्मों से ही) जलकर भस्म हो जाते हैं। ब्राह्मणों का संतोष सब मंगलों की जड़ है और भूदेव ब्राह्मणों का क्रोध करोड़ों कुलों को भस्म कर देता है॥2॥

अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ॥
तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौं कछु काल कृपाला॥3॥

ऐसा हृदय में समझकर- वह स्थान बतलाइए जहाँ मैं लक्ष्मण और सीता सहित जाऊँ और वहाँ सुंदर पत्तों और घास की कुटी बनाकर, हे दयालु! कुछ समय निवास करूँ॥3॥

Above words of Shri Rama seeks the permission of the seer – Where Lord Rama should stay during exile.

And the Valmiki replies to Rama:

सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी॥
कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू॥4॥

श्री रामजी की सहज ही सरल वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि वाल्मीकि बोले- धन्य! धन्य! हे रघुकुल के ध्वजास्वरूप! आप ऐसा क्यों न कहेंगे? आप सदैव वेद की मर्यादा का पालन (रक्षण) करते हैं॥4॥

छन्द :
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥
जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी।
सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी॥

हे राम! आप वेद की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी (आपकी स्वरूप भूता) माया हैं, जो कृपा के भंडार आपका रुख पाकर जगत का सृजन, पालन और संहार करती हैं। जो हजार मस्तक वाले सर्पों के स्वामी और पृथ्वी को अपने सिर पर धारण करने वाले हैं, वही चराचर के स्वामी शेषजी लक्ष्मण हैं। देवताओं के कार्य के लिए आप राजा का शरीर धारण करके दुष्ट राक्षसों की सेना का नाश करने के लिए चले हैं।

सोरठा :
राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।
अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह।126॥

हे राम! आपका स्वरूप वाणी के अगोचर, बुद्धि से परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है। वेद निरंतर उसका ‘नेति-नेति’ कहकर वर्णन करते हैं॥126॥

चौपाई :
जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥
तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥1॥

हे राम! जगत दृश्य है, आप उसके देखने वाले हैं। आप ब्रह्मा, विष्णु और शंकर को भी नचाने वाले हैं। जब वे भी आपके मर्म को नहीं जानते, तब और कौन आपको जानने वाला है?॥1॥

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥2॥

वही आपको जानता है, जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनंदन! हे भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले चंदन! आपकी ही कृपा से भक्त आपको जान पाते हैं॥2॥

चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी॥
नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा॥3॥

आपकी देह चिदानन्दमय है (यह प्रकृतिजन्य पंच महाभूतों की बनी हुई कर्म बंधनयुक्त, त्रिदेह विशिष्ट मायिक नहीं है) और (उत्पत्ति-नाश, वृद्धि-क्षय आदि) सब विकारों से रहित है, इस रहस्य को अधिकारी पुरुष ही जानते हैं। आपने देवता और संतों के कार्य के लिए (दिव्य) नर शरीर धारण किया है और प्राकृत (प्रकृति के तत्वों से निर्मित देह वाले, साधारण) राजाओं की तरह से कहते और करते हैं॥3॥

राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे॥
तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा॥4॥

हे राम! आपके चरित्रों को देख और सुनकर मूर्ख लोग तो मोह को प्राप्त होते हैं और ज्ञानीजन सुखी होते हैं। आप जो कुछ कहते, करते हैं, वह सब सत्य (उचित) ही है, क्योंकि जैसा स्वाँग भरे वैसा ही नाचना भी तो चाहिए (इस समय आप मनुष्य रूप में हैं, अतः मनुष्योचित व्यवहार करना ठीक ही है।)॥4॥

दोहा :
पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।
जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ॥127॥

आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ? परन्तु मैं यह पूछते सकुचाता हूँ कि जहाँ आप न हों, वह स्थान बता दीजिए। तब मैं आपके रहने के लिए स्थान दिखाऊँ॥127॥

चौपाई :
सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने॥
बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी॥1॥

मुनि के प्रेमरस से सने हुए वचन सुनकर श्री रामचन्द्रजी रहस्य खुल जाने के डर से सकुचाकर मन में मुस्कुराए। वाल्मीकिजी हँसकर फिर अमृत रस में डुबोई हुई मीठी वाणी बोले-॥1॥

सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता॥
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना॥2॥

भावार्थ:-हे रामजी! सुनिए, अब मैं वे स्थान बताता हूँ, जहाँ आप, सीताजी और लक्ष्मणजी समेत निवास कीजिए। जिनके कान समुद्र की भाँति आपकी सुंदर कथा रूपी अनेक सुंदर नदियों से-॥2॥

Now listen carefully where Lord Ram should stay!!

भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गुह रूरे॥
लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे॥3॥

निरंतर भरते रहते हैं, परन्तु कभी पूरे (तृप्त) नहीं होते, उनके हृदय आपके लिए सुंदर घर हैं और जिन्होंने अपने नेत्रों को चातक बना रखा है, जो आपके दर्शन रूपी मेघ के लिए सदा लालायित रहते हैं,॥3॥

निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी॥
तिन्ह कें हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक॥4॥

तथा जो भारी-भारी नदियों, समुद्रों और झीलों का निरादर करते हैं और आपके सौंदर्य (रूपी मेघ) की एक बूँद जल से सुखी हो जाते हैं (अर्थात आपके दिव्य सच्चिदानन्दमय स्वरूप के किसी एक अंग की जरा सी भी झाँकी के सामने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों जगत के अर्थात पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रह्मलोक तक के सौंदर्य का तिरस्कार करते हैं), हे रघुनाथजी! उन लोगों के हृदय रूपी सुखदायी भवनों में आप भाई लक्ष्मणजी और सीताजी सहित निवास कीजिए॥4॥

दोहा :
जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।
मुकताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु॥128॥

आपके यश रूपी निर्मल मानसरोवर में जिसकी जीभ हंसिनी बनी हुई आपके गुण समूह रूपी मोतियों को चुगती रहती है, हे रामजी! आप उसके हृदय में बसिए॥128॥

चौपाई :
प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा॥
तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥1॥

भावार्थ:-जिसकी नासिका प्रभु (आप) के पवित्र और सुगंधित (पुष्पादि) सुंदर प्रसाद को नित्य आदर के साथ ग्रहण करती (सूँघती) है और जो आपको अर्पण करके भोजन करते हैं और आपके प्रसाद रूप ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं,॥1॥

सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी॥
कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहिं दूजा॥2॥

जिनके मस्तक देवता, गुरु और ब्राह्मणों को देखकर बड़ी नम्रता के साथ प्रेम सहित झुक जाते हैं, जिनके हाथ नित्य श्री रामचन्द्रजी (आप) के चरणों की पूजा करते हैं और जिनके हृदय में श्री रामचन्द्रजी (आप) का ही भरोसा है, दूसरा नहीं,॥2॥

चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥
मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा॥3॥

भावार्थ:-तथा जिनके चरण श्री रामचन्द्रजी (आप) के तीर्थों में चलकर जाते हैं, हे रामजी! आप उनके मन में निवास कीजिए। जो नित्य आपके (राम नाम रूप) मंत्रराज को जपते हैं और परिवार (परिकर) सहित आपकी पूजा करते हैं॥3॥

तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना॥
तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी॥4॥

जो अनेक प्रकार से तर्पण और हवन करते हैं तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर बहुत दान देते हैं तथा जो गुरु को हृदय में आपसे भी अधिक (बड़ा) जानकर सर्वभाव से सम्मान करके उनकी सेवा करते हैं,॥4॥

दोहा :
सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।
तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ॥129॥

और ये सब कर्म करके सबका एक मात्र यही फल माँगते हैं कि श्री रामचन्द्रजी के चरणों में हमारी प्रीति हो, उन लोगों के मन रूपी मंदिरों में सीताजी और रघुकुल को आनंदित करने वाले आप दोनों बसिए॥129॥

चौपाई :
काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥1॥

जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह हैं, न लोभ है, न क्षोभ है, न राग है, न द्वेष है और न कपट, दम्भ और माया ही है- हे रघुराज! आप उनके हृदय में निवास कीजिए॥1॥

सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥
कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥2॥

जो सबके प्रिय और सबका हित करने वाले हैं, जिन्हें दुःख और सुख तथा प्रशंसा (बड़ाई) और गाली (निंदा) समान है, जो विचारकर सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं तथा जो जागते-सोते आपकी ही शरण हैं,॥2॥

तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥
जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥3॥

और आपको छोड़कर जिनके दूसरे कोई गति (आश्रय) नहीं है, हे रामजी! आप उनके मन में बसिए। जो पराई स्त्री को जन्म देने वाली माता के समान जानते हैं और पराया धन जिन्हें विष से भी भारी विष है,॥3॥

जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥
जिन्हहि राम तुम्ह प्रान पिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे॥4॥

जो दूसरे की सम्पत्ति देखकर हर्षित होते हैं और दूसरे की विपत्ति देखकर विशेष रूप से दुःखी होते हैं और हे रामजी! जिन्हें आप प्राणों के समान प्यारे हैं, उनके मन आपके रहने योग्य शुभ भवन हैं॥4॥

दोहा :
स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।
मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात॥130॥

हे तात! जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब कुछ आप ही हैं, उनके मन रूपी मंदिर में सीता सहित आप दोनों भाई निवास कीजिए॥130॥

चौपाई :
अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं॥
नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका॥1॥

जो अवगुणों को छोड़कर सबके गुणों को ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गो के लिए संकट सहते हैं, नीति-निपुणता में जिनकी जगत में मर्यादा है, उनका सुंदर मन आपका घर है॥1॥

गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा॥
राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही॥2॥

जो गुणों को आपका और दोषों को अपना समझता है, जिसे सब प्रकार से आपका ही भरोसा है और राम भक्त जिसे प्यारे लगते हैं, उसके हृदय में आप सीता सहित निवास कीजिए॥2॥

जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई॥3॥

जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देने वाला घर, सबको छोड़कर जो केवल आपको ही हृदय में धारण किए रहता है, हे रघुनाथजी! आप उसके हृदय में रहिए॥3॥

सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना॥
करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा॥4॥

स्वर्ग, नरक और मोक्ष जिसकी दृष्टि में समान हैं, क्योंकि वह जहाँ-तहाँ (सब जगह) केवल धनुष-बाण धारण किए आपको ही देखता है और जो कर्म से, वचन से और मन से आपका दास है, हे रामजी! आप उसके हृदय में डेरा कीजिए॥4॥

दोहा :
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥131॥

जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिए और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन में निरंतर निवास कीजिए, वह आपका अपना घर है॥131॥

चौपाई :
एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए॥
कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक॥1॥

इस प्रकार मुनि श्रेष्ठ वाल्मीकिजी ने श्री रामचन्द्रजी को घर दिखाए। उनके प्रेमपूर्ण वचन श्री रामजी के मन को अच्छे लगे। फिर मुनि ने कहा- हे सूर्यकुल के स्वामी! सुनिए, अब मैं इस समय के लिए सुखदायक आश्रम कहता हूँ (निवास स्थान बतलाता हूँ)॥1॥

चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू॥
सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू॥2॥

आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिए, वहाँ आपके लिए सब प्रकार की सुविधा है। सुहावना पर्वत है और सुंदर वन है। वह हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियों का विहार स्थल है॥2॥

नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तप बल आनी॥
सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि॥3॥

वहाँ पवित्र नदी है, जिसकी पुराणों ने प्रशंसा की है और जिसको अत्रि ऋषि की पत्नी अनसुयाजी अपने तपोबल से लाई थीं। वह गंगाजी की धारा है, उसका मंदाकिनी नाम है। वह सब पाप रूपी बालकों को खा डालने के लिए डाकिनी (डायन) रूप है॥3॥

अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं॥
चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू॥4॥

अत्रि आदि बहुत से श्रेष्ठ मुनि वहाँ निवास करते हैं, जो योग, जप और तप करते हुए शरीर को कसते हैं। हे रामजी! चलिए, सबके परिश्रम को सफल कीजिए और पर्वत श्रेष्ठ चित्रकूट को भी गौरव दीजिए॥4॥

Hope we have a home for Prabhujee within us.

Harih Harah!!

**

कभी दिल खूब रोता है, कभी फिर मुस्कुराता है!
मगर इस दौड़में देखो, सिर क्यों झुकता जाता है!
कभी दिल खूब ….

ये सोचें हर दिशा नापे, ये देखे टूटते सपने!
कभी थककर अंधेरोंमें, समेटे भूलते अपने!

गम क्यों यूँ सताता है वो खुशियां फिर सजाता है!
कभी दिल खूब रोता है….

ये जाने सत्य कैसा है, ये समझे झूठ वैसा है!
जहाँ में एक भी पल, मौतकी फैसला सा है!

दम भी हार जाता है, जाने क्यों खोता जाता है!
कभी दिल खूब रोता है…

जमानेकी वो दौलत भी, फंसाने के वो शोहरत भी
सगे-अपनोंकी संगत भी, मुहब्बतके हंसी पल भी

सभीका दिन भी आता है सभी को जाना होता है!
कभी दिल खू्ब रोता है……

हरिः हरः!

**

९ अक्टूबर २०१२

प्रिय द.मु.मि.के आगन्तुक!

हम सभ अनुभव कयलहुँ अछि जे दहेज मुक्त मिथिला अपन स्थापना मार्च ३, २०११ सँ एखन धरिक अत्यन्त कम अवधिमें एक अन्तर्राष्ट्रीय समूह बनि गेल अछि; शनैः शनैः समयक माँग अनुरूप बहुत रास सुधार सेहो लाओल गेल अछि जाहिसँ सहभागीजनकेँ सुविधा हो। पहिले ई पूर्णतः मैथिल हेतु मात्र समर्पित छल, कालान्तरमें एतय अन्यके सहभागिता देखैत हम सभ हिन्दी आ अन्य भाषाके सेहो मिथिलाक भाषा मैथिलीके अतिरिक्त मान्यता देलहुँ।

आब देखयमें आबि रहल अछि जे आगन्तुक एहि समूहके बारे आ एकर प्रतिबद्धता के बारे जानकारी रखबाक लेल बेसी रुचि लऽ रहल छथि। अतः आजुक आवश्यकता एक ‘अक्सर पूछऽ जायवाला प्रश्न आ उत्तर’ के अछि जाहिसँ सभक जिज्ञासा के पूर्ण समाधान हो, एतय तक जे सदस्यगण पहिले सऽ सहभागी बनल छथि हुनकहु जानकारी के अभाव देखल जाइछ, अतः ई कदम हुनकहु लेल हितकारी बनत।

एखन एकरा अहिना छोड़ल जा रहल अछि बिना कोनो प्रश्नक – अपने अपन तरहें प्रश्न निर्माण कय सकी। या, यस्वतः संज्ञान सऽ सामान्यतया पूछल जायवाला प्रश्न हम सभ स्वयं रखैत अपने लोकनिक जानकारी लेल सभ बात राखब।

हरिः हरः!

प्र. १. दहेज मुक्त मिथिला के परिचय संछिप्तमें?

उ. एक जागृति अभियान! युवा के जागरण हेतु दहेज प्रथा के बढैत प्रकोप पर चर्चा के प्रोत्साहन! दहेज नहि लेब, नहि देब… धिया-पुता में सेहो नहि लेब-देब आ ने एहेन कोनो विवाह में सहभागी बनब जतय लेन-देन भेल हो।

प्र. २. दहेज के परिभाषा?

उ. सब किछु पसिन पड़ल, विवाह लेल तैयार छी… मुदा स्वेच्छाचार के विरुद्ध एक-दोसर पर माँग थोपैत छी। माँग कैल कोनो वस्तुके दहेज कहल जैछ। विवाह के पूर्व-शर्तमें एहेन माँग के मात्र दहेज कहल जाइछ जे सामान्य आवश्यक माँग – जेना नीक घर-वर, नीक बोल-वचन, नीक पढल-लिखल, नीक खानदान, सुन्दर आदर्श… ई सभ माँग मानवता के पोषक माँग थीक, एकरा दहेज नहि कहल जा सकैत छैक। ई सभ भावना के माँग भेल जे हर प्राणीमें नीक प्रति आकर्षण रखैछ। वस्तुतः माँग ओ भेल जे हमर बेटी लेल हमरा चान चाही, हमरा २ गो तारा आ वृहस्पति समान गन्धर्व-राजकुमार चाही… ओम्हर जे हमरा अलखचान स्वर्गक परी पुतोहु चाही, ग्रेजुएट आ विदुषी विद्योतमा चाही.. से सभ चाही आ चाह के युद्ध में अन्त के माँग जे मुद्रा एतेक चाही… बरियाती के स्वागत एना चाही… विवाह शहरे में हो… होटल में बरियाती के ठहराव हो… आ अनेको तरहक माँग जे वास्तवमें सामनेवाला के स्वेच्छा सऽ आ क्षमता सऽ बहुत दूर के वा कर्जा करय लेल बाध्यकर हो। एहेन माँग के हम सभ दहेज मानी। अर्थात माँगरूपी द्रव्य वा वस्तु वा थोपुआ भावना के हम सभ दहेज मानी। ओ दहेज नहि भेल जे दुनू पक्ष मनमर्जी सँ अपन सन्तानके विवाह उपलक्ष्य लेन-देन करय लेल तैयार छथि, करैत छथि वा करबाक इच्छा रखैत छथि।

https://www.facebook.com/groups/dahejmuktmithila/doc/498898763454193/

हरिः हरः!

**

मित्र!

किछु समय सँ हम देखैत आयल छी जे किछु मित्र जातिगत टिप्पणी करैत छथि, ब्राह्मण जातिमें अनेको प्रकार के दोष के दर्शन करैत छथि, अपने इच्छे जहर उगलैत छथि… लेकिन हमरा व्यक्तिगत रूपमें ई बहुत खराब लगैत अछि आ एहेन मित्र सँ हमर निवेदन जे अहाँ हमर मित्र बनय योग्य नहि छी… या फेर हमहीं ताहि योग्य नहि छी। दुनू हाल में हमर मित्रता के परित्याग करी आ अपनहि हाथे हमरा मित्रके सूची सऽ हंटय लेल बाध्य करब सेहो मंजूर अछि। हम स्वयं ब्राह्मण जातिके छी ताहि लेल एना खराब लगैत अछि से सत्य नहि, बल्कि हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे बिना ब्राह्मणक जनकल्याण संभव नहि छैक आ अहुँ सभ अपन वृत्ति के प्रगति-सुसंस्कार के पथ पर अग्रसर करू एहि सऽ गैरो पढब छूटत आ एहि बात के अनुमानो होयत जे आखिर हमर कहब या सनातन वेदके कहब किऐक उचित छैक। ब्राह्मण केवल जाति सऽ नहि बल्कि ब्रह्मणत्त्व अपनेला सऽ होइत छैक। हम ओहि ब्राह्मक सेहो घोर विरोधी छी जे देखावा लेल ब्राह्मण बनैत छथि आ जनकल्याण लेल कोनो जप-तप नहि करैत छथि… ओ केवल स्वार्थ लेल जिबैत छथि तऽ अपन जन्म के ब्यर्थ गमबैत छथि।

हरिः हरः!

**

९ अक्टूबर २०१२

कतेक बचलौ?

गुरुजी चेला सऽ कहला जे,

“कि बच्चा, बड़ उदास देखैत छियौक?? कि बात?”

“हाँ गुरुजी! एहि समय दिन ठीक नहि चलि रहल अछि?”

“से कि?”

“बस!”

चेला फेर गुरु्जी के पैर पर परैत कहैत अछि:

“गुरुजी! किछु उपाय बताउ।”

“अवश्य।”

गुरुजी कनेक काल धरि किछु सोचैत रहला आ फेर बाजि उठला:

“कह जे आइ-काल्हि तोहर रुटीन कि छौक?”

चेला बाजय लागल जे एतेक बजे उठैत छी, फेर एना करैत छी आ ओना करैत छी आ एतेक बजे सुतैत छी… आदि-आदि! गुरुजी कहला जे:

“रुक! बच्चा! हम एकटा टेबुल बना दैत छियौक आ ओहि अन्तर्गत अपन जीवनचर्या के हिसाब जोड़। नाफा आ नुकसान – नीक आ बेजाय – सभ किछु पता चलि जेतौक।”

गुरुजी टेबुल बनौलाह – ओहि में दिनक २४ घंटा के चारि भाग चारि महत्त्वपूर्ण कार्य करबाक लेल बाँटैत ओहि चारू में कर्ताक कतेक घंटा लगैत छल तेकरा जोड़बय लगलाह। टेबुलक चारि खनमें १. भोजन-भ्रमण (आहार-विहार), २. कर्म-कर्तब्य, ३. चिन्तन-मनन (भजन-पूजन) आ ४. विश्राम-आराम (अमन-शयन)। मनुष्यक हरेक कार्यके एहि चारू खनमें बाँटैत ओ वासलात निर्माण करैत छलाह। चेला के देल दिनचर्या अनुरूप भोरे सुति-उठि २ घंटा में नित्य-कर्म पूरा करब आ फेर लगभग २ घंटा धरि चाय-चस्का-मित्र-मस्कामें बितबैत पुनः लगभग दस बजे सँ चारि बजे धरि (६ घंटा) कार्यालयमें बितायब आ तदोपरान्त पुनः साथी-संगत संग ३ घंटा धरि स्पोर्ट-फेवरिट में बितायब, पुनः संध्या ७ बजे सँ ८ बजे धरि टीवी देखब आ रात्रि भोजन करैत ९ बजे विश्राम लेल जायब जे पुनः ६ बजे उठब के बात के ओ एना जोड़ि देला – नित्यकर्म +२ (वर्ग ३), चाय-चस्का -२ (आहार विहार), अफिस +६ (कर्म-कर्तब्य), खेल-व्यायाम +३ (वर्ग ३), टीवी आ भोजन आदि -२ (आहार विहार), शयन विश्राम -९ = कुल -२, याने ऋण!

हम सभ सेहो एहि तर्ज पर अपन वासलात निकैल सकैत छी।

हरिः हरः!

**

१० अक्टूबर २०१२

मलाला युसुफजई केर गोलीकांड

यही वजह है कि लोगोंमें इस्लामकी कट्टरता के कारण एक किस्म का भय और नफरत दोनों पैदा हो रहा है। एक १४ वर्ष की लड़की को भी अपना दुश्मन मान लेना – उसपर गोलियोंकी बौछाड़ कर देना – और मिडियामें ऐसे हमलोंकी जिम्मेदारी ले लेना… गोली इसलिये मारी क्योंकी यही लड़की फतवे के विरुद्ध भी लड़कियोंमें शिक्षाके लिये प्रयास की और दुनियाको संदेश भी एक डायरी लिखकर दी कि ऐसे कट्टरपंथियोंके विरुद्ध भी संघर्ष करते हुए शिक्षाकी जरुरतको पूरा किया जाय। ये तो हाल है पाकिस्तान का और उन देशोंका जो धार्मिक अंधता के नाम पर ऐसे मासुमोंको भी नहीं छोड़ते। निःसंदेह यह अत्यन्त निन्दनीय है और ऐसे अपराधियोंको पकड़कर ऐसी सजा देना चाहिये कि दुबारा धर्मकी व्याख्या तालीबानी अंदाज में करना ही भूल जायें।

और यह क्या? हमारे मिथिला व विभिन्न अन्य जगह भी तो इन मासुमोंपर बर्बरता दहेजके चलते दिया जाता है, इनका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सौदे किया जाता है। विडंबना तो तब है जब शादीके जश्नके नामपर अनेकों तरह से राष्ट्रकी सम्पत्तिको युँ ही बर्बाद किया जाता है। जो सक्षम वर्ग हैं वो इसे समाजिक व्यवहारमें मानकर मिथ्याचारी-अहंकारी प्रदर्शन तक करते हैं कि मैंने अपने बेटीकी शादी पर इतने दहेज दिये, इतने खर्चे किये, ऐसे दामाद लाये, ऐसा परिवार… आदि-इत्यादि और इनके इस दिखावेकी प्रवृत्तिको शान व प्रतिष्ठाका चोला पहनाकर गरीब तवकेको भी नहीं सवैया-डेढा तो आधी-पौनेमें फंसाया जाता है जिससे वो डरकर दहेज जुटाने में पड़ते हैं न कि लड़कर-मरकर बच्चोंको बराबर शिक्षा देने में। मुझे और जगह का उतना पता नहीं, बस नेपालमें मैंने देखा है कि लड़कियोंके शादीके लिये ऐसे कोई दबाव नहीं हैं तो यहाँ दोनों (लड़के-लड़की) का विकास समान रूपसे होता है, शिक्षा समान रूप से मिलता है और हर तरह से एक संतुलित समान अधिकार-कर्तब्य निर्वाह करनेवाले परिवार बनते-बढते हैं। तो क्या दहेज प्रथा भी तालीबानी कट्टरता के जैसा ही है?

हरिः हरः!

**

शुभकामना संदेश

मिथिलाक सुप्रसिद्ध चित्रकार द्वारा संचालित हेल्लो एफ़.एम. ९९.२ (विराटनगर) सऽ हरेक सोम दिन ९ बजे (रात्रि) सँ १० बजे धरि प्रसारित होयवाला कार्यक्रम ‘अरिपन’ जेकर मूल उद्देश्य कला, संस्कृति तथा साहित्यके संवर्धन-प्रवर्धन, भरपूर मनोरंजन संगे सूचना प्रवाह लेल चलाओल जा रहल अछि; एहि कार्यक्रम के पूर्ण सफलता के शुभकामना के संग मैथिली श्रोतावर्गमें एकर समुचित लाभ पहुँचत से कामना प्रकट करैत छी।

हरि: हर:!!

**

Dear Youth For Blood ‘Worldwide’!

Your movement is so positive and humane that everyone in need can understand your contribution’s value. All will understand it, for that we also need to keep ourselves active in social activities. Health and hygiene are true concerns of all, nutrition is another important thing, for these we have to run mass awakening programs in all areas. Please develop smaller program but meet with more and more people directly.

Here, at Biratnagar, we are all charged up and we take the task in hands on daily basis. So, wherever you are, please keep adding more youths as members of YFB and grow the campaign on large scale through out the world.

You can consult with us for anything, we are ready to cooperate with you.

Youth For Blood Team – Biratnagar!

https://www.facebook.com/groups/youthforblood/?fref=ts

Harih Harah!

**

प्र.५ दहेज मुक्त मिथिला कि दहेज मुक्त विवाह लेल आवश्यक कार्य करैत छैक?

नहि! विवाह नितान्त व्यक्तिगत विचार आ रुचिके बात थीक। एहिमें भला कोनो संस्था कोना के प्रयस करतैक! बस, ई एक मुहिम थीक जे दहेज मुक्त विवाह लेल सभ सँ अपील करत। दहेज मुक्त विवाह करनिहार के सम्मान देत। दहेज के बुराई सभ के लोकक समक्ष राखत। आजुक नव पीढी के संग चर्चा करत जे आखिर कोनो परंपरा के रूप यदि बिगैड़ जाइत छैक तखन बोझ कतेक दिन तऽ उठायल जाय! दहेज के स्वच्छ परंपरा आब मरल लाश जेकाँ वातावरण प्रदूषित केने जा रहल छैक। एहि सँ महामारी पसैर रहल छैक। एहि लाश के संस्कार करब जरुरी छैक नहि कि एकरा लऽ के राजनीति वा समाजिक सम्मानके प्रतीक ठाड़्ह करब! एहि लेल आजुक पीढी जागैथ आ अपन बड़-बुजुर्गके बुझाबैथ। बस यैह सभ तरहक जागृति पसारबाक अभियानके नाम थीक दहेज मुक्त मिथिला। जी! यदि युवा एकत्र होइत छथि तऽ स्वयंसेवाके तर्ज पर किछु कार्य जरुर करैथ। जेना महत्त्वपूर्ण परंपरा के संरक्षण! एहि में वर्तमान समय सौराठ सभा के शुद्ध स्वरूप के संरक्षण लेल प्रयास करैत छैक। देश-विदेश पसरल समस्त मैथिल आइ इहो समस्या सऽ जूझि रहल छथि, अत: एहि लेल एवं मिथिलाक सम-सामयिक समस्या पर सामूहिक चर्चा लेल सेहो एक सांस्कृतिक पर्यटन केन्द्रके रूपमें लोकवर्गकें जमा होयब जरुरी।

https://www.facebook.com/groups/dahejmuktmithila/doc/498898763454193/

हरिः हरः!

**

११ अक्टूबर २०१२

Kichhu chinhit vyakti dahej prati dhaarnaa clear nahi rakhait chhathi aa o chup chhathi. Ham sabh bujhait chhiyaik je o ke-ke chhathi. Ahu bujhait jarur hebaik. O chinhit vyakti ke naam pardaafaas karab neek nahi, kaaran muh-kaan vala lok ohane lok ke maanal gel chhaik.  Jakhan ki manch par baja lebain ta oho kahi detaa je ham dahej ke virodh me chhi. O Mithyaachaar hoyat. Kam se kam e chinhit vyakti sabh chup chhathi ta apan ijjat jogene chhathi. Mithyaachaar me nahi parait chhathi. Kaaran pata achhi? Kaaran yaih je praapti ke gunjaish hunkaa seho neek lagait chhanhi aa tyaag ke bhavana bilkul nahi chhanhi. Saardhaar paise!! 

Hamar vichaar hoit achhi je ek din – Mahamoorkh Sammellan kail jaay aa ehen-ehen lok ke naam par khuli ke charchaa kail jaay, baru moorkhe bani ke!! 

Aha sabh ke raay ki achhi??

Harih Harah!!

**

भूखमरी भारत मे बेसी – बिबिसी समाचार पर ई रचना

ई दृश्य हदय-विदारक अछि
ई बात दिमाग उड़ाबक अछि

बड़-बड़ दाबी सरकारक छैक
गपमें योजना भरमारक छैक

तैयो भूखल प्राणी सभ ठाम
बस एक सहारा मात्रे राम

अन्नक भंडार सड़य-गन्हाय
कतौ चुल्हा जड़य न मिझाय

जाबत छै गाम-समाज मरल
ई दुनिया असमानता सऽ भरल!

बस मानवता के पाठ सिखू
सम्पन्न संसारक भाग लिखू!

हरिः हरः!

**

दौड़ते-दौड़ते हम कहाँ से कहाँ पहुँच गये…. अपनी गुरु आश्रम और दार्शनिक – व्यावहारिक अध्ययनके पैटर्न से बहुत दूर आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा पद्धतिको अपनाये और शिक्षा-पद्धति में वही सुपर हिट बनता जिससे रोजीका जुगाड़ शीघ्र हो जाय। एम.बी.ए. विगतके वर्षोंमें काफी लोकप्रिय हुआ। मृग-मरीचिकामें फंसे मृगोंकी तरह हममें ऐसे रोजगारोन्मुख पढाई प्रति आकर्षण बढाया और एक विश्वास भी दिया की हमारे ऊपर आज कुछ लगाने से कल अच्छा हो जायेगा। पर सच्चाई यही है कि बुनियादी मजबूतीके वगैर केवल प्रमाणपत्र से हम कुछ भी नहीं कर सकते। बेरोजगारीका दोष जितना सरकार पर देते हैं उसके दसांश भी अपने ऊपर देकर जड़ मजबूत करनेपर काम करना जरुरी है। स्वाबलंबी बननेके लिये केवल प्रमाणपत्र लेने की होड़ बन्द करना होगा और अपने ‘घरैया लूरि’ के साथ पुनः वही पौराणिक व्यवस्था को भी आपसी सौहार्द्रके साथ जीना होगा – खेते जोतना होगा, पशुपालन करना होगा, गाँव-गाँव रोजगार देनेवाला बुनियादी ढाँचा खड़ा करना होगा… केवल आधुनिकता के सुर-ताल के साथ फुदकना बंद करना होगा। हम गाँवमें शान्तिके साथ जी सकते हैं – ऐसा आत्मविश्वास भी लाना होगा।

हरिः हरः!

**

कोसी बान्ह मिथिला के जेना दू भागमें ततय तक विभाजित कयलक जतय तक गंगाजी मिथिलाके अपन पावन जलसँ सिंचन करैत निकललीह। तहिना हिमालयरूपी मिथिला मुकुटसँ जे अन्य धार सभ निकलल ओ मानू जे समूचा मिथिलांगनके नित्य पखारैत जगज्जननी गंगामें समाहित होइत छथि। ई विशिष्टता जाहि भूमि में छैक ताहि ठाम सिया आ गौरी समान बेटी जन्म लैत छथि, जनक-हिमवान के सम्मान बढबैत छथि आ पावन मिथिलाधाम के जगमें अलग अलखरूप दैत छथि। हरि ओ हर एहिठाम पाहुन बनैत छथि। मुदा मिथिलाक आजुक नाजुक अवस्था – आपसी विखंडन – संस्कृति सँ दूर होइत एहिठामक अपनहि समांग… हमरा सोचय पर मजबूर कय रहल अछि जे आखिर कोन भयानक शाप सँ ई आशीर्वादित भूमि जूझि रहल अछि। आधुनिकतामें कोसी पर बनल पूल आइ ओहि दू बिछड़ल मिथिलाक भूभागके एक बना देलक। आब जरुरैत छैक जे पुन: नव आलेख निर्माण हो, एहि सँ वर्षोंके बनल दूरी घटत। लेखनीमें लागल सभसँ निवेदन जे एहि दू भूभाग के पुन: एक करऽवाला आलेख समेटैथ।

हरि: हर:!!

**

१३ अक्टूबर २०१२

जेना पैछला वर्ष कैल गेल छल, तहिना अहु बेर गाम गेनिहार समस्त मैथिलसँ हार्दिक निवेदन जे अपन गामके चौताल पर आ अभिभावक सभ के बैसारमें दहेज मुक्त समाज निर्माण हेतु आवश्यक विचार जरुर करी। संगहि सौराठ सभा सँ वैवाहिक सम्बन्ध निर्माण करबाक पुनरावृत्ति करी। यदि सौराठ सभा केवल ब्राह्मणहि टा लेल आरक्षित छैक तऽ आब एहि पर आपसी विमर्श सँ विस्तार आनैत हर जाति-समुदाय के अपन-अपन रीति-रिवाज अनुरूप कुटमैतीमें आबि रहलसमस्याके निदान के संग मिथिला-मैथिलीके सम-सामयिक समस्या पर गोलबंद होयब जरुरी। आपसी एकता तखनहि बनैत छैक जखन एक-दोसरके समस्या घड़ी संग देबाक परिपाटी हो। जातिवादिता के जे झगड़ा छुद्र-ओ-छद्म राजनीतिज्ञ लगाय मिथिलाके अस्मिता पर ग्रहण लगौलक तेकर निदान आब कोनो ने कोनो बहाने एक ठाम सर्वजातिय सम्मेलन टा बचि गेल अछि। कोनो एक जातिक ठीकेदार के जबरदस्ती कोनो परंपरा पर कब्जा – आ सेहो बिना पोषण करबाक कुबत के… एकरा आब नहि मानल जा सकैत छैक। एहि पर अंकुश जरुरी।

एहि वर्ष २० अक्टुबर गाम पहुँचय के योजना अछि आ तदनुसार पुन: अपन कार्यक्रम मार्फत बेसी स बेसी लोकमें दहेज मुक्त मिथिलाक उद्देश्य संग अवगत करायब। यदि अहाँ गाम आबि रहल छी तऽ जानकारी दी, अहुँके गाम में कार्यक्रम राखब हम सभ आ मिलि के दहेज मुक्त मिथिला बनायब।

सहयोग हेतु अग्रिम धन्यवाद!

प्रवीण

हरिः हरः!

**

कहैत रहियैक जे प्रेम कोनो धिया-पुता के खेल नहि थिकैक, पता नहि कि सोचि ओ बात नहि बुझलक। जाइत छल पढाइ करय लेल, मुदा प्रेम पैघ के बेटी सऽ कय बैसल। आब बताओ जे ओकरो मरबा देलकैक आ ओकर एहेन मृत्युके विरोध करनिहार के सेहो गोली सऽ भुजरी उड़ा देलकैक। ई मिथिला आब मुंबई बनि गेल, एतहु लोक अपन मैथिली बिसैर हिन्दीमें सनकी झाड़य लागल अछि। वैह हिन्दीके सम्राज्यवादी शक्ति के बर्बरता आइ ओकरा जरा रहल छैक। हमरा तकलीफ अछि लेकिन ओकर गलती आ जिद्दीपन के कारण हम चुप छी, सन्न छी। आखिर मिथिला लेल कहियो आवाज नहि उठल, नहि तऽ कहियो गोली चलल – मुदा सुसंस्कृत मिथिलाभूमिमें प्रेमके दिवानगीके चलते आइ आइग लागि गेल। किछु दिन पूर्व एक अबोध बालिका के संग बलात्कार आ हत्याके घटना घटल छल। हेकड़ी नहि टूटतौक तऽ अंग्रेजो सऽ बदतर शासन तोरा ऊपर लदतौक। चेत मोहना चेत!!

हरिः हरः!

**

अनुसंधानकी निगाहें भारतीय समाजमें उस तरफ टकटकी लगाकर देख रही हैं कि आखिर बेटी भी लोगोंके लिये बेटा से ज्यादा प्यारा हो सकती है, नहीं तो कम से कम यह आँकड़ा वही पुराने तर्ज पर बेटे के लिये मरते – गिरते लोगोंके बारे में ही बातें करते दिखता। अवश्य हरियाणा, दिल्ली, बिहार, युपी, या कोई भी राज्य ऐसा नहीं जहाँ लड़कोंके अनुपातमें लड़कियोंकी संख्या कम है… पर अत्याचार फिर भी थमनेका नाम नहीं ले रहा है। अब मौसम बदलना तय समझकर हो सकता है कि लोग चेतना जगा लें और दहेजकी दाकियानूसी अग्नि-लपेटोंमें बेटियोंको कम से कम कोखमें जलाना बन्द करें। हलाँकि अब तो बिहार सरकार ने बेटीके पैदा करनेपर बहुत सारी सुविधाओंका भी ऐलान कर रखा है…. पर वो तथाकथित समाज के सम्भ्रान्त वर्ग आज भी बेटियोंके शादीपर दिखावे और शानोशौकत के झूठे व्यवहारमें फंसकर दहेज के आधार पर ही सम्बन्ध निर्माण करते हैं; राम जानें कि यह कब रुकेगा।

खैर! इस आलेखको पढें और मनन करें कि आपके साथ परिस्थिति क्या है।

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/10/121011_girl_adoption_ss.shtml

बेटियोंको प्यार दें, उनसे प्यार ग्रहण करें और कम से कम समुचित शिक्षा जरुर दें।

दहेज मुक्त मिथिला परिवार!

www.dahejmuktmithila.org

हरिः हरः!

**

जीवनमें कैरियर निर्माण प्रमुख विषय छैक। एकर चिन्ता एक किशोर सँ वयस्क तकके रहैत छैक। आजुक व्यवसायात्मिका बौद्धिकता सऽ भरल संसार में एकर महत्त्व आरो बढि गेल छैक। एहि महत्त्वक परिणाम यैह बात सँ पता चलैत छैक जे शिक्षा पेबाक सीधा अर्थ रोजगार – जीवनक कैरियर सँ लगायल जाइत छैक। हलाँकि शिक्षाक पूर्ण अर्थ अनुशासन आ बौद्धिक स्तरमें बढोत्तरी सनातन सत्य छैक, लेकिन आइ-काल्हि अर्थ आ परिणामके बीच व्यवसायिक समीकरणबनबैत लोक प्रतिभा के गौण करैत संसारमें अपन कैरियर निर्माण तरफ उन्मुख होइछ। भले अहाँ मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास करू वा नहि, लेकिन लाखों रुपया के खर्च सऽ कोनो मेडिकल इन्स्टीच्युट (प्राइवेट आ सरकारी सऽ बहुत बेहतरीन व्यवस्थापन सहित) सऽ अपन कैरियर डाक्टर बनय लेल सपना पूरा कय सकैत छी।

अहिना, एक महत्त्वपूर्ण कैरियर के चर्चा एतहु कैल गेल अछि। आब वाला समयमें क्लीनिकल साइकोलॅजिस्ट के माँग बढबे करतैक। सभके ध्यान रहय।

हरिः हरः!

**

ऐसी घटनाएँ (क्रिया) और तत्पश्चात्‌ पंचायतें (प्रतिक्रिया) से समाजको आगे बढनेका एक दिशा मिलता है। बड़े-बड़े विचारकों ने इसे प्राकृतिक परिवर्तन कहकर आत्मसात्‌ किया है। हरियाणा हो या आंध्रप्रदेश, या फिर अन्य कोई भी राज्य; यदि लैंगिक विभेद रहेंगे तो घटना नित्य घटेगा ही। प्रो. चौधरी के विचारोंको ध्यानपूर्वक पढनेकी आवश्यकता है और स्वयंसेवा द्वारा ऐसे समाजिक दुर्घटनाओंसे बचा जा सकता है।

जो मिथिला कल तक ऐसे दिखावेकी प्रेम से नितांत दूर अलौकिक प्रेमके आधार पर सांस्कृतिक महत्त्वको बखूबी समझते हुए मानवीय जीवन शैलीको अपनाया था, अब वहाँ भी मुंबईया (हिन्दी) सिनेमाओंके तर्ज पर गाँव-गाँव लोग जनमकर खड़े होते ही अपने संस्कारसे हंटकर प्रेम करते हैं, जिसका परिणाम पारिवारिक विद्वेष और हिंसा से होता है। वैसे तो बहुत शान्त हैं यहाँके लोग, लेकिन जब दिमाग उलट जाता है तो फिर अपने ही रक्षकको भक्षक मानकर हिंसक जानवरकी तरह व्यवहार करने लगते हैं।

लैंगिक विभेद अन्त करनेकी दिशा में हमारे समाजके प्रबुद्धजन काम करें, अपनी संस्कृतिकी मर्यादाको भी समझें। युवा समाजमें स्वयंसेवाकी भावनाको मजबूत करें। और क्या….

हरिः हरः!

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/10/121013_khap_haryana_vk.shtml

**

१४ अक्टूबर २०१२

अति महात्त्वाकांक्षा किसीको भी लेकर डूब जाता है, लक्ष्य जरुर हो, पर महात्त्वाकांक्षा से बचना जरुरी है। नितीश कुमार जबसे भारतीय जनता पार्टी के मोदी जैसे प्रखर नेता की सराहना तो दूर कटाक्ष करके अपनी तुष्टीकरणकी राजनीति करने लगे, तब से जो मजबूत समर्थन उनके पक्षमें था और उन्हें भी प्रोत्साहित करनेका काम करता था वो दूर हंट गया और विरोधी मजबूत हो गये। फिलहाल जो विरोध का लहर नितीशके विरोधमें है वो प्रायोजित ही सही पर सच है कि जो दिखता है वो बिकता है।

एक समय था जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी नितीशका खुलकर प्रशंसा करना पड़ा था, और आज भी एक समय है कि नितीश अपने विकासवादी छवि से स्वच्छ रहते हुए भी अपने इतने पीठ पर छूड़ा मारनेवाले विरोधी खड़ा कर लिये हैं कि उन्हें अपनी अधिकार यात्रा रोककर समीक्षा करना पड़ेगा कि आखिर बिहारको विशेष राज्यकी दर्जा दिलानेके लिये कुछ भी कर गुजरनेवाली बातें और नेचुरल एलायंसके विरुद्ध शोर मचाना कितना महंगा पड़ता है।

समय है – सुधार लानेके लिये। आप जिस तरह से बहुमत पाये हैं उसमें प्रायोजित छद्म लड़ाई से चिन्ता नहीं बल्कि वास्तविक सुधार के लिये आप अपनी शक्तिको प्रयोग करनेके लिये फिर से संकल्प लें।

बिहार आगे बढकर रहेगा। मिथिला के लिये भी सही वक्त पर आप फैसला कर लें नहीं तो देरी हो जायेगी।

हरिः हरः!

**

दंगे करबाये नहीं जाते, बल्कि हो जाते हैं।

जी हाँ! सैयद ने यह बिलकुल सही कहा है। अपने धर्म और ईमान किसे अच्छा नहीं लगता और कौन इसके लिये तैयार नहीं रहता… जान देनी पड़े दे देंगे। पर दंगे होते हैं छोटे-छोटे कारणोंसे! जैसे, कार-सेवक से भरे साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बेपर पेट्रोल छिड़ककर दर्जनों कार-सेवकोंको जिन्दा जला डालना… भागने तक के लिये मौका न देना… अमानवीय हरकत करना… वहाँ पर मुस्लिमोंकी बाहुल्यता थी, उसने ऐसे वीभत्स काम को अंजाम दे दिया। क्या इसमें सारे मुस्लिम दोषी थे? बिलकुल नहीं! रहा कोई गंदे विचारधारा रखनेवाला गलत तत्त्व ही! लेकिन वह मुसलमान था और उसने हिन्दुओंके उन जत्थेपर आक्रमण किया जो धार्मिक पुण्य कार्य के लिये यात्रापर थे। बस! इनके द्वारा यह बर्बर कार्यका प्रतिक्रिया से सारे हिन्दुस्तानके हिन्दू और मुसलमान आपसमें द्वेषभाव से पीड़ित होकर एक-दूसरेपर आक्रमण करने लगे। गोधराकी आगकी लपट समूचे हिन्दुस्तानपर पड़ा। ऐसा नहीं कि केवल गुजरात में लोग मरे या मारे गये या जिन्दा जलाये गये… इसकी लपट हर जगह मानवताको शर्मसार किया।

मेरे कुछ अनुभव रखना चाहूँगा… पिछले सालकी बात है… मेरे गाँवमें दुर्गा पूजा बहुत धुमधाम से मनाया जाता है और इसमें सभी हिन्दू-मुस्लिम त्योहार मनाने के मूडमें दिखते हैं। पर आजका पीढी – कुछ मुस्लिम युवाओंमें हिन्दुओंसे खु्दकी अलग धर्म और पहचानकी बात कुछ ज्यादा ही हावी है, वैसे ही हिन्दुओंके युवाओंमें भी अपने धर्म प्रति जानकारी कम पर उन्माद बहुत मिल जाता है। तो वर्षोंकी सौहार्द्रको आजके युवाओंकी अपनी हरकतों से इन्होंने तोड़नेका दुष्प्रयास किया… कुछ मुस्लिम लड़के हिन्दू लड़कियोंका अपमान किया और इससे बातें बिगड़नेकी नौबत आ गयी। संयोगवश कुछ पुराने मुसलमान वफादार शागिर्द ने बातकी गंभीरताको भांप लिया और स्थिति खुद संभालनेकी वायदा करके बुजुर्ग द्वारा गलती न दुहराये जानेकी बात स्वीकार कर लिया। नहीं तो परिस्थिति ऐसी बनती कि २-४ वो मरते और २-४ ये! यही बातें गाँव-गाँव फैल जाती और फिर बन जाता हिन्दू-मुस्लिम रायट!

दंगोंका इतिहास यही रहा है कि छोटे कारण पहाड़ बनकर आम लोगोंके सिरपर टूट पड़ते हैं और जब खून की नदियाँ बहने लगती है तो मोदी – बीजेपी – आरएसएस आदि की बदनामी करके पुनः कुछ दिनोंके लिये शान्त हो जाती है।

लेकिन राजनीति भी कारक तत्त्व है और कुछ नेता जो जानबुझकर हिन्दू-मुसलमान के नामपर अलग-अलग वकालत करते रहते हैं वही अपने स्वार्थ सिद्धिके लिये पीछे से कभी भी वार करबा सकते हैं। आम लोगोंमें इसकी समझ जरुरी है। गुजरातमें मुसलमान जितने खुश हैं, उतनी खुशी शायद अन्य किसी राज्यमें नहीं हैं। परन्तु युसूफ वो दृश्य नहीं भूल पा रहा है, गुलबर्ग सोशाइटीमें आज भी वो इसलिये नहीं जा पा रहा है क्योंकि वहाँ उसके अपनोंको सामनेमें जिन्दा जला दिया गया था। इसके घाव शायद कभी न भर पाये!

हरिः हरः!

**

१५ अक्टूबर २०१२

यदा-कदा ई मन हारि जाइत अछि!
जेम्हर देखी अन्याय देखाइत अछि!

संस्कार पैघ वस्तु थिकैक, हरेक परिवारमें ई सभ सऽ पहिल जरुरत सेहो थिकैक। समाजमें प्रदूषण कही एकरा आ कि प्रेम के बरसात? लेकिन ई प्रेम अवैध बनिते हिंसक बनैत छैक।

ई समाचार हमर मन के बहुत तड़पेलक, ठीक जेना मृतका अपन अन्तिम साँस लैत अनुभूति केने होयत। दोष केकर कही? ओ पिता जे मुंबई में रिक्शा चलबैत अपन बच्चा सभक पढाइ-लिखाइ लेल आतूर छथि – हुनकर; आ कि अबोध पूजा जे अवैधके अर्थ नहि बुझि सकल या नहि जानि एतेक कम उम्रमें वासनाके शिकार भऽ गेल या फेर ओहि युवक के जे पूजा संग एहेन सम्बन्ध निर्माण कयलक अपन वासनाक भूख पूरा करय लेल… दोष केकर?

समय शायद बिपरीत बनि रहल,
जा नहि रहल आरो किछु कहल!

अपने जखन ओहि उम्रमें रही तऽ प्रेम करबाक मोन जरुर होइत छल, शायद प्रेम भेबो कैल, लेकिन वासना के गंध ओहि समय नहि रहल छल। बस चन्द्रमुख देखि भाव-विभोर होयब मात्र प्रेम छल, लेकिन आब चन्द्रमुखी के दर्शन सऽ बेसी आलिंगन-चुंबन स्थान लेने जा रहल अछि… शायद!

कोना के चलतै राज,
जँ बिसैर जेतै लाज!

ईश्वर रखिह लाज,
बनल रहय नाज!

हरि: हर:!

**

आदरणीय शेखर बाबु,

यैह रवि दिन सँ हमरा लोकनि गत वर्ष समान पुन: मधुबनी, दरभंगा के लगभग हरेक दुर्गा पूजा स्थलपर भ्रमण हेतु चलब जाहि सँ दहेज मुक्त मिथिलाक निर्माण एवं सौराठ सभा पुनरुत्थान के चर्चा आम जनमानस संग करब। एहि लेल आवश्यक समय अपने निकालब, हार्दिक अनुरोध!

Madan Kumar Thakur Roshan Kumar Jha – अपने लोकनिसँ आग्रह जे अपन समय उपलब्धता के जानकारी कराबी। यदि संग भ्रमण करबाक समय हो तऽ प्रसन्नता भेटत।

संगहि, समस्त सदस्य जे गाम आबि रहल छी, अपन इलाकाके दुर्गा-पूजा-स्थल के जानकारी कराबी एवं किनका सँ सम्पर्क करैत कम समय में हम सभ अपन संदेश – संवाद प्रसार शीघ्र कय सकब से जानकारी उपलब्ध कराबी।

दरभंगा आ मधुबनी दू जिला के हम कैम्पेनिंग कय सकब, एहि लेल तैयार छी। तहिना अपने महानुभाव अन्य-अन्य जिला में एहि तरहक कैम्पेनिंग करैत दहेज मुक्त मिथिलाक उद्देश्य पोषण व स्वच्छ समाज निर्माणमें सहायक बनी से हार्दिक निवेदन अछि।

हरिः हरः!

**

कोनो जमानामें मेला, सर्कस, थियेटर, रामलीला, अल्हा-रुदलके नाच, कुश्ती, कबड्डी, चैत-चिक्का, अन्य ग्रामीण खेल, संपेरा द्वारा साँपके प्रदर्शन, जादुगर द्वारा विभिन्न तरहक खेल… आदि सभ आम जनके मनोरंजन लेल होइत छल। आधुनिकतामें कतेको बात अपन अहमियत आ वजन स्वतः नष्ट केलक, ओ लगभग समाप्त भऽ गेल कहबामें अतिश्योक्ति नहि हेतैक। लेकिन नव-नव बहुतो बात सभ प्रवेश कय गेल। जेना भिडियो द्वारा सिनेमा, प्रोजेक्टर द्वारा सिनेमा, मौतके कुआँ, पिंग, झुलाके विभिन्न प्रकार, क्रिकेट, मैराथन, योग शिविर, साधू प्रवचन, आदि। समग्रमें समय बदलाव देखबैत छैक, लेकिन मूल अर्थ एकहि रहैत छैक। पावैन-तिहारमें एकजूटता आ इलाकाके विकास लेल जोश भरल कार्य करबाक प्रतिबद्धता!

दुर्गा पूजा के हार्दिक मंगलमय शु्भकामना!

एक आरो महत्त्वपूर्ण बात जे आध्यात्मिकताके दृष्टि सऽ एहि समयक विशेष मोल के जरुर आत्मसात् करी।

हरि: हर:!

**

१६ अक्टूबर २०१२

शरद ऋतु के आगमन संग मातारानी – शक्तिदात्री भवानी जननी पूजाक विशेष अवसर घर-घर दुर्गा पाठ भऽ रहल अछि। फेसबुक पर सेहो मायकेर मुर्तिक संग कलशस्थापना भऽ चुकल अछि। हमरो कर्तब्य बनैत अछि जे एहि शुभ घड़ी आध्यात्म सँ जुड़ल अति मननीय रहस्य ऊपर चर्चा करी आ सौभाग्यशाली मित्र संग समस्त मानव समुदाय – जीवमण्डल हेतु कल्याणकारी कर्म व वचन के प्रवाह करी। सर्वप्रथम भगवती के नौ रूप – नवदुर्गाके जानकारी प्राप्त करी।

१. शैलपुत्री

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शुलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम्॥

माँ दुर्गा अपन पहिल स्वरुप में ‘शैलपुत्री’क नामसँ जानल जाइत छथि। पर्वतराज हिमालयक घर पुत्रीक रूपमें उत्पन्न होयबाक कारण हिनकर ई ‘शैलपुत्री’ नाम पड़ल छल। वृषभ-स्थिता माताजीकेर दाहिना हाथमें त्रिशूल आर बायाँ हाथमें कमल-पुष्प सुशोभित अछि। यैह नव दुर्गाओंमें प्रथम दुर्गा छथि।

२. ब्रह्मचारिणी
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

माँ दुर्गाकेर नव शक्तिकेर दोसर स्वरुप ब्रह्मचारिणी केर अछि। एतय ‘ब्रह्म’ शब्दक अर्थ तपस्या अछि। ब्रह्मचारिणी अर्थात् तपकेर चारिणी – तपकेर आचरण करयवाली। कहल गेल छैक – वेदस्तत्त्वं तपो ब्रह्म – वेद, तत्त्व आर तप ‘ब्रह्म’ शब्द के अर्थ थीक। ब्रह्मचारिणी देवीक स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यन्त भव्य अछि। हिनक दाहिना हाथमें जपकेर माला एवं बायाँ हाथमें कमण्डलु रहैत अछि।

३. चन्द्रघण्टा

पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

माँ दुर्गाजीकेर तेसर शक्तिक नाम ‘चन्द्रघण्टा’ अछि। नवरात्रि-उपासनामें तेसर दिन हिनकहि विग्रहकेर पूजन-आराधना कैल जैछ। हिनक ई स्वरूप परम शान्तिदायक आर कल्याणकारी अछि। हिनकर मस्तकमें घण्टीके आकारक अर्धचन्द्र अछि, यैह कारणसऽ हिनका चन्द्रघण्टा देवी कहल जाइत अछि। हिनक शरीरक रंग स्वर्ण-समान चमकीला अछि। हिनक दस हाथ अछि। हिनक दसो हाथमें खड्ग आदि शस्त्र व बाण आदि अस्त्र विभूषित अछि। हिनक वाहन सिंह अछि। हिनक मुद्रा युद्ध लेल उद्यत रहबाक होइत अछि। हिनक घण्टीसँ निकैल रहल भयानक चण्डध्वनिसँ अत्याचारी दानव-दैत्य-राक्षस सदैव प्रकम्पित रहैत अछि।

४. कुष्माण्डा

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च,
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभादस्तु मे॥

माँ दुर्गाजी केर चारिम स्वरुपक नाम कूष्माण्डा अछि। अपन मन्द-हलुक हँसीद्वारा अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्डके उत्पन्न करबाक कारणे हिनका कूष्माण्डा देवीके नामसऽ अभिहित कैल गेल अछि। जखन सृष्टिक अस्तित्व नहि छल, चारू कात अन्हार परिव्याप्त छल तखन यैह देवी अपन ‘ईषत्’ हास्यसँ ब्रह्माण्डक रचना केने छलीह। अतः यैह सृष्टिक आदि-स्वरुपा, आदि शक्ति छथि। हिनका सँ पूर्व ब्रह्माण्डक अस्तित्व रहबे नहि कैल।

५. स्कन्दमाता

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

माँ दुर्गाजीक पाँचम स्वरुपके स्कन्दमाताक नामसऽ जानल जाइत अछि। ई भगवान्‌ स्कन्द ‘कुमार कार्तिकेय’ नाम सऽ सेहो जानल जाइत छथि। ई प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवता सभक सेनापति बनल छलाह। पुराण सभमें हिनका कुमार आर शक्तिधर कहैत हिनकर महिमाक वर्णन कैल गेल अछि। हिनकर वाहन मयूर अछि। अतः हिनका मयूरवाहनक नाम सऽ सेहो अभिहित कैल गेल अछि।

६. कात्यायनी

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दुलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्यादेवी दानवघातिनी॥

माँ दुर्गाक छठम स्वरूपक नाम कात्यायनी अछि। हिनका कात्यायनी नाम पड़बाक कथा एहि प्रकार अछि – कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि छलाह। हुनक पुत्र ऋषि कात्य भेल छलाह। ओ भगवती पराम्बाक उपासना करिते बहुत वर्ष धरि बड कठिन तपस्या केने छलाह। हुनकर इच्छा छलन्हि जे माँ भगवती हुनक घर पुत्रीक रूपमें जन्म लैथि। माँ भगवती हुनक एहि प्रार्थनाके स्वीकार कयने छलीह। किछु काल पश्चात् जखन दानव महिषासुर केर अत्याचार पृथ्वीपर बहुत बढि गेल तखन भगवाऩ् ब्रह्मा, विष्णु आ महेश तीनू गोटे अपन-अपन तेजक अंश दैत महिषासुरक विनाशक लेल एक देवीकेँ उत्पन्न केलाह। महर्षि कात्यायन सर्वप्रथम हिनक पूजा कयलन्हि। यैह कारण सऽ ई कात्यायनी कहेली।

७. कालरात्री

एकवेन्नि जपकर्णपुरा नग्न खरस्थिता,
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णि तैलभ्याक्ताशरीरिणी,
वामपादोल्लासल्लोहलताकान्ताक्भुषणा,
वर्धनामुर्धध्वज कृष्णा कालरात्रिभयङ्करी॥

भगवती दुर्गाके सातम स्वरूप कालरात्रिकेर नाम सऽ जानल जाइत छथि। हिनक दैविक शरीरक रंग गाढा कारी जेना घनघोर अन्हरिया राइत समान अछि। हिनक केश छितरायल छन्हि। गर्दैनमें बिजलोता समान चमकैत बिजलीक माला छन्हि। हिनक तीन टा नेत्र छन्हि। एक-एक ब्रह्माण्ड समान गोल-गोल देखैत छन्हि ई तिनू आँखि। साँस लैत आ छोड़ैत आइगक ज्वाला निकैल रहल छन्हि। गदहाक वाहन पर आरूढ (सवार) छथि। दाहिना ऊपरका हाथ संसारके कल्याण हेतु आशीष देबाक मुद्रामें छन्हि, दाहिना निचुलका हाथ निर्भय शक्तिक प्रतीक बनल छन्हि; बाम भागक ऊपरका हाथमें कील-काँटी छन्हि आ निचुलकामें कुरहैर।

बहुत भयावह देखा रहल छथि मुदा हमरा लोकनिकेँ सदिखन सुन्दर फल प्रदान केनिहैर सदिखन केवल आशीर्वाद दऽ रहल छथि, एहि हेतु हिनक नाम शुभङ्करी पड़ल छन्हि। दुर्गा पूजाक सातम दिन पारंपरिक रूपसँ हिनक पूजा कैल जाइत छन्हि।

८. महागौरी

स्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्वरधरा शुचिः,
महागौरी शुभांग दद्यान्महादेवप्रमोदता!

भगवती दुर्गाजीके आठम शक्ति स्वरूपके महागौरी नाम सँ जानल जाइत अछि। ओ मात्र श्वेत वस्त्र धारण करैत छथि आ पूर्णतया श्वेत-स्वरूपा लगैत छथि। गौरवर्ण होयबाक कारणे महागौरी कहाइत छथि। वास्तविकता एहेन छैक जे भगवान् महादेव संग विवाह हेतु देवी एहेन घोर तपस्या केलीह जेकर परिणामस्वरूप कोयलो सऽ कारी झमास बनि गेलीह, मुदा जखन महादेव के प्रसन्न केलीह तेकर बाद देवाधिदेव हुनका गंगाजल सऽ रगड़ि-रगड़ि अपन अलौकिक प्रेमभाव सहित स्नान करेलाह आ तत्क्षण दुधिया गोराइ प्राप्त करैत माँके नाम महागौरी पड़ल।

हिनक चारि टा हाथ छन्हि आ बैलकेर सवारी प्रयोग करैत छथि। दाहिना ऊपरका हाथ कल्याण हेतु आशीर्वाद देवाक मुद्रामें छन्हि। दाहिना निचुलका हाथमें त्रिशूल छन्हि। बामा ऊपरका हाथमें डमरु छन्हि। बामा निचुलका हाथ वरदायिनी मुद्रामें छन्हि।

दुर्गा पूजाकेर आठम दिन हिनक पूजा-अर्चना कैल जैछ। हिनका सँ हमरा सभके सच्चाई आ ईमानदारिता संग सदिखन कर्म करबाक लेल उद्यत रहबाक लेल भेटैत अछि, असत्यके माता अपनहि सँ भक्तसँ दूर करैत छथि।

९. सिद्धिदात्री

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि,
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

भगवती दुर्गाक नवम स्वरूपके सिद्धिदात्री नाम सऽ जानल जाइछ। ओ समस्त सिद्धिके देनिहैर छथि, समस्त दैवीक सम्पदा-मुद्रा के प्रदायिनी छथि। मार्कण्डेयपुराण अनुसार – अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईश्विता आ वशीत्व – ई आठ प्रकारके सिद्धि होइछ। लेकिन ब्रह्मवर्तपुराण अन्तर्गत कृष्णजन्मखण्ड अनुसार सिद्धि कुल अठारह प्रकार के होइछ: १. अणिमा, २. लघिमा, ३. प्राप्ति, ४. प्रकाम्य, ५. महिमा, ६. ईश्विता-वशीत्व, ७. सर्वकामवसयिता, ८. सर्वज्ञत्व, ९. दूरश्रवण, १०. परकायप्रवेशन, ११. वाक्‌सिद्धि, १२. कल्पवृक्षत्व, १३. सृष्टि, १४. संहारकरणसामर्थ्य, १५. अमरत्व, १६. सर्वन्यायकत्व, १७. भावना, आ १८. सिद्धि!

अतः, भगवती के प्रसन्न भेला सऽ भक्तकेँ उपरोक्त समस्त सिद्धिक प्राप्ति होइत छैक।

ॐ तत्सत्‌!!!!! !..

हे पाठक – भक्त – मित्र – समस्त मानव-समुदाय! उपरोक्त नवदुर्गा भवानीकेर आराधना – पठन – मनन – नाम-सुमिरन अपने सभक लेल अवस्य कल्याणकारक होयत एहि विश्वास के संग एक बेर फेर दुर्गा पूजा के हार्दिक मंगलमय शुभकामना अछि।

हरिः हरः!

**

१७ अक्टूबर २०१२

लगानीके वातावरण आ नेपालक आर्थिक विकास

प्राकृतिक स्रोत-साधनसँ धनी मुदा विकासक भावना-गति सँ दरिद्र नेपाल के आर्थिक विकासमें लगानीक वातावरण के एक पंक्तिमें शुन्य कही तऽ अतिश्योक्ति नहि होयत। जे नेपालमें आइ सऽ २५-३० वर्ष पहिने धरि शिक्षित आ परिष्कृत समाज के संख्या आंगूर पर गानय जोगर छलैक, जतय लोक अपन आवाज तक खुलल आकाशमें स्वतंत्र रूप सऽ नहि निकैल सकैत छल, बेसीतर लोक अनमनायल अपनहि रोजीमें लागल नून-तेल सऽ सेहो प्रसन्न रहबाक कला सिखने शान्तिपूर्ण जीवन जिवैत छल… ताहिठाम जहिना-जहिना शिक्षाके प्रसार भेलैक तहिना-तहिना लोक अपन हक-अधिकार के विषय जागरुक भेल वा एना कही जे किछु बेसिये जागरुक भऽ गेल आ समुचित गंभीरताक संस्कारके अभावमें उच्छृंखल राजनीतिक बदलावके गति पकड़बाक कारण आइ नेपाल संक्रमणकालीन कालगतिमें ओझरायल अछि। एहि समय गीतासार स्मृतिमें आनब मात्र हमरा प्रसन्नता दैत अछि: जे भेलैक सेहो ठीक रहैक, जे भऽ रहल छैक सेहो ठीक छैक आ जे हेतैक सेहो ठीके हेतैक। लोकक कि छैक जे लोक बेहाल हो! आम जनता बहुत सहनशील आ शान्त प्रकृति के होइत छैक एहिठाम, मुदा नेताके बुद्धि के परावार नहि। मानू जे नित्य संविधान पारित करैछ, नित्य नियम-कानून बनैछ आ ताहि अनुरूप चलबाक समय विरले कहियो भेटैत छैक वा एना कहू जे ताकल जाइत छैक। पूर्वाधार के सुरक्षा आ विकास के जगह केवल हवाबाजीके कारण सिर्फ ह्रास टा होइत छैक। जे बिजली नेपालमें २४ घंटा रहैत छलैक, से आइ १२ घंटाके औसत आपुर्ति बड़ मुश्किल सऽ करैत छैक। सप्ताहमें दु-दु दिन उद्योगके केवल बिजलीके कारण बंद राखय पड़ैत छैक जेकर कारण उत्पादनशीलता में पैघ कमी आयल छैक। वैकल्पिक उर्जाक स्रोत डिजलके दाम उद्योग लेल सस्ता दर पर उपलब्धताके बिपरीत महग दर पर उपलब्ध छैक आ सेहो प्रचूर मात्रामें नहि बल्कि ऋणक सहारे भारतक कृपापर उपलब्ध होइत रहल छैक। केवल एहि कारणे औद्योगिक विकास तऽ दूर संवर्धन के कार्य तक संभव नहि भऽ रहल छैक। दोसर महत्त्वपूर्ण बात होइत छैक श्रम-व्यवस्थापन, श्रमिक-उपलब्धता, श्रम-नीति के! उद्योगक विकास भेल वा नहि, पूर्वाधार मजबूत भेल वा नहि, आर्थिक विकासक गति उत्तरोत्तर प्रगति केलक वा नहि, पूँजी-लगानी बढल वा नहि… एहि समस्त महत्त्वपूर्ण बुँदाके समीक्षा बिना बस राजनीतिक दल सभक मनमानी व्यवस्थापन करबाक मानसिकता सऽ आइ श्रम-नीति न्युनतम मजदूरीके एतेक ऊपर लऽ गेल छैक जेकर चलते सेहो एहिठाम पूँजी-लगानीकर्ता हतोत्साह पबैत छैक नहि कि कोनो उत्साह भेटैत छैक। अन्य कोनो विन्दु जे लगानी लेल माहौल बनबैत छैक से विद्यमान-व्यवस्थापन, नियमन, सिद्धान्त, संस्कार या समग्र वातावरण एकदम सार्थक-सकारात्मक नहि छैक। आ नहिये कोनो प्रतिबद्ध मानसिकता जे कार्यरूप दैत नेपालमें कोनो तरहक सुधार कय सकैक, केवल मुँह सऽ बजनिहार के कमी नहि। प्रतिबद्धता तऽ ओ भेल जे आइ बाजल सहमति करब आ काल्हि १९-२० करैत सहमति करैत राष्ट्रके निकास देत। एतय तऽ घोर उपद्रवी आ अत्यधिक बुधियार सभ राजनीति कय रहल अछि आ अपनहि खूनल इनारमें पहिले कूदैत अछि, फेर कोहुना-कोहुना कमरेड सभ ओकरा एक इनार सऽ निकालैत छैक आ कि पुनः दोसर इनार खूनल भेटैत छैक आ बस इनार-टू-इनार खेल खेलाइत अछि, सांझ पड़ैत सभ मस्त, पुनः भिनसर भेने गस्त!

असंभव किछु नहि छैक जे आश के हम सभ अपना सँ दूर करी, आशे बले संसार टिकैत छैक। नहि तऽ अदृश्य भगवान्‌ प्रति आस्तिकताके मात्रा नास्तिकता सऽ बहुत बेसी कदापि नहि होइतैक। नेपालक जनसंख्या आ भौगोलिक संरचना अनुरूप लगानी करबाक क्षेत्र सेहो सीमित छैक, लेकिन उत्साहवर्धक सेहो छैक। एहिठाम जाहि संसाधनके प्रचूरता छैक लगभग सैह प्रचूरता किछु बराबर भौगोलिक स्वरूप लेने भारतक सिक्किम, गोरखा क्षेत्र (बंगाल), उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा आदि छैक। ओहिठामक विकास के तर्ज मात्र यदि अख्तियार कैल जाय तऽ नेपालके जय-जय संभव हेतैक। जलस्रोत, जंगल, जडी-बूटी, जनशक्ति, जमीन… हर प्राकृतिक साधन नेपाल के रिद्धि-सिद्धि-जननी शैलपुत्रीके संज्ञा दैत छैक… लेकिन जेना सहोदर भाइ के.. सहोदर संतान के.. अपन-अपनके लेल जन-जर-जमीन तोड़यवाला होइत छैक; किछु तहिना नेपालमें लोक अपन कमजोर इच्छाशक्ति आ बेमौसमी राजनीतिक लाद-चापमें सभ संसाधन के दुरुपयोग करैत छैक नहि कि सदुपयोग लेल कोनो सोच बनबैत छैक। माओवादी नेता सभक लेख सभमें पैघ-पैघ बात पढैत आयल रही आ उम्मीद बन्हैत छल जे ई दल जहिया राजनीतिके बागडोर अपन हाथमें लेत तऽ जरुर कोनो क्रान्तिकारी – मुक्तिगामी परिवर्तन करत। लेकिन ई समस्त बात मिथ्या साबित भेल। केवल कट्टरता आ फूइसक राष्ट्रीयता प्रदर्शन केला सऽ राष्ट्र अग्रगामी निकास नहि पाबि सकैत अछि। सहिष्णुता आ सहमेल-सहमतिक आधार पर विकासक गति आगू बढेबाक लेल संभाव्य क्षेत्रमें लगानीके वातावरण बनेबाक बहुत पैघ आवश्यकता छैक। बात बहुत भेल, किछु कार्य करब जरुरी।

नेपालमें लगानीकर्ता आन देशके लोक शायद आजुक परिस्थितिमें हिम्मत नहि करतैक, मुदा भारत सऽ बहुते लगानीकर्ताके रुचि एहि बाजारमें छैक। परिस्थिति कतबो बिपरीत रहितो भारतीय पूँजी के लगानी नेपालमें सदिखन संभव छैक। भारतीय रुचिके एक मजबूत वजह यैह जे ओकरा सभके दुनू कातक परिस्थितिमें चलबाक आदति पड़ि गेल छैक। राजनीतिक दल संग सहकार्य करबाक, सरकारी नियम-कानूनके निर्वाह करबाक आ लिच्चड़ श्रमनीति संग समझौता करबाक… हर मूल्यपर उत्पादनशीलता बाजार अनुरूप सृजन करबाक काज केवल नेपाल आ भारतक लोक लेल नेपाली भूमि में संभव देखि रहल छी हम! लेकिन एहि तरफ मजबूत इच्छाशक्ति संग कार्य कैल जाय। भारत प्रति जे नाशी नकारात्मकता के प्रसार कैल जाइछ ओकरा में परिवर्तन आ एकर उलट पोषण-प्रवर्धनके आवश्यकता छैक। भारत व भारतीय के सम्राज्यवाद कहि मुँहे भरे खसायब नेपाली राजनीतिके ओ कलंकी पक्ष थिकैक जे सिर्फ भावना भड़कौनय टा बुझैत छैक। समाधान लेल याचना आ घूड़की नहि, मित्रताके संग समुचित विकास लेल सहकार्य करबाक जरुरति छैक। भारतके पास जे विकासक गति-रेल इन्जिन छैक, ओहिके संग नेपालक आर्थिक समृद्धिके डिब्बा जोड़ि देबाक आवश्यकता छैक। १९९० ई. के एक प्रिफरेन्शियल एन्ट्री फेसिलिटी सऽ नेपालमें औद्योगिक क्रान्ति भेल रहैक, बस किछु यैह तर्ज पर नेपालक प्राकृतिक संसाधन के बखूबी सदुपयोग करैत राष्ट्रके समग्र विकास लेल लगानीके माहौल बनेबामें पूर्वाधारके विकास करबाक लेल सेहो भारतक विशिष्ट भूमिका के सहारा लैत यदि आगू बढल जाय तऽ नेपाल के दस वर्ष में आर्थिक विकास सिंगापुर-हंगकंग समान फ्रिपोर्ट सऽ करब तऽ गलती नहि हेतैक। नेपालके आर्थिक विकास हेतु सर्वप्रथम जरुरति अपन मनोदशा के सुधारबाक ईमानदार बनबाक जरुरति छैक। ढकोसला राष्ट्रवाद सऽ आत्मघाती कदम उठेला सऽ ओहिना नोकसान हेतैक जेना २००० ई. के बाद सऽ आइरन-स्टील, वनस्पति घी, टेक्सटाइल, प्लास्टीक उद्योग सभक भेलैक।

हरि: हर:!

**

प्रियजन! आइ पुनः नवरात्राके सुखद उपलक्ष्यमें अपने सभसँ पहिलुक पोस्टमें ऋतुनाम हेमन्तसँ शरद ऋतु सुधार करैत आगू दुर्गा सप्तशती में भगवतीक महिमा कुल १३ अध्यायमें वर्णित अछि; आइ एहिपर विस्तार सँ चर्चा करी।

प्रथम अध्यायमें मेधा ऋषि द्वारा राजा सुरथ आ समाधिके भगवतीक महिमा बतबैत मधु-कैटभकेर वध करबाक प्रसङ सुनेबाक छैक।

विनियोग:

ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः, नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्‌, अग्निस्तत्त्वम्‌, ऋग्वेदः स्वरूपम्‌, श्रीमहाकाली-प्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः।

ध्यानम्‌

ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रीनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्‌।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्‌!!!!!॥
ॐ नमश्चण्डिकायै॥

प्रथम चरित्रक ब्रह्मा ऋषि, महाकाली देवता, गायत्री छन्द, नन्दा शक्ति, रक्तदन्तिका बीज, अग्नि तत्त्व आ ऋग्वेद स्वरूप छैक। श्रीमहाकाली देवताक प्रसन्नताके लेल प्रथम चरित्रके जपमें विनियोग कैल जाइत छैक।

ध्यानमें, भगवान्‌ विष्णुक सुतला उपरान्त मधु आ कैटभके मारबाक लेल कमलसँ जन्म लेनिहार ब्रह्माजी जिनक स्तवन केने छलाह, ओहि महाकाली देवीक हम सेवन करैत छी। ओ अपन दसो हाथमें खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल भुशुण्डि, मस्तक आ शङ्ख धारण करैत छथि। हुनक तीन नेत्र छन्हि। ओ समस्त अङ्गमें दिव्य आभूषणसँ विभूषित छथि। हुनक शरीरक कान्ति नीलमणिक समान छन्हि आ ओ दस मुख एवं दस पैरसँ युक्त छथि। चण्डी देवीकेँ नमस्कार करैत छी।

द्वितीय अध्यायमें देवाता लोकनिक तेजसँ देवीक प्रादुर्भाव आ महिषासुरक सेनाके वधके गाथा कहल गेल अछि।

विनियोग:
ॐ मध्यमचरित्रस्य विष्णुरृषिः, महालक्ष्मीर्देवता, उष्णिकछन्दः, शाकम्भरी शक्तिः, दुर्गा बीजम्, वायुस्तत्त्वम्, यजुर्वेद: स्वरूपम्, श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थं मध्यमचरित्रजपे विनियोग:।

ध्यानम्

ऊँ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्‌।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्‌॥

मध्यम चरित्रक विष्णु ऋषि, महालक्ष्मी देवता, उष्णिक्‌ छन्द, शाकम्भरी शक्ति, दुर्गा बीज, वायु तत्त्व और यजुर्वेद स्वरूप छथि। श्रीमहालक्ष्मीकेर प्रसन्नताक लेल मध्यम चरित्रके पाठमें एकर विनियोग कैल जाइछ।

ध्यानमें, हम कमलकेर आसनपर बैसल प्रसन्न मुखवाली महिषासुरमर्दिनी भगवती महालक्ष्मीक भजन करैत छी, जे अपन हाथमें अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, पद्म, धनुष, कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, शङ्ख, घण्टा, मधुपात्र, शूल, पाश आ चक्र धारण करैत छथि।

तृतीय़ अध्याय में सेनापति सहित महिषासुरक वधके वर्णन कैल गेल अछि।

ध्यानम्‌

ऊँ उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां
रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्‌।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्व्क्त्ररविन्दश्रियं
देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्देऽरविन्दस्थिताम्‌॥

ध्यानमें, जगदम्बाक श्रीअङ्गकेर कान्ति उदयकालकेर सहस्र सूर्यक समान छन्हि, ओ लाल रंगक रेशमी साड़ी पहिरने छथि। हुनक गलामें मुण्डमाला शोभा पाबि रहल अछि। दुनू स्तनपर चन्दनक लेप छन्हि। ओ अपन कर-कमलमें जपमालिका, विद्या आ अभय एवं वर नामक मुद्रा धारण केने छथि। तीन नेत्रसँ सुशोभित मुखारविन्दक बहुत शोभा बढल छन्हि। हुनक मस्तकपर चन्द्रमा सहित रत्नमय मुकुट बान्हल छन्हि आ ओ कमलक आसनपर विराजमान छथि। एहेन देवीके हम भक्तिपूर्वक प्रणाम करैत छी।

चतुर्थ अध्यायमें इन्द्रादि देवतागण द्वारा देवीकेर स्तुतिगान कैल गेल अछि। हमरा सभके चाही जे नित्य गानमें एहि अध्याय के पाठ जरुर करी। 

ध्यानम्‌

ॐ कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां
शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्‌।
सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं
ध्यायेद्‌ दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृत्तां सेवितां सिद्धिकामैः॥

ध्यानमें, सिद्धिकेर इच्छा राखनिहार पुरुष जिनकर सेवा करैत छथि तथा देवता जिनका सभ दिशसँ कल जोड़ने घेरने रहैत छथि, ताहि ‘जया’ नामवाली दुर्गादेवीके ध्यान करैत छी। हुनक श्रीअङ्गक आभा कारी मेघके समान श्याम अछि। ओ अपन कटाक्षसँ शत्रुसमूहकेँ भय प्रदान करैत छथि। हुनक माथपर आबद्ध चन्द्रमाक शोभा खिलैत अछि। ओ अपन हाथमें शङ्ख, चक्र, कृपाण आ त्रिशूल धारण करैत छथि। हुनक तीन नेत्र छन्हि। ओ सिंहक कान्हपर सवार छथि आ अपन तेज सँ तीनू लोककेँ परिपूर्ण कय रहल छथि।

पञ्चम अध्यायमें देवतागण द्वारा देवीकेर स्तुति, चण्ड-मुण्डकेर मुखसँ अम्बिकाक रूपक प्रशंसा सुनिकय शुम्भके हुनका लग दूत पठायब आ दूतक निराश भऽ के वापसीके चर्चा कैल गेल अछि।

विनियोगः

ॐ अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य रुद्र ऋषिः, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप्‌ छन्दः, भीमा शक्तिः, भ्रामरी बीजम्‌, सूर्यस्तत्त्वम्‌, सामवेदः स्वरूपम्‌, महासरस्वतीप्रीत्यर्थे उत्तरचरित्रपाठे विनियोगः।

ध्यानम्‌

ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्‌
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्‌॥

एहि उत्तर चरित्रक रुद्र ऋषि छथि, महासरस्वती देवता छथि, अनुष्टुप्‌ छन्द छथि, भीमा शक्ति छथि, भ्रामरी बीज छथि, सूर्य तत्त्व छथि आ सामवेद स्वरूप छथि। महासरस्वतीकेर प्रसन्नता लेल उत्तर चरित्र केर पाठमें एकर विनियोग कैल जाइछ।

ध्यानमें, जे अपन करकमलमें घण्टा, शूल, हल, शङ्ख, मूसल, चक्र, धनुष आ बाण धारण करैत छथि, शरद ऋतुके शोभासम्पन्न चन्द्रमाक समान जिनकर मनोहर कान्ति छन्हि, जे तीनू लोकके आधारभूता छथि आ शुम्भ आदि दैत्यक नाश करवाली छथि – संगहि गौरीक शरीरसँ जिनक प्राकट्य भेल अछि, ओहि महासरस्वती देवीकेर हम निरन्तर भजन करैत छी।

क्रमशः….

हरिः हरः!

**

श्री दुर्गा सप्तशती के तेरहो अध्यायके विश्लेषण आइ भिनसरमें कय रहल छलहुँ, लेकिन समयाभावके कारण केवल पाँच अध्याय तक कय सकल रही। आउ, आब क्रमशः सऽ आगू ध्यान दी।

छठम अध्यायमें धुम्रलोचन वध के वृत्तान्त देल गेल अछि।

ध्यानम्‌

ॐ नागाधिश्वरविष्टरां फणिफणोत्तंसोरुरत्नावली-
भास्वदेहलतां दिवाकरनिभां नेत्रत्रयोद्भासिताम्‌।
मालाकुम्भकपालनीरजकरां चन्द्रार्धचूड़ां परां
सर्वज्ञेश्वरभैरवाङ्कनिलयां पद्मावतीं चिन्तये॥

ध्यानमें, हम सर्वज्ञेश्वर भैरवकेर अङ्कमें निवास केनिहैर परमोत्कृष्ट पद्मावती देवीक चिन्तन कय रहल छी। ओ नागराजकेर आसनपर बैसल छथि, नागसभक फन ऊपर सुशोभित होयवाली मणिसमूहक विशाल मालासँ हुनक देहलता उद्भासित भऽ रहल छन्हि। सूर्यक समान हुनकर तेज छन्हि, तीन नेत्र हुनक शोभा बढा रहल छन्हि। ओ हाथ सभमें माला, कुम्भ, कपाल आ कमल लेने छथि आ हुनक मस्तकपर अर्धचन्द्रकेर मुकुट सुशोभित अछि।

सप्तम अध्याय में चण्ड आ मुण्डकेर वधके वृत्तान्त देल गेल अछि।

ध्यानम्‌

ॐ ध्यायेयं रत्नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यामलाङ्गी
न्यस्तैकाङ्घ्रिं सरोजेशशिशकलधरां वल्लकीं वादयन्तीम्।
कह्लाराबद्धमालां विलसच्चोलिकां रक्तवस्त्रां
मातङ्गीं शङ्खपात्रां मधुरमधुमदां चित्रकोद्भासिभालाम्।।

ध्यानमें, हम मातङ्गी देवीकेर ध्यान करैत छी। ओ रत्नमय सिंहासन ऊपर बैसि पढि रहल तोताक मधुर स्वर सुनि रहल छथि। हुनक शरीरक वर्ण श्याम छन्हि। ओ अपन एक पैर कमल पर रखने छथि आ मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करैत छथि, संगहि कह्लार पुष्पकेर माला धारण केने वीणा बजबैत छथि। हुनक अङ्गमें कसल चोली शोभा पाबि रहल अछि। ओ लाल रंगकेर साड़ी पहिरने हाथमें शंखमय पात्र लेने छथि। हुनक बदन ऊपर मधुकेर हल्लूक-फल्लूक प्रभाव सेहो बुझय में आबि रहल अछि आ ललाटपर बिन्दी सेहो शोभा दऽ रहल छन्हि।

आठम अध्यायमें रक्तबीजकेर बधक वृत्तान्त देल गेल अछि।

ध्यानम्‌

ॐ अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं
धृतपाशाङ्कुशबाणचापहस्ताम्‌।
अणिमादिभिरावृतां मयूखै-
रहमित्येव विभावये भवानीम्‌॥

ध्यानमें, हम अणिमा आदि सिद्धिमयी किरणसभसँ आवृत्त भवानीकेर ध्यान करैत छी। हुनक शरीरक रंग लाल छन्हि, नेत्र सभमें करुणा लहराइत छन्हि आ हाथ सभमें पाश, अंङ्कुश, बाण आ धनुष शोभा पबैत छन्हि।

नवम अध्यायमें निशुम्भ वधकेर वृत्तान्त देल गेल अछि।

ध्यानम्

ॐ बन्धुककाञ्चणनिभं रुचिराक्षमालां
पाशाङ्कुशौ च वरदां निजबाहुदण्डै:।
बिभ्राणमिन्दुशकलाभरणं त्रिनेत्र-
मर्धाम्बिकेशमनिशं वपुराश्रयामि॥

ध्यानमें, हम अर्धनारीश्वरकेर श्रीविग्रहक निरन्तर शरण लैत छी। हुनक वर्ण बन्धुकपुष्प आ सुवर्ण के समान रक्तपीतमिश्रित अछि। ओ अपन भुजा सभमें सुन्दर अक्षमाला, पाश, अङ्कुश आ वरद-मुद्रा धारण करैत छथि; अर्धचन्द्र हुनक आभूषण छन्हि, आर ओ तीन नेत्रसँ सुशोभित छथि।

क्रमशः….

हरिः हरः!

**

१९ अक्टूबर २०१२

काल्हिक स्वाध्याय के शेष अंश: दुर्गा सप्तशतीके तेरह अध्यायके संछिप्त विश्लेषण

दुर्गा सप्तशतीक दसम अध्यायमें शुम्भ-वध के चर्चा कैल गेल अछि। देवीक क्रमसँ असुरकेर वध करबामें शुम्भ नामक दैत्य अन्तिम छल। बहुत माया आ देवी पर अनेको प्रकारे अपन आधिपत्य स्थापित करबाक आसुरी इच्छा संग एकर लीला देवी कोना समाप्त कयली एहि पर सप्तशतीमें पाँचम अध्याय सँ प्रकरण शुरु भेल अछि, एक बेर दोहराबी… पहिले शुम्भ-निशुम्भ द्वारा दूत पठायब आ देवी द्वारा दूतके खुलेआम चुनौती देब जे युद्धमें देवी ऊपर जीत देवीक जितब समान होयत, पुनः दैत्यराजके द्वारा अपन एक-पर-एक योद्धाके (धुम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज आ निशुम्भ) देवी ऊपर जीत हासिल करबाक लेल पठायब आ विभिन्न तरहक मायावी खेल खलेबाक बावजूद देवी (सत्य) के असुराधिपति (असत्य-मिथ्या) ऊपर विजयी प्राप्त होयब गानरूपमें सप्तशतीमें प्रस्तुत कैल गेल अछि। अन्ततोगत्वा एहि दसम अध्यायमें शुम्भ नामक दैत्यके वध-वृत्तान्त देल गेल अछि।

ध्यानम्‌

ॐ उत्तप्तहेमरुचिरां रविचन्द्रवह्नि-
नेत्रां धनुश्शरयुताङ्कुशपाशशूलम्।
रम्यैर्भुजैश्च दधतीं शिवशक्तिरूपां
कामेश्वरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम्।

ध्यानमें, हम मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करऽवाली शिवशक्तिस्वरूपा भगवती कामेश्वरीके हृदयमें चिन्तन करैत छी। ओ तप्त-सुवर्ण समान सुन्दर छथि। सूर्य, चन्द्रमा आ अग्नि – यैह तीन हुनक नेत्र छन्हि एवं ओ अपन मनोहर हाथ सभमें धनुष-बाण, अङ्कुश, पाश आ शूल धारण केने छथि।

अवश्यम्भावी देवी द्वारा समस्त असुर-समाजपर विजय प्राप्त कयला उपरान्त ‘एगारहम अध्याय’में देवतागण (समाज) द्वारा देवीकेर स्तुति एवं देवीद्वारा देवता समाजके वरदान के विलक्षण चर्चा अछि। कहल गेल छैक, यदि समस्त सप्तशतीकेर पाठ नहि पार लागय तऽ एगारहम अध्याय जरुर करी। एहि सँ हमरा लोकनिकेँ भान होइछ जे देवी कोना दानवी अहंकार-विकारसँ त्रस्त-पस्त ब्रह्माण्डकेर रक्षा करैत छथि आ मानव (हमरा सभके) और कि चाही। बस… अपन भीतरक दानवके संहार लेल देवीक स्तुतिगान जरुर करी।

ध्यानम्‌

ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्ताम्।
स्मेरमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम्।।

ध्यानमें, हम भुवनेश्वरी देवीक ध्यान करैत छी। हुनक श्रीअङ्गकेर आभा प्रभातकालीन सूर्यक समान अछि आ माथपर चन्द्रमाक मुकुट अछि। ओ उभरल सीना आ तीन नेत्रसँ युक्त छथि। हुनक मुखपर मुस्कानक छटा प्रखर रहैत अछि आ हाथमें वरद, अङ्कुश, पाश संग अभय-मुद्रा शोभा पबैत अछि।

ई स्वतः छैक जे मेहनतक फल मीठ हेतैक। पाठ कयलहुँ मुदा कि सभ छल से मनन नहि भेल वा एना कहू जे बस पाठ टा कयलहुँ – मनन नहि भेल तऽ शायद हमरा सभके आत्म-साक्षात्कार सत्यसंग नहि भऽ सकल। हम एहि तरहक पाठ के विरोध करैत छी, आ एहि बात के समर्थन जे सनातन संस्कृतिमें पाठ उपरान्त माहात्म्य, याने महत्त्वसंग खुलेआम साक्षात्कार करायल जाइछ। 

बारहम अध्याय में देवी चरित्रक पाठकेर महत्त्व कहल गेल अछि। भले अहाँ कोनो मानसिकता सँ देवी आराधना करी, पाठ अवश्य करी। बारहम अध्याय अहाँके मेहनतके फलादेश करैछ। 

ध्यानम्‌

ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां
कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्‌।
हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं
बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥

ध्यानमें, हम तीन नेत्रवाली दुर्गा देवीक ध्यान करैत छी, हुनक श्रीअङ्गकेर प्रभा बिजलीक समान अछि। ओ सिंहके कान्हपर बैसल भयंकर प्रतीत भऽ रहल छथि। हाथमें तलवार आ ढाल लेने हिनकहि सेवामें तत्पर अनेको कन्याक संग छथि। ओ अपन हाथमें चक्र, गदा, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश आ तर्जनी मुद्रा धारण केने छथि। हुनक स्वरूप अग्निमय अछि तथा ओ माथपर चन्द्रमाक मुकुट धारण करैत छथि।

अन्तिम, याने तेरहम अध्यायमें सुरथ आ वैश्यके देवीक वरदान के गाथा अछि। जतय सँ पाठक प्रारम्भ भेल छल ततहि आब पाठक फल प्राप्ति होइत देखायल गेल अछि। निःसन्देह! निःसन्देह! निःसन्देह! दुर्गा पाठ किछु एहि तरहें हमरो सभ लेल फलदायी अछि। 

ध्यानम्‌

ॐ बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम्‌।
पाशाङ्कुशवराभीतीर्धारयन्तीं शिवां भजे॥

ध्यानमें, जे उदयकालक सूर्यमण्डल-सम कान्ति धारण करऽवाली छथि, जिनक चारि भूजा आ तीन नेत्र छन्हि एवं जे अपन हाथ में पाश, अङ्कुश, वर एवं अभय केर मुद्रा धारण केने रहैत छथि, ताहि शिवा देवीक हम ध्यान करैत छी।

ॐ तत्सत्‌! !!

हरिः हरः!!

**

अर्ज अछि एक मैथिली शायरी, आ गजल! 

(फेसबुक पर हमर बहिन, बेटी… कहु तऽ कतेको सम्भ्रान्तो महिला समाज नित्य पोज बदैल रहल छथि। हुनका सभके लक्षित एक सत्य अनुसरण तत्त्व के उपहार सहित ई रचना समर्पित अछि।)

शायरी:
फेसबुक हो या सच जीवन, गोरकी भरल गुमान
खने लिपिस्टीक खने हिल पर करैत रहैयऽ ध्यान 

गजल:

फुदकी चिड़ियां रंग बदैलिके, जानि कते छितराइ छै
कुदकी गुड़िया ढंग बदैलिके, कानि-कानि भैर जाइ छै

खन ई फोटो खन ओ पोज, फँसल पिंजर रहि जाइ छै
बेर अबै सऽ पहिने गुम्हरब, आप चाल मैर जाइ छै

नर जोड़ी बड़ भेल ब्याकुल, चाह नेह बहि जाइ छै
मादा मद्यक मादे मधुरल, जोवन दुःख जैर जाइ छै

जुनि इतरो न इठलो चमकी, चानो देख कुहि जाइ छै
बूझ नेह कथमपि न देहे, मन-मियैद फैर जाइ छै

सूरजो भोरे बालरूप ओ, नित बढि पुनि ओ मिझाइ छै
ओकर कहब के बुझे रजनी, नित्य सत्य तैर जाइ छै

हरि: हर:!

**

२० अक्टूबर २०१२

नित्य नवरात्राक प्रसाद आध्यात्मिक चिन्तन संग ग्रहण करी। आउ, आइयो किछु एहेन विन्दुपर चर्चा करी जे हमरा लोकनिक जीवनके सफल बनेबाक लेल उपयुक्त हो:

भक्ति भगवान् प्रति पूर्ण समर्पणकेर नाम होइछ।

भगवान् राम द्वारा शबरीक भक्ति केर सराहना हमरा सभ लेल अनुकरणीय अछि। नवधा भक्तिक चर्च कयलन्हि अछि श्रीराम!

‘प्रथम भगति संतन कर संगा’

शबरीक दोसर कोनो काज नीके नहि लगैन, सिवाये साधू-संतकेर कुटियामें सेवा प्रदान करबाक। कतबो लोक अछूत कहि हुनका भगैयो देलकैन, मुदा ओ बस टकटकी लगौने केवल सेवाभाव आ समर्पण संग आश्रम नजदीक एक कुटिया बनाय रहलीह आ गुरुप्रेममें पागल शबरी गुरुवचनके सदिखन स्मृतिमें रखलीह जे अहाँ संग प्रभुजी एक दिन जरुर साक्षात्कार होयत, बस हुनका लेल गुरुवचन अन्तिम सत्य छल। अपन गुरुक नित्य दर्शन करैत दूर कातमें पड़ल शबरी पूर्ण समर्पण भाव आ बिना कोनो तरहक केकरो लेल, एतय तक जे साधूसमूह झारि-फटकारि गुरुसेवा सँ वञ्चित करैत आश्रम सऽ बाहर निकाइल देने छलन्हि… तेकरोप्रति कोनो दुर्भावना के अपनामें जगह नहि दैत बस केवल गुरुवचनके सत्य मानैत नित्य रामजीके इन्तजार करैत रहलीह। नित्य फल तोड़ि लाबैथ। प्रेम कतेक अबोध आ बालबुद्धि सन छलन्हि जेकर परावार नहि। भगवान्‌के भोग लगेती, लेकिन मीठ फर… आ मीठ फर पहिले अपने जीभ पर स्वाद लेती… अर्थात्‌ जे मीठ वैर छैक प्रभुजी लेल वैह टा डालीमें संग्रह करती। हाय रे निश्छल प्रेम! आँखिमें नोर भरैछ जखन-जखन हुनक ई प्रसंग के ध्यान करैत छी। यैह भावके राम स्थान दैत छथि। बहुत चाव सऽ ओ शबरीके आँइठ वैरके भोग लगबैत छथि नहि कि आश्रमक अनमोल कंद-मूल-फल! 

‘दूसरी रति मम कथा प्रसंगा’

साधू हुनका एहि लेल नीक लगैत छलन्हि जे ओहिठाम अन्य कोनो अर्र-दर्र बाते नहि बल्कि जेम्हर-तेम्हर रामहि-राम!

‘गुरु पद सेवा तीसरी भक्ति अमान’

पहिले कहि चुकल छी, गुरुप्रेम शबरीक निश्छल, निष्कपट आ पूर्ण समर्पण संग छलन्हि। रामजीक कृपा, गुरुओ हुनका लेल ओतबे सोचैथ। अंततोगत्वा गुरु हुनका लेल सभ साधूसमाज तक सऽ मोहभंग करैत अपन सर्वस्व हुनकहि संरक्षणमें छोड़ि समाधिस्थ भऽ गेलाह। गुरु-शिष्याक पवित्र सम्बन्धके अमरत्त्व सेहो प्रदान कय गेलाह। शिष्या सेहो शिक्षा लेनिहैर नहि, बस सेवा-सुश्रुषा देनिहैर। एकमात्र दासत्वके स्वीकार केनिहैर शबरी, अपन जीवनक एकहि टा उद्देश्य जे आन काज हम किऐक करी, हुनकर सेवा करी जे रामजीके सेवामें निरंतर अपन जीवन लगौने छथि। वाह! वाह! मुँह सँ हृदयक आवाज आइ युगो उपरान्त ई लेखनी करैत निकैल रहल अछि जे हम बड़भागी बनैत छी यदि शबरीके सुमिरैत छी। शबरीक सुमिरन सऽ रामजीके सुमिरन पर्यन्त भऽ रहल अछि। आगू देखी, रामजी स्वयं कहि रहल छथि।

‘चौथी भक्ति मम गुणगान, करै कपट तजि गान’

संगत साधू-संतक रहलापर एहि बातक गारंटी छैक, गान केकर करत लोक सिवाये भगवान् के? अवश्य एक अवलंब छथि दीनबंधु! तखन भटकब किऐक? शबरी तऽ गार्हस्थ जीवनमें प्रवेश कदापि नहि करब आ ता-उम्र ईशक सेवा कयनिहारके सेवा करब सोचि आयल छलीह। दोसर काजे कि? बस प्रभुके गुण गाउ, रुख-सुख खाउ! कपट काजक नहि! सावधान!

‘मंत्र जाप मम दृढ विश्वासा, पंचम भजन जो वेद प्रकाशा’

वेदक प्रकाश यैह छैक जे मंत्र जपू, नाम सुमिरू, लेकिन ई सभ करू तखन जखन दृढ विश्वास हो जे आब अन्य किछु उपाय हमरा लेल अछिये नहि। निःसन्देह, शबरी बाल्यावस्थामें अपन बड़-बुजुर्गसँ ई सुनलीह जे जीवन बस मृत्यु लेल भेटैत छैक आ जीवनकालमें यदि माधवसेवा हो तऽ पार लगैत छैक, बस फेर कि छलैक, ओ नित्य देव-सुमिरन में देवपुरुष के सत्संग सँ आनन्दपूर्वक करय लगलीह! ओ ताहि समाज लेल अछूत छलीह, लेकिन मन गंगा सँ पखारल छलन्हि। ओ निर्मल छलीह जे एतेक अटूट विश्वास के संग पूर्ण निर्णय आ दृढताक संग यैह कार्य लेल अपन जीवन समर्पित कयलीह। कहू! ई अनुकरणीय नहि तऽ आर कि? भटकैत रहबाक विचार हो तऽ स्वतंत्र छी प्रवीण! 

‘छठा दास शील बिरति बहु कर्मा, निरत निरंतर सज्जन धर्मा’

कहि चुकल छी, शबरी लेल अन्य कोनो काज नहि! बस सेवा आ सेवा! सेवा बड़ पैघ कर्म छैक। आजुक प्रोफेशन युगमें सेवा मूल्य लेल कैल जैछ, मूल्य केहेन तऽ भौतिक सुख! परञ्च जे सेवा निष्काम आ केवल ईशक हेतु बुझि कैल जाय तऽ ओकरा असल प्रभु-दासतामें समर्पित मानी। सज्जनकेर सेवा धर्म थीक। आब सज्जन के से विचारयमें बहुत समय लगा देबैक तऽ देरी नहि भऽ जाय! सावधान प्रवीण! 

‘सप्तम सम मोहि जग देखा, मो ते संत अधिक कर लेखा’

बस हंसी लगैछ! देखैत छी कि आ देखा रहल अछि कि! जी! शबरी सभ संसारमें केवल हुनकहि देखलैथ। संतक सेवामें मेवा देखलैथ। कारण पहिले गुरु, तखनहि गोविन्द-ब्रह्म! 

‘आठवाँ यथा लाभ संतोषा, सपनेउ नहि देखै परदोषा’

सुखक मूल जे जतेक भेटल तहीमें प्रसन्न छी। शबरीके आर कि चाही? प्रवीण बौआइत छथि। भूखल डिरियैत छथि। लेकिन शबरी तऽ पहिले सभके प्रसन्न करैत छथि, तखन जे भेटल तहीमें हैप्पी! तहुँ सीख ले प्रवीण!

‘नवमाँ सरल सब सन छलहीना, मम भरोस हिय हरष न दीना’

एक भरोसो एक बल एक आस विश्वास
एक राम घनश्याम हित जातक तुलसीदास!  

संसारमें जे छैक बस वैह छथि, एहि विश्वास के संग सरल आ सभ संग छलविहीन व्यवहारके संग प्रभुजीक भरोसा रखैत बिना सुखी-दुःखी भेने जीवन शबरी जिलैथ, हे मानव समुदाय अहुँ लेल एहि नवरात्र सन पवित्र सुअवसरपर हम यैह शुभकामना बेर-बेर देब जे नवधा भक्ति प्राप्त करू।

हरिः हरः!

**

हम बड समृद्ध छी!
सीता हमर बेटी थिकी।
जगतजननी हमर सौभाग्य बढेली।
समस्त रिद्धि आ सिद्धि हमरहि लग अछि।
हमर स्वरूपमें दलान पर मालक थैर,
चारपर कुम्हर, कदीमा, सजमैन, घेरा,
बारीमें झुंगनी, खीरा… किछु न किछु रहत,
गेनहारी, तोरी, सरिसव, ठरहिया साग,
तरह-तरहके मेरचाइ,
हरैद, धनिया, जमैन, नेबो,
आम, लताम, जामुन,
कटहर, बरहर, शरीफा,
पान, मखान, माछ,
हमर माटि में सभ किछु फरैछ।
खतरनाक बीमारी सऽ हम दूर छी।
गायके गोबर, गायक दूध,
सुन्दर रचना हरदम शुद्ध!
हम मिथिला छी!
चलू गाम दिस!
शहरे में जुनि औनाउ!
हरि:हर:!

**

हमरा अनुभवमें, फेसबुक पर किछु जानलेवा बीमारी – जानलेवाक तात्पर्य जे ब्यर्थ के समय गमऔनाय।

१. कोनो पोस्ट बिन पढने लाइक केनाय।

२. फोटो के पाछू महत्त्वपूर्ण तत्त्व नहि देखनाय।

३. रुचि अनुरूप पोस्ट मात्र में लोक के नाम टैग नहि कय हरही-सुरही सभ पोस्टमें नाम टैग करैत झिल्होरि खेलनाय।

४. आवश्यकता सऽ अधिक चैट केनाय।

५. अपन परिचय देने वा सामनेवालाके पूरा चिन्हने मित्रक सूची लंबा केनाय।

हरि: हर:!

**

ई उपवन थिकैक! उपवनमें तुलसीक चौरा! तुलसीक सम्मान नारायण स्वयं देने छथि जे अपन माथपर हिनका स्थान देने छथि। तुलसीके जल-सिंचन कयलासँ समस्त ब्रह्माण्डक स्वामी नारायण बहुत प्रसन्न होइत छथि। हमर समस्त स्वजन-मित्रसँ निवेदन जे तुलसीमें नित्य जल ढारी। कम से कम घरक महिला द्वारा बिना बिसरने ई काज हो! पतिव्रता तुलसीक आशीष सभ प्राप्त करैथ। हरि: हर:!

**

चलू एक बेर फेर भेटय लऽ माँ गंगा सँ
लऽ भार भरि गंगाजल भेटी फेर बाबा सँ!

जतराक प्रात घरसँ प्रस्थान,
२६ के भेटब सुल्तानगंजमें ठीक यैह स्थानपर!
नित्य संध्या दुइ साँझ, नाचब बाबाक भजन गाबि मिलि के!

हरि: हर:!

**

२१ अक्टूबर २०१२

My Ideal: Tulsidas

The author of Ramacharitmanas and my first encyclopedia is Ramacharitmanas by him. Inspirations come through influencing writer with highly effective verses within my reach, and eyes filled with tears, heart filled with great exhilaration whenever aspired through it and many more, I truly became a cuckoo from a crow what the writer has claimed in beginning only, a crane becomes a swan too. During 2007, on Dharma Marga we started a thread namely ‘Great Teachings From Ramacharitmanas’, ‘Sundarkand’, ‘Quiz on Sundarkand’, ‘Characteristics of Lord Rama’s Daily Routine’, ‘Devotion of Hanumana’, and many more based on same. Life has to learn a lot and finally the love for Lord, the devotion is ultimate. We surrendered all selves to one Self alone. 

Let’s see, some of those pious and sweet lines I put below for your compassionate aspirations too.

1. The fragrance of a beautiful flower fills its essence to the hands which pluck it and obviously to those hands which keep it with love and care, similarly the people with sainthood favor to both friends and enemies equally.

2. One becomes prudent only after having companies of good or holy (noble) people. Attainment of such holy companies is possible by blessings of Prabhuji. This is the root of pleasure and welfare. Attainment of such noble companies is fruits of such pious tree of holy company, rest all are mere attracting flowers which decay after some moments of showing the temporary deluding beauty.

3. Planets, medicines, water, air and clothes turn to make good or bad resulting substances by mixing with other good or bad components. When these things are mixed with good components/company make better resultants and when with bad components/company, you all know they are called worse as poisons. But this mysterious fact is known only to the wise and prudential people.

4. Cotton thread fills the holes made by sewing needle and help in stitching the torn clothes, the yarns of cottons are also made with several types of atrocities on these such as being picked from cotton plants, then spun and then again weaved or knitted to make fabrics; but then the resulting clothes cover the several secret places of others. Similarly it is in the nature of saints who tolerate several types of distresses by self but try to cover the defects or sins of others. This is why they are praised by many. 

5. Both pious or wicked give trouble to others. The pious while leaving us take our life with them but the wicked start giving trouble right from the moment of meeting. This is explained better with example of pious being compared with lotus flower the touch of which gives pleasure and the wicked is compared with leech which start sucking blood with its touch to us. 

And so on! There are many such interesting knowledge available in Ramacharitmanas!  So, never keep a distance from these oceans of pearls of wisdom. 

Happy Durga Pooja Friends!!

And don’t miss to read about the life of Tulasidas Jee! Please, my request! We waste so much time uselessly, but it is my promise, I would take on the tour of heaven right when you are in worldly life. 

http://veda.wikidot.com/tulsidas

See you after 15 days now. Have a nice time and strong aspirations. Love you all. Har Har Mahadev!

Harih Harah!

**

जेकरा जे नीक लगै छै,
आ से जे नहि भेटै छै,
तऽ बरका नाटक होइ छै!
एकरा आन्दोलन कहै छै!

चुनचुन मिथिला मँगला,
मुरली फिलिमलऽ लड़ला,
केओ दहेज मुक्त मिथिला,
केओ रोजी लऽ सिखेला,
प्रशान्त प्रीतिके फिरेला,
मधुबनी में आगि लगेला!

ई सभ चलिते रहतय,
आन्दोलन हेबे करतय,
मान मन मानिये जेतय,
हृदय जँ एना कनतय,
मिथिला बनबे करतय,
सिनेमो मैथिली चलतय,
दहेज मुक्त मिथिलो हेतय,
रोजीके कमी न रहतय,
संस्कृति जोगिये जेतय,
सभ मिलि के जँ लड़तय!

एखुनका हाल बेहाली,
अपन पेटहि टा काफी,
टाँग में टाँग अड़ाबी,
कोनाके झटका लगाबी,
छोड़ ई बूड़िपन पापी,
बने नहि विषक खोपड़ी,
द्रौपदी मैथिली बनली,
उठे बनि भीमक शक्ति,
संग तोर कृष्ण छथुनजी!
सत्यके युद्धमें भारी!

हरि: हर:!

**

२५ अक्टूबर २०१२

Hamara prasannataa achhi je Durga Pooja ke 5 dinak chhutti me Dahej Mukt Mithila lel ground networking vibhinn gaam me kay sakalahu, tahina Dr. Dhanakar Thakur jee sang 1.5 days ke saannidhya sa AMP ke sangathan nirmaan kaarya apan gaam Kurson me bha sakal. Aab punah 5.5 days ke chhutti me Babadham ke saardiya kaamar yaatraa puraa ho ehi lel Isvar sang praarthanaa karait chhi. Harih Harah!

**

३१ अक्टूबर २०१२

आइ बहुत दिवसक बाद पुनः फेसबुक पर सक्रिय भेलहुँ, बीचमें मोबाइल द्वारा यदाकदा तीर्थक फुर्सतके समय सेहो प्रयास करैत रही जे फेसबुकिया माहौल के निरंतरता देने रही, अफसोस मोबाइल द्वारा ओतेक संभव नहि जतेक हम चाहैत रही वा चाहैत छी, करैत छी। खैर! आब पुनः वापसी पर प्रसन्नता जतबैत शीघ्रहि एहि बेरुक दुर्गा पूजाके छूट्टीक उपयोगिता पर किछु चर्चा करब। एहि क्रममें तीन गोटेकेँ विशेष धन्यवाद – डा. धनाकर ठाकुर, अपन अमूल्य समय सँ किछु समय हमरो गाम लेल देलाह आ मिथिला लेल आन्दोलन के जमीन पर उतारैत आम जनमानसमें खलबली मचाओल गेल जेकर जरुरैत छैक, नहि तऽ मिथिला धूल-धूसरित होयत एकर डर अछि। दोसर धन्यवाद डा. शेखर चन्द्र मिश्र केँ, सौराठ सभा लेल हिनकर समर्पणमें हमर सभक गाम-गाम भ्रमणके कार्यक्रम लेल समय देलाह आ हम सभ विभिन्न गामके भ्रमण केलहुँ, सम्पर्क अयला सभ गणमान्य सँ सौराठ सभाक आवश्यकता पर चर्चा केलहुँ। तेसर आ सभ सऽ महत्त्वपूर्ण धन्यवाद आजुक युवा मुदा वचनक पक्का भास्कर वत्स लेल देबनि जे चकौती दुर्गास्थानमें पूजा-पाठ-भजन-कीर्तनके भव्य कार्यक्रममें व्यस्त गणमान्य ग्रामीण संग सफल वार्ता करैत हमरा लोकनिक मुहिम प्रति लोककेँ जुटेलथि, एना लागल जे मिथिलाक एक सशक्त गाममें पूर्ण जागरुक लोकके बीच पहुँचल छलहुँ। बहुत-बहुत धन्यवाद!

आगामी समय में पुनः नव-नव कार्यक्रम लायब एहि विश्वास के संग अपने लोकनि संग सेहो सकारात्मक प्रयास लेल आग्रह करैत छी।

हरि: हर:!

**

१ नवम्बर २०१२

हिन्दू पावैन-तिहार के महत्त्व बहुत तरहें मानवताके समुचित पाठ सिखेबाक लेल सेहो छैक। ओ भले दुर्गा पूजा के असीम भीड़ हो वा बाबाधामके कामर यात्रा… हर जगह आपसी सद्‍भावना आ प्रेम के दर्शन होइछ जे हृदयकेँ प्रफूल्लित करैत अछि।

यात्रा सेहो हमरा सभके लेल बहुतो तरहें प्रेरणाके प्रवाह करैत अछि। एहि बेरक मिथिला यात्रा हमरो लेल किछु एहने प्रेरणादायक रहल। एकर विस्तार सँ चर्चा हम बाद में करब लेकिन एखन एतबी कहब जे मिथिलाक समृद्धि कतहु हेरायल नहि अछि, बस लोक स्वयं आँखि मुनने छथि आ दर्शन करबा सँ बाधित छथि। बिल्कुल जेना नजैर बन्द केला सँ डर आगू सऽ भागल बुझैछ, बस किछु तेहने बचकानी केनिहार ओ प्रवासी मैथिल मिथिला सँ दूर रहैत एहि समृद्धिक दर्शन करबामें चूकैत छथि जेना हमरा बुझायल एहि बेर। गाम के नहि अबैत अछि, अहाँ स्वयं गाम सँ दूर रहब आ लागब गामपर छिंटाकशी कसय तऽ भले गाम बिगड़ल आ कि अहाँ एहि बात के एक पुरान मुहावरा प्रमाण दैछ – ओझा के लेखें गाम बताह आ गामक लेखें ओझा बताह!

गाम आउ, समृद्धि-ऋद्धि-सिद्धि संग आशीर्वादित बनू! एहि बेर बाबाधामक यैह प्रसाद (पेड़ा आ बद्धी) के संग मिथिला राज्य निर्माण लेल सभ सँ हार्दिक निवेदन करैत छी।

हरिः हरः!

**

बाबाधाम के प्रसाद – गाम समृद्ध अछि, गाम जरुर आउ!

हिन्दू पावैन-तिहार के महत्त्व बहुत तरहें मानवताके समुचित पाठ सिखेबाक लेल सेहो छैक। ओ भले दुर्गा पूजा के असीम भीड़ हो वा बाबाधामके कामर यात्रा… हर जगह आपसी सद्‍भावना आ प्रेम के दर्शन होइछ जे हृदयकेँ प्रफूल्लित करैत अछि।

यात्रा सेहो हमरा सभके लेल बहुतो तरहें प्रेरणाके प्रवाह करैत अछि। एहि बेरक मिथिला यात्रा हमरो लेल किछु एहने प्रेरणादायक रहल। एकर विस्तार सँ चर्चा हम बाद में करब लेकिन एखन एतबी कहब जे मिथिलाक समृद्धि कतहु हेरायल नहि अछि, बस लोक स्वयं आँखि मुनने छथि आ दर्शन करबा सँ बाधित छथि। बिल्कुल जेना नजैर बन्द केला सँ डर आगू सऽ भागल बुझैछ, बस किछु तेहने बचकानी केनिहार ओ प्रवासी मैथिल मिथिला सँ दूर रहैत एहि समृद्धिक दर्शन करबामें चूकैत छथि जेना हमरा बुझायल एहि बेर। गाम के नहि अबैत अछि, अहाँ स्वयं गाम सँ दूर रहब आ लागब गामपर छिंटाकशी कसय तऽ भले गाम बिगड़ल आ कि अहाँ एहि बात के एक पुरान मुहावरा प्रमाण दैछ – ओझा के लेखें गाम बताह आ गामक लेखें ओझा बताह!

गाम आउ, समृद्धि-ऋद्धि-सिद्धि संग आशीर्वादित बनू! एहि बेर बाबाधामक यैह प्रसाद (पेड़ा आ बद्धी) के संग मिथिला राज्य निर्माण लेल सभ सँ हार्दिक निवेदन करैत छी।

हरिः हरः!

**

केकरा नहि इच्छा छैक जे हमर फोटो अखबार पर छपय, आ के नहि चाहैत अछि जे हमरो खूब नाम हो। लेकिन कर्म करैत रहब तऽ दुनू बात होयत, लोकप्रिय वैह बनैछ जे संसार के हित लेल सोचैत आ करैत अछि।

हरि: हर:!

**

२ नवम्बर २०१२

एक बेर कृपाक दृष्टि फेरियौ हे सिया धिया
जनक-दुलरिया ना!
मिथिला कानि रहल फेर अहाँ आयब कहिया
जनक दुलरिया ना!

हरि: हर:!

**

३ नवम्बर २०१२

मुझे लग रहा है कि हिन्दुस्तानमें आज भी आम लोगोंकी स्वतंत्रता ऊँचे कुर्सी और औकातवालोंके हाथ गुलाम बना हुआ है। इसे हम क्या मानें? यदि कानून और प्रशासन ने किसी शिकायतपर ही ऐसा किया तो उन्हें भारतीय न्यायाधिकरण से समुचित आदेश लेकर करना चाहिये था न कि सीधा आम लोगोंपर कुछ इस तरह कि आगे श्रीनिवास के जैसा हिम्मत दूसरा कोई न करे। यह काँग्रेस सरकार और रावणकी अहंकार – इन दो में अब क्या अन्तर रहा? पर हम आम लोग इनके झाँसे में आकर प्रजातांत्रिक गणतंत्रकी सबसे बड़ा अधिकार मताधिकार को फिर भी १०० रुपये के पत्ते और कुछ देशी-विदेशी शराबके पोलिथिन में इनके हाथों गिरवी रख देते हैं हर पाँच वर्षो में! किसको दोषी मानें? खुदको या खुदकी किस्मतको? वो तो ईस्ट ईण्डिया कंपनी की तरह हमारे ही संपत्ति छीनकर हमहीं पर राज करते हैं। आमजनोंकी जागृति इतना नीचे क्यों?

हरिः हरः!

**

तर्क आ रामायण

तुलसीदासजी मंगलाचरण लिखबाक क्रममें रामचरितमानसके बालकाण्डमें बेर-बेर उद्धृत केने छथि जे तर्क सँ रामके बुझब कठिन, भक्ति-भावना आ आस्था एकमात्र उपाय छैक जे सहज साधना सँ रामके पुरुषोत्तम कहेबाक अर्थ हमरा अहाँके बुझा सकैत अछि।

हरिः हरः!

**

३ नवम्बर २०१२

भगवतीकेर विसर्जन काल एक अलगे गमगीन दृश्यके निर्माण होइछ लेकिन ताहू घड़ी आजुक युवा-किशोर नवतुरिया सभ अबीर लगाय आ विभिन्न तरहक ढाक-चुक म्युजिक लगाय नाचयके परंपरा शुरु केलाह अछि जे सचमें मन के आहत कय देलक एहि बेर आ प्रण लेलहुँ जे अगिला वर्ष पुनः एहि समयक योजना पूर्वहि तैयार करैत किछु नव प्रयोगके आगाज जरुर करब! युवा सभके सेहो संतुलित रखबाक छैक आ समयोचित कार्य सेहो करबाक छैक। हरिः हरः!

**

Dr. Dhanakar Thakur ke yadi aajuk Mithilak Gandhi kahal jaay ta galat nahi hoyat, ona o swayam Gandhi Jee ke samarthak nahi chhathi. Lekin Gandhi jena satyavaadi aa karmath jarur chhathi. Gandhi Jee ke jeevan sa ena bharakal kiyaik rahait chhathi se nahi jaani.  Harih Harah!!

**

हमर एहि बेरक गामक अनुभव बहुत सार्थक आ सकारात्मक रहल आ मिथिला निर्माण प्रति देखल सपना अवश्य साकार होयत से आत्मविश्वास जागल। युवा प्रति जे उदासीनता प्रवेश कय गेल छल तेकरा सेहो समुचित समाधान कय सकलहुँ, आ महसूस कयलहुँ जे डा. धनाकर ठाकुर एवं अन्य मैथिल अभियानी जेना यदि समुचित समय दैत मिथिलाक परिचय, इतिहास, समृद्धिपूर्ण पहचान आ ताहि संग कैल जा रहल भेदभाव पर यदि युवावर्गकेँ संग अन्तरक्रिया कैल जाय तऽ जागृति जल्दी पसरत आ जखनहि सिंहक बच्चा जागि जायत तऽ माय-बाप जे मैथिली-मिथिला बिसैर गेल छथि हुनको सभके जागय पड़बे करतन्हि। हलाँकि गरीबी के झमारल मिथिलावासी पेट काटि के एक युग बितौलाह छथि, तखन जाय आइ हिनक धियापुता नहि मिथिला तऽ प्रवासी-परदेशी बनितो पुनः अपन आर्थिक संतुलन बना सकल छथि, आ एहि युगीन परिवर्तन के क्रममें मिथिला-मैथिलीके पहचान संग दूर होयबाक प्राकृतिक कारण के नकारल नहि जा सकैत छैक। एहि महत्त्वपूर्ण सत्यके हम आत्मसात करैत आगां लेल आब यैह निर्णय कय रहल छी जे एको क्षणके समय यदि बचय तऽ युवा-समाज संग अन्तरक्रियामें लगानी करब। संगहि हमर हार्दिक निवेदन ओ समस्त मैथिली-मिथिला प्रति सोच आ विचार संग कार्य करनिहार के जे बेसी सऽ बेसी युवा समाज के जागृति दीस ध्यान दैथ।

एहि बेर विराटनगरमें २८-२९ दिसम्बर, २०१२ के ‘विद्यापति स्मृति पर्व समारोह – २०६९’ मनेबाक नियार भेल अछि। हमर ध्यान एहि कार्यक्रममें सेहो युवा-जागृति तरफ रहत। हलांकि एक निश्चित प्रारूप संग हर वर्ष मनायल जायवाला एहि कार्यक्रममें सांस्कृतिक झाँकी, विद्यापतिजी केर श्रद्धाञ्जली सुमन अर्पण, उद्घाटन समारोह, कवि गोष्ठी, बाल-बालिका कार्यक्रम केर संग रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं नाटक के होयत मुदा थीम युवा जागृति रहत से हमर पूरा प्रयास रहत। नेपालमें मैथिल अभियानीकेँ एक मंचपर लाबय लेल सेहो हमरा लोकनिक प्रयास रहत। विद्वान्, राजनीतिकर्मी एवं समाजसेवीके संग साहित्यसेवी सभकेँ विद्यापति स्मृति समारोह होइक से पूरा प्रयास होयत।

हरि: हर:!

**

४ नवम्बर २०१२

अध्ययन लेल सेहो अपन-अपन रुचि त्रिगुणात्मक प्रकृति द्वारा तय होइत छैक। लेकिन एक बात तय छैक जे निर्णय वैह कायम रहैत छैक एहि संसारमें जे बाहुल्यता के मान्य हो।

देवता पूजन (यज्ञ वा हवन) आ पितर कर्म के संस्कार जे कर्मकाण्ड के प्रेरणा छैक तेकर विरोध आइ सऽ नहि बहुत पूर्वहि सऽ करनिहार करैत आयल छथि, तदापि माननिहार लेल ई कायम छैक, आ रहबो करतैक।

श्रीराम पुरुषोत्तम छथि आ रहबे करता, प्रश्न करनिहार हुनक छुपिके बालिके मारब आ सियाजीके परित्याग पर प्रश्न उठबिते रहता। ई कोनो आइये भेलैक से नहि छैक। आलोचक वर्ग लेल एक सूझ छैक, लेखक वर्ग लेल एक। लेखक बेसी धन्यवाद पबैत अछि कारण आलोचकवर्ग ओकर लिखला ऊपर टिप्पणी करैत छथि, लिखैत कम छथि। 

असलियत हमर हो वा अहाँके, ओ बाहर जल्दिये स्पष्ट होइत छैक। छुपेला सऽ भितरका स्याह छुपैत नहि छैक, ओ बहरा जाइत छैक। ढकोसला आ आडंबर क्षणिक कहल गेल छैक। एतेक तक कि मानव जीवनमें सेहो जन्म भेला संग मृत्यु तय भऽ जाइत छैक। अर्थात्‌ जन्मके माने अन्तिम सत्य मृत्यु संग जोड़ब स्वतः समझ थिकैक।

एहि बीच हम सभ झूला झूली वा तैर जाय, ई समस्त बात के ठेका स्वयं लेल मात्र स्वयंके हाथमें अछि। परमात्मा कदापि नहि औता एहि स्थूल आँखिक सोझाँ जे बौआ अहाँ आत्मा छी, हमरहि अंश छी, अहाँ एना करू वा ओना करू तऽ तैर जायब, जीवन सफल भऽ जायत… एहि लेल ओ अपन सिद्धान्तके प्रतिपादन श्रेष्ठजन द्वारा कराबैत आयल छथि, मानू तऽ देव नहि तऽ पत्थर!

हरिः हरः!

**

५ नवम्बर २०१२

कोढिया

बड देखावटी छलैक, लेकिन कर्म बेर में पछुवैत भगैत छल। कहैत छलैक जे एहेन जरुरी काज पड़ि गेल जे २ महीना के लेल हमरा ओहि तरफ ध्यान लगाबय पड़ल। गाम-समाजके लोक में एक नव आशा जगैत छलैक जे आबो कम से कम ई २ महीना ओम्हर ध्यान देलक तऽ कोनो कार्य में सफल होयत; मुदा आशा के बिपरीत परिणाम अयला पर कोढिया दोसर कहानी बना लैत छल। एहेन सिलसिला कतेक दिन सँ चलैत रहलैक। अन्ततोगत्त्वा कोढियाके सेहो अपनहि कैल सँ घृणा होवय लागल छलैक। ओकरा परैय लेल बाट नहि सुझैत छलैक। ओ कतेको पैंतरा बदलि चुकल छल। जखनहि घर सऽ बाहर निकलैत तखनहि जोर-जोर सँ चिकरैत लोक सभके गरियाबैत जे एना नहि एना हेबाक चाही, फल्लां सिद्धान्त गलत अछि, ओ मान्यता अहाँ सभ गलतीमें स्वीकार केलहुँ, एकरा एना कैल जाय, ओकरा ओना कैल जाय… लोक सभ जोर सऽ बजनिहार दिस एक बेर तऽ जरुर तकैत छैक से कोढियाके बाजब सुनि सभ एक बेर जरुर सुनि लैत छल। किछु सम्भ्रान्त अभिभावक ओकरा बुझबय के प्रयास सेहो करैथ… लेकिन कोढिया अपनहि धून में नहि जानि अपन कमजोरी झांपय लेल आ दुनियामें अपन खोखला अहमियतके प्रमाणित करय लेल पूरजोर प्रयास करैत रहल छल। आनके जोर सऽ बाजि के वा हाथ-मुक्का चमकाय कोढिया डेरबयमें सेहो सफल भऽ जाइत छल, किछु दिन सेहो सभ पैंतरा खूब केलक कोढिया। मुदा फेरो ओकरा अपनहि भीतर सन्तुष्टि नहि होइत छलैक आ खोखलापनके शिकार कोढिया पुनः योग, ध्यान आ नहि जानि कि-कि नहि केलक, लेकिन कोढिपन एहेन रोग थिकैक जेकर इलाज बिना कर्म केने संभव नहि छैक। कतबो तपस्या कय लेब, यज्ञ आ हवन नहि होयत तऽ प्रसाद बनब कठिन छैक। अतः कोढिया परेशान छल जे भाइ जीवनक एतेक रास बसन्त तऽ कोढिपनीमें बीतल, आबो कोनो उपाय लागैत जे प्राण जोगेबाक बाट भेटैत। आत्माके धिक्कार कोढियाक उपाय बतबैत छल, कोढिया ताहि अनुरूपे कार्य करैक प्रयास करय लागल। क्रमश: ओकरामें परिवर्तन आबय लगलैक। लेकिन ताबत ओ बूढ भऽ गेल छल। बियाहदान नहि भेलैक। पुन: कोढियापर एक न एक जुवाइर नित्य चढय लगलैक। दोसराक गृहस्थी देखि मन विचलित होवय लगलैक। लेकिन आब कोढिया काज करबा सऽ शारीरिक रूपे असमर्थ छल। नव-नव पैंतरा करैते बेचारा एक दिन औनाइत-पटपटाइत गुँह गिजैत दुनिया सँ चलि गेल।

कोढिपन बड खराब बीमारी होइत छैक। आजुक युवामें एहि रोग के प्रवेश पर पाबंदी जरुरी!

हरि: हर:!

**

प्रेरणा

ओहि गाम सँ प्रेरणा सभके लेबाक चाही जाहि ठाम उत्साही युवा आ प्रौढ समाज संग अवकाश प्राप्त कर्मठ लोक-समाज एकजूट बनैत विकास लेल तरह-तरहके कार्यक्रम करैत छथि। सामूहिक पूजा समारोह हो या नवाह संकीर्तन या सांस्कृतिक कार्यक्रम वा कोनो भी तरहक सार्वजनिक कार्यक्रम जेकर मानांक समाजक हरेक वर्ग लेल होइक आ समग्रमें विकास मात्र लक्ष्य होइक; एहि सभके चर्चा खुलिके फेसबुक समान मिडियापर कैल जाय जाहि सँ प्रेरणाक नवधारा सभ लग पहुँचय जे फेसबुक पर सक्रिय छथि आ गाम-समाज-मिथिला विकास लेल सोचैत छथि, विशेषतः आजुक युवा।

एहि प्रेरणाक किछु उदाहरण हम एना देब:

सनत कुमार झा, ग्राम: चैनपुर (सहरसा) विगत किछु समय सँ गामक विकास लेल दीपनारायणजी संग मिलिके योजना बना रहल छलाह, संजयजी, श्यामल सुमनजी आ एक सऽ एक विद्वान्‌— -विज्ञजनके गाम चैनपुरक अनेको लोक हुनका सभकेँ एहि लेल उत्साहवर्धन आ सहयोग हेतु वचन दऽ रहल छलखिन। ताहि बीच एक युवा किशोर ठाकुर सेहो एक नव प्रस्ताव रखला जे गामक विकास लेल एहि बेर ‘मैराथन’ कार्यक्रम गाम में राखल जाय आ ओ सभ एक स्वरमें सहमति दैत आब १३ तारीख के ९.३० बजे सँ मैराथन कार्यक्रम के जोर-शोर सँ तैयारी केने छथि। हमहुँ-अहाँ एहिमें सहभागी भऽ सकैत छी।

श्री यज्ञी मिश्र (वरिष्ठ समाजसेवी), ग्राम: चकौती जिनक अध्यक्षतामें दुर्गा पूजा समिति चलैत अछि आ समस्त ग्रामक एकजूट प्रयास व सहयोग संग मन्दिर निर्माण कार्य निष्पादित कैल गेल अछि। भगवतीके मन्दिरके डिजाइन आ संरचना स्वतः बजैत अछि जे गामक लोकमें कतेक स्फुरणा आ विकास प्रति संवेदनशीलता अछि। हमरा विश्वास अछि जे एहि गामके लोक में कदापि विपन्नताक प्रवेश नहि भऽ सकैत छैक। यदि मिथिला सनातनकालीन अछि तऽ यैह तरहक त्यागपूर्ण कीर्तिके कारण! ओना प्रेरणाक स्रोतमें युवाशक्तिके भूमिका काफी सकारात्मक देखलहुँ। आपसी सहमेलता आरो पसिन्न पड़ल। विनोद कुमार झा जे श्री देवचन्द्र झा ‘मेजर साहेब’क पुत्र छथि हुनकर क्रियाशीलता मनके छूबि गेल। अपना द्वारा पुरखाक एक पुरान परंपरा जे समूचा पतरा के ‘एक झलकमें पंडित’ शीर्षक सँ प्रकाशित करबैत आयल छथि तेकर प्रकाशन २१ वर्ष एहि बेर भेल आ मेलामें आयल हजारों आदमीकेँ एक-एक प्रति दैत छथि, मन भाव-विभोर बनि गेल। नमन अछि इ लगन के! तहिना हम अहाँ फेसबुक पर जनैत छी भास्कर वत्स के – मुंबईमें प्राइवेट नौकरी करैत छथि लेकिन गामक संस्थाक विकास लेल १० दिनक छूट्टीके बखूबी उपयोग करैत छथि। सौभाग्यशाली छथि चकौतीवासी जतय अनुभवी आ अत्यन्त शालीन अभिभावक जेना श्री शुभचन्द्र झा जे मैथिली-मिथिलाक आन्दोलन अपन दिल्ली प्रवासमें रहितो निरंतर केने छलाह अखिल भारतीय मिथिला संघक अध्यक्षता कयके; तहिना श्री देवचन्द्र झा ‘मेजर साहेब’, श्री राज कुमार ठाकुर, श्री गिरिजानन्द मिश्र, श्री देवेन्द्र कुमार झा, एवं अनेको गणमान्य केँ शुभ संरक्षण प्राप्त छन्हि। प्रेरणाक बहुत पैघ उदाहरण बुझायल चकौती!

डा. शेखर चन्द्र मिश्र, ग्राम: सौराठ – एसगर लड़ैत-जुझैत सौराठ सभाके जियाबयवाला लोक! गाममें सेहो केओ सार्थक समर्थक नहि, कतेको लोक बताह बुझैत छथि हिनका जे बेकार में मरल संस्थामें नव-प्राण फूकय लेल शेखर बौआयल छथि… लेकिन कुल आ शील के असर हिनका पर हावी अछि; नाना तरहक नकारात्मकताके बावजूद हिनकर लगन हमरा लेल प्रेरणा के पैघ स्रोत अछि। एहि बेर हिनकर सौराठमें निवासक आगू जे फूलबारी देखल ओ गामक संस्कृतिमें शहरक संस्कृतिक फ्युजन सऽ अनुपम-अपूर्व सुन्दर लागल। नित्य खुरपी आ पानि पटाबयवाला पाइपक संग भोर करैत छथि आ दू घन्टा केवल बगियाक सुन्दरतामें देब हिनक दैनिकी बुझायल। बिना मेहनतके भौतिक सुन्दरता नहि निर्वाह भऽ सकैत छैक। काश! यदि सभक सहयोग भेटैत तऽ ई अवश्य सौराठ सभागाछीके अपूर्व सुन्दर बना देने रहितैथ, कम से कम लोक आबो सजग होय आ सभागाछीके चारूकात बाउण्ड्री-वालके संग अन्दरमें सतहीकरण आ छोट-छोट कॅटेज निर्माण करबैत एक कंप्युटरीकृत पंजीकार कार्यालयके संग एक पूर्व स्मृतिक जोगाबयवाला म्युजियम बनैक; दहेज मुक्त मिथिलाक तरफ सँ हमर वचन देल अछि एहि लेल। माधवेश्वरनाथ महादेव मन्दिरके जीर्णोद्धार हेतु आवाज उठायल तऽ बिहार सरकारक पर्यटन समिति अन्तर्गत योजना पास कयल गेल, काज आइ धरि शुरु नहि भेल मुदा। आब ऐतिहासिक सौराठ सभाक पंजियन पूरा कराओल गेल अछि, देखी एकर केहेन लाभ भेटैत छैक।

क्रमश:

हरि: हर:!

**

६ नवम्बर २०१२

ऐसे दिलको जब-तब मत रुलाओ दोस्तो!
यह तो रोता केवल असत्यकी कहर देखकर!

संभालो ‘मन’को क्यों ये उछलता इतना
इसके गुण हैं तीन, तामश जहर घोलकर!

कर न लो कुछ अन्तर-खोज खुदमें
किये क्या-क्या हो क्या-क्या बोलकर!

अपनी बदी कुछ दिखते नहीं हमें
दूसरे की फटी बस कुछ यूँ सूझकर!

अजी! वो हममें, वो तुममें, वही सबमें
स्थूल नहीं पर मर्म और दया बनकर!

हरि: हर:!

**

Friends from Biratnagar!

Your attention is invited to a meeting called by Maithili Sewa Samiti for celebrating 2-day program of Vidyapati Smriti Parva Samaroh 2069 in Biratnagar on Poush 13-14, 2069 (December 28-29, 2012). The venue of meeting is Shri Ram Janaki Temple, it would start at 3pm.

Regards,

Pravin (GS, Maithili Sewa Samiti, Biratnagar).
Navin Karna Priyanka Yadav Dimple Dev Ram Chandra Mahto Sachin Kumar Paswan Niranjan MallickPurushotam Mallick Sanjay Kumar Deo Sanjay KarnSanjay Roy

**

समारोह मनेबाक मूल उद्देश्य जे युवा पीढीमें मैथिली भाषा व मिथिला संस्कृतिके संरक्षण लेल उत्साह सृजन हो! विराटनगरमें प्रत्येक वर्ष मनायल जा रहल विद्यापति स्मृति पर्व समारोह द्वारा समूचा राष्ट्रमें आ भारतमें सेहो मैथिली-मिथिला प्रति जाजरुकताक एक फहराइत झंडा पठाओल जायत अछि। आउ, आइ पुनः बैसार करी जे आखिर एहि बेर कोन तरहक समाद संग ओ झंडा समस्त जगत्‌में मैथिल पठौता। समय ३ बजे सँ श्रीरामजानकी मन्दिरक परिसरमें एहि बैसार में बृहत बहस होयत आ संगहि एक कार्यसमितिक निर्माण कैल जायत। एहि बेर हमर विचारमें केवल युवा ऊपर भार देल जाय आ संरक्षक वर्ग एहि में अपन पूर्ववत्‌ सक्रिय सहयोग बरकरार राखैथ।

हरिः हरः!

**

विद्यापति स्मृति पर्व समारोह २०६९ (प्रस्तावना)

महानुभाव एवं सुधिजन! समस्त मैथिलकेँ अभिनन्दन आ आजुक एहि बैसारमें स्वागत करैत ‘विद्यापति स्मृति पर्व समारोह – २०६९’ के प्रस्तावना अग्रसारित कय रहल छी। एहि पर अपन अनुमति प्रदान करबाक संग-संग पैछला वर्षक समारोह केर कमी-कमजोरी-गलती-त्रुटि आदिके समीक्षा करैत पुनः एक मजबूत आ सशक्त कार्यक्रम करबाक लेल एकजुटताक आह्वान करैत छी।

विराटनगरमें मैथिली सेवा समिति अपन स्थापना काल २०४८ वर्षहि सऽ प्रत्येक वर्ष ई समारोह मनबैत आयल अछि। विगत दुइ वर्ष सँ एहि समारोहके राष्ट्रीय पर्वके स्वरूपमें ढालबाक विराटनगरक समाज के प्रयास के शब्द में प्रशंसा कि करू, ई एतबा अवर्णनीय अछि जे आजुक बदलैत नेपालकेर परिवेशमें मैथिली संग उपेक्षा पर स्वस्फूर्त कुठाराघात करैत अछि आ संवैधानिक पदके उच्चस्थ आ महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्वकेँ एवं हुनका लोकनिकेर मार्फत समस्त विधायिकाके प्रत्यक्ष रूपमें संवाद पठा रहल अछि जे उपेक्षा घोर निन्दनीय अछि एवं एकर हंटायब शीघ्र प्रभावसँ जरुरी अछि जाहि सँ मैथिली एवं मिथिला संस्कृति ऊपर सँ ग्रहण हंटि सकत। यदि २०६७ के समारोहमें तत्कालीन कार्यवाहक प्रधानमंत्री विजय कुमार गच्छदारजी आबि अपन उद्गार प्रकट करैत मैथिली-मिथिलाक संस्कृति नेपालक समग्र विकास लेल अग्रगामी भूमिका निर्वाह करैत आयल अछि आ आगुओ मैथिलसँ बहुत अपेक्छा समूचा राष्ट्रके छैक, नेतृत्ववर्गकेँ बौद्धिक सहयोग करनिहार वर्ग मैथिल संग सहकार्य पर जोर देने छलाह आ हर तरहक सहयोग करबाक वचन देने छलाह, तहिना २०६८ के समारोह में देशक उपराष्ट्रपति महामहिम परमानन्द झा आबि एहि मंचसँ मैथिलीके रजनी-सजनीक भाषा सँ ऊपर उठि समग्र विकास लेल मैथिलहिके प्रयास मूलरूपमें जरुरी अछि आ मैथिलीक घरहिमें उपेक्षाके कारण जे खतरा अछि ताहि में सुधार लाबय लेल मैथिलीकेँ सम्पन्न भाषाक रूपमें विकास करबाक आह्वान कयने छलाह। मैथिलीमें समाचार पढी आ सुनी, मैथिलीमें शिक्षा प्राप्त करी-करबाबी, मैथिली लेल संघर्ष करैत संवैधानिक अधिकार सम्पन्न बनी, मिथिलाक विलोपान्मुख संस्कृतिके संरक्षण हेतु एहेन समारोह आयोजित करी जे अपन पारंपरिक महत्त्वके प्रकाशित राखय। अपन भाषा संग अपनहि सौतिया-डाह नहि राखी। एहि तरहें अपन आत्मनिरीक्षण द्वारा मिथिलत्त्वक रक्षा पर जोर देने रहथि महामहिम जी। विराटनगरक ई सौभाग्य कहि सकैत छी जे एक विद्वान्‌के स्मृति दिवस मनाबय लेल सैकड़ो विद्वान्‌ कवि व नेतृत्वकर्ता नहि केवल नेपाल सँ बल्कि भारतक मिथिला सँ एक मंचपर अबैत छथि। सुप्रसिद्ध कलाकार अपन विख्यात कला सँ आम जनमानसमें अपन भाषा व संस्कुति प्रति आकर्षण उत्पन्न करैत छथि। जाति-पाँति सऽ बहुत ऊपर जाय केवल मैथिलीभाषी-मिथिलावासीके रूपमें एहि समारोहक एक-दू नहि बल्कि अनेको गुण गानल जा सकैत छैक। आइ एना बुझा रहल अछि जे ई कार्यक्रम विराटनगरक एक अभिन्न अंग बनि गेल हो। नहि केवल मैथिल बल्कि समस्त मधेसी-पहाड़ी-आदिवासी-जनजाति-दलित व समस्त समाज एहि कार्यक्रमके खुलल हृदय सँ सराहना करैत छथि।

आउ, आब चर्चा करी जे एहि बेरक कार्यक्रम हम सभ कोना मनायब।

हरि: हर:!

**
प्रसन्नता संग सूचित करय चाहब जे आइ लगभग ३ घंटा धरि मैथिल समाज के अनेको लोक मैथिली सेवा समिति द्वारा बजायल गेल ‘विद्यापति स्मृति पर्व समारोह – २०६९’ मनेबाक लेल बैसारमें सहभागी भेलाह आ कार्यक्रम के तिथि २८-२९ दिसम्बर, २०१२ स्थान विरेन्द्र सभागृह, विराटनगरमें करब तय कैल गेल। कार्यक्रममें सांस्कृतिक झांकी-प्रदर्शनी प्रभात फेरीक रूपमें कार्यक्रम स्थल सऽ शुरु करैत नगर परिक्रमा करैत विद्यापति स्मारक – त्रिमुर्ति चौक पर जाय विद्यापति जी केर मुर्तिपर श्रद्धाञ्जलि सुमन अर्पित करैत पुनः नगरके दोसर भाग सऽ कार्यक्रम स्थल पर आबि प्रमुख अतिथि (नाम तय करबा लेल बाकी) द्वारा कार्यक्रमके उद्‌घाटन संग-संग नेपालमें मैथिली-मिथिलाक संवैधानिक अधिकार विषय ऊपर विचार गोष्ठी करैत कवि गोष्ठी एवं मैथिली नाटक संग प्रथम दिवस के कार्यक्रम समापन कैल जायत। प्रथम दिवस प्रमुख अतिथि द्वारा समाज के विभिन्न क्षेत्र में योगदान देनिहार विभिन्न मैथिलकेँ सम्मानित करबाक कार्यक्रम राखल गेल अछि। दोसर दिन पूर्वहि के भाँति बाल-बालिका द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम सँ शुरुआत करैत विभिन्न तरहक रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम, मैथिली नाटक, हास्य एवं झांकी प्रस्तुति संग पारंपरिक नृत्य आदिके कार्यक्रम कैल जायत।

समारोह कार्यक्रमके सफलता पूर्वक संचालन हेतु एक मूल समितिमें विराटनगरक २२गो वार्ड में प्रत्येक सँ ११-सदस्यीय समिति बनबैत सभक पूर्ण समावेशी व्यवस्था संग कार्यक्रममें एहि बेर केवल स्थानीय कलाकार, रंगकर्मी, चित्रकार व अन्यकेर सहभागिता सुनिश्चित कैल जायत। एहि कार्यक्रम लेल कुल दस लाख रुपया खर्चक अनुमान कैल गेल अछि। मूल समिति निर्माण उपरान्त समारोह हेतु कार्यसमिति, उपसमिति आदि निर्धारित कैल जायत।

आजुक बैसारमें ई. रमाकान्त झा, डा. नारायण कुमार, डा. शंभुनाथ झा, डा. सुरेन्द्र ना. मिश्र, ई. फूल कुमार देव, प्रसिद्ध चित्रकार एस. सी. सुमन, रामभजन कामत, रामचन्द्र महतो, राजेश दास, संजय कर्ण, कर्ण संजय, केशव कु. दास, पंकज मिश्र, दया सागर, जागेश्वर ठाकुर, राम भंडारी, जानुका पौडेल, भास्कर झा, डिम्पल देव, नवीन कर्ण, वसुन्धरा झा, राजेश झा, जितेन्द्र ठाकुर, दिलीप झा, कर्ण संजय, पप्पु साह, एवं अनेको अन्य सम्भ्रान्त गणमान्य सक्रिय मैथिलक सहभागिता रहल आ सभ पैछला कार्यक्रमके त्रुटि के एहि बेर सुधार करैत भव्यता संग कार्यक्रम करबाक लेल प्रतिबद्धता प्रकट कयलाह। कार्यक्रम के प्रारूप आ संयोजनके जिम्मेदारी निर्वहन लेल मैथिली सेवा समितिक महासचिवके रूपमें शुरुआती दौरमें हमरा द्वारा कैल गेल।

हरिः हरः!

**

७ नवम्बर २०१२

कौआ के कतबो प्रेम व सिनेह सऽ पोसबैक तखनहु ओकरा मौस खाय सऽ नहि रोकल जा सकैत छैक।

(रामचरितमानस सँ किछु बेहतर सीख)

तात्पर्य यैह जे दुष्टात्माके कतबो प्रेम व सिनेह देबैक ओहि सऽ ओकर प्राकृतिक द्रोही गुण समाप्त नहि होइत छैक।

हरि: हर:!

**

७ नवम्बर २०१२

काल्हि एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठल छलैक बैसारमें जे भैर साल में मैथिली सेवा समिति एक कार्यक्रम करैत अछि, ‘विद्यापति स्मृति पर्व समारोह २०६८’; एहि सऽ मैथिल समाज केँ कि उपलब्धि भेटैत छैक। आउ एहि प्रश्न पर अपन-अपन राय राखी।

कार्यक्रममें समस्त मैथिलक सहभागिताक संग सांस्कृतिक जागरण मूल विषय रहैत छैक। अपन भाषा, भेष आ संस्कृति प्रति लोकमें सजगता अपनयबाक संदेश रहैत छैक। संगहि इतिहास व वर्तमान बीच एक विशेष तादात्म्य रहैत छैक जेकर प्रभाव व प्रेरणा नव पीढीपर पड़ैत रहैत छैक। राजनीतिक परिदृश्य में सेहो क्षेत्रक महत्त्व केन्द्र तक पहुँचबाक बाट बनैत छैक। संसार भरिक संस्कृति संग आपसी अन्तरक्रिया करबाक आ एक-दोसर तक अपन विशिष्टता पहुँचेबाक सेहो सद्‌प्रयास रहैत छैक। सभ सऽ पैघ प्रभाव तऽ आम मैथिल पर यैह पड़ैत हम देखलियैक अछि जे मिथिलत्त्व के स्वयं मैथिल हीन-भावना सऽ ग्रसित भऽ परित्याग करैत छथि ताहि प्रति स्वतः जुड़ाव उत्पन्न होइत छैक आ अपन पहचान प्रति समर्थन व आकर्षण दुनू बढैत छैक। शहर-बाजारमें सेहो समारोह मनेबाक तऽ आरो सार्थकता एहेन देखलियैक अछि जे मिश्रित समाजमें मैथिल प्रति समर्थन दोसरो के मनमें बनैत छैक आ श्रद्धाभाव संग समाजिक सौहार्द्रता बनैत छैक। देखू! हम तऽ समारोह के पक्षधर लोक छी, हमरा अनेको फायदा मात्र बुझैत अछि। मौका जेना बुझैत अछि। हर बेर किछु न किछु नव प्रयोग करबाक अवसर समान बुझैत अछि। पैछला दू वर्ष यदि हमर ध्यान धियापु्तामें मैथिली आ मिथिलत्त्वक बीजारोपण रूपमें उपयोगिता पर रहल तऽ एहि बेर युवा कार्यकर्ता संग सहकार्य पर जोर रहत जाहि सऽ दू पीढीके बीच एक कार्य-समन्वय स्थापित हो आ मैथिलमें सेहो युवा पीढी सजग होइथ। लेकिन हम कमजोर विन्दुके सेहो मनन करैत आगू बढय लेल चाहैत छी। जेना काल्हिक मिटींगमें बहुतो एहेन विन्दुके सोझां राखल गेल छल। अवश्य ओहि कमजोरीकेँ दूर करबाक प्रयत्न हेबाक चाही।

संस्थागत कमी-कमजोरी सहित आरो विन्दुपर आम-चर्चा लेल ई पोस्ट एतय दऽ रहल छी। कृपया अपन विचार आ अनुभव जरुर राखी।

हरि: हर:!

**

८ नवम्बर २०१२

मिहिर झा महादेव एवं चन्दन झा जे सौराठ सभा सँ दहेज मु्क्त विवाह केलाह तिनकर सम्मान दहेज मुक्त मिथिलाक तरफसँ विद्यापति स्मृति पर्व समारोह २०६९, विराटनगर के मंचपर प्रमुख अतिथिक हाथे करेबाक नियार अछि। यैह मंच सँ सौराठ सभाक अनुपम व विशिष्ट वैवाहिक परंपरा पर एक डक्युमेन्ट्री प्रस्तुत करैत आम जनमानसमें विलोपान्मुख विशेषताक बचेबाक आह्वान कैल जायत आ दहेज मुक्त मिथिलाक तरफ सँ सभागाछी के चहारदिवारी व सतहीकरण कार्य करेबाक लेल कोष निर्माण कार्यक शुरुआत कैल जायत एहि लेल ऐतिहासिक सौराठ सभा समितिक सचिव डा. शेखरचन्द्र मिश्र संग वार्ता करैत एहि कार्यक्रममें सहभागी बनबाक लेल निवेदन कैल गेल। एकर अतिरिक्त आगामी समयमें जे मिथिला महोत्सव केर आयोजन सौराठ सभामें कैल जायत ताहू में प्रवासी-आप्रवासी समस्त मैथिलकेर सहयोग हेतु निवेदन कैल जायत व एहि कार्यक्रमकेर आयोजन ऐतिहासिक सौराठ सभा समिति द्वारा कला तथा संस्कृति मंत्रालय – बिहार केर सहयोगमें कैल जायत से जानकारी शेखर बाबु करौलनि। हरि: हर:!

**

एक सुन्दर सुगन्धित फूल अपन सुगन्ध एकरा तोड़यवाला हाथके सेहो सुवासित करैत अछि, आ सहजहि जे फूलके प्रेम संग अपन हाथमें राखैत छथि, तिनको! किछु तहिना संत-प्रकृतिके लोक अपन चाहनिहार आ नहि-चाहनिहार दुनू लेल एक समान प्रेम रखैत छथि।

ग्रह, औषधि, पाइन, हवा आ कपड़ा अन्य कोनो नीक व बेजाय पदार्थक संग मिलि नीक-बेजाय परिणाम निर्माण करैत अछि। जखन ई सभ कोनो नीक संग मिलैत अछि तऽ नीके परिणाम निर्माण करैत अछि, आ गलत संग गलते जे केकरो पसिन्न नहि पड़ैत अछि। लेकिन ई गूढ रहस्य केवल ज्ञानी आ विवेकीके जनतबमें रहैत अछि। जौँ पाइन चाउर संग मिलय तऽ भात बनैछ, लेकिन जहर संग मिलि विष बनैछ। स्वतः अनुमान लगायल जा सकैत छैक मिश्रण कोन नीक! जीवनक सिद्धान्तमें सेहो विवेक सँ लोक नीक आ बेजाय के निर्णय आत्म-स्वतंत्रता संग करैत अछि।

(श्रीरामचरितमानस सँ)!

हरिः हरः!

**

बिराट मैथिल नाट्य कला परिषद्‌ द्वारा आयोजित नाटक ‘आब कोना चलब’ केर ४५म बेर प्रदर्शन आइ आरोहण-गुरुकुल (विराटनगर) में सफलता पूर्वक कैल गेल। मूलतः नेपालमें विद्यमान राजनीतिक परिवर्तनके आम जनमानसपर पड़ल असरकेँ सजीव चित्रण करैत ई सड़क नाटकके मंचपर प्रदर्शन के पहिल प्रयोग छल। नेपाली आ मैथिली मिश्रित संवाद सँ नेपालमें विद्यमान अराजकपूर्ण राजनीतिक संकट आ परिवर्तनशील नेपालमें जातीय भेदभावके भुमड़ीमें फँसल अग्रगामी निकासके असर आम जनमानस कोना भोगि रहल अछि, कोन तरहें पहाड़ी-मधेसी के नाम पर, भाषा-भुषाके नामपर लोकमें आपसी अविश्वास बनल छैक तेकरा सभकेँ प्रभावी ढंग सऽ प्रस्तुत केने छल ई नाटक। एकर निर्देशन श्री राम भजन कामत द्वारा कैल गेल अछि। एक सशक्त कलाकार, रंगकर्मी, लेखक, निर्देशक आ नहि जानि कतेको गुण सँ सम्पन्न रामभजन के एहि प्रस्तुति लेल जतेक प्रशंसा कैल जाय से कम होयत। एहि में भाग लेनिहार हरेक कलाकार मांजल छलाह आ प्रस्तुतिके भव्यता के सराहना दर्शक मुक्तकंठ सँ कयलन्हि।

हरिः हरः!

**

९ नवम्बर २०१२

सूतक ताग सिबयवाला सुइया द्वारा बनायल गेल भूरके मुनैत छैक, एहि तरहें फाटल कपड़ा सियबाक कार्य में सहायक बनैत छैक। रुइया सँ तागक बनयबाक कार्यमें रुइयापर कतेको प्रकारके जुर्म कैल जाइत छैक, गाछसँ तोड़बाक सँ धुनाइ, बिनाइ, इत्यादि अनेको तरहक जुर्म! तखन फेर कपड़ा रूपमें तैयार होइछ जे कतेको तरहक गुप्तांग सभके झाँपय के काज करैत छैक। तहिना संतके प्रकृतिमें छैक जे सभ तरहक कष्ट सहियोके अपना आपके कष्टोमें रखने आनक छिद्रके झँपने रहय, आनक पापके झाँपय। यैह लेल हुनकर प्रशंसा सभ केओ करैत अछि।

– रामचरितमानस सँ!

हरिः हरः!

**

रामको पुरुषोत्तम देखनेवालेमें लोगोंकी अपनी बुद्धि व विवेक का उपयोग होता है। स्वभाव से वकील और तर्क देनेवाले प्रकृतिके स्वामी जेठमलानी रामके आदर्शवान्‌ चरित्र तथा राजधर्म निर्वाह करनेवाले प्रजाकी राजाके रूपमें कम बल्कि कलियुगी बीबीके पतिके रूपमें पत्नीको दुःख पहुँचानेवाला राम के रूपमें देखा, यह उनके प्राकृतिक गुणोंके आधार पर दिया गया उक्ति है। ऐसा पहले भी होते आया है। बहुतायत प्रश्न उठे हैं रामके लीलामयी जीवन पर, परन्तु मर्यादा पुरुषोत्तम भी उन्हें ही कहा गया है, हम इसे नहीं भूलते! हरिः हरः! (राम जेठमलानीक बयान पर बिबिसी समाचार पर ई प्रतिक्रिया)

**

कान-कनैठी दैत जखन तोरा हम पढेबौ बच्चा,
विचार-व्यवहारक सिखमें पाठ तखन तूँ सच्चा।

करमें जौं गृहकार्य मन से बनमें नंबर एक,

आदर्शक हर राह में भेटतौ सच संगी अनेक।

गुरु-द्रोह के बात हेतौ तऽ केओ नहि देतौ काज,

बहरी लोक झुकेने रहतौ मिट जेतौ मिथिला राज।

काँच करची टा लिबि सकै छै बुझे इ तू आइ,

पाकि जेमें तऽ कोनो शक्ति मोड़ि न सकतौ भाइ।

शिक्षा के तू मर्म बुझे मूढ चपाट लंपटबा,

मूरी गोंतने जुनि बैसे रे चेला हमर सिलठबा।

हरिः हरः!

**

१० नवम्बर २०१२

भाइ रे!! डरा रहल अछि चोर!!
कतबू देखय झूठ नौटंकी, मेघक घटा घनघोर,
मुदा बुझे जे सत्य इ छैक जे डरा रहल छौ चोर!!
भाइ रे!! डरा रहल अछि चोर!!

आरोपक अंबार लगौलक, उल्टहि चोर कोतवाल के डटलक,
मुदा नहि लागल ओर!
भाइ रे! डरा रहल अछि चोर!!

चन्दाके धन्धा कहि दमसल, भीखमंगा के संज्ञा देलक,
पर न डिगल मुँह मोर,
भाइ रे! डरा रहल अछि चोर!!

बाबु ओकर खुबे पढेलकै, एहि आशमें जे पाइ बड भेटत,
मुदा नहि छोड़बै पछोड़,
भाइ रे!! डरा रहल अछि चोर!!

सोचैत अछि जे भभकी सँ, धमकी सँ आ गुम्हरी सँ,
बन्द होयत ई घोष,
भाइ रे!! डरा रहल अछी चोर!!

जे किछु करब से शरण हुनक रहि, सभटा अगुवा हुनकहि पर छोड़ि,
लागी हुनकहि गोर,
भाइ रे!! डरा रहल अछि चोर!!

हरिः हरः!!

**

राजा पृथु ईशसँ ईशत्व व ईशहिके प्रशंसा सुनबाक लेल दस हजार अतिरिक्त कानके याचना कयलन्हि, इच्छा रखलन्हि; ठीक एकर बिपरीत बूड़ि बानुर बांगरके बूड़ित्व आ दोसराक बुराई सुनबाक लेल ततबे अतिरिक्त कानके इच्छा रहैत छैक।

(श्रीरामचरितमानसक सागरसँ चुनल मोती पर आधारित)

हरिः हरः!

**

‘को नहि जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो!’ – सन्दर्भ – ए – मिथिला पेन्टिंग बनाम मधुबनी पेन्टिंग!

मनन कीजिये! मधुबनी मिथिलाका हृदयस्थली है और जनकनन्दिनी सियाजी द्वारा गिरिजा पूजन स्थल भी आजके मधुबनी जिले में ही अवस्थित है। कभी दरभंगा जिलाका ही अंग होता रहा मधुबनी! उससे भी पूर्व मिथिला क्षेत्रमें क्या-क्या नाम रहा यह मुझे भी नहीं पता और न ही हमें किसी इतिहासमें इन चीजोंकी पढाई कराया गया, ना ही हम बचपन में इसकी जरुरत समझे। हमें क्या मतलब था… हम तो नादान बच्चे थे और हमारे विद्यालयमें बिहार टेक्स्टबुक कमिटीकी विभिन्न पुस्तकों जिसे बिहार राज्यके शैक्षणिक कमिटीके द्वारा निर्धारित किया गया रहा वही पढाया गया और हम केवल पढाईकी गुणस्तर और खुदमें आ रही प्रगति से ज्यादा चिन्तित रहे होंगे ऐसा अनुमान लगा सकते हैं। परन्तु इतना सब दिन से पता रहा कि मिथिला पेन्टिंग उसे कहते हैं जो हमारे यहाँ हरेक पूजा-पाठ व मांगलिक कार्यके अवसर पर अहिपन से लेकर कोहबर लिखाई, देव उठाउन एकादशीके अवसर पर ईश्वरके पदचाप भगवती घर से लेकर तुलसी चौड़े तककी, इत्यादिमें एक विशिष्ट पारंपरिक चित्रोंको बनाया जाता रहा है। बहुत सारे लोगोंके घरोंके बाहरी दिवालोंपर भी सजानेमें मिट्टी और रंग दोनोंसे ऐसे आकृति बनाये जाते रहे हैं जो शुभ व खुशहालीके संकेत माने जाते रहे हैं। आधुनिक समयमें इसका उपयोग पेन्टिंग के रूपमें मधुबनीसे तरक्की किया और आज भी यहाँ पर एक से एक जानेमाने कलाकार मिलते हैं। हाल ही में बिहार सरकार ने मधुबनी के सौराठमें ही मिथिला पेन्टिंग इन्स्टीच्युट स्थापित करनेकी बातें की है। फिर भी यदि किसी मिडियामें यह समाचार आये कि मधुबनी पेन्टिंग तो आप इसे क्या मानेंगे? केन्द्र सरकार व बिहार सरकार में मिथिला नाम का डर? या फिर मिडियाकी भूल? बस खुद सोच लें। मिथिला विशालता का दूसरा नाम है। सीताजी यहीं जन्म लेकर इसे ऐसा अमरत्त्व प्रदान करीं जिसे अब किसी भी तरहका उपद्रव नहीं मिटा सकता।

हरि: हर:!

**

प्रिय अनुज!

हमरा केओ धोखा नहि देलक आ नहि हम केकरो धोखा देलियैक। ई सहजहि बुझल बात थिकैक जे हमर ओकर प्रकृति अपन सहज गुण के चलते कदापि मिलि नहि सकल। कोनो पहिल एना भेलैक से बात नहि, एहि सऽ पूरबो कतेक अहिना नांगैर सुटकाय नुका चुकल अछि। केवल हवाबाजी सऽ केओ कतेक दिन केकरो बेवकूफ बना सकैत अछि। मर्दानगी ओ भेल जे अपन स्टैण्ड पर कायम रहय।

आदित्य, उदय, सचिन, नवीन व अजित! सुने! संगठन माने झूठ-मक्कारीके अड्डा नहि, आदर्श व सिद्धान्तकेर संकल्प होइत छैक। यदि तोरा सभमें तेहेन प्रतिबद्धता छौक तखनहि हमर या केकरो संग ग्रहण कय सकैत छें, अन्यथा एक समय पुन: एतौक जखन तूँ हमरा ऊपर आ हम तोरा ऊपर थाल-कादो फेकब आ फेर अपन बाट दिस देखब। कह तखन संगठन केहेन निर्माण हेतौक? मैथिली आ मिथिलाक संगठन अधिकांशतः आपसी ईरबाजीमें चौपट भऽ जाइत छौक। कर्मठ लोक यदि ५ गो संग छौक तेकरे चलतबे कार्य होइत रहलौक अछि आ आगुओ वैह कार्य करतौक। ओकर कि जे केवल गप मारनिहार छौक। बस कार्य करब सिखे! अपन लक्ष्य तय करे आ कार्य करे। संग केओ अबौक तऽ एक लाख आ नहि अबौक तऽ दस लाख! संग आबिके सहयोग कम आ दिमाग बेसी खाइत सेहो हमर किछु तीख अनुभव अछि। 

कार्य करबाक लेल व्यक्ति नहि, मुद्दा के लेल आगू बढबाक चाही। मुद्दा लेल बुद्धि नहि आदर्श व सिद्धान्तक संकल्प लेबाक चाही। 

शुभकामना छौक!

हरि: हर:!

**

मिथिला दर्शन व संसार के दर्शन करबाक लेल दृष्टि चाही। सामग्रीके कोनो कमी नहि छैक। दर्शन एक पर एक भेटत। लिंक दू छैक। 

https://www.facebook.com/PravinNarayanChoudhary – एहि पेज के लाइक कय आभारी बनाबी!

https://www.facebook.com/pravin.choudhary – एतय दोस्ती लेल जरुर अपन हाथ बढाबी, लेकिन सावधान! चैटिंग करय लेल नहि, मानव जीवनक गंभीरता बुझैत मानवताक धर्मकेर प्रसार लेल मात्र!

आगामी विद्यापति स्मृति पर्व समारोह २०६९ (विराटनगर)में दिसम्बर २८-२९, २०१२ सहभागी बनी आ दर्शन के अम्बार सऽ परिचित होइ। विश्वमें मिथिलाक संस्कृति किऐक सनातन छैक एकर परिचय एहि द्वि-दिवसीय कार्यक्रम में होयत से हमर वादा अछि।

हरि: हर:!

**

११ नवम्बर २०१२

Dharma Marga:

Today we have made ourselves too busy to care on religious values. It should be thus our attempt to talk over the piousness of religion and spread the message of love and brotherhood for all human beings.

We trust very strongly in ‘All Religions are Same!’ Sincerely we hate none but the talks which divide us.

Variation in religions must be omitted.

Complexes of any type must be given up.

Wisdom must be shared as service to mankind, share your beautiful thoughts with all and learn good from all.

ऐसा ह्रदय रखो, जो कभी कठोर नहीं होता और ऐसा स्वभाव जो कभी नहीं उकताता तथा ऐसा स्पर्श, जो कभी कष्ट नहीं पहुँचाता।

Dharmo Rakshati Rakshithaha

If you protect Dharma, Dharma will in turn protect you.

Please take an oath:
1. Love all, speak only truth.
2. Know your responsibility as a member here.
3. Never indulge in meaningless debates.
4. Learn to be a true devotee.
5. Share your views/opinion on topics of interest.

Wishes for true and worthy human life.

Link: https://www.facebook.com/groups/265996693436348/ (Newly launched on Facebook).

http://www.orkut.co.in/Main#Community?cmm=33078149(Treasure House on Orkut). 

Harih Harah!!

**

मित्रगण एवं समस्त फेसबुक द्वीपवासी लेल दीपावली केर हार्दिक मंगलमय शुभकामना!

मुदा हमर एक आत्मीय (आध्यात्मिक) चेतावनीक संग:

सिर्फ लक्ष्मी पूजन कयला सँ लक्ष्मीके प्रसन्नता भेटैत छन्हि आ भगवती ऊल्लू सवार आगमन करैत छथि, अर्थात्‌ अन्हरियाकाल व्याप्त भेल (गुप्त समय जखन मानव व अन्य पृथ्वीक जीव सभ सुप्तावस्थामें रहैत अछि) तखन हिनक सवारी आवागमन करैछ। केम्हर ढरब कतेक ढरब कि बरसात कय देब कोनो ठेगान नहि रहिजाइत छैक जेकर विद्यमान संसारमें अनेको उदाहरण देखय लेल भेटैत छैक।

मुदा जे ईश्वरक सद्‌भक्ति करैत शरणागत सेवक बनल रहैछ ततय स्वयं त्रिलोककेर स्वामी श्रीमन्नारायणकेर आविर्भाव होइछ, भगवती स्वतः ओतय एबे करैत छथि। बिना प्रभुजीक सेवाके भगवती कतय आ कतीकाल टिकती?

अतः शरणागतवत्सलके सेवामें सभ केओ रत रही, गरुड़पर भगवान्‌ विष्णु संग सवार मैया लक्ष्मी औती आ अहाँके कोनो तरहक कष्टके भक्तवत्सल प्रभु मेटा देता, स्वतः भगवतीके शक्ति हुनकहि संग कार्य करत। अगबे लक्ष्मीजी के पूजा करब ताहि सँ जरुर परहेज करब। 

हरिः हरः!

**

सज्जन आ दुर्जन दुनू संग भेंट कष्टदायक होइत छैक। पुछू कोना? संत (सज्जन) संग बिछुड़ैत काल अर्थात जखन वापस जाय लगैत छथि तऽ हृदय के बड वेदना झेलय पड़ैत छैक। मुदा असंत (दुर्जन) तऽ भेटैते कष्टक अनुभूति देनय शुरु कय दैछ। 

तुलसीदासजी एक उदाहरण सँ एना बुझबैत छथि: संतस्वरूप कमलक फूलकेर स्पर्ष सँ सुखक अनुभूति होइत छैक, ओहीठाम जलजीव जोंक के स्पर्शहि सऽ खून चूसनाइ कार्य प्रारम्भ भऽ जाइत छैक।

संसारमें कमल आ जोंक के भरमार छैक, जीवनकालमें दुनू संग भेटैत आगू बढैत रहब विवेकी के खूब नीक जेकां पता छैक। 

(श्रीरामचरितमानस पर आधारित)!

हरिः हरः!

**

फेसबुक के मानब तऽ भारतमें नरेन्द्र मोदी सन लोकप्रिय अन्य केओ दोसर नेता नहि। सोशियल मिडियापर किछु नेतृत्वकर्ता के सक्रिय देखि बहुतो जागरुक फेसबुक व अन्य सोशियल मिडिया यूजर शासन-प्रशासन-नेतृत्व-विकास आदिक बात जानकारी में रखैत छथि। नरेन्द्र मोदी, ममता बनर्जी, नितिश कुमार आ बहुतो एहेन नेतृत्वकर्ता भारत एवं विश्व परिप्रेक्ष्य मादे बहुतो बात अपन पेजसँ लिखैत रहैत छथि। नितीश कुमारजी जेना अपन पाकिस्तान यात्रा पर अपडेट लगेलाह छथि तऽ ममता बनर्जी अपन कोलकाता में फिल्म फेस्टिवल व प्रगतिके चर्चा कयलथि अछि, तहिना नरेन्द्र मोदी जी गुजरात के संग-संग अपन अलग-अलग संवाद सँ सभके ध्यानाकर्षण करैत रहैत छथि। हमर नजैर कम से कम एहि तिनू नेता पर जरुर रहैत अछि। हम देखलहुँ अछि जे एक मिनट में हिनकर कतेको बातके लाइक कयनिहार, कमेन्ट देनिहार आ शेयर करनिहार हिन्दुस्तान व विश्व समुदाय के अनेको लोक बनि जाइत छथि।

एहि आधार पर हम कहि सकैत छी जे भारतक अगिला प्रधानमंत्री के रूपमें नरेन्द्र मोदी के जोड़ी दोसर केओ नहि!

एक बात आरो कहब। बिकासशील मनुष्य के हिनकर पेज जरुर लाइक करबाक चाही आ विकास हेतु मानव जीवनके समर्पण लेल प्रेरणा प्राप्त करबाक अनुरोध करब।

जय मैथिली! जय मिथिला!

हरिः हरः!

**

मैथिल के हुंकार!

कहता छी हम बड़ बुधियार,
बाप हमर छथि जागीरदार!

हमर सभ किछु अछि बड़ नीक,
दुनियाके कय सकैछी ठीक!

भैया हमर तऽ पूछू नहि,
हाकीम बड़का दोसर नहि!

भौजी एलखिन मंत्रीके बेटी,
पैरवी हमर आ सोर्सक खेती!

काका हम बड़ होशियार,
मालिक बनल ओ गामक भंडार!

बाबा छलखिन तहसीलदार,
सभक छलखिन पालनहार!

खानदानी अंग्रेजक साझेदार,
सभपर पुरखे कऽ एकाधिकार

पुछबै बौआ तों कि छह?
झूकय नजैरि तुरतहि बेविचार!

बाप-दादाके बलपर फेरो,
फौदारी के भरय गुम्हार!

जाउ हे मैथिल! आबो सुधरू,
करइ छै मिथिला करुण पुकार!

कर्म बल आ तप बल फेरो,
जगबू जेना पूर्वाधार!

याज्ञवल्क्य ओ जनक बनू यौ,
त्यागि करू झूठक व्यवहार!

चरित्र सुधारू केवल अपन,
छोडि समूचा ई व्यभिचार!

हरि: हर:!

**

१२ नवम्बर २०१२

संसारमें दुष्टक पाप आ अत्याचार तथा गुणीके पुण्य – एहि दूवो के प्रकरण-कथा भरल पडल अछि ओहिना जेना कोनो अथाह समुद्र! हम सभ यैह दुनू के अध्ययन करैत नीक व बेजाय के निर्णय करैत धारण व परित्याग करैत छी।

हरि: हर:!!

(रामचरितमानस सँ)

Stories of sins and atrocities of evil minded and that of piousness of the noble minded are both like immeasurable (depthless) sea. By both these types of stories we recognize bad and good and only after knowing both these things we either conceive or abandon them.

Harih Harah!!

**

We are thankful to cooperation from all sides, especially to the respectable Principal Madam Kamala Kunwar of Arniko Boarding School, Biratnagar, Mr. Prakash Sir and the disciplined students who gave the guard of honor to the Honorable Chief Guest of Vidyapati Smriti Parva Samaroh 2068 His Excellency Vice Preside Parmanand Jha.

Let us hope that program this year would again have more thrilling moments to draw unforgettable mark of Maithili and Mithila.

Harih Harah!!

**

मिथिलामें पारंपरिक रूपसँ कतेको व्यवस्थापन एहेन रहलैक अछि जे आधुनिक तामझाम सऽ कोसो दूर| जेना ई देखियौक: आदरणीय प्रधानाध्यापक श्री देव सर अपन भातीजक मायके श्राद्धमें जेनरेटर के इन्तजाम रहितो पहिलुका करारा व्यवस्थापन के नहि त्यागलाह जेकर सुखद परिणाम भेलैक जे जेनरेटर लोड नहि उठा सकबाक कारण खराब भेला पर तुरन्त गोबरक गोइठा (हलांकि एहि तरहक गोइठाक नाम हमरा विस्मृति भऽ रहल अछि एखन) ऊपर मटिया तेल ढारि ओहिमें धधरा पजैर देल गेलैक जकर रोशनीमें भोजैत भोज आरामसँ खेलाह।

कहबाक तात्पर्य जे पुरान लोक के सोच आधुनिकताक आडंबर सँ दूर सहज आ सुन्दर छलैक जेना हमरा बुझैत अछि।

काल्हि दीपावलीपर ऊक फेरबाक अछि लेकिन शहरमें ई इन्तजाम कोना होयत ताहि लेल आइये सऽ चिन्ता अछि।

हरि: हर:!

**

मिथिला राज्य नहि बनला सँ मैथिलक संस्कृति खतरामें कहब तऽ अतिश्योक्ति नहि होयत। असगर सीता मैया आ रामचन्द्रजीके खातिर आखिर मिथिला सनातन बनि गेल अछि, लेकिन लोक संस्कृतिके बचेबाक लेल राज्य-निर्माण जरुरी अछि। बिहार संग रहैत मिथिलाक कल्याण नहि होयत से बिहार गीतहि सऽ प्रमाणित भऽ चुकल अछि। एकजुट बनैत मिथिला राज्य निर्माण लेल काज करू! हरि: हर:!!

**

१३ नवम्बर २०१२

Rakhi ek adaakaaraa hai aur corrupt politicians se kahi jyada behatar hai. Wo to apane sharir aur sundartaa ko bajaar me utaarti hai, par ye beimaan netagan to apane maatribhumi ko black money ke liye nilaam karate hai. Aur Arvind Kejriwal jo aam jano ko inke ye kaali karatute jan-jan ke kaan tak pahuchaate hai to unhe Rakhi Sawant se tulna karke unhone sidhe taur par ek adaakaaraa naari ki satitwa par hamala kiya hai. Hame Hindu darshan me dekhne ko miltaa hai ki veshyaa ka bhi kitna ijjat kiya jata jab unake kothi ke mitti ke wagair aaj bhi Bengal me Devi Pratima nirmaan nahi hota. Hoshiyaar gaddaar aur desh bechnewaale netaa! Aurat ki shakti ko tumne lalkaaraa hai to iskaa bhugtaan to bhugatnaa hi hogaa. Harih Harah!!

**

एक सुन्दर नारी जेकर मुख चन्द्रमा समान दमकैत अछि आ सभ तरहक श्रृंगार व आभूषणसँ विभूषित अछि लेकिन बिना पहिरन (पोशाक)के ओ ओहिना कुरूप लगैछ जेना केकरहु प्रभुजीक नाम बिना कोनो बात नीक नहि लगैछ। 

(रामचरितमानस सँ)

हरि: हर:!

**

ऊकक संरचना देखैत छी, ओकर देहके बीच पटुआ के संठी, खड़्ह सन खह-खह जड़यवाला माँस, हाथ, मुँह, खड़हिके रस्सीसँ गसल तन-बदन, (साँझ तक फोटो सहित मैसेज शेयर करबैन), आ एना मानू जेना कोनो मानव-शरीर जे प्रतीकात्मक प्रस्तुति कय रहल हो दरिद्रीके, जे हिन्दू धर्मकेर दर्शन कि शरीरके कोनो मोल नहि छैक आ शरीरसँ बड पैघ आसक्ति उत्पन्न नहि करू – ताहि तरहक सोचके दरिद्री कहैत कर्मकाण्डक प्रस्तुति ऊकाबाती जरेबाक मादे यैह कहि रहल अछि जे दरिद्रीके जराउ आ आध्यात्मिक आत्मचिन्तन समान समृद्धि प्राप्त करबाक लेल देवीक महालक्ष्मी रूप केर आराधना करू। एहि चतुर्मासमें अनेको पावैन के लगभग यैह संदेश छैक जे आध्यात्मिक समृद्धि लेल समुचित साधना करैत मानव-जीवन के सफल करू। ताहू में मिथिलाधाम में जन्म भेल जे तांत्रिक भूमि, अर्थात्‌ श्रीतंत्रक एक प्रत्यक्ष अंश थीक, ओहिठामक समस्त परंपरा केँ मूलरूपमें आत्मसात्‌ करी – यैह होयत असल समृद्धि, दियाबाती जरबैत अन्धकारसँ परिछिप्त बुद्धिकेँ जागृति लेल प्रतीकात्मक पावैनरूपी साधना थीक, जाहिमें समस्त परिवार एकत्रित होइत एक संग एक दिवस ईश्वर प्रति समर्पित करी। जीवनके हर क्षण महत्त्वपूर्ण छैक, लेकिन विशिष्ट क्षण के विशेष महत्त्व छैक। हरिः हरः!
**

दरिद्रा के ऊक रूप
जराय देलहुँ फेक
लयलहुँ वापस
ऊक जराठीक एक
पीटथिन मैडम सूप
सुतली राइत
घरक चारू कात 
घूमैत जेती बजैत
‘अन्न-धन लक्ष्मी
घर आउ’
दरिद्रा
बाहर जाउ!
दिवाली सेहो गेल,
एहि बेर!

हरिः हरः!

**

१४ नवम्बर २०१२

केन्हा कृष्णा केना

गोवर्धन बाबु के तीन बालक आ तिनू तीन अलग जगह पर कार्यरत छल। बड़का के मास्टरीमें नोकरी लागि गेल छलैक आ गामके बगले लगभग दस किलोमीटर पश्चिम ओकर कार्य-स्थल रहितो घरवालीके दबावमें बेचारे गाम नहि बसि सकल आ दरभंगामें रहब मजबूरी एहि लेल सेहो बनि गेलैक जे गामक विद्यालयमें पढाइ-लिखाइके माहौल नहि छैक, गाममें अधिकांशतः बच्चा बिगड़िये जाइत छैक। गोवर्धन बाबुके बड़का बेटाक छोटका भाइ गामहिमें पढबाक कारण कहाँ दैन बिगैड़ गेल छलैक। ऐ टोल सऽ ओहि टोल जाय भैर दिन अट्ठा (कनैलक फर), बघन्डो, झुटका, गोली, पैसा, चैत-चिक्का आ कब्बड्डी खेलाइत ओकरा फुर्सत नहि छलैक। अरबधल सि-नंबरके बदमाश कहैत छल मोहनजी। नाम तऽ छल मोहनजी लेकिन कोनो छौंड़ा-मांरड़िक मारि-धारिमें कहियो ओकर आँखिमें आंगूर कय देने छलैक जेकर चलते ओ कनाह भऽ गेल छल आ सभ ओकरा कन्हा कहैत छलैक। ओकरा बाप किछु कहबे नहि करथिन आ भाइ सभके ओ कहियो गुदानबे नहि केलक। कन्हाके देखि ओकर भौजी निर्णय केलीह जे ओकरा सऽ किछुवे वर्ष छोट ओकर भतिजबाके गाममें तेहेन संगत नहि भेटैक। मैझला भाइ पढाकू आ घोंकारू दुनू छल। ओ मैट्रिकमें सेहो खुब नंबर अनने छल आ आर्ट लऽ के पढाइ करैत सभ दिन एक पर एक मार्क आनैत रहल, बादमें बाबुके कहला पर ओ वकालैतके पढाइ केलक आ दरभंगामें वकालति शुरु केलक, बियाहो भेलैक, धियो-पुता भेलैक, मुदा कमाइ तेहेन खास नहि जे श्रीधरजी के पत्नी प्रसन्न होइतथिन; तै ऊपर सऽ आब बड़की दियादनी दरभंगे रहब विचैर गाम छोड़ि मास्टर बच्चाके परिवार सऽ अलग कय उड़ि चुकल छलखिन तेकर सेहो मोंनमें वकीलक कनियांके बड़ रोष! घरवालाके कपार खाइत-खाइत दिल्ली जाउ, दिल्ली जाउ – कहैत-कहैत अपन नैहरके कलिया संग पठैये कऽ दम लेलखिन। ओ तऽ श्रीधर घोंकारू लोक छल से दिल्लीयो में अपन सिनियर सभके ड्राफ्टिंग करयके नौकरी पर कार्य शुरु केलक आ किछुए दिनमें लोकप्रियता हासिल केलक, छोट-मोट केस सभ सेहो ओकरा सिनियरके कृपा सऽ भेटय लागल छलैक। एहि तरहें आब एतेक पामर भेलैक जे ओ कलियाक गामवाली यानी ओकर पत्नीके दबावके चलते ऊत्तमनगरमें एक खोली भाड़ामें लय गाम सऽ आनि लेलक। शुरुमें कनी तकलीफ भेलैक तऽ गोवर्धन बाबु आ कनियाके बाबु प्रत्येक महीना गाम सऽ दिल्ली अयनिहारके संग धान कुटबाय खोराकी पठा देथिन। लेकिन आब श्रीधरके नाम कोर्टमें खूब चलय लागल छलैक से गाम सऽ खर्च नहि पठबैक लेल बापके समाद देलक लेकिन धृष्टता केलक जे अपन कमाइके पचासो टाका बापके पठबितय जे चाह-पान खा लेब से नहि केलक। कारण साफ छैक, घरवालीके चाप आ कलिया समान मंत्रीक सल्लाह। किछुवे दिनमें एगो चिट्ठी लिखलक जे दिल्लीमें भार कम करबाक लेल ५० गज जमीन सस्ता उपलब्ध छैक से किनत आ ताहि लेल ओकरा सहयोग चाही गाम सँ। किसान बापके मना केलोपर ओकर चाप आ मंत्रीक हिदायतके चलते भिन होयबाक आ अपन हिस्सा जमीन बेचियोक ओकरा दिल्लीमें जमीन किनय लेल सहयोग करबाक कठोर बात गोवर्धन बाबुके सुना देलक। जेठका भाइके सेहो आन्तरिक इच्छा रहबे करैक, बस कड़ी गिरल आ बखरा लागि गेल। कन्हाके लेकिन आब बतहपनी आ सनकीके असर एहि प्रकरण सऽ कम भेल। ओकरा मनपर चोट लागल जे जाहि जेठ भाइ सभपर ओ अपन सनक सभ दिन बैलूनी हवा समान गुम्हरैत रखलक से भाइ सभ पिताक इच्छा बिपरित आइ घरमें हिस्सा-बखरा लगबौलन्हि जखन कि एक मास्टर एक वकील आ हम कि… इत्यादि सोच सँ ओ तखनहि पीड़ित भेल जखन सभ दिस लोक ओकरा ऊपर दया भरल दृष्टिसँ देखय लागल। जेम्हर जाइत छल तेम्हर लोक पूछैत छलैक जे कि-कोना एना भऽ गेल ओकर घरमें आ कन्हा आब कि करत? कन्हाके औनी-पटपटौनी लागि गेल। ओहो जल्दिये किछु करय लेल प्रण केलक। ओकरा दोसर किछु नहि फुरेलैक, बस कोहुना अरब देश जयबाक आ ओतय मजदूरी करितो अपन कैरियर बनेबाक सूझ कोनो दोसर गामक लफुआके देक्सी करबाक लेल केओ संगिये तेसर लफुआ देने रहैक। से ओ बापके सुतली राइत अपन योजना सुनौलक। बापके छातीपर जेना साँप चढि गेल हो! बाप मुदा मौन रहि कन्हाके मोंन सेहो राखि लेलाह। सभ प्रक्रिया मिलबैत कन्हा अरब देश चलि गेल। बाप असगर मायके संग गामहि छूटि गेलाह। कन्हा गाम सऽ निकैलते जेना गाम सून्न बनि गेल। यदा-कदा बदमाशो लफुआ के कमी गाममें होइत छैक से चर्चाक विषय बनि गेल।

आब पहिल चारि वरखक खेप पूरा कय कन्हा गाम आयल छल। लोक सभ ओकरा सऽ पूछलक हाल, ओ बतबय लागल कहानी जे कोना ओकर नाम कन्हा ओतयके लोक ‘केन्हा-केन्हा’ बाजय आ आब गाममें लोक ओकरा कियो कन्हा नहि कहय बल्कि कृष्णा कहय कारण आब ओकरा लग विदेशमें कमायल बहुते रास पैसा आ अगिला ट्रीप अमेरिका जयबाक डीभी कार्ड के जोगाड़ ई दुनू छैक। भगवान्‌ जानैथ जे अमेरिकामें लोक ओकरा फेर कन्हा सऽ कोन्हा, केन्हा, कान्हा, कुन्हा कि कहय लगैक; लेकिन कृष्णा यदि ओकर नाम रहतैक तऽ सम्मान जरुर कृष्ण भगवान्‌ समान भेटतैक।

गोवर्धन बाबु जहिया मरि गेलाह तऽ दरभंगा सऽ मास्टर के अबैयामें समय लागि गेल, दिल्ली सऽ श्रीधर सेहो बरखीमें आयब कहि देल; मुदा संयोगवश कन्हा छल कुमार जे तेसरां दिन अमेरिका सऽ गाम आबि गेल आ बापके अन्तिम संस्कार केलक, मुदा छौरझप्पी कय समयक अभावक कारण नह-केश दिन उतरी जेठकाके सौंपि पुन: अमेरिका वापस चलि गेल। कृष्णा आइ मायके मोबाइल पर दिपावलीके ग्रिटींग पठेलक – ‘हैप्पी दिवाली मोम! अमेरिका आ स्वदेशमें सुख-समृद्धिक बरसात हो! आब हमरो बियाह देशहिमें करबाक इच्छा अछि से कनियां चाही मुदा भौजी सभ सन नहि! मोम! हम गाम वापस आबय लेल चाहैत छी। बघन्डो आ अट्ठे में जीवनक आनन्द छैक! अहाँक कृष्णा!’

हरि: हर:!!

**

घमंडी चौधरीक कुर्सों ड्योढि

(मजाक नहि! गंभीरतापूर्वक ध्यान दै योग्य बात छैक। केओ हमरा यदि घमंडी कहैत अछि तऽ तुरन्त आत्मनिरीक्षण शुरु करय पड़ैछ। बहुत कोशिस केलहुँ तऽ पता चलल जे हम तऽ संताने छी घमंडी चौधरीक! – आत्मालोचनाके संग हमर पुरखाक कथा!)

पं. शशिनाथ झा – मूल जलेवार गरौल के संतति मकरमपुरवासी घमंडी चौधरी! पं. शशिनाथ झा मुगल शासनक दरबारी पंडित रहलाह जिनका ५०० बिघाक मोजे पारितोषिक रूपमें शाह आलमसँप्राप्त भेल कहल जाइछ। चौधरी टाइटिल के संग एहि तरहक पारितोषिक पयबाक ओहि समय प्रथा रहल छल। गोरौल मूल डीहसँ चौधरी – जलेवार आठ गाममें अलग-अलग पसैर गेलाह। ओहि समय एहनो प्रचलन रहल जे शाह सम्राज्यके मजबूती लेल मंत्रीक सल्लाह वा शाहके आदेश सँ मोजे प्राप्त करनिहार परिवारकेर परिजन के पूर्ण अधिकार वा एना कहीजे ओतेक क्षेत्रमें सम्राज्यके पकड़-प्रभुत्व कायम करय लेल संभवतः जमीन्दार परिवारक एक न एक संतान लेल एक गाम – एक समाज बसाबयके कार्य कैल जायत छल। जलेवारक मूलके यदि आरो गहिंरमें अध्ययन लेल गेलहुँ तऽ पयलहुँ जे मैथिल ब्राह्मणमें गरौल आ वसौली – दू परिवारकेर सीढी एक संग शुरु भेल।

वापसी करी मूल कथा दिस! पंडित शशिनाथ झाक परिवारमें विद्याके बल रहल, एहिमें आब जोड़ा गेल राज्यबल! ब्राह्मणकेँ यदि धनक लोभ होवय लागल तऽ विनाशके नजदीक देखि सकैत छी। साधारणतया एक ज्योतिष परिवार यदि अपन प्रारब्धके मजबूत नहि करय आ पुरुषार्थ निर्माण त्यागपूर्ण कीर्ति एवं दानशीलता सँ नहि करय तऽ तीन पुश्त सऽ बेसी ओकर खानदान नहि चलि सकैत छैक। लेकिन सभ संतान में एकहि रंग गुण सेहो नहि अबैछ आ कुलके तारनिहार एक भागिरथ सँ सहस्र सगरपुत्र के उद्धार संभव होइत छैक। अत: परिवारमें सदिखन नीक चर्याक उद्बोधन करब हरेक मुखियाक कर्तब्य होइत छैक। अपन विद्याक बले इलाकामें प्रतिष्ठा पेनिहार विद्वान पं. झा अपन संततिमें शालीनताक पाठ देबाक प्रयास कयलन्हि से बात हुनक समस्त संततिक वर्तमान स्वत: प्रस्तुत कय रहल अछि। मकरमपुरवासी एक संतति घमंडी चौधरीक असल नाम किछु आर रहल हेतनि से अन्दाज मात्र लगा सकैत छी कारण पारिवारिक अभिलेख मौजूद नहि अछि, बल्कि सौराठ सभाक पंजीके आधारपर हुनकर नाम बादमें पता चलैत अछि जे घमंडी चौधरी के रूपमें अछि।

घमंडी चौधरी सेहो अपन खानदानक पारंपरिक धरोहर विद्या प्रचुरतामें पौलनि आ काफी कूशाग्र बुद्धिक मालिक इलाका में अपन कठोर मुदा सत्यानुगामी स्वभावके चलते अपन उपनामसँ प्रसिद्धि सेहो पौलनि। एक समय अपन एक दियाद जे गाम नदियामी में पहिले सऽ वास लऽ लेने छलाह तिनका ओतय ओ घूमय लेल अयलाह। अपन नित्यकर्म संध्या हेतु पोखैरपर गेल छलाह, ओतय अमराहीमें पोखरीक कंछैरमें एक अजीब दृश्य देखलाह। बिज्जी आ सांपमें झगड़ा भऽ रहल छलैक, साँप बिज्जीपर भारी पड़ि रहल छलैक। बहुत काल सोचला उपरान्त हुनका बुझेलनि एना जेना ओ लड़ि नहि रहल छल बल्कि जेना दोस्ताना क्रीड़ा कय रहल छल। ई घोर विस्मित करवाला बात के प्रेरणा हुनका ऊपर एना पड़ल जे ओ सोचय लगलाह आ बहुत सोचलाक उपरान्त मनमें विचार करैत वापस दियादक दलानपर आबि प्रस्ताव रखलाह जे हुनकर इच्छा छन्हि जे ओहि डीहपर (पोखरिक महार जतय अमराही छल) ओतय वास करी आ ताहि लेल ओ दियाद सँ अनुमति मँगलाह।

ओहि दिनके लोकमें लोकहि के संगतके मूल्य छलैक, आइ जेकाँ जमीनक (सांसारिक पदार्थीय आसक्तिक) कदापि नहि! दियाद गछि लेलाह जे अहाँ सहर्ष ओहि डीहपर वास करी। एहि तरहें ज्योतिष व व्याकरणाचार्य संस्कृतक विद्वान्‌ घमंडी चौधरी आबि ओहि गाम कुर्सोंमें बसय लेल मूल गाम मकरमपुरमें बजलाह आ कार्य करेबाक लेल किछु जन-जनिहार संग कुर्सों अयलाह। हुनकर दू संतान छलखिन्ह – नेहाल चौधरी आ मनसुख चौधरी। नेहाल चौधरीक उम्र ओहि समय तेरह वर्षक किशोरकेर रहल छल। मनसुख जेठ भाइ छलाह आ किछु सुस्त सात्विक दिमागके युवा छलाह जिनकर विवाह होवयवाला छलन्हि। विवाह सँ पूर्व लोकमें लगन लागि गेलाक कारण काजमें सेहो कनेक अरुचि होइत छैक। से पिताक सहयोग लेल किशोर बालक नेहाल कुर्सों अयलाह। जंगल कटाइ-सफाइ भेल। तदोपरान्त एक विशेष घटनाक्रमके चर्चा कैल जैछ जे निर्माण कार्यके प्रक्रममें ३ (तीन) गो पितरिया तमघैल जाहिमें अशर्फी भरल छल से भेटलन्हि। इ प्रसंग अलगे बहुत रुचिगर छैक जे हम एहिठाम नहि समेटय चाहब। ई बात केकरो कानोकान पता नहि चलय देलखिन कहाँ दैन! केवल पिता व भाइ के जानकारी देलाह आ तीव्र मस्तिष्कक किशोर नेहाल अपनहि अग्रसरतामें वैह जगह गोसाउनि भगवती (काली)के स्थापित करैत खजानाके गुप्तरूप संरक्षित कयलाह। शनैः शनैः ओहि खजाना बले मुजफ्फरपुर कचहरी हर दू महीनामें जाय ओ खेतीपाती व अन्य तरहक जमीन सभ किनय लगलाह आ ताहि समय हुनका ड्योढि रूपमें पहचान बनल। भाइ मनसुख चौधरी पुनः पचखुट्टीसँ दादपट्टी में प्रतिस्थापित भेलाह आ नेहाल चौधरीकेँ तात्कालीन शाह-दरबार सँ नव टाइटिल सेहो प्राप्त भेल। हुनकर नामकरण नेहाल सिंह चौधरीके रूपमें कैल गेल। बहुत रचनात्मक मस्तिष्कक किशोर आब युवावस्थामें प्रवेश पाबि चुकल छलाह आ हिनकर दमकैत प्रतिभासँ इलाकामें कुर्सों ड्योढि अल्पकालीन समयमें नाम कमेलक। हिनकर विवाह उत्सव खुब धुमधाम सँ मनायल गेल। काफी रास कीर्ति सभ सेहो केलाह। अपने जतय पहुँचैथ ओहिठाम एक न एक कीर्ति निर्माण जरुर करैथ करबाबैथ। संगमें पहुँचल जतेक जन-जनिहार, राज-मिस्त्री आदि छल तेकरा सभके लेल सेहो बास करबाक लेल समस्त इन्तजाम कयलन्हि। लोकप्रियता हिनकर एहेन बनि गेल जे एक छोट राज के स्थापना करनिहारके रूपमें हिनकर प्रतिष्ठा चारू दिस बढि गेल। हिनका तीन पुत्र रत्न व एक कन्या रत्न प्राप्त भेलन्हि। तिनू पुत्र पिता समान शालीन व संस्कारी भेलाह। सभक शिक्षा-दीक्षा लेल तात्कालीन बेहतरीन इन्तजाम कैल गेल छल। तिनू पुत्र पिताक प्रतापसँ काफी समृद्धि प्राप्त कयलन्हि। हलाँकि तिनू गोटामें तीन तरहक प्रकृति रहलन्हि, पिता तिनूकेँ तीन तरहक दायित्व देलाह। जेठ मोहन सिंह चौधरीकेँ श्रीसीताराम भगवान्‌केर मन्दिर बनाय गाम कुर्सोंमें रहबाक आदेश भेलन्हि। तहिना माझिल जगमोहन सिंह चौधरीकेँ श्रीराधेकृष्ण भगवान्‌केँ मन्दिर निर्माण करैत दसौत ड्योढिमें बास करबाक आदेश भेल। तहिना छोटका बेटा दुलारमोहन सिंह चौधरीकेँ सेहो भगवान्‌केर मन्दिर बनाय ठेंगहा ड्योढि बनाय बास करबाक आदेश भेल जिनका जेठ भाइ व हुनकर जेठ पुत्र चित नारायण चौधरी के अनुरोध पर कुर्सोंमें संगहि रहबाक निर्णय कैल गेल। एहि तरहें कुर्सोंमें जेठ भाइके ड्योढिकेँ उत्तरबाड़ि ड्योढि व छोट भाइक ड्योढिकेँ दक्षिणबाड़ि ड्योढिक संज्ञा देल गेल। हलाँकि विकास व बाहरी विकासी क्रियाकलापमें सभ सऽ बेसी महारत हासिल कयलाह चित नारायण चौधरी! तात्कालीन दरभंगा राज, काशी नरेश, जोधपुर राजा आदि सँ काफी नजदीकीके सम्बन्ध निर्माण भेल छल एहि खानदानकेँ हिनकहि नेतृत्वमें। दरभंगा राजाकेर लगान जतय सँ नहि असुलैत छल ओतयके ठीकेदारी सेहो लैत छलाह चितु बाबु! हिनकर कार्यशैली जतबा प्रभावशाली मानल गेल ओतबा विवादित सेहो! यदि केकरो ऊपर हिनका बड क्रोध अबैन तऽ हँसी लागि जाइन आ तत्काल केकरो किछु कहय सऽ परहेज करैथ आ स्वयं के दाँत सऽ काटय के अजीब आदत रहल हिनका में! कहबी छैक जे हिनकर एहि तरहक अनेको विचित्र आदत सभ छलन्हि। क्रूर सेहो छलाह। दया सेहो छलन्हि। मुदा सनकी लोक छलाह। हिनक कार्यकालमें ड्योढिक डाइ चलय लागल। क्रूरतापूर्ण प्रशासन कहि सकैत छी जे विनाशके मूल कारक होइत छैक। ई अपन परिवारोमें केकरो एक छोट गलती के बहुत पैघ सजाय देनिहार लोक मानल जाइत रहलाह। बहुत रास कथा हिनकर विषयमें प्रचलित अछि। एक मुड़ा पोखैर के निर्माण में कहाँदैन पाँच नरबलि देल गेल छल जेकर एक विचित्र कथा कहल जाइछ। विषयान्तर नहि ताहि लेल हम ओ सभ एतय लिखय लेल नहि चाहैत छी। कम से कम ३०० पोखैर आ ५०० ईनार एखन धरि खुनायल जा चुकल छल। हिनक विवाह रहिका भेल छल आ विवाहोमें कतेक तरहक रोचक कथा सभ कहल जाइछ, जेना मधुश्रावणीमें भरि गामक लोककेँ भार, द्विरागमनमें आयल ब्राह्मण, दासी, आदि लेल वास के इन्तजाम, आदि! दरभंगा महाराज हिनका बिहैर नाम रखने छलाह से कथा सुनबैत छथि भाट सभ! क्रमश:

हरि: हर:!

**

हलाँकि ईश्वर अपनहि संसारकेर संरचना एहेन मायावी केने छथि जाहिमें नीक आ बेजाय भरमार भेटैत छैक, लेकिन संतात्मा ओहि हंसक गुण के धारण केने नीक आ बेजायके भरमार मिश्रण सँ नीक तहिना ग्रहण करैत छथि जेना हंस दूध आ पानिक मिश्रणसँ शुद्ध दूध पीबि जैछ आ अशुद्ध पानि छूटि जैछ।

(रामचरितमानस सँ)

हरि: हर:!

Though God has Himself projected this world full with illusions as with good or bad qualities, but a saint functions same as a swan to drink the good quality filled milk and leave the bad quality filled water.

**

हमर अनुभव सऽ कहब – दहेज मुक्त मिथिला लेल किछु प्रतिबद्ध लोक के सिवाय किनको पास समय नहि अछि। ईमानदारी सऽ के कतेक समय आ सोच संग संस्था लेल व मिथिला हित लेल कार्य करल जाइत अछि से छुपल नहि अछि। तखन फेर अनेरो के चर्चा कय समय बर्बाद नहि कैल जाय। निवेदन जे आश्वस्त रहू! जे गेल छथि हुनका नहि लाजे कहय पडल जे गलती भेल जे संस्था सऽ मुँह मोडि लेलहुँ तऽ हमर नाम नहि! आश्वस्त रहय जाउ!

हरि: हर:!

पुनश्च: कलियुगमें लोक के वैह कार्य पसिन्न पडैत छैक जाहिमें समाज कम आ अपन बेसी स्वार्थ हो! हमर घमंड बूझब लेकिन हमर अनुभव कहैत आयल अछि जे समाजिक कार्य लेल आइ २% लोकमें सोच नहि बनैत छैक। गाम-गाम कननी लागल छैक, काज करनिहार केओ नहि, सभ अपनहिमें तर अछि! लेकिन धारा क्रान्तिके बहतैक से वादा करैत छी।

**

१५ नवम्बर २०१२

Undoubtedly this type of visits would dilute the unnecessary tension in two countries (India and Pakistan) today of one country the Hindustan alone. Thanks Nitish for your gesture visit, be it even for political tactics to appease the minorities of India, or be it to tag your name and fame as in the list of ‘would be PM of India’ or whatever, but I am encouraged seeing the welcome, the interaction, the reactions, the responses and the everything after your visit to Pakistan. Leaders of your height must do it for sake of peaceful relationship between the two known rival sister countries today. They forget that they are born of same mother. They demean the essence meaning of religions Hindu and Muslims. They are on height of communal behaviors; especially the youths are misguided against one another instiutionally; by such visits those meaningless training for youths would certainly lose the weight and people will understand the importance of friendship and brotherhood. People of both these nations are not far, they are made far by a few people claiming that there is Allah but no God – LaIlahiIlLiLaah! Nope! Islam has to learn the tolerance and develop harmony of love and brother by practicing this within one’s own self to learn the selfless surrendering to the Supreme of entirety – say Allah, say God, say Ram, say Rahim, say Jesus, say Buddha, say your bosom friend whom you can have a true refuge in. 

Harih Harah!!

**

१६ नवम्बर २०१२

मैथिली-मिथिलाके लेल पूर्ण समर्पित संस्था अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद्‌ द्वारा कोनो कार्यक्रमके शुरुआत विद्यापति रचित गोसाउनि गीत ‘जय-जय भैरवि असुर भयाउनि’ सँ कैल जैछ तहिना अन्त बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ रचित ‘भगवान्‌ हमर ई मिथिला सुख-शान्ति केर घर हो’ सँ कैल जैछ; तऽ आब आगामी समयमें मैथिलक वर्तमान अवस्था जे खाली गीत-संगीतमें ध्यान रहैत छन्हि आ गीतेसँ जागृति होयत से ठानल सत्य बुझैत हमर अनुरोध परिषद्‌ एवं समस्त मैथिल अभियानी सँ जे आजुक समय में मैथिली व हिन्दीके विद्यमान्‌ कवि श्यामल सुमन रचित निम्न अभियान गीत मध्यान्तर कालमें जरुर बजबैथ: एहि गीतमें यथार्थ चरित्र-चित्रण कैल गेल अछि आ शीर्षक देल गेल छैक ‘आत्म-दर्शन’, हलाँकि हमर अनुभूतिमें ई आत्म-निरीक्षण लेल समुचित अछि आ ताहि लेल हमर अपील जे समस्त अभियानमें एकर प्रस्तुति जरुर कैल जाय।
—————————————-——
आत्म-दर्शन

ठोकलहुँ पीठ अपन अपने सँ बनलहुँ हम होशियार।
लेकिन सच कि एखनहुँ हम छी बेबस आउर लाचार।
यौ मैथिल जागू करू विचार। यौ मैथिल सुनिलिय हमर पुकार।।

गाम जिला के मोह नञि छूटल नहिं बनि सकलहुँ हम मैथिल।
मंडन के खंडन केलहुँ आ बिसरि गेल छी कवि-कोकिल।
कानि रहल छथि नित्य अयाची छूटल सब व्यवहार।
बेटीक बापक रस निकालू छथि सुन्दर कुसियार।
यौ मैथिल जागू करू विचार। यौ मैथिल सुनिलिय हमर पुकार।।

मिथिलावासी बड़ तेजस्वी इहो बात अछि जग जाहिर।
टाँग घीचय मे अपन लोक के एखनहुँ हम छी बड़ माहिर।
छटपट मोन करय किछु बाजी कहाँ सुनय लऽ क्यो तैयार?
कतहु मोल नहि बूढ़ पुरानक एक सँ एक बुधियार।
यौ मैथिल जागू करू विचार। यौ मैथिल सुनिलिय हमर पुकार।।

“संघ” मे शक्ति बहुत होइत अछि कतेक बेर सुनलहुँ ई बात।
ढंगक संघ बनल नहि एखनहुँ हम छी बिल्कुल काते कात।
हाथ सुमन लय बिहुँसल मुँह सँ स्वागत वो सत्कार।
हृदय के भीतर राति अन्हरिया चेहरा पर भिनसार।
यौ मैथिल जागू करू विचार। यौ मैथिल सुनिलिय हमर पुकार।।

http://maithilbhooshan.blogspot.in/2011/06/blog-post_16.html
—————————————-——

हरिः एव हरः!

**

समस्त मिथिलासँ अपन विशिष्ट कला (मिथिला पेन्टिंग, मूर्ति बनाबयके कला, गीत-गबनिहाइर वा गबनिहार, नाटक प्रस्तुतकर्ता, विद्यापति नाच, दीना-भद्री, राजा सलहेश, अल्हा-रुदल, रामलीला वा अन्य विशिष्ट प्रस्तुति) संग विद्यापति स्मृति पर्व समारोह २०६९ – विराटनगरमें सहभागी बनबाक इच्छूक सम्पर्क करी। प्रवीण – ९८५२०२२९८१। सहभागिता लेल मिथिला (नेपाल) व कोसी-मिथिला (भारत) सँ कलाकार सहुलियत सऽ एतय पहुँचि सकनिहार जरुर सम्पर्क करैथ। उत्कृष्ट प्रस्तोता लेल समुचित पुरस्कार के व्यवस्था सेहो कैल जायत एवं आबय-जायके खर्च संग अन्य सुविधा सेहो प्रदान कैल जायत। कार्यक्रमसँ पूर्वहि अपन सहभागिता सुनिश्चित करी। हरि: हर:!

**

१७ नवम्बर २०१२

चुगला (मैथिली कथाका हिन्दी अनुवाद)

चुगलखोरी करनेवालोंको ‘चुगला’ कहा जाता है। मिथिलाके मैथिलोंमें एक महत्त्वपूर्ण पर्व सामा-चकेवामें चुगला दहन करनेकी गाथा है। चलो इसी बहाने हम कुछ संस्मरण करें सामा-चकेवा जो मिथिलामें लोकपर्वके रूपमें मनानेका अत्यन्त प्राचिन परंपरा है।

सामा – याने द्वारकाधीश श्री कृ्ष्णकी बेटीका नाम! प्रकृति-प्रेमसे आविर्भूत! अक्सर वाग-वन-उपवनमें विचरनेवाली और वहाँ रहनेवाले चिड़िया और विभिन्न किस्मके जानवरोंके साथ नदी, पोखरे, झरने, पहाड़ आदिसे प्रेम रखनेवाली!

चकइ (चकेवा) – सामाका प्रेमी एक चिड़िया! कहा जाता है कि सतीकी शापके कारण कोई देवता या ऋषि पंछीरूपमें परिवर्तित होकर चिड़ियां बन गये थे!

अन्य पात्रोंमें – सतभैंयाँ (कृष्णपुत्र), तोता, मैना, अनेको पंछी, बृंदावन (उपवन), ढोलिया, बजनिया, इत्यादि!

चुगला – सामा और चकेवा के प्रेम प्रति ईर्ष्या रखनेवाला दुष्ट प्रकृति का एक पात्र जो लोगोंके पीठ पीछे शिकायत करे और बढा-चढाकर अपनोंको अपनोंसे दूर करे!

कथा – सामा सुबह-सुबह सोकर उठते ही अपनी प्रकृति-प्रेमके कारण उपवन घुमने चली जाती थी और इसी क्रममें चकवाके साथ प्रेमके बँधन में बँध गयी थी। धीरे-धीरे सामाका चकइ संग प्रेम बढता गया जिसमें विभिन्न तरहका प्रेमालाप-प्रसंगकी चर्चा मिथिलाकी जनोक्ति-लोकगीत आदिमें हमें सुननेको मिलता रहा है। सामा-चकेवाकी प्रेम-गाथा चर्चाका विषय बन जाता है। कितने लोग इनके प्रेमको अबोध बाल्यप्रेमरूप देखकर भाव-विभोर होकर प्रशंसा करते हैं तो कितने ऐसे भी लोग हैं जो इस प्रेमको अप्राकृतिक और अमानवीय तक कह डालते हैं। ऐसे ही इस प्रेम-सम्बन्धके विरुद्ध सामाका ही एक संगतिया था जिसमें दूसरोंके सुखचैन से जलन होनेका एक अजब रोग था, उससे सामाका इस प्रकार चकेवाके साथ प्रेम वर्दाश्त नहीं होता था और एक दिन सामाके पितासे उसने बढा-चढाकर चुगली कर दिया, इसी कारण उसको चुगला कहा जाता है। पिता कृष्ण ने उसके चुगलीके आधारपर सामाको भी चिड़िया ही बन जानेका शाप दे डाला। मानव-धर्मके विरुद्ध अपनी स्वभाव बनाने से जो सामाने उस पक्षी चकेवाके संग प्रेम की, इसे नाजायज मानकर सामाको भी चकेवाकी प्रजातिमें मिल जानेकी एक तरह से न्याय दिया गया क्योंकि चकेवा जो सतीद्वारा शापित था उसके शापका विमोचन से कृष्ण खुदको असमर्थ मानते हुए विधकी मान्यताको कायम रखकर उलट अपनी बेटीको ही चिड़िया प्रजातिमें प्रवेश पाकर देव-ऋषि चकेवासे मिलनको मंजूरी दिये।

इधर सामाको अपने प्रेमी चकेवासे मिलनकी खुशी तो थी परन्तु अपने माता-पिता-भाइयों-परिजनोंसे पंछीरूपके कारण बिछुड़नेका अजीब डर उसे सालने लगी। यही दु:ख उसके भाइयोंको भी सालने लगा था। वेदना इसलिये भी भाई-बहनको हुआ होगा कि सक्षम पिता चकेवाको भी आशीर्वाद देकर मनुष्यरूपमें ले आते तो फिर बिछुड़न जो आज हुआ वह नहीं होता। दुःखी भाइयोंने बहन और बहनोई से मिलनेके लिये तरकीब खोजते हुए तपस्या करके पिताको प्रसन्न किये और उनसे वरदान प्राप्त किया कि भाई-बहनके प्रेमको फलित-फूलित रखने के लिये तुम्हारे तपसे प्रसन्न होकर मैं वर देता हूँ कि कार्तिक पूर्णिमामें छठ परमेश्वरीके पूजेके पारनेके दिन सामा-चकेवा अपने पूरे पंछी-समाज सहित तुमलोगोंसे मनुष्यरूपमें मिलने आएंगे और तुमलोग (सारे भाई-बहन) मिलकर हँसी-खुशी एक-दूसरेके कल्याण निमित्त पर्वरूपमें साथ रहोगे, पुनः कार्तिक पूर्णिमाके दिन अपने बहन-बहनोई और इनके समाजको भावभिनी विदाई देकर सालभरके लिये आनन्दित रहकर अपने-अपने जीवनचर्यामें लगोगे। और जिस चुगलेकी चुगलखोरीके कारण आज ऐसा हाल बना है उसे वृंदावन (उपवन)में मुँहमें आगसे झुलसाकर पुन: इसका दुरुपयोग न करनेके लिये सबक दोगे। भाईयोंको काफी प्रसन्नता मिली, सामा-चकेवाकी प्रसन्नताकी सीमा नहीं रहा। न्यायसे सभी सहमत हुए। चुगलाके सजासे औरोंको भी सबक मिलनेका राह बना। 

इसी कथाके अनुरूप मिथिलामें सामा-चकेवा लोकपर्व मनानेका प्रचलन है। पर आज कलियुगमें चुगलाका मुँह झुलसानेवालोंका संख्या कम इसलिये पड़ गया है क्योंकि आज तो सौ में नब्बे बेईमान फिर भी मेरा भारत महान् वाली कहावत चरितार्थ हो रहा है। आज द्वापर युगवाली बात नहीं है। फिर कौन किसके मुँहको झुलसाये, कौन भला, कौन चुगला इसका पता पाना बहुत ही मुश्किल है। ऐसेमें अब मिथिलाकी लोकपर्व सामा-चकेवा मनानेवाले भी कम होते जा रहे हैं।

हलाँकि इतिहास गवाह है कि हम कोई भी पर्व वगैर समुचित संकल्प नहीं मनाते हैं। हमारे संस्कृतिमें पर्वों-त्योहारोंका अर्थ गूढ है जिसे समझनेकी जरुरत है, तभी मनानेका मतलब सार्थक होगा।

चुगलोंके संसारमें चुगलोंका अब दिन चले!
चुगलखोरीकी धर्म से न्यायीपर हथियार चले!
चुगलोंके संसारमें….

कौन है सामा कौन चकेवा निर्णय अब पहाड़ बने!
सतभैंयाँ घर ही में बँधा है बहन-जीजा कपार धुने!
चुगलोंके संसारमें….

कोखमें सामा सेटिंग होवे बेटा कोख उधार लिये!
दहेजकी मारसे बेटी भगाबे व्यवहारोंकी अंबार लगे!
चुगलोंके संसारमें….

पर्वका मतलब दारू ताड़ी जुआ हार कपार धुने!
नाम लिये बस चमके हैं सब मर्म न कोई सार बुझे!
चुगलोंके संसारमें….

वृंदावन नित जरे लव-यूमें नितीशराज बिहार जरे!
मिथिलाराज रोता है प्रवीण भूकनीका औजार बने!
चुगलोंके संसारमें….

सामा-चकेवा गाथा अपनी संस्मरण प्रस्तुत करे,
विधके विधानका मतलब समझो मानवता में सभी जिये!

हरि: हर:!

**

छठि मैया आ डूबैत-उगैत सूरुजके पूजा

छैठ परमेश्वरी के पूजा समस्त मिथिलावासी लेल अति प्राचिन पारंपरिक पूजन समारोह थीक। सामूहिक रूपमें बेसीतर महिला लेकिन गोटेक पुरुष व्रतधारी सभ संग अनेको प्रकारके पकवान व ऋतुफल संग संध्याकालीन सूर्यकेँ हाथ उठाय नमस्कार अर्पण करैत पुनः उषाकाल भोरहरबेसँ छठि परमेश्वरी (उगैत सूरज) केर दर्शन लेल व्रतधारी करजोड़ि ठरल जलमें ठाड़्ह इन्तजार करैत छथि। सूर्योदय उपरान्त पुनः विभिन्न पकवान व ऋतुफल भरल डालासँ हाथ उठाय नमस्कार अर्पण करैत छठि मैयाके व्रतकथा सुनैत ओंकरी आ ललका बद्धी – ठोप लगबैत व्रतधारी अपन समस्त परिजनकेँ भगवान्‌केर शुभाशीर्वाद हस्तान्तरित करैत छथि। यैह पूजाके छैठक संज्ञा देल जैछ। क्रमशः मिथिला व आसपासके क्षेत्रसँ शुरु भेल ई पूजा आब समस्त संस्कृतिमें प्रवेश पाबि रहल अछि। आस्थाक बहुत पैघ उदाहरण थीक ई पूजा आ समस्त मनोवाञ्छित फल प्रदान करनिहैर शक्तिशाली छठि मैयाक पूजा लेल के आस्थावान्‌ उद्यत नहि होइछ आइ!

व्रती (साधक) अत्यन्त कठोर नियम एवं शुद्ध आचार-विचार संग निर्जला व्रत करैत छथि आ शरदकालमें ठरल जलमें ठाड़्ह भऽ व्रती सूर्यकेँ जल-फलसँ हाथ उठबैत विशेषार्घ्यसँ पूजा करैत छथि, पूजा काल सेहो विशेष रहैत छैक। सच पूछू तऽ छठि मैयाके पूजा-अर्चनाके विधान देखि हम सभ नहि सिर्फ प्रभावित रहैत छी, बल्कि एकदम कल जोड़ि शरणापन्न अवस्थामें सेहो रहैत छी जे कहीं एको रत्ती गड़बड़ नहि हो नहि तऽ कखनहु साधनामें विघ्न पड़ि जायत आ तेकर दुष्परिणाम व्रतधारी एवं समस्त परिजन पर पड़त। बहुत गंभीर भावनासँ पूर्णरूपेण शरणागत बनि एहि पूजा में साधना करबाक महत्त्व छैक। लेकिन एतेक गंभीरताके रहस्य कि? कि बात छैक जे व्रत एतेक कठोर करय पड़ैत छैक? डूबैत सूरजके पूजा किऐक? आउ प्रयास करैत छी जे एहि समस्त रहस्य पर सँ पर्दा उठाबी। कम से कम आजुक नवतुरिया (हमरा समेत) लेल ई एक शोधक विषय अछि आ एहिमें सावधानीपूर्वक हम सभ मनन करैत आगू देखी!

सभसँ पहिने छठि मैया के थिकी? वा छठि मैया सूरजरूपमें कोना?

बहुत रोचक प्रसंग कहल गेल छैक – कहियो नारद ऋषि व्यामोहित (नारी रूपमें आकर्षित) भेल छलाह। भगवान्‌ विष्णुकेँ मायासँ नारदकेँ एहि तरहक अवस्थाक प्राप्ति भेल छलन्हि आ कहल गेल छैक जे ई ताहि समय भेल छलन्हि जखन नारदजी कोनो कुण्ड (सरोवर)में संध्या करबाक लेल प्रवेश केने छलाह आ ताहि समय भगवान्‌के मायास्वरूपा एक नारी ओहि सरोवरमें अपन अंग-प्रत्यंग प्राच्छालन करैत रहलीह आ व्यामोहित नारदजी अपन संध्याके (सूर्य एवं गायत्री उपासना) बिसरि बस ओहि नारीके माया-दर्शनमें लागि गेल छलाह। हिनकर भगवान्‌के मायामें एहि तरहें व्यामोहित देखि सूर्य के सेहो हँसी लागि गेल छलन्हि जाहि कारणे सूर्यास्त सँ किछु समय उपरान्त धरि हुनक अस्त नहि भेलन्हि आ नारदके व्यामोहन छूटिते सूर्यक उपस्थिति देखि सभ बात बूझय में आबि गेलन्हि, तखनहि नारद सूर्यकेँ नारीरूप प्राप्त करबाक शाप देलाह जे बादमें प्रभुजीके मध्यस्थ कयलापर विमोचन करैत केवल एक दिवस लेल कायम राखल गेल, कार्तिक मासक षष्ठी (छठम) तिथिकेँ जेकर समय तेसर संध्या (सूर्यास्तसँ एक पहर पहिले) समय सँ अगिला संध्या याने भोरक सूर्योदय काल के एक पहर उपरान्त धरि नारी स्वरूपमें रहबाक बात तय भेल जिनका भगवान्‌ विष्णु छठि मैयाक शक्तिस्वरूपा नाम व वर प्रदान कयलन्हि। मिथिलामें यैह देवीक उपासना लेल पूर्वकालमें योगी-ऋषि द्वारा प्रजाकेँ उपदेश कैल गेल आ आदिकालसँ हिनक उपासनाक एक निश्चित विधान अनुरूप छठि मैयाक आराधना चलैत आबि रहल अछि।

छठि मैयाक पूजाक महत्त्व कि?

सूर्यक परिचय सर्वविदित अछि। बिना सूर्य सभ सून्न! विज्ञान – ज्ञान – मान – आन – शान – सभ सूर्यके चारू कात, केन्द्रमें केवल सूर्य! नवग्रह, नक्षत्र, भूमण्डल, पंचतत्त्व, उर्जा, पोषण… हर बात के जैड़में सूर्य! सूर्यक उपासना संसार में आस्तिक-नास्तिक सभ करैछ। मिथिलामें जतय पुरुषवर्ग लेल संध्योपासनामें सूर्यकेँ जलक अर्घ्यसँ नित्य पूजा करैक विधान अछि, तहिना सूर्य नमस्कार समान प्रखर योग-साधना, नारीवर्गलेल सेहो नित्य तुलसी एवं सूर्यकेँ जलार्घ्य देबाक परंपरा रहल अछि। सूर्यकेँ भगवान्‌ मानल जायमें किनको कोनो आपत्ति कहियो नहि रहल अछि। नित्य समयसँ उदय, समयसँ अस्त, दिन व रातिक निर्धारण, अग्नि-वायु-वर्षा-मौसम आ समस्त अवयव जे जीवन लेल आवश्यक अछि तेकर दाता – चक्रवर्ती राजा के संज्ञा देल जाइछ सूर्यकेँ। ओ चाहे मनुष्यलोक हो वा आदित्य-वसु वा कोनो अन्य लोक; सभक राजा सूर्य! प्रत्यक्ष देवता के अधिपति सूर्य! साक्षात्‌ नारायण के – त्रिलोकस्वामीके प्रतिनिधित्व करनिहार सूर्य! हिनकर पूजा तऽ लोक नित्य करैत अछि। तखन यदि एक दिन (कार्तिक षष्ठी) हिनक विशेष रूप छठि मैया साक्षात्‌ शक्तिके भंडारिणी हम मानवलोककेर सोझां रहती तऽ के कृपापात्र बनय लेल नहि चाहत! अत: छठि मैयाके आराधना समस्त सखा-परिजन-राष्ट्र लेल कल्याणकारक होइछ।

सूर्यकेँ प्रतिदिन प्रातः काल अर्ध्य देलासँ आ प्रणाम कएला सँ आयु, विद्या, यश आ बल के वृद्धि होइत अछि ।

आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने-दिने ।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलम्‌ ॥

छठि मैयाके व्रतकेर नियम कि?

एहि व्रतमें तीन दिनक कठोर उपवास कैल जाइत अछि। चतुर्थी दिन पवित्र पोखैर वा नदीक जलसँ स्नान करैत एक बेर खयबाक परंपरा अछि जेकरा नहाय-खायके संज्ञा देल जाइछ। पञ्चमी दिन उपवास करैत सन्ध्याकाल लवणरहित गुड़सहित खीरसँ खरना कैल जैछ। षष्ठी दिन निर्जल व्रत राखि सूर्यास्त सँ पहिले एवं कतेको जगह सूर्यास्तक बाद पोखरि वा नदीके पवित्र घाट पर जलमें ठाड़्ह भऽ पकवान एवं फलादिक डालासँ अस्त होइत सूर्य जे आब शक्ति-स्वरूपा छठि मैयाक रूपमें परिणत भऽ गेल रहैत छथि तिनका प्रणाम कैल जाइछ, समस्त बन्धु-बान्धवके कुशलता एवं कल्याण लेल प्रार्थना कैल जाइछ, मनोवाञ्छित फल व व्रतक निष्ठापूर्वक सफलता एवं चरणमें अटूट भक्ति लेल प्रार्थना कैल जाइछ। पुनः उदयकालिक सूर्य याने छठि मैयाकेँ विभिन्न प्रकारक पकवान एवं ऋतुफलके डाला आदिसँ हाथ उठाय नमस्कार अर्पित करैथ व्रतक कथा श्रवण कैल जाइछ।

छठि मैयाक व्रत कथा

एक छलाह राजा प्रियव्रत जिनक पत्नीक नाम मालिनी छलन्हि। राजा रानी नि:संतान होयबाक कारणे बहुत दु:खी छलाह। महर्षि कश्यप द्वारा पुत्रेष्ठि यज्ञ करौलन्हि, फलस्वरूप मालिनी गर्भवती भेलीह मुदा नौ महीना बाद जखन ओ बालक के जन्म देलीह तऽ ओ मृत अवस्थामें छल। एहिसँ राजा प्रियव्रत बहुत दुःखी भऽ आत्महत्या लेल उद्यत भेलाह। तखनहि एक देवी प्रकट होइत अपन परिचय षष्ठी देवीके रूपमें दैत पुत्र वरदान देनिहैर कहैत हुनका सँ अपन पूजा-अर्चनामें लीन होयबाक लेल उपदेश केलीह। राजा देवीकेर आज्ञा मानि कार्तिक शुक्ल षष्टी तिथि केँ देवी षष्टीकेर पूजा कयलन्हि जाहिसँ हुनका पुत्र-धनके प्राप्ति भेलन्हि। ताहि दिन सँ छठिक व्रतक अनुष्ठान चलि रहल अछि।

एक दोसर मान्यता अनुसार भगवान श्रीरामचन्द्र जी जखन अयोध्या वापसी कयलाह तखन राजतिलक उपरान्त सियाजी संग कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथिकेँ सूर्य देवताकेर व्रतोपासना कयलन्हि आ ओहि दिनसँ जनसामान्य में ई पावैन मान्य बनि गेल और दिनानुदिन एहि पावैनक महत्त्व बढैत चलि गेल जाहिमें पूर्ण आस्था एवं भक्तिक संग ई पावैन मनाओल जाय लागल।

हरिः हरः!

**

विद्यापति स्मृति पर्व समारोह केर औचित्यपर कतेको ठाम प्रश्न देखल, हम सहज रूपमें औचित्यपर किछु प्रकाश देबय लेल चाहब।

विद्यापति स्मृति समारोह के सार्थक अर्थ होइत छैक – विद्वानक स्मृति, विद्याधन के महत्त्वक गान, आबयवाला पीढीमें विद्या अर्जन हेतु सचेतना जागृति, संस्कृतिके महत्त्व प्रदर्शन, पहचानके मजबूती प्रदान, इत्यादि!

एक विद्यापति अपन सर्वहिताय-सर्वसुखाय सिद्धान्तके चलते जनकवि बनि गेलाह आ हुनकर सोच-दर्शन में प्रजाप्रेम, जनकल्याण, ईशक मान व सद्भक्तिसम्पन्नता आ नहि जानि कतेको गुण देखल जाइत अछि। हिनक स्मृति दिवस के माने कदापि ई नहि जे बस दस गो गीत सुनू आ फूहरताक शिकार आधुनिक मंचसँ अपन एकजूटता मात्रके प्रदर्शन करैत नामकरण करू कि विद्यापति स्मृति पर्व समारोह वा आइ-काल्हिक नाम मिथिला विभूति सम्मान दिवस आदिके रूपमें मनाबी।

एकर औचित्य के बहुत सार्थक संदेश छैक। जेना:

*विद्वान्‌ प्रति श्रद्धाञ्जलि अर्पण
*विद्याके प्रभाव वर्तमान पीढीमें प्रेरणा वितरण
*विद्याधन सँ अलंकृत होयबाक संदेश
*संस्कृतिके विरासत पर प्रकाश
*कवि कोकिल वा अन्य विभूतिक योगदान पर चर्चा
*एक कविक समाजक दिशा व दशा निर्धारणमें कतेक महत्त्वपूर्ण योगदान
*विद्यापति एक: गुण अनेक
*समर्पित शरणागत तत्त्वक विश्लेषण
*महादेव भगवान् सेहो भक्तके मान रखलन्हि
*तकनीकी फायदा – कार्यक्रम आयोजन-संयोजनसँ एकजुटताके संदेश
*संगठन निर्माण
*समाजिक शक्ति निर्माण
*गीत-संगीत-नाटकसँ संस्कृतिके भूत, वर्तमान व भविष्यक चर्चा
*ताजापनके प्रवेश
*नाटक सँ समाजिक कूरीति पर प्रहार, चेतनामूलक संदेशके प्रसार
*समाजिक-प्रादेशिक-राष्ट्रीय एवं मानवीय हर स्तरके सुधार व विकास लेल संकल्प
*समारोह द्वारा अपन पहचान स्थापित करब
*समग्र विकासमें एवं मानवीय सभ्यताके संभारणमें अपन सहभागिता प्रति संसारके संदेश-संवाद प्रवाह

हम कतेक सार्थक बात गनाओ? एकर अन्त नहि अछि। लेकिन एहि लेल हमरा-अहाँमें एहि तरहक कर्मठ प्रतिबद्धता रहबाक चाही। धन्य विद्यापति पर्व समारोह जे आइयो मिथिलत्त्व संसारमें बाँचल अछि। अंशतः सही, मिथिलाके प्राण रक्षा करबा में एहि समारोह के जतेक योगदान छैक आन कथुओ के नहि! आब तऽ विकृति एतेक हावी छैक जे स्वयं मैथिल अपन भाषा, भुषा आ भूषण के परित्याग करय में रत छथि आ छाती फूलाके बजैत छथि जे आब मिथिला-मैथिलीमें बचल कि अछि… बूड़ि नहितन!  लेकिन धन्य ई समारोह जे संसारमें मिथिलाके जयकारा आइयो लगा दैत अछि। आउ, आमंत्रित करैत छी अहाँके विराटनगर २८-२९ दिसम्बर, २०१२ केँ। देखू हमरो सभक प्रयास! जय मैथिली केवल जयकारा सऽ नहि कर्म सऽ होइत छैक।

हरिः हरः!

**

१९ नवम्बर २०१२

Aai gaam me Chhathik subh-avasar par Maithili Sanskritik kaaryakram ke sang jaagran ke kaaryakram achhi. Gaam-gaam Maithili prati jaagriti badhi rahal achhi. Lok sabh ke laaj hovay laagal chhanhi je aanak bhasha lel ham sabh jagah da ke Maithili ke aatmahatyaa karbaak lel prerit kelahu se doshi fer nahi banab. Bahut neek laagi rahal achhi. Aab Maithili me kaaryakram karanihaar kalaakaar ke kami bujhait achhi. Ona ehi samay sabh tight schedule me chhathi.

Harih Harah!!

**

काल्हि जनकपुरमें मैथिली-मिथिलाक संगीत, रंगकर्म, नृत्य, गीत आदि में उत्कर्ष प्राप्त केनिहार समूह ‘मिथिला नाट्यकला परिषद्‌’ द्वारा एक स्टुडियो के उद्‌घाटन होयत। हमरा आदरणीय सुनील भाइ द्वारा ई सूचना प्राप्त भेल। गाम सँ शायद समय नहि भेटि पाबय जे एहि कार्यक्रममें भाग लऽ सकब। लेकिन हार्दिक बधाई आ सफलता लेल शुभकामना! मैथिली संगीत-गीत व रिकार्डिंग लेल हरेक आधुनिक सुविधासहित ई स्टुडियो आगामी समय में सृजनशील मैथिल कलाकार संगहि अन्य लेल सेहो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करत से विश्वास अछि। एक बात पर दुविधा अछि जे ई स्टुडियो सुनील भाइ निजी खोलि रहल छथि वा मिनाप अन्तर्गत, लेकिन दुनू परिस्थितिमें मिथिला लेल ई नया उपहार आ विकासक आयाम प्रस्तुत करत से धरि पक्का अछि।

हरिः हरः!

**

सृजनशील मनुष्य सदैव नीक सृजन करैत संसारमें सार्थक भूमिका निर्वाह करय लेल तत्पर रहैछ। कमजोर आ दुष्ट प्रवृत्ति लेल ओहेन सृजनशील लोक सदिखन आँखिक फतिंगा बनल रहैछ। तदापि सृजनक नव-नव श्रृंगार नित्य एहि संसारक सुन्दरतामें नव-नव सितारा जोड़ैत रहैत छैक। केकरो मैथिली के मरण देखैत छैक आ कियो मैथिली-मिथिला संग कतेक आगू बढि रहल अछि। स्वतः बुझू जे हम कि कय रहल छी। सृजनशील यदि नहि बनि सकल छी तऽ कमजोरी कोना दूर होयत, एहि पर आत्ममंथन करू, नहि कि सृजनशीलक कुचेष्टा आ पीठ पाछू दोसरके निन्दा बड पैघ पापाचार थीक। सावधान!

हरिः हरः!

**

आजुक दोसर शुभ समाचार – गुवाहाटीमें भव्यताक संग विद्यापति स्मृति पर्व समारोह ३० दिसम्बरके मनायल जायत। आदरणीय सत्यानन्द पाठक जी सँ भेटल जानकारी अनुरूप आइ कइएको वर्षसँ मनाबैत आबि रहल एहि श्रेष्ठ कार्यक्रम मार्फत आसाममें मैथिल आ मिथिलाक महत्त्व बरकरार रहल अछि आ आपसी सौहार्द्र बनाबयवाला एहि कार्यक्रमसँ मैथिलकेर आसामी मूल संग सहकार्यक नव-नव रास्ता सेहो बनैत आयल अछि। अपन संस्कृति व पहचान के सशक्तीकरणमें एहि कार्यक्रमके सराहनीय योगदान रहल अछि।

हरिः हरः!

**

ईश्वरके बहुत रास धन्यवाद जे समय-समयपर अनुजके बरसात कऽ देने छथि, आइ रोशनजी द्वारा देल गेल सूचना बहुत कारगर प्रमाणित भेल। हुनकर सूचना छल जे मात्र १०००/- रुपयाक खर्चमें अपन वेबसाइट बना सकैत छी हुनकर मार्फत! बेशक हुनकर बनायल बहुतो रास वेबसाइट सभ देखलहुँ जाहिमें नीक दक्षताके परिचय भेटल। मिथिलाके लेल पहिल सोशियल नेटवर्किंग जे लगभग फेसबुक समान अनेको महत्त्वपूर्ण फीचर संग हमरा सभ लेल वरदान प्रमाणित भऽ रहल अछि, मैथिली के जयकारा लागि रहल अछि www.mithilaface.com याने मिथिलाफेस पर, तहिना ओ हमेशा अपन कार्यदक्षता सँ मैथिली-मिथिला प्रति नीक सोच रखैत किछु न किछु योगदान दैत आयल छथि, से देखलियैन अछि। मन प्रसन्न अछि जे आइ हमरो एक निजी शख कि अपन वेबसाइट हो से पुरा करय लेल वचन देलाह छथि। हमर वेबसाइट के नाम कि रहत – झटके में पूछलाह आ फटके में उत्तर देलियैन जे एकर नाम ‘मैथिली-जिन्दाबाद’ राखू। www.maithili-jindabad.com, शुरुमें ७ दिन लेल ट्रायल पेरियड लेल www.maithili-jindabad.tk रहत आ आइये कोनो समय ओ प्रारूपके लांचिंग करता। आशा करैत छी जे रोशनजी द्वारा बनल हर वस्तु सदिखन सुपर-डुपर-हिट हो!

जय मैथिली! जय मिथिला!

हरिः हरः!

Roshan Choudhary – Thanks in advance!! 

https://www.facebook.com/roshan.choudhary3

**

२१ नवम्बर २०१२

मिथिला माइक दस गो बेटा, दसो भेलै खरहुअनमा गै! ओ कि बाजत सदिखन बजिते दिन बितल अनढनमा गै! मिथिला लेल पहिले स्वयं करू, तखन करनिहार के दर्द बुझबैक। बैजुजी सऽ जतेक संभव छैक, कय रहल छथि। धनाकरजी सऽ जतेक संभव छैक ओहो कय रहल छथि। बहुत कम लोक एहि कार्यमें अग्रसर छथि। हिनका सभमें दोष देखनिहार के कतहु कमी नहि, मुदा विडंबना कही वा सत्य जे स्वयं किछु नहि करैत छथि वैह समस्या आ छिद्रान्वेषणमें लगैत छथि। हम सभ अपन हिस्साके दायित्व जरुर बुझी। केवल कमजोरी टा नहि निकाली, बल्कि ताहि कमजोरीके अपन कर्मबल-तपबल सँ दूर भगाबी। तखन मिथिला लेल चिन्ता करी, वरना किनको नैतिक अधिकार नहि जे दोसर पर आंगूर उठायब। हरि: हर:!

**

चुगला

चुगलखोरी करनिहारके कहल जाइत छैक। मैथिलके एक महत्त्वपूर्ण पावैन सामा-चकेवा में चुगला-दहन के गाथा छैक। चलू यैह बहाना हम किछु संस्मरण करी पावैन सामा-चकेवा जे मिथिलामें लोक-पर्व रूप मनयबाक अति प्राचिन परंपरा अछि।

सामा – याने द्वारकाधीश श्री कृ्ष्णकेर बेटी के नाम! प्रकृति-प्रेमसँ आविर्भूत! सदिखन चिड़ै-चुनमुनी, जंगल-पहाड़, नदी-झरना-पोखैर-वन-उपवनमें रमनिहैर!

चकइ (चकेवा) – सामाके प्रेमी! सतीशापसँ कोनो देवता पंछीरूपमें परिवर्तित!

अन्य पात्र – सतभैंयाँ (कृष्णपुत्र), सुग्गा, मेना, अनेको पंछी, बृंदावन, ढोलिया, बजनिया, इत्यादि!

चुगला – सामा आ चकेवा केर प्रेम प्रति ईर्ष्या राखनिहार दुष्ट प्रकृतिक पात्र!

कथा – सामा भोरे सुति-उठि अपन प्रकृति-प्रेमके कारण उपवन घुमय लेल जाइथ आ यैह क्रममें चकइ संग प्रेमक बँधन में बन्हाइत छथि। धीरे-धीरे हुनकर चकइ संग प्रेम बढैत जाइत अछि जाहिमें अनेको तरहक प्रेमालाप-प्रसंगक जनोक्ति-लोकगीत आदि हम सभ सुनैत मिथिलाक पुरान परंपरा सँ सुनैत आयल छी। सामा-चकेवाकेर प्रेम-गाथा चर्चाक विषय बनैछ। कतेक लोक हिनकर प्रेमके अबोध बाल्यप्रेमरूप देखैत प्रशंसा करैत भाव-विभोर भऽ जाइथ, तऽ एक ‘चुगला’ छल जेकरा सामाक एहि तरहें मानव रहैत चिड़िया संगक प्रेम अनसोहांत लगैत छलैक। भऽ सकैत छैक जे एहेन चुगला आरो बहुतो हो, लेकिन कथा आ पावैन में प्रतीकात्मक प्रस्तुति लेल एके गो चुगला काफी अछि। 

सामाकेर प्रेम-प्रसंग ओ नून-तेल-मसाला लगाय सामाक पिता संग कहैत छन्हि आ सामाके सेहो पिता शाप दैत छथि जे मानव-धर्मके विरुद्ध अपन स्वभाव बनेलीह जे कोनो पंछी संग प्रेम केलीह, अतः आब ओ पंछीरूपमें परिणत होइथ आ अपन प्रिय चकइ संग वास करैथ। एहिसँ सामाके प्रसन्नता तऽ जरुर भेलन्हि जे अपन प्राकृतिक प्रेमरूप चकइ संग ओ बसती, लेकिन संगहि वेदना सेहो भेलन्हि जे आखिर मनुष्यरूप पिता आ भाइ-बहिन सभसँ बिछुड़न होयत, सक्षम पिता हमरा वरदान सेहो दऽ सकैत छलाह आ चकइ के मनुष्यरूप प्रदान कय सकैत छलाह, तदोपरान्त सेहो हम सभ संग वास कय सकैत छलहुँ। वेदनाक ई स्वरूप कविक भावना बुझि सकैत छी, संभावना ईहो भऽ सकैत छैक जे हुनक अबोध प्रेमके गलत व्याख्या चुगला हुनक पिता संग कयलाह आ परिणामवश मनुष्यरूपसँ हुनको पशुरूप पंछी में परिवर्तित होयबाक शाप देल गेल।

जहिना सामाके कचोट भेलन्हि तहिना हुनक भाइ (सतभैंयाँ) के सेहो कष्ट भेलन्हि जे आब बहिन सामा सँ कोना भेट होयत आ भाइ-बहिनिक आपसी खेल-सिनेह सभ कोना कय सकब; से भाइ लोकैन सामासंग पुनर्मिलन हेतु आ चकेवा संग साक्षात्कार करबाक हेतु, चुगलाके सजाय दियेबाक हेतु, अन्यायके न्याय दियेबाक हेतु प्रण करैत छथि। कठोर संकल्पशक्तिसँ भाइ सभ तपस्यारत होइत छथि आ पिताकेँ प्रसन्न करैत छथि। प्रसन्न पिता चकेवाक पूर्वजन्मक शापके ध्यान रखैत आ सामा (श्यामा) संग मिलनके मूल्य सेहो कायम रखैत एतेक वरदान दैत छथिन जे शरदकालमें अपन पंछी समाजसंग सामा आ चकेवा मनुष्यरूपमें आबि अपन भाइ सभ संग वास करती आ पुनः कार्तिक पुर्णिमा दिन भाइ सभ हिनका लोकनिकेँ सहर्ष विदाई करताह। भाइ सभ बहुत प्रसन्न भेलैथ आ सामा-चकेवा केँ सेहो प्रसन्नताक सीमा नहि रहि गेल। न्याय सँ सभ सहमत भेलाह। संगहि चुगला लेल दंड तय कैल गेल जे एहेन प्रकृतिलेल एकहि इलाज छैक जे भाइ-बहिन-सखी-बहिनपा मिलिके एहेन चुगलखोर लोककेँ सामूहिक सजाय दैथ। विदाई सँ पूर्व वृंदावन (उपवन)में चुगलाकेँ मुँहमें आगि लगाय जरा देल जाय जे पुनः दोसर केओ अपन मुँहके दुरुपयोग नहि करैथ आ एहि सजाय सँ सबक लैथ। 

यैह कथा अनुरूप मिथिलामें सामा-चकेवा लोकपर्वक रूप लेने अछि। मुदा चुगलाकेँ जरौनिहार आइ कम एहि लेल अछि जे कलियुगमें द्वापरयुग समान अवस्था नहि रहि गेल छैक। आब तऽ सैकड़ा में नब्बे बेईमान – तैयो हमर भारत महान्‌!, ई लोकोक्ति चरितार्थ भऽ रहल अछि।

चुगलाके संसारमें चुगले के आब दिन चले!
चुगलखोरीके धर्म सँ न्यायीपर हथियार चले!
चुगलाके संसारमें….

के सामा या के चकेवा निर्णय आब पहाड् बने!
सतभैंयाँ घरेमें बान्हल बहिन ओझा कपार धुने!
चुगलाके संसारमें….

कोखिमें सामा सेटिंग होवे बेटा कोखि उधार लिये!
दहेजक मारिसँ बेटी भगबे व्यवहारक अंबार लगे!
चुगलाके संसारमें….

पावैन मतलब दारू ताड़ी जुआ हारि कपार धुने!
नाम लेल चमकै छै सभटा मर्म न कोनो सार बुझे!
चुगलाके संसारमें….

वृंदावन नित जरे लव-यूमें नितीशराज बिहार जरे!
मिथिलाराज कानय प्रवीण भूकनीके औजार बने!
चुगलाके संसारमें….

सामा-चकेवा गाथा अपन संस्मरणसँ प्रस्तुत करे,
विधके विधानक मतलब बुझू मानवता में सब जिबे!

हरि: हर:!

**

एक हाटके व्यथा – अपनहि लेख पर मनन करबाक पूर्ण अवसर भेटल, मुदा सुधारक उपाय नहि होइत देखि व्यथा किछु बढिये गेल, घटल नहि! 

https://www.facebook.com/notes/pravin-narayan-choudhary/why-mithila-falls-back-ponder/354974271183157

हरि: हर:!

**

गाँवमें सांस्कृतिक कार्यक्रम आ मैथिलीके घटैत माँग

पोरकाँ एहि कार्यक्रममें श्री कुञ्जबिहारी मिश्र एवं हुनक टोली आयल छल संगीत-नृत्य-मनोरंजन संध्याक लेल! एहि बेर छलाह जितेन्द्र संन्यासी म्युजिकल ग्रुप – झंझारपुर आ हिनकर गारंटी छलन्हि जे साक्षात्‌ कुञ्जबिहारीजीके नहि उतारि देब तऽ जे कहू… से एक रामकृष्ण झा गायक सहीमें हुनकर ट्रु-कॅपी बुझेला मुदा बाकी गाना कम आ नचाना बेसी छलन्हि आ नचानामें सेहो आइटम गर्लके तर्जपर प्रस्तुति देखल। बेर-बेर मन सोचयपर मजबूर होइत छल जे वास्तवमें एहि कार्यक्रमके असर गामके जनता पर केहेन पड़तैक आ जे मर्मके सोचि कार्यक्रम राखल गेलैक अछि तेकर सार्थकता कोना बनतैक? पैछला वर्ष जखन पूर्ण मैथिली कार्यक्रम राखल गेल छल तऽ करीब १-२ घंटामें आधा लोक सुतय लेल चलि गेल रहैथ, लेकिन पुनः ब्रह्म-मुहुर्तमें भीड़ जबरदस्त लागि गेल छल आ प्रस्तुति सभ सेहो एक पर एक देने छलाह संगीत समूह! एक-पर-एक! जेकर छाप यैह छल जे सम्भ्रान्त लोक सभके मुँहे केवल वाह-वाह निकलल! एहि बेरके कार्यक्रमके प्रशंसक सेहो कम नहि, केओ नाचि-नाचिके हाथ चमकाय नचनियाँके इशारा करैत छल तऽ कियो पिहकारी मारि के तऽ कियो V सऽ डुवेट प्रस्तुति लेल फरमाइश झाड़ैत करैत छल… महिला-पुरुष-बच्चा-बुढ सभ केओ दर्शक छलाह आ भीड़ टनाटन छलैक। कार्यक्रम मस्त चलि रहल छलैक। बेर-बेर संन्यासी घोषणा करैथ – बस शान्ति टा बनेने रहू – प्रस्तुतिके मजा लियऽ! लेकिन जोश रुकने थोड़ेक न रुकैत छैक, से बेर-बेर ओकरा देह पर ओ फाँगय आ ओकर दु मुक्का तेसर मारय – हुर्र-फुर्र होइते रहल। तही बीचमें समितिके लोक फट्ठा लऽ के होहकारी दैक, आ कि आरो वातावरण टेन्सनमें परिवर्तित होइ, बेसम्हार भऽ जाइ। खास बात ई जरुर छलैक जे जहाँ बीचमें तनाव होइक आ कि अभिभावकके पहुँचला सऽ वातावरण शान्त भऽ जाइक, याने मूलमें संस्कार गामक बचल अछि से विश्वास भेल। एकर अतिरिक्त मैथिली गीत गबैते लोकमें जेना अमृतवृन्दके फुहार पडैत छलैक, से सभ केओ शान्त भऽ जाइत छल। लेकिन जहिना-जहिना सामने सऽ महिला दर्शक के संख्या घटलैक, हमहुँ सभ हँटि गेल छलहुँ तऽ कहाँ दैन किछु अभद्र-कुप्रदर्शन सभ सेहो भेलैक। अन्ततोगत्वा परिणाम सोचले भेटलैक जे भोरे सँ समितिके फजीहत करनिहार सम्भ्रान्त लोक आ गुण गेनिहार युवा-तुरिया जेकरा नाचय-मजा लूटय लेल खुलिके मैदान भेटलैक – लेकिन मैथिलीके प्रभावशाली होयबाक प्रमाण भेटितो मैथिलीके घटैत माँग देखि हम जरुर किछु चिन्तित भेलहुँ। आवश्यकता ई देखलियैक जे आगामी समयमें मैथिलीके सेहो हिन्दी-भोजपुरी समान उच्छृंखलताके सन्हियाबय पड़तैक नहि तऽ चमक-दमकके कमी में एहेन नहि होइक जे भाषा बेदम भऽ जाय।

गाममें विद्यापति स्मृति पर्व समारोह मनेबाक संकल्प लैत अगिला समय तक के लेल विश्राम पर पहुँचि गेलहुँ आ आब विराटनगरके कार्यक्रम जे २८-२९ दिसम्बर, २०१२ केँ अछि ताहिपर ध्यान केन्द्रित करय लेल जा रहल छी।

हरिः हरः!

**

२३ नवम्बर २०१२

सामा-चकेवा गीत-नाटिकाकेर तैयारी चलि रहल अछि – एक भाव-नृत्य एहि तरहें राखल अछि:

सुन मोरा भैया सुनु हे सहेलिया, सामा-चकेवा के खेल यौ
भाइ-बहिनक प्रेमक गाथा, मिलि-जुलि गबियौ मेल यौ!
मानव बनि सभ जीव लऽ बनलहुँ बुझियौ अपन कर्तब्य यौ!
सभक सुख लऽ तप-जोग करियौ कर्म सदा संसर्ग यौ!
जखनहि कृष्णा सामा के दुषलाह भाइ भेला बड़ त्रस्त यौ!
चरण पिताके पकड़िके अनलाह बहिन बहनोईके गाम यौ!
हम सभ भाई-बहिन मिलि के मनाबी सामा चकेवा आ ईश यौ!
आउ सभ मिलिके पबनी मनाबी सुनी कथा जगदीश यौ!

हरि: हर:!

**

२३ नवम्बर २०१२

मिथिला क्षेत्र तऽ जगजननी सियाजी के अवतार होइते धन्य बनि गेल – मुदा मिथिला में अनेकानेक विभुति समय-समय अवतरित होइत रहलाह जाहिमें महाकवि विद्यापतिजी के नाम समस्त मैथिल जनमानस के संग विश्व भरिक विद्वान्‌ वर्ग जनैत छथि। हिनक जन्म १३५० ई. में भेल आ लगभग अपन १०० वर्षके जीवनकाल धरि अनेक सुप्रसिद्ध रचना सँ मैथिली साहित्यके समृद्धि प्रदान करैत रहलाह। अपन भावपूर्ण गीत आ रचना केर अम्बार सँ जन-जनके बोलीमें समा गेलाह। मिथिला के संस्कृतिमें बहुतो अवसरपर गीतनाद के परंपरा छैक – आ विद्यापतिजीके लिखल गीत एहेन हर अवसरपर सुनय लेल भेटैत अछि। हिनक गीतक माधुर्यता आ सरसता एहेन प्रभावशाली होइछ जे बटगबनी यदि गबैछ तऽ चारुकातके लोक सभ झुइम उठैछ।

कहल गेल छैक जे विद्यापतिजी ईश्वरकेर बहुत पैघ भक्त छलाह – एक उच्चकूलीन वंशमें जन्म लेल जाहिमें पूर्वहि सऽ सुन्दर संस्कारके परंपरा-धारा चलि आबि रहल छल। मैथिल ब्राह्मणक पंजी अनुसार गढबिसपी (बिस्फीके पूर्वनाम) में कर्मादित्य त्रिपाठी नामक ब्राह्मण रहैत छलाह जे एक राजमंत्री छलाह आ विद्यापतिजीके वंशके आदिपुरुष विष्णुशर्मा ठाकुर के पोता छलाह। कर्मादित्यके बाद हिनक वंशमें जतेक महापुरुष लोकनिक जन्म भेलन्हि सभ केओ तत्कालीन मिथिलाके राजदरबार में उच्चपद पर काज कयलथि – केओ राजमंत्री तऽ केओ राजपंडित – किनकहु महामहत्तक के उपाधि भेटल तऽ किनकहु सन्धि-विग्राहिकके। हिनक वंश अपन विद्वता आ बुद्धिमत्ताके कारण ओहि समय केर मिथिलामें बेजोड़ी छल। कतेको लेखक आ कतेको कवि भऽ चुकल अछि हिनक वंशमें आ सरस्वतीके अपूर्व कृपापात्र एहि परिवारमें विद्यापतिजी अद्वितीय भेलाह। हिनक पिता गणपति ठाकुर सेहो एक राजमंत्री आ नीक कवि छलाह। हुनक गंगाभक्ति-तरंगिणी नाम के एक पु्स्तक रचना भेल अछि। कर्मादित्यके पोता वीरेश्वर ठाकुर नान्यवंशी राजा शक्रसिंह एवं हुनक पुत्र हरसिंहदेव (सिमराँव गढके अधिपति) के राजमंत्री छलाह आ हिनक रचना छन्दोग्य-दशकर्मपद्धति भेल अछि जाहि अनुरूपे आइयो दशकर्म कैल जैछ। वीरेश्वरके सहोदर भाइ धीरेश्वर जे विद्यापतिके निज प्रपितामह छलाह, ओ महावार्त्तिकनै बन्धिक नाम सँ प्रख्यात छलाह। वीरेश्वरके पुत्र चंडेश्वर के रचनामें कृत्यचिन्तामणि, विवादरत्नाकर, राजनीति रत्नाकर एवं अन्य जोड़ि कुल सप्त रत्नाकर छन्हि। फोर्ट विलियम कॅलेज – कलकत्तामें एकर पाठ्यपुस्तकमें पढाई सेहो होइत छल आ बादमें एहि कॅलेजके बंगभाषाके अध्यापक हरप्रसाद राय १८१५ ई. में एकर भावानुवाद केने छलाह। चारिम पुस्तक कीर्त्तिपताका – एहिमें मैथिलीमें लिखल गेल प्रेमसंबंधी कविता सभ अछि। पाँचम ‘लिखनावली’ संस्कृतमें पत्रव्यवहार करयके रीति-वर्णित अछि। एहि पुस्तकके रचना राजबनौलीक अधिपति ‘पुरादित्य’ के लेल २९९ लक्ष्मणाब्दमें लिखल गेल छल। अही ठाम विद्यापति ३०९ लक्ष्मणाब्दमें ‘भागवत’ लिखब समाप्त केने छलाह। छठम पुस्तक शैवसर्वस्वसार जाहिमें भवसिंह सऽ विश्वासदेवीके समयतक जतेक राजा छलाह हुनक कीर्त्ति-कथा तथा शिवपूजाके विधि लिखल छैक। सातम पुस्तक गंगा वाक्यावली, आठम दान वाक्यावली जे राजा नरसिंहदेवके पत्नी धीरमतीके समर्पित कैल गेल छैक, नवम पुस्तक ‘दुर्गाभक्ति-तरंगिणी’ दुर्गापूजाके प्रमाण आ प्रयोगपर लिखल गेल छैक। एकर अतिरिक्त विभाग-सार (स्मृतिग्रंथ), वर्षकृत्य और गया-पत्तलक नामक संस्कृत पुस्तक सेहो हिनकहि रचना सभ थिकन्हि।

विद्यापति के प्रसिद्धि हिनका देल गेल विभिन्न महत्त्वपूर्ण उपनाम सभ सँ सेहो पता लगैछ। ‘अभिनव जयदेव’ के उपाधि सर्वप्रसिद्ध अछि। जेना संस्कृत-साहित्यमें, मधुर-श्रृंगार वर्णन में जयदेवके केओ जोड़ा नहि छथि, तहिना विद्यापतिजीके भाषा-साहित्यमें केओ जोड़ा नहि छन्हि। उक्‍त उपनाममें हिनक कविता रचना सेहो अछि:

सुकवि नवजयदेव भनिओ रे।
देवसिंह नरेन्द नन्दन। सेतु नरवइ कुल निकन्दन।
सिंह सम शिवसिंह राजा। सकल गुनक निधान गनिओ रे।

हिनकर अन्य उपाधि ‘कविशेखर’, ‘कविकंठहार’, ‘कविरंजन’, ‘दशावधान’, ‘पंचानन’, ‘चम्पति’, ‘विद्यापति चम्पई’, आदि सुप्रसिद्ध अछि।

विद्यापति शिवके परमभक्त छलाह। हिनकहि शब्दमें:
आन चान गन हरि कमलासन, सब परिहरि हम देवा।
भक्त बछल प्रभु बान महेसर, जानि कएलि तुअ सेवा॥

केओ चंद्रमाके पूजा करैत अछि, केओ विष्णुके पूजा करैत अछि, लेकिन हम सभके छोड़ि देल। हे बाण-महेसर, भक्तवत्सल जानि हम अहीं के सेवा कयलहुँ।

विद्यापतिक जन्मस्थान बिसपी सऽ उत्तर भेड़वा नामके एक गाममें बाणेश्वर महादेव केर मन्दिर छन्हि। कहल जाइछ जे विद्यापति हिनकहि उपासना करैत छलाह। एतबा नहि, हिनक बनायल अनेको शिवगीत आ नचारी सभ छैक, जे मिथिलामें हिनक पदावली सऽ बेसी प्रचलित छैक। हिनक पद बेसी स्त्रिगण गबैत छथि, पुरुषवर्गमें नचारी प्रसिद्ध छन्हि। तीर्थस्थान जाइत झुंड-के-झुंड कोकिलकंठी गीतहैर सभ हिनक मधुर पद गबैत झुमैत चलैछ, तहिना तीर्थयात्री पुरुष के झुंड बहुत प्रेमसँ हिनक नचारी गबैछ। कहल जैछ जे स्वयं महादेव हिनक भक्तिपर मुग्ध छलाह। एक अपरिचितके रूपमें हिनक सेवा करैत उगना के नामसँ महादेव अपन भक्तके मान-बढौलन्हि। इ भेद एक दिन बड़ रोचक रूपमें खुलल आ शर्तके अनुसार ओ रहस्य विद्यापति द्वारा अन्य किनकहु समक्ष प्रकट नहि करयके क्रमभंग भेल तऽ उगना महादेव अन्तर्धान भऽ गेलाह। तदोपरान्त भक्त महाकवि विद्यापतिके विलापरूपी रचना बहुत मार्मिक आ हृदयके छूबयवाला अछि:

उगना रे मोरा कतए गेलाह। कतय गेला सिव कीदहु भेलाह॥
भाँग नहि बटुआ रुसि बैसलाह। जोहि हेरि आनि देल हँसि उठलाह॥
जे मोर कहता उगना उदेस। ताहि देबओं कर कँगना बेस॥
नन्दन-वनमें भेटल महेस। गौरि मन हरखित मेटल कलेस॥
विद्यापति भन उगना सों काज। नहि हितकर मोरा त्रिभुवन राज॥

एहेन हिनक अनेको पदके रचना छन्हि जाहिमें इ उगना के छोड़ि अन्तर्धान भेला प्रति विलापपूर्ण सम्बोधन केने छथि।

विद्यापति शिव आ विष्णुके एकहि रूपके दू कला मानैत छलाह। हिनक पद्य अछि:

भल हरि भल हर भल तुअ कला। खन पितवसन खनहि बघछला॥

संगहि हिनक देवी दुर्गाके स्तुति के मनन कयलापर हिनक शैव, वैष्णवके संग शाक्त सेहो भेलाके पुष्टि होइछ। आम मैथिल के समान इ शिव, विष्णु आ चंडी – तिनू के मानैत छलाह, आ कोनो एक विशेष संप्रदाय मात्र के नहि छलाह। समस्त जीवनकाल धरि अपन आश्रयदाता राजा शिवसिंह एवं हुनक वंशके संग मिथिलाके सर्वथा कल्याण हेतु विभिन्न प्रकारके योगदान दैत महाकवि अपन उमरपर लक्ष्य करैत कहैत छथि:

बयस, कतह चल गेला।
तोहे सेवइत जनम बहल, तइओ न आपन भेला॥

वयस, तू कतय चलि गेलें? तोरे सेवैत अपन जन्म बितेलहुँ, तैयो ने अपन भेलें।

अपन मृत्युके बेर बुझि महाकवि अपन घरके लोकसँ विदा माँगैत नित्यचर्याके गंगास्नान के महत्त्व आ मिथिलाके परंपरानुसार गंगालाभ अर्थात्‌ गंगा किनार सेवैत अपन प्राण छोड़ी एहि धारणाके जिबैत अपन संतानकेँ इ कहैत जे प्रजारंजन करब, अतिथि-सत्कार में कहियो नहि चूकब, दोसरके स्त्रीके माय के समान मानब – तदोपरान्त अपन कुलदेवी विश्वेश्वरी के समीप जाय लेल अनुमति माँगैत जे माय आब गंगाजी जा रहल छी, जन्म भैर शिवजीके आराधना कयलहुँ, आब विदा करू… कहैत पालकीमें बैसैत घरसँ विदाह भेलाह। रास्तामें जखन गंगा सऽ किछु दूरी पर छलाह तऽ पालकी रखबा देलाह आ एक अभिमानी भक्त जेकाँ कहलाह – एतेक दूर सऽ माय के समीप अयलहुँ, तऽ माय हमरा लेल दू कोस आगू नहि बढि सकैत छथि? राइत बितल, दोसर दिन लोक दृश्य देखि अवाक्‌ रहि गेल! गंगा अपन धारा छोड़ि, दू कोसके दूरीपर पहुँचि गेल छलीह!! आइयो धरि ओहि स्थानपर गंगाके धार टेढ देखैछ। ओहि स्थानकेओहि स्थानके नाम मउ बाजितपुर अछि। साविकके दरभंगा जिलामें आब समस्तीपुरमें पड़ैछ आ एहि जगह विद्यापतिजीके देहावसान भेलन्हि। हुनक समाधिपर आइयो सुन्दर शिव मन्दिर अछि आ एक प्रसिद्ध तीर्थके रूपमें लाखो श्रद्धालू एहिठाम प्रतिवर्ष पहुँचैत एहि महान अवतारी पुरुषके आशीष लैत छथि। विद्यापति समान विद्वान्‌ आ कर्मठ वेत्ता लेल आइयो करोड़ों मैथिल नतमस्तक रहैत अछि आ हुनक स्मृतिगान करैत नहि केवल विद्वान्‌के सम्मानवर्धन करैछ बल्कि अपन धर्म आ कर्म हेतु हुनक आशीर्वाद सेहो पबैछ।

नमः पार्वती पतये हर हर महादेव!

Harih Harah!

PS: Mritynjoy Thakur – e aalekh paichhla varshak chhi.

**

आदर्श विवाह प्रारूप
By Pravin Narayan Choudhary in दहेज़ मुक्त मिथिला (Files) · Edit Doc · Delete
https://www.facebook.com/groups/dahejmuktmithila/doc/374593335884737/

ड्राफ्ट प्रस्तुत अछि – सुझाव आमन्त्रित अछि।

परिभाषा:
आदर्श विवाह:
एहेन विवाह जाहिमें वर पक्ष एवं कन्या पक्ष पूर्ण स्वतन्त्र भाव सऽ केवल वर-कन्याक विवाह हेतु सहमत होइथ तथा विवाह कोना होयत ताहिपर एक समाजिक समझौता तैयार करैथ जेकर मान्यता सर्वोपरि हो तथा हर कार्य ताहि समझौता अनुरूप हो। सामान्यतया एक आदर्श-विवाहमें कुल खर्चके सीमांकन अधिकतम ५१,०००.०० रुपया हो।

समझौता:
समझौता में प्रथमतः वर-पक्ष एवं कन्या-पक्ष आपसी वार्ता करैथ आ लगभग सभ विन्दुपर आपसी सहमति मौखिक रूपसँ तय करैथ तदोपरान्त समाजके उपस्थिति रखैत बेटीवाला सँ वैवाहिक खर्च संवरण लेल कि-केहेन सामर्थ्य छन्हि ताहिपर खुल्ला चर्चा करैथ आ दुनू पक्ष अपन-अपन भावना समाजके समक्ष राखैथ आ जाहि विन्दुपर सहमति-असहमति प्रथम वार्तामें बनल ताहिपर समाज के वरिष्ठ संरक्षण अभिभावकवर्ग सँ विचार लैत अन्तिम सहमति कायम करैथ आ एक लिखित समझौता तैयार करैथ जे दुनू पक्ष अपन-अपन ईष्ट कुलदेवी-देवताके समक्ष आशीर्वाद प्राप्त करय लेल राखैथ आ एहि अनुरूपें अन्य सभ बात सामान्य रहला पर अनुसरण करैथ। समझौता में सभ सऽ प्रमुख बात के पूर्णतः वर्णन हो कि कुल खर्च एतेक तक कैल जायत जाहिमें वरपक्ष के तरफ सऽ एतेक आ कन्यापक्षके तरफ सऽ एतेक।

विधि-व्यवहार:
परंपरानुसार जिनकर जे मान्यता होइन आ ताहि में जे जाहि धर्मके निर्वाह हेतु तैयार होइथ तेकर सम्मान एक-दोसर पक्ष समाजके प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण में अवश्य करैथ। जाहि विधि-व्यवहार करयमें अनावश्यक दबाव वा कंजूसी भऽ रहल हो ताहिठाम समाजके निर्णय अन्तिम मानैथ। विधि-व्यवहार लेल दुनू पक्ष अपन परंपराके देखैथ लेकिन आदर्श सिद्धान्त अनुरूप ई खर्चसीमा ५,०००.०० अधिकतम हो! लड़का-लड़कीके लेल आवश्यक परिधान अनिवार्य हो, तदोपरान्त हर वस्तु स्वेच्छिक रूप सऽ एक-दोसर पक्ष लेन-देन करैथ।

वैवाहिक संस्कार:
वैदिक वा अन्य परंपरा जाहिमें स्वयं के इच्छा आ समाज के सहमति दुनू देखल जाय आ ताहि अनुरूपें कैल जाय। जाहि अभिभावक केँ आवश्यक खर्च हेतु साधन नहि छन्हि हुनका सभके लेल हर गाममें एक सामूहिक विवाह के समय निश्चित हो आ ताहि समय पर एहेन विवाह सम्पन्न कैल जाय। एहि तरहक व्यवस्थापन लेल जे कोनो संस्था, व्यक्ति, समिति, आदि तैयार हो ताहि संस्थाके सामूहिक सहयोग दैत आयोजन कैल जाय। एक सामूहिक विवाह के पवित्र यज्ञ समान मान्यता भेटय आ एहिमें समस्त समाजके लोक बैढ-चैढके भाग लैथ। घरही किछु सहयोग जरुर संकलन कैल जाय।

बरियाती:
आजुक बदलल परिवेशमें ओना तऽ बरियाती के केवल विवाहके राइत मात्र स्वागत-सत्कार करैत विदाई के परंपरा सर्वमान्य एवं सुविधापूर्ण बनि गेल अछि, तथापि दूरके बरियातीके संग न्याय करैत कम से कम विश्राम के व्यवस्था आ भिन्सर हल्का ताजा ताजगी हेतु आवश्यक खानपानके सहित इन्तजाम करैत कैल जाय। परन्तु समाजके आदेश अन्तिम व समझौतामें एहि बात के उल्लेख आवश्यक। बरियाती के संख्या कोनो हाल में २५ सऽ बेसी नहि हो! यदि बेटाके विवाहमें बरियाती २५ सँ बेसी होइछ तखन बेटीवाला के आवश्यक खर्च बेटावाला उपलब्ध कराबैथ। यदि एक सांझ सऽ बेसी बरियाती ठहरब मजबूरी छैक तखनहु बेटावाला उपरिव्ययके भार गछैथ।

सोहाग:
मिथिलामें हिन्दू विवाह पद्धतिमें वर-कन्याके वैदिक विधिसँ विवाह भेला उपरान्त वरके पिता वा अभिभावक के समक्ष सेनुरदान आ तदोपरान्त कन्याके माथ पर आशीषस्वरूप में घोघट देबाक परंपरा छैक जाहिमें विवाह के साक्षी बनैत दान कैल कन्याके अपनायब आ हुनक इज्जतके अपन मर्यादापूर्ण व्यवहार सँ रक्षा करब से प्रतिबद्धता अभिव्यक्त करब समान छैक। एहि समय जे कोनो लेन-देन होइत छैक ताहिमें स्वेच्छाचार आ समाजिक मर्यादाके न्युनतम माँग पूरा होयब आवश्यक छैक, एहि लेल वर-पक्ष स्वतन्त्र हेबाक चाही आ कोनो प्रकार के टीका-टिप्पणीके प्रचलन समाप्त हेबाक चाही। सोहाग देबाक क्रममें बरियातीगण सेहो स्वतन्त्रता संग स्वेच्छा सँ जे किछु कन्याके हाथ में आशीषस्वरूप रखैत छथि ताहिके सम्मान हेबाक चाही। एहिमें विदाई के लोभ वा अन्तर-इच्छा सँ कोनो प्रकार के लेनदेन नहि हेबाक चाही। सामूहिक विवाहमें सोहाग लेल प्रायोजक अनुरूप कार्य कैल जाय। एहिमें समाजके सहयोग अपरिहार्य आ समाज के निर्णय अन्तिम होयबाक चाही।

चतुर्थी के भार:
जे आवश्यक विधि छैक तेकर पूर्ति सम्बन्धित पक्ष आपसी मेल-मिलाप सऽ करैथ, कोनो दबाव व आडंबर के हतोत्साह करबाक चाही। सामूहिक विवाहमें एहि तरहक समस्त विधि-व्यवहार के कटौती हो।

मधुश्रावणी में साँठ:
एहिमें सेहो कोनो पक्ष द्वारा दोसर पक्ष पर आडंबरी भार नहि वरन्‌ स्वेच्छा एवं परिस्थिति अनुरूप कार्य करबाक लेल प्रोत्साहित करैथ, एहेन व्यवहार हेबाक चाही। सामूहिक विवाहमें एहि तरहक समस्त विधि-व्यवहार के कटौती हो।

कोजगरा के भार:
प्रचलित मखान-मिठाई के वितरण हेतु जतेक संभव हो ततेक भार प्रदान कैल जाय, स्वेच्छा सर्वोपरि। सामूहिक विवाहमें एहि तरहक अतिरिक्त भार के कटौती हो।

द्विरागमन:
लड़कीके पिता/अभिभावक के तरफ सँ आवश्यक सामान जे एक गृहस्थीके बसाबय लेल देल जाइछ तेकर शुद्ध स्वरूप के निर्वहन हो। कोनो लेनदेन लेल सम्मुख-पक्षक हैसियत अनुकूल आ मानवीय धर्म अनुरूप व्यवहार के स्वागत हो!

अन्य विध-व्यवहार, भार-दौर: अपन-अपन इच्छा आ हैसियत अनुरूप, स्वेच्छानुकूल!

हरिः हरः!

**

२४ नवम्बर २०१२

आइ फेर मैथिली सेवा समिति द्वारा रामजानकी सेवा सदनमें एक वृहत बैठक भेल जाहिमें आगामी विद्यापति स्मृति पर्व समारोह २०६९ जे दुइ दिनक कार्यक्रम होयत आ पुस १३-१४, २०६९ केँ विराटनगरक विरेन्द्र सभागृहमें मनायल जायत ताहिके लेल कार्य-समितिक गठन कैल गेल। एहि बेरक कार्यक्रमके संयोजनक भार ई. फूल कुमार देवकेँ भेटल, तहिना सह-संयोजनमें अजित झा, जितेन्द्र झा एवं कोषाध्यक्ष मनोज मिश्र के संग-संग विभिन्न कार्य हेतु अलग-अलग उप-समिति सभके भार देल गेल। ज्ञात हो जे मैथिली सेवा समिति, विराटनगर २०४८ साल सँ लगातार विद्यापति स्मृति पर्व समारोह मनाबैत आयल अछि जाहिमें कवि-कोकिल-विद्वान्‌केर संस्मरण-श्रद्धाञ्जलिके संग-संग मिथिला संस्कृतिके झलकाबयवाला तरह-तरहके झाँकी-प्रदर्शनी, विचार-गोष्ठी, कवि-गोष्ठी, बाल-बालिका कार्यक्रम, मिथिला-पेन्टिंग प्रदर्शनी, मिथिला-खानपान-प्रदर्शनी, नाटक, नृत्य, संगीत एवं विभिन्न तरहक सांस्कृतिक कार्यक्रम कैल जाइछ आ एहि समस्त कार्यक्रममें नेपाल व भारत दुनू तरफक विद्वान्‌, नेतृत्वकर्ता, कवि, कलाकार, रंगकर्मी संग-संग दर्शककेर सहभागिता रहैत अछि। उपरोक्त कार्यक्रमके सल्लाहकार वरिष्ठ ई. रमाकान्त झा, डा. नारायण कुमार, भगवान् झा, डा. एस. एन. झा एवं डा. सुरेन्द्र ना. मिश्र छथि। तहिना समारोहके लेल तकनीकी पक्ष एवं संयोजन सल्लाहकार विशेष दलमें एस. सी. सुमन, प्रवीण चौधरी, जागेश्वर ठाकुर, वसुन्धरा झा, डिम्पल देव, नवीन कर्ण, प्रियंका यादव, राजेश झा, सुनील प्रियदर्शी, विश्वनाथ मंडल, कर्ण संजय, लगायत विभिन्न व्यक्तित्वक सहयोग रहत। एहि बेरुक कार्यक्रममें केवल स्थानीय कलाकार व रंगकर्मीके संग अलग-अलग झांकीके लेल सेहो सुन्दर सहभागिता रहत तेकर उम्मीद कैल जा रहल अछि। कार्यक्रमकेर मुख्य आतिथ्य पूर्वमें जेना उप-प्रधान तथा गृहमंत्री विजय गच्छदार एवं उपराष्ट्रपति महामहिम परमानन्द झा कयलन्हि तहिना अहू बेर नेपालक कोनो प्रमुख व्यक्ति जेना सम्माननीय प्रधानमंत्रीके आमंत्रित कैल जायत से नियार अछि। विशेष शुभ!

Information shared for publishing: Respected All: Dhirendra Premarshi Siyaram Saras Karuna Jha Swami Bodhi Pankaj Shyamal Suman S.c. Suman Appan Mithila Patrika Ratneshwar Jha Akhilesh Jha Ashok Avichal Ajit Azad Arvind Akoo Ashok Choudhary

**

२५ नवम्बर २०१२

संतान जनल मैथिली मैया
पोसली शौतिन हिन्दी मैया
पिता भेला मिथिलहि विदेह
आंगूर धैल अंकल-अंग्रेज

गुरु हेरेलथि तीर्थहि कात
मसटरसाब बंगौर सौगात
नहि घरे नहि कोनो घाट
धोबि कुत बनल वसात

पटकि-झटकि क छिटकी मार
लटकि-कटकि जिनगीके काट
बात-कथा गुल-गुल गप्पा
मार-मार मैथिल होशियार

जे जत शौतिन अंकल पास
से तत चमकी दनकल खास
जेकरहि जुडलहि ग्रास-कपास
वैह बीर बाकी रणछोडदास

पप्पा मैथिल बूडि बलेल
शहरी चच्चा केश फूलेल
मम्मी गौंवाँ गाम छोडेल
बोर्डिङ जा अंकल मिलेल

नीक-नीक गामक ई हाल
देखि मोंन हो अति-बेहाल
हे मैथिली! बनू दयाल
करु उद्धार बनू कृपाल!

हरि: हर:!

**

एहि आलेखमें विद्यापतिके नेपाली हीन व्याकरणी कहैत डा. मृदुला शर्मा हिनकर नेपाली भाषाक आदिकवि सेहो मानैत छथि। पृथ्वीनारायण शाह के नेपाली भूभाग एकीकरण सँ जोडैत कवि अपन कल्पनाशक्तिसँ सही लेकिन विद्वान् विद्यापतिकेर गान करैत छथि।

बंगालक दावी जे ओ हमर कवि थिकाह आ आइयो कलकत्तामें विद्यापतिकेर सम्मान मात्र मैथिल नहि बल्कि बंगाली सेहो ओतबा श्रद्धा सँ हिनका प्रति आदर-श्रद्धांजलि अर्पित करैत अछि।

राग्य: देशे पूज्यते, विद्वान: सर्वत्र पूज्यते!

http://www.majheri.com/node/8853

**

सभ्यताक विकासमें नारीके रूपक प्रशंसा किछु एहि तरहें हमरा समझ सऽ बाहर रहल, बुझाइत अछि जे नारीके पूजाक अनुशंसा जे हिन्दू धर्मशास्त्र केने अछि आ इस्लाम व अन्य कोनो धर्म-व्यवस्था जाहि तरहें नारीकेर सम्मान में तत्पर रहैछ तेकर बावजूद आखिर जीत तऽ ओकरे भऽ रहल छैक जे नारीकेँ प्रदर्शनकेर वस्तु अनुरूप प्रयोग कय रहल अछि। मानव समुदायकेँ ध्यान एहि तरफ आकर्षित करय चाहब। एकरा सभ्यातक विकास कहल जाय वा विनाश?

हरि: हर:!

**

26 नवम्बर २०१२

Vidyapati ke aadarsh vidwata, ish-bhakti, kureeti dur karabaak lel saahitya ke saarthaktaa pradaan karab… aa hunak samast anya aadarsh ke sweekaar karab me laaj nahi apitu aatma-sammaan ke baat hoichh. Gyan ke kami sa kateko lok moorkh rahait chhathi, ta hunkaa lel Kaka Jee ‘laaj’ ke prayog nahi, abhaagdashaa ke prayog upyukt hoyat. Harih Harah!!

**

विद्यापतिके मान्यता तऽ एतेक गहिंर छन्हि जे हमहुँ-अहाँ किछु लिखि लेब आ अन्तमें जोडि देबैक ‘भनहि विद्यापति गाओल, गाबिके सुनाओल हे! आ हे बेटा आ बेटी दुनू इक्वल, दहेजो त्यागू हे!’ तऽ फाजिल नहि हेतैक। बस गप पचयवाला हेबाक चाही! 

हमर कहबाक तात्पर्य यैह जे बिना अध्ययन केने हम सभ सात गो अन्हरा जेकाँ एकहि हाथीके छूबि अलग-अलग पहचान देबैक। स्मरण करू ओ दोहा:

विद्या धन उद्यम बिना – कहो जो पावै कौन
बिना डुलाये ना मिले – जयों पंखेकी पौन!

विद्यापतिकेर आदर्श कि? आउ देखी जे एहि प्रश्नक उत्तर कतेक अध्ययनक आधारपर हम सभ दऽ सकैत छी?

हरि: हर:!

**

दहेज कि थीक से बुझनाइ बहुत जरुरी। दहेज मुक्त मिथिला केवल माँगरूप दहेज के प्रतिकार करबाक लेल शान्तिपूर्वक आह्वान करैत अछि। जे पूर्ण आदर्श विवाह करैत छथि तिनकर यशगान करैत अछि आ युवा-युवतीमें जागृति बढेबाक उद्देश्य सऽ जगह-जगह एहि पर चर्चा-परिचर्चा करैत दहेज मुक्त विवाह करनिहार लेल आवश्यक फोरम सेहो निर्माण करैत अछि जाहिसँ आपसी-मिलान संभव हो, जेना सौराठ सभामें, वेबसाइटके मार्फत, ग्रुप मार्फत वा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष जेना दू पक्ष आपसमें वार्ता कय सकैथ ताहि तरहक इन्तजाम मिला दैछ। एकर अतिरिक्त संगठन के स्वरूपमें चलैत रहबाक लेल आ कर्मण्यताक पथपर अग्रसर रहबाक लेल एहि संस्था अन्तर्गत धरोहरकेर संरक्षण लेल सोच बनैछ, कार्य कैल जैछ। एहि में एखन धरि स्वयंसेवी सदस्य अपन जेबी सँ खर्च करैत जे किछु कार्य कय सकलाह छथि आ यैह आत्मसम्मान व स्वाभिमानके मूल थीक जे कोनो फालतुके दान-दक्षिणा-सहयोग लेल कदापि आतुरता नहि रखैत अपन-अपन सूझबूझ आ सोच अनुसार जैह किछु संभव हो से कार्य कैल जाय – एहि सिद्धान्तके अनुसरण कैल जैछ।

भ्रांति: दहेज मुक्त मिथिलाके नामसँ बहुत लोकके भ्रांति उत्पन्न होइत सेहो देखल गेल अछि। जेना:

*एहि संस्थाके दहेज प्रतिकार लेल युद्धकर्ताके भूमिकामें देखनाइ
*हिंसात्मक आन्दोलन चलेनहार के रूपमें देखनाइ
*विवाह कराबऽवाला संस्थाके रूपमें पहचान केनाइ
*चन्दा उगाही करवाला संस्थाके रूपमें बुझनाइ
*आइ अभियान शुरु भेल आ काल्हिये सऽ दहेज समान जड़ियायल दुष्टके उखड़ैत देखय लेल अपेक्षा रखनाइ

अपील:
अहाँ सेहो एहि में सदस्य बनि सकैत छी। लेकिन सदस्यता लेबाक लेल किछु शर्त सभ छैक। शपथग्रहण ई करू जे अहाँ नहिये माँगरूप दहेज लेब, नहिये देब। न धियापुतामें एहेन कोनो लेनदेन करब। आ नहिये एहेन दबावपूर्ण तरीका सँ केकरो सँ लेल गेल दहेज वला विवाह कार्यक्रममें सहभागी बनब। मूलरूप सऽ एतेक संकल्प लेलाक बादे अहाँ हमरा लोकनिक एहि प्रयास के बुझि सकब आ शान्तिपूर्ण आन्दोलनसँ समाज सुधारय लेल, धरोहर संरक्षण करैत मिथिलाक विकासक लेल सदस्यता लेब। सदस्यताक शुल्क साविकमें जे रहल ताहि तरहक बात आब नहि अछि। आब संस्था पंजियनलेल प्रक्रियामें अछि। आ नया प्रारूप जल्दिये प्रकाशित कैल जायत। लेकिन वर्तमानमें यदि केओ सदस्य बनय लेल चाहैत होइ तऽ मदन ठाकुर, नोएडा सँ सम्पर्क करी – ९३१२४६०१५० व अपन सहयोग स्वेच्छासंग करी।

हरि: हर:!

**

मैथिलीमें दहेज विरुद्ध भारतक कानून आ कतेको दहेज-मुक्त वर-कनियांक परिचय, संस्थाक परिचय, उद्देश्य, लक्ष्य, एवं अनेको तरहक जागृतिमूलक बात लेल अनेको फाइल्सके अध्ययन करबाक हो तऽ एहि लिंक पर क्लीक करू। हरिः हरः!

https://www.facebook.com/groups/dahejmuktmithila/files/

**

पर अपने लोकनि जरुर अपन-अपन प्रोफाइल निर्माण करी। हरिः हरः!

https://www.facebook.com/groups/dahejmuktmithila/ यदि फेसबुक के ग्रुप सऽ जुड़य लेल चाहैत छी, तऽ एहि लिंकपर ज्वाइन करू। हरिः हरः!

मैथिलीमें दहेज विरुद्ध भारतक कानून आ कतेको दहेज-मुक्त वर-कनियांक परिचय, संस्थाक परिचय, उद्देश्य, लक्ष्य, एवं अनेको तरहक जागृतिमूलक बात लेल अनेको फाइल्सके अध्ययन करबाक हो तऽ एहि लिंक पर क्लीक करू। हरिः हरः!

https://www.facebook.com/groups/dahejmuktmithila/files/

यदि रुचि हो जे देखी कि ई संस्था आइ धरि कि कयलक तऽ एक साल के लेखा-जोखा एहि लिंक पर देल गेल अछि: https://www.facebook.com/groups/dahejmuktmithila/doc/462861870391216/

हरिः हरः!

**

२७ नवम्बर २०१२

मिथिलाक पाग – आब पेन्ट-सर्टपर सेहो सूट करैत छैक। ओना धोती-कुर्ता-बंडीपर पागक शोभा के वर्णन कि, सम्भ्रान्त व सशक्त व्यक्तित्वके झलक भेटैछ अपन पहिरन-पोशाकमें! संगहि मैथिल बुद्धिके दाद देबय पडत जे अहु पागके जातिविशेष हेतु कहि आपसी सौहार्द्र बिगाडैत अछि। हमरा ओ कहावत बेर-बेर मोंन पडि जाइछ जाहिमें कहल गेल छैक जे बानरके बुद्धि बढलापर कहाँदैन बाँसमें फाँगय चलि जाइछ आ कनेकबा कालमें ओकर अण्डकोष चेपा जाइत छैक आ प्राण अपटी-खेतहि चलि उडि जाइत छै। कहीं मैथिल संग यैह हाल तऽ नहि जे अपन संस्कृतके जोगाबय लेल बाँसमें फाँगि रहल अछि?

हरि: हर:!

**

फेसबुकके माध्यम सेहो मैथिली-मिथिलाक कतेको आन्दोलन आँधी जेना अबैत बिहैर जेना बिलैत देखल गेल। पता अछि किऐक? बस कोहुनाके लोक के बुझा देब जे देखू हम कतेक पैघ चिन्तक छी जे अपन समाज लेल सोचैत छी, परिवर्तन नीक आ पवित्र समाज निर्माण लेल चाहैत छी। दाबी बड पवित्र, सच में! लेकिन जहाँ देखलहुँ जे आब पब्लिसिटी कमजोर पडि गेल तऽ लंगोट कसि ततेक दूर परेलहुँ जे फेर लोक पाछु सऽ बजबैत रहि जेता तऽ पलटि-पलटि राँरी-बेटखौकी गाइर उलटे पढैत अपने मोंने डायन-मंत्र बर्बरैत भगैत हिमालय पहाडके खोहमें नुकाय जायब। लोक सभसँ दूर शेरो-शायारी करब, अपने लिखि अपने लाइक करब – वाह-वाह! तहू सऽ नहि भेल तऽ गुदगुदी लगाय अपनहि सऽ हिहिहि-हाहाहा हँसैत रहब। धू जी! समाज लेल सोचैत-सोचैत ई कोन रोग धऽ लेलक यौ? कहियो-कहियो राइत-बिराइत गाम लौटियो जायब तऽ चुगला जेकाँ चुगली लाइर कऽ दु-चारि-दसगोमें झंझैट फँसाय पुनर्मुसिको भव! 

सुधरू यौ मैथिल कुटिल बुद्धिक धनिक चोर! बेसी कि कहू! कहियो-कहियो अन्तर्मनमें मनन करू जे खोंखी सऽ मेघक गर्जन नहि होइत छैक। निरन्तर युद्ध करय पडैत छैक। निरन्तर!

हरि: हर:!

https://www.facebook.com/PravinNarayanChoudhary

**

मिथिला-मैथिली लेल शुभ-समाचार

विद्यापति स्मृति पर्व समारोह सँ मिथिला लगायत समूचा जगत एखन विद्वान्‌—- – कवि – समाजसुधारक – राजनीतिज्ञ – मर्मज्ञ – भक्तमान्‌ विद्यापतिकेँ श्रद्धाञ्जलि अर्पण कय रहल अछि आ जगह-जगह मैथिलमें स्फुरणाक नव जागरण भऽ रहल अछि। एहेन अवस्थामें यदि हमर ज्येष्ठ करुणा झा पुनः जागि जाइथ तऽ हमरा लेल ई कोनो नव गप नहि भेल। लेकिन सच पुछू तऽ मिथिला लेल बड पैघ घोषणा कयलीह छथि। हम निम्नरूपमें हुनकहि वचन अनुरूप प्रकाशित करय लेल जा रहल छी।

“आइ श्रीमती करुणा झा – कर्मठ महिला समाजसेवी, विभिन्न संघ-संस्थासँ जुड़ल सक्रिय मैथिलानी – मिथिला लेल समर्पित कार्यकर्त्री – विशेषरूपसँ दहेज मुक्त मिथिलाक अध्यक्षा (नेपाल) व अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद्‌ (नेपाल) के अध्यक्षा द्वारा दुइ महत्त्वपूर्ण पुरस्कारकेर घोषणा कैल गेल अछि।

१. शहीद रंजू झा पुरस्कार: पुरस्कारके राशि नकद ५,०००/- संगहि प्रमाणपत्र – केवल महिला (मैथिलानी) लेल जिनक मानव जीवनक कोनो विधामें उत्कृष्ट योगदान होयत आ ओ नेपाल या भारत दुनू में सँ कतहु के होइथ, तिनका अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद्‌ (नेपाल) द्वारा ओ पुरस्कार देल जायत।

२. शहीद डा. लक्ष्मीनारायण झा पुरस्कार: पुरस्कारके राशि नकद ५,०००/- संगहि प्रमाणपत्र – महिला वा पुरुष सभक लेल जिनक मिथिला-मैथिलीक सेवामें उत्कृष्ट योगदान होयत आ ओ नेपाल या भारत दुनूमें सँ कतहु के होइथ, तिनका अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद्‌ द्वारा ओ पुरस्कार देल जायत।

एहि बातक घोषणा अगिला शनि दिन राजविराजमें प्रेस कन्फ्रेन्स करैत श्रीमती झा औपचारिक घोषणा करती।

संगहि, दोसर खुशखबड़ी जे हिनका द्वारा मैथिली-मिथिला-मधेस-नेपालक सेवामें लांचिंग कैल गेल नव एफ.एम. ९४.७ केर उद्‌घाटन उपराष्ट्रपति (नेपाल) महामहिम परमानन्द झा द्वारा आगामी दिसम्बर ११, २०१२ केँ कैल जायत।

बहुत हार्दिक बधाई व सफलताक शुभकामना दैत श्रीमती झा केर मनोबल सदिखन अहिना उच्च रहैन आ कदापि केवल प्रदर्शन लेल नहि अपितु सत्य-मातृ-सेवा लेल अविरल-निरन्तर समस्त रुकावटसँ लडैत-जुझैत आगू बढैत रहती से कामना करैत छी।

हरि: हर:!

**

२८ नवम्बर २०१२

इन्टरनेट पर मैथिली के इतिहास मे पहिल बेर जेना पाक्षिक पत्रिका आयल विदेह, पहिल समाद पत्र आयल इसमाद, तेनाहिते पहिल मैथिली सोशला साईट मिथिलाफेस आयल, आब पहिल मैथिली डोमेन नाऊ आ होस्टिंग साईट आबि रहल अछि
http://yummyhost.in
एतए आबि फूटर मे जाकए भाषा बदलु,( एखन भाषाक नाऊ बदलवाक प्रयास जारी अछि कियाक त भोजपुरी स मैथिली केना करब ताकि रहल छी, जल्दीए क देब), बिहारी करू ताहि के बाद देखु पहिल मैथिली डोमेन आ होस्टिंग साईट. अपन कमेंट्स क क जरुर उत्साहवर्धन करू

**

महानुभाव,

मैथिली-जिन्दाबाद नामक एहि साइट द्वारा मैथिलीकेर सेवा करैत मिथिलाक उत्कर्ष सँ समस्त मैथिलकेँ जागरण करेबाक कार्य कैल जायत। मिथिलाक गान के नहि गबैछ, लेकिन स्वयं मैथिल याने हम सभ अपने सँ अपन भाषाके त्याग करैत छी, अपन संस्कृतिकेँ बारीक पटुआ तीत समान बुझैत कतियाबैत छी आ कौआ रहैत मयुरक पाँखि पहिरि झूठक नाच देखाबैत छी। मिथिलाक अपनहि बेटा जखन खड़्हुवान जेना आपसमें कहा-सुनी करैत लड़ैत आन देखैत अछि तऽ ओकरा हंसी सेहो लगैत छैक आ ओहो मौकापर चौका लगा दैत अछि। मोंने-मन मिथिलाक प्रशंसा करितो ओ मैथिलकेँ दस गो गैर जरुर दऽ दैत छैक। अतः आत्मनिरीक्षण करैत हम सभ अपन आत्मसम्मान लेल काज करी, मैथिली-मिथिला लेल सेवाभावना सँ अपनाकेँ तैयार करी। जाबत आत्मसम्मान नहि ताबत गैर-सम्मान लेल कदापि अपेक्षा नहि कैल जा सकैत छैक।

विकास लेल मिथिला राज्य जरुरी!

हरिः हरः!

**

मिथिलाक शान लेकिन बनल छथि गुमनाम!

चिन्हू हिनका! नाम भेल विरेन्द्र झा, गाम भेल सप्तरीक भारदह, भातीज भेला उदित नारायण समान चमकैत मैथिल-ज्योतिके आ वर्ग तीसरासँ पढाइक संग गायन करैत छथि। हाल विराटनगरमें रहैत छथि। २०३५ विक्रम संवतमें हिनकर जन्म भेल अछि, योग्यता: बी ए (संगीतमें प्रतिष्ठा) रविन्द्र भारती विश्वविद्यालय, कोलकाता सँ केने छथि। माध्यमिक स्तरक परीक्षा उपरान्त अपन जीवनमें गायन केर कैरियर बनायब निर्णय कयलन्हि। २०५१ वि.सं. में काठमाण्डु पहुँचि पशुपतिनाथ मन्दिरमें भजन गायन सँ अपन कैरियर शुरु केलाह। मन्दिरमें आबय-जायवाला एक सऽ एक नेपाली व मैथिल विद्वान्‌जन सभसँ भेंट भेलन्हि। विरेन्द्र स्मरण करैत छथि धीरेन्द्र प्रेमर्षिजी संग भेंट आ सहयोग के अपेक्षा, जाहि समयमें प्रेमर्षिजी नेपाल रेडियोपर हिन्दी समाचार वाचक छलाह। तहिना स्मरण करैत छथि विराटनगरवासी प्रसिद्ध संगीतकार विजय सिंह मुनाल केँ जे नहि सिर्फ संगीतकेर शिक्षा देलन्हि बल्कि अपन विशेष अनुग्रहसँ संगीत क्षेत्रमें सफलतम प्रवेश सेहो करेलन्हि, एक सऽ एक प्रसिद्ध गीतकार-संगीतकार-फिल्मकार सभ संग भेंट करबैत समुचित प्रोत्साहन दैत रहलाह। संयोगवश एहेन गुरुक हाथ माथपर भेटल जे हमर काका (उदित नारायण) केँ सेहो प्रशिक्छित केने छलाह। सभसँ बेसी सहयोग शंभुजित बासकोटाजी केर भेटल जे नेपाली फिल्म के सुप्रसिद्ध संगीतकार छलाह। शुरुआतमें नेपाली गीत बेसी गबैत रहलहुँ, प्रसिद्धि सेहो भेटल। लेकिन कुसंयोग कही वा कि, जहिया सऽ अपन मातृभाषा मैथिलीमें गायन शुरु केलहुँ तऽ जेना नेपाली फिल्म संग नाता टूटि गेल आ कैरियर प्राय: सिमैट गेल जेकर आब अफसोस होइत अछि। आशाक बिपरीत अपन मातृभाषाक सेवा सँ नुकसान भेल। बासकोटाजी सेहो दूर भऽ गेलाह कारण मैथिलीक बाजार नगण्य छैक। मैथिल सभ अपनहि सँ अपन सम्मानजनक भाषाक चौपट कय लेने छथि से आब बुझैत अछि। नेपाली-हिन्दी गीत गायन सँ जतय हमरा २२७ गो ट्रफी भेटल ततय मैथिली गायन सँ आइ धरि एक पाग मात्रके सम्मान भेटल अछि। एकरा हम विडंबना मानी आ कि मैथिलीक दुर्भाग्य से नहि जानि कि कहू? बादमें फिल्म लाइनमें सेहो अपन तकदीरके आजमाइश केलहुँ, लेकिन ओतहु एक मैथिल किसलय कृष्ण जे अपने सँ तकैत-तकैत हमरा गामपर सऽ सङोर बनेला वैह बादमें समूचा सप्तरीमें अपन अनेको फरेबी-धंधासँ धोखा मात्र देलाह, नहि कि कोनो अवसर! अपना आपसँ घृणा होवय लागल फेर… अन्तमें अपन समस्त टैलेन्टके छोड़ि आब विराटनगरमें प्राइवेट नौकरी कय रहल छी जाहि सँ नीक गुजर भऽ रहल अछि। लेकिन यदा-कदा गीत-संगीतके जन्मजात स्वभाव हमरा ऊपर आइयो हावी होइछ आ आइयो सोच बनेने छी जे पूर्वाञ्चलमें एक संगीत महाविद्यालय के स्थापना करी जाहिमें नेपाल सरकारसँ आ अपने सभसँ सहयोगके आशा रखैत छी।

विरेन्द्रजीके मनोभावना बहुत आहत केलक आ मैथिलक असहयोगी स्वभाव सभक कथा-गाथा सुनि स्वार्थी मुदा देखावटीमें महानताक बात बहुत मैथिलक सुनि काफी चोट सेहो पहुँचल।

हरि: हर:!

**

लगनक समय फेर आबि गेल। मिथिला लेल शुभ समाचार यैह जे बेसी विवाह आब दहेज मुक्त होवय लागल अछि। दहेज मुक्तके माने ई नहि जे उपहार-सर-समान-नकदके लेन-देन नहि होइत छैक, मुदा स्वेच्छा सऽ दू पार्टी मिलिके लेन-देन करैत छथि जे दहेजक माँगरूप नहि थीक आ ताहि कारण दहेज मु्क्त विवाहके संग्या देलहुँ।

एक बहुते खास बात देखलहुँ जे आब कतेको वर जिनकर घटक साफे नहि अबैत छन्हि, भले कतबो मुँह बौने रहैत छथि, तखन दहेज के बाते कि कहू, बेटीवाला सभके सेहो भाव बढल देखलियैक। बेटावालाके चिन्ताजे कोहुना घर पुतोहु अबितैथ, लेकिन बेटीवाला सभ बेटीके कैरियर निर्माण उपरान्त मात्र कुटमैती करब से कहैत छथि आब। मोन खुश भेल! लेकिन अशिक्षित वर्ग में एखनहु समस्या छैक आ दहेज बहुत नहियो तऽ बेटी बोझ जरुर बुझैत छैक। बेटीके पढाइ करेनहार में एक मनोबल बढल देखैत छी जे बेटी आब बेटा जेकां माता-पिताके लेल सहारा सेहो बनैत छथि। जमाना बदैल रहल छैक।

दहेज मुक्त मिथिलाक सदस्य सभ यदि अपन-अपन गाममें सेहो किछु सार्थक काज करबाक भार लैथ तऽ परिवर्तन के वयार जरुर शीघ्रहि बहतैक, आ आन्दोलन गाम-गाममें पसैर जायत। काज केवल एतेक करबाक छैक जे एक समिति बनाय पढल-लिखल बेटीके लाभ ऊपर गामके हर वर्गमें जागृति पसारैत बेटीके शिक्षा दियेबाक-देबाक नियम लगबाबैथ। एहि सँ जल्दिये चेतना जागत जे दहेज के बात छोड़ू आ शिक्षा पर जरुर ध्यान दियौक। नितीश कुमार एक काज बड़ नीक केलाह जे लड़की सभके साइकिल देलाह। आब बचिया सभके साइकिल, मोबाइल आ किताबक वस्ताक संग देखैत छी तऽ मोंन आरो खुश भऽ जाइत अछि।

जय हो!

हरिः हरः!

**

रामायण (रामचरितमानस सँ)

कुसंगके चलते धुआँ कालिख कहाइछ, वैह धुआँ सुसंगसँ सुन्दर रोशनाइ बनि शास्त्र ओ पुराण लिखय के काज में अबैछ। वैह धुआँ पाइन, आइग आ हवा संग मिलि बादल बनि जगतकेँ जीवन देबऽवाला बनि जाइछ।

कुसंग के कारण धुआँ कालिख कहलाता है, वही धुआँ सुसंग से सुन्दर स्याही बनकर शास्त्र पुराण लिखने के काम आता है। वही धुआँ जल, अग्नि और पवन के साथ मिलकर बादल बनकर जगत को जीवन देने वाला बन जाता है।

The smokes with bad company blacken the things and are thus identified as blackish, same smokes with good company turns to form the ink which is used to write great scriptures. Same smokes with good companies like water, heat and air turns into cloud and gives rains which is essential for life to the world.

Harih Oum!

**

२९ नवम्बर २०१२

मिथिला मिडिया आ मिथिला पेन्टिंग

प्रगतिशील मैथिलक बहार इन्टरनेट व फेसबुककेर दुनिया सँ देखय लेल भेटैत अछि। मिडिया हो या पेन्टिंग, दुनूमें विकास भारत भरि पसरल विश्वके संदेश दैत देखैत अछि। हमर आजुक विचार सेहो यैह विषय एहि लेल चुनलक जे बिबिसीपर समाचार पढलहुँ कि राँटी व मधुबनीक आसपास में पर्यावरण के संजोरबाक लेल एक स्थानीय गैर-सरकारी संगठन ‘ग्राम विकास परिषद्’ बहुत सार्थक कार्य जमीनपर कय रहल छथि। सडक किनारक गाछ सभपर मिथिला पेन्टिंग करैत गाछके काटि विकास नहि वरन् गाछके सजाय विकास दिस आगू बढबाक संदेश दऽ रहल छथि। एहिसँ इलाका सुन्दर दुलहिन जेना सजि रहल अछि आ पर्यटक सभ दिन-दिन देखय लेल आबि रहल छथि, सुहाओन बाग-बगिया व सडकक किनारक गाछ सभपर रंग-बिरंगी मिथिला पेन्टिंग बहुत बेहतरीन माहौल बना रहल अछि। संचालक षष्ठि नाथ झा मिथिला पेन्टिंगकेर कलाकार सभकेँ सेहो उत्साह बढा रहल छथि। धीरे-धीरे अभियान चारू दिस पसरत तेकर बहुत पैघ संभावना बनि रहल अछि। सार्थक कार्य होयब देखि समस्त मिथिला शुभकामना देबाक लेल आतुर बनि रहल छथि। पेन्टिंग अवश्य उत्कृष्टता तरफ उन्मुख अछि।

मिथिला पेन्टिंगमें काफी संभावना छैक। नेपालमें सेहो विभिन्न कोष द्वारा एकरा राष्ट्रीय संरक्षण देबाक बात सुनैत आयल छी। जरुरत छैक जे नियमित कार्य हो, प्रशिक्षण कार्यक्रम हो आ तैयार भऽ रहल पेन्टिंगके बाजार उपलब्ध करायल जाय, देशमें वा विदेशमें, जाहिमें राजकीय प्रयास आरो तीव्र कैल जाय के जरुरत छैक। केवल औपचारिक रूपमें राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री द्वारा सम्मान नहि, बल्कि प्रशिक्षणके नीक व्यवस्था आ तैयार वस्तुके मूल्य प्रदानके जरुरत बेसी बुझा रहल अछि।

आब आउ मिथिलाक मिडिया-विकास के वर्तमान दृश्य देखी। इन्टरनेट द्वारा समाचार प्रसारण सहज बनल बुझैछ। मिडियाक राष्ट्रीय विकास मिथिलामें सेहो गाम-गाम पहुँचल देखैछ। मोबाइल फोन बहुत पैघ क्रान्ति पसारलक एहि विकासमें! संजाल तऽ हर जगह बनल, मुदा मैथिलीके जगह हिन्दी अखबार लेल! मैथिलीमें जेहो छल से विपन्नताक शिकार बनि बहुत पहिनहि दम तोडि देलक, व किछु रास जे चलि रहल अछि ओ हुक-हुकी संग टिमटिमैत तरेगन जेना अनियमित रूपमें, बस कतहु-कतहु आ कखनहु-कखनहु! लेकिन नगण्य कहियो नहि भेल। पाठक नगण्य छथि। जेना अन्य भाषालेल मारि देखलहुँ तेना मैथिलकेँ मैथिलीलेल कोनो आतुरता नहि देखलहुँ, बेशक परित्याग करैत खूब देखलहुँ जाहि कारणे शायद मैथिली भाषाक मिडिया विकास कमजोर रहल लगैछ। लेकिन आब किछु नव संभावना जागल बुझैत अछि। मिथिला भूमिसँ मिथिला-प्राइम, कलकत्तासँ मिथि-मिडिया आ बहुत पैघ समय सँ मैथिलानीक संयोजनमें चलि रहल ईसमाद आ तहिना विदेह पन्द्रहियापर प्रकाशित होइत आयल अछि। हेल्लो मिथिला (कान्तिपुर) एफ-एम तऽ समस्त मिथिलामें एक नव-क्रान्ति पसारलक। असल सृजनशीलताक संग धीरेन्द्र प्रेमर्षि एवं रूपा झाजी केर युगल प्रस्तुति भले केकरा नहि झकझोरिके जगेने होयत, सम-सामयिक-सान्दर्भिक विषयपर कार्यक्रमके केन्द्रित रखैत आधुनिकताक फ्युजन समेत प्रयोग करैत प्रेरणाके निरन्तर प्रवाह करैत आयल अछि हेल्लो मिथिला! परिणामस्वरूप समूचा नेपालकेर मिथिला-मधेसमें आइ मैथिली कार्यक्रमके बहार आयल बुझैत अछि जे लुढकैत-टुघरैत मैथिली-मिथिलामें अवश्य नव-प्राण प्रदत्त केलक बुझैछ। नेपालक प्रमुख समाचारपत्र गोरखापत्रमें सेहो एक विशेष परिशिष्ट मैथिलीमें अबैछ हरेक पन्द्रहियापर! जनकपुर, राजविराज, लहान, विराटनगर, काठमाण्डु सभसँ विभिन्न पत्र-पत्रिका मैथिलीमें प्रकाशित होइत आयल अछि। विराटनगरक मकालू टीवी मैथिलीकेँ विशेष स्थान देने अछि, समाचारके दु-तीन बुलेटिन मैथिलीमें आ संगहि मनोरंजन व जागृतिमूलक अन्य कार्यक्रम सभ सेहो मैथिलीमें कैल जैछ।

मिडियाक विकासमें सभ सऽ पैघ प्रयास डा. चन्द्रमोहन झा द्वारा कैल गेल अछि। अजित आजाद, अरविन्द ठाकुर, कुमार शैलेन्द्र, आदि जेहेन विद्वान-जुझारू सक्रिय कार्यकर्ताक समूह द्वारा बहुत जल्दी मिथिलाक अपन अखबार ‘मिथिला-आवाज’ दरभंगासँ प्रकाशित होवय जा रहल अछि।

हम कोना बिसरू – आकाशवाणी, अल-ईण्डिया रेडियो व यदा-कदा रेडियोके विदेशक चैनल सभपर मैथिली सुनय लेल सेहो भेटैत रहल। बचपन तऽ रेडियोक दीवाना छल! 

मिडिया व पेन्टिंग दुनूके निरन्तर विकास मिथिलाक पहचानके अखण्ड राखत से शुभकामना दैत छी! पाठकवर्गसँ निवेदन जे अपन भाषाक पत्र-पत्रिका-पुस्तक-प्रसारण-प्रोग्राम ताकि-ताकि हासिल करी!

हरि: हर:!

**

३० नवम्बर २०१२

शर्म-लाज आ आत्मंथन

मिथिला विभूति पर्व मना रहल छी, विद्यापतिक गान कय रहल छी, मैथिली-मिथिला लेल दिल्लीमें धरना दऽ रहल छी, काठमांडुमें वार्ता कय रहल छी – मैथिली मिडियापर, मुख्यरूप सऽ फेसबुकपर धूम-धड़ाक फूल-फटाक खुब पढि रहल छी। लेकिन दू मुख्य बात लेल कियो नहि सोचि रहल छी:

ध्यानाकर्षण:

१. मिथिला राज्य लेल शान्तिपूर्ण आन्दोलन करनिहार पर अही वर्ष निज जानकी नवमीके दिन बमसँ मिथिला विरोधी अराजक तत्त्व द्वारा हमला कैल गेल। मैथिलानी रंगकर्मी रंजूसहित कतेको निर्दोष मैथिल शहीद भऽ गेला, दर्जनो लोक घायल भऽ गेलाह, आँधी-तूफान ठाड़्ह भऽ गेल…… लेकिन अपन समृद्धिके दंभ भरनिहार हम मैथिल केवल फूइसगानमें मस्त छी आ एको बेर शहीद एवं आन्दोलनकर्मीके प्रति कतहु कोनो संबोधन तक नहि अछि, से किऐक?

कि एखन धरि नेपाल सरकार, भारत सरकार, राष्ट्रसंघ, अन्तर्राष्ट्रीय समुदायकेर ध्यान एहि जघन्य अपराध दिस खींचि सकलहुँ हम सभ? यदि नहि तऽ किऐक?

किऐक नहि चूड़ी पहिरि हम सभ अपन-अपन घरेमें अपन विद्वताक गान करैत छी, जे हम सभ बड विद्वान्‌, बड होशियार बस सहिष्णुताक कंबल ओड़ि मिथ्याचारक घी पीबि रहल छी?

व्यक्तिगत विकास में थोड़ेक न केकरो सऽ पाछू छी??

आ बूड़ि लोक सभ छथि जे आगू-आगू लड़ि रहल छथि। हुनको सभ के कि कहबैन…. कनेक नाम होइते पुनः पराइत छथि दोगे दिस आ लॅलीपॅप पबिते भऽ जाइत छथि खुश, बिसैर जाइत छथि मिथिला-मैथिली आ जपय लगैत छथि पदलोलुपताक चाटुकारी गीत।

“पदे-पागल, पदे-पागल!
कते मिथिला – कथी मैथिली!
बिसैर गेलियौ सभ मातृप्रेम!
गेलौ संस्कृति भाँड़में!
हम पीबि ताड़ी केश तेल फूलाय –
मस्त छियौ मस्तीमें!”

आइ धरिके इतिहास किछु यैह कहि रहल अछि, कहाँ केओ आब चुनचुन बाबु असगरो सड़क पर सुति दुबगली रास्ता जाम करैत चिकरैत छथि, भीख नहि अधिकार चाही, हमरा मिथिला राज चाही?

२. २०१२ ई. में मिथिला लेल दोसर अशोभनीय घटना घटल – मिथिलाक सुप्रसिद्ध गायक जिनक आवाज व उच्चारण सँ मैथिली (सीताजी) केर निनाद प्रकट होइत रहैत अछि, जे गबैत छथि तऽ बुझाइत अछि जे विद्यापति साक्षात्‌ उपस्थित भऽ गेला आ देवी सहित महादेव स्वयं ताण्डव करैत छथि… घन-घन घनन घुघुर कत बाजय – हन हन कर तुअ काता – आह! दैवके प्रकोप कहू जे एहि प्रखर गायक के सुन्दर संतुलित संगीतक टोली एक सड़क दुर्घटनाक शिकार बनि बस नारायण कवचके प्रभाव सऽ स्वयं सहित बहुत कलाकार केर प्राण रक्षा तऽ भेल मुदा निर्बल-निर्धन तीन मशहूर मिथिलासेवी कलाकार व एक परम निर्दोष ग्रामीण अपन प्राण नहि बचा सकलाह। एहि बेर स्वर-सम्राटक आवाज मिथिला भूमि पर एहेन शुभ घड़ी कतहु सुनय लेल नहि भेटि रहल अछि।

लेकिन संस्था व आयोजक के एतेक चिन्ता तक नहि जे ओतेक खर्च करबे करब तऽ मृतक व घायल असहाय मिथिला-मैथिलीके निरन्तर सेवा प्रदान करनिहार कलाकार सभके सहायतार्थ किछु पठाबी, एहि बातक चर्चा कतहु नहि देखलहुँ आ ने सुनलहुँ आ नहिये पढलहुँ! कि हमर सभक आत्मसम्मान नहि धिक्कारि रहल अछि? या फेर हम सभ किनको पैघ योगदान के एतबी मूल्य गानैत छी जे विपत्तिके समय एक बेर पूछो तक नहि?

मैथिली सेवा समिति – विराटनगर सेहो आगामी दिवस विद्यापति स्मृति पर्व समारोह २०६९ मनाबय लेल जा रहल अछि। हमर प्रस्ताव जे उपरोक्त दुनू विन्दुपर अवश्य विचार करैत आवश्यक कार्यवाही कैल जाय। आत्मसम्मान सँ स्वाभिमान प्राप्त होइछ। केवल नाच-गान लेल कदापि हम सभ विद्वान्‌ कवि, समाज के हितकारी व भक्तमान्‌ विद्यापतिक नाम नहि बेची; यैह प्रार्थना समेत समस्त मैथिलजन सँ आत्ममंथन करैत उपरोक्त दुनू मुख्य विन्दुपर ध्यानाकर्षण चाहैत छी।

हरिः हरः!

**

१ दिसम्बर २०१२

बिहार सरकार हो या भारत सरकार या नेपाल सरकार – विचारू कने….. कोनो आन भाषा जाहिमें पढबाक बाध्यता छैक लोक कतेक जल्दी बुझैत छैक, आ फेर वैह बात यदि अपन भाषामें सिखायल जेतैक तखन कतेक जल्दी बुझतैक, से ट्राइ कऽ के देख लियौक। हमरा तऽ ओहिना याद अछि, बिहार सरकार सेहो कोनो समय पहला-दूसराके समूचा किताब मैथिलीमें छपबाय विद्यालयमें मुफ्त बँटवेने छल आ तेकर सुखद परिणाम रहलैक जे गामके सभ वर्गक लोक विद्यालयमें पढय लेल आयल। पता अछि, यदि मातृभाषामें पढाइ हो तऽ लिट्रेसी रेट हाइ होयत। उदाहरण लियऽ – चीन, जापान, कोरिया, फ्रांस, साउथ भारत व हरेक ओ जगह जाहिठाम मातृभाषामें पढबाक सुविधा छैक, ओहि ठामक गुणस्तर सेहो उच्च भेटत। हरि: हर:!

**

लोक उत्सव – विद्यापति समारोह के तुरन्त बाद! किछु बुझबामें फेर भऽ रहल अछि। बिहार सरकारके तरफ सऽ एकर आयोजन हलाँकि नीके उद्देश्य सऽ कैल जा रहल अछि, लेकिन एक स्पष्ट संकेत कि भेटल जे बिहार सरकार सेहो विद्यापतिके जन-जन के प्रतिनिधि नहि मानि एक अलग समारोह द्वारा पुनः अपन जातीयता के राजनीतिक कार्ड खेलाइत मिथिलामें डिवाइड एण्ड रूल के सिद्धान्त अख्तियार करय के अपन पुरान पद्धतिके नहि छोड़लक अछि।

समीक्षामें त्रुटिक संभावना सेहो भऽ सकैत अछि कारण हमरा पास बहुत रास सूचना नहि अछि, बस एखन समाचार पढैते दिमागमें जे आयल से लिख देलहुँ। ओहि तरफक जे केओ विज्ञ होइथ से अपन मूल्यवान्‌ राय जरुर राखैथ।

हरिः हरः!

**

तिरहुत मिथिला

संजाता यत्र सीता, सरिज निर्मलजला, बागमती यत्र पूर्णा,
यत्रास्ते सन्निधाने सुरनगर नदी, भैरवोयत्र लिंगम्,
मीमांसा न्यायवेदा पठितु-पठितरे, पण्डिते मण्डिताय,
भूदेवो यत्र भूपो शास्त्रमे तिरहुति!

मिथिला-माहात्म्य (पंडित श्री जयभद्र झा, देवडीहा, जनकपुर)!

**

Bahut neek kadam – saarthak aa sundar bhavishya ke nirmaan me sahaayak. Jay Maithili! Apanek ajey hoybaak dis ek neek kadam. Bhavendra Mishra seho kichhu kaarya Physics me kene chhathi. Naam bisair rahal chhi, lekin Darbhanga ke ek professor saheb pahile ek pustak poornatah Maithili me anuvaad karait prakaashit kay chukal chhathi. Bhavendra Jee ke naam tag kay del, o Ajit Jee sang sampark jarur karaith. Emhar e neek soochna hamhu sabh share kara ja rahal chhi jaahi sa anya-nya vidwan seho ehi shubh kaarya me sahaayak siddh hetaah. Jay Mithila!! Harih Harah!!

**

महत्त्वपूर्ण विषयकेर मैथिलीमें अनुवाद हेतु सहयोग लेल धनाकरजीके वालसँ अजीत-मैसूरके निम्न सूचना पर सहयोग करी!

बहुत नीक सूचना आयल आ एहि तरफ समस्त मैथिलकेर ध्यानाकर्षण लेल सभ सँ निवेदन जे अपन-अपन वालपर आ सहकार्य करवाला हर जगह प्रकाशित करैत निम्न सूचनापर अजीत-मैसूर केँ सहयोग प्रदान करी।

हरि: हर:!

**

ढकोसला के माने जे कैयो रहल छी आ किछु हेबो नहि करैत अछि… तखन तऽ लागल रहू सेहो जरुरी अवश्ये छैक। अपनेक भावना सऽ हम सहमत छी आ जगह-जगह आन्दोलन करनिहारके पक्षमें रहैत आयल छी। लेकिन अफसोस जे मिथिलाक शहीदक चर्चा कतहु नहि, अफसोस जे कुञ्जबिहारी सनके प्रखर पुत्रके सहयोग लेल केओ नहि – लानत अछि एहेन आन्दोलनपर जे फुसफुसिया फटक्का फोड़ब आ अपन घरहिमें विरहिनीके विरहा गायब।  हरिः हरः!

**

जे जतेक पढत – से ततेक लिखत
जे जतेक लिखत – से ततेक पढत
जीवन-धन सुच्चा केवल विद्या टा
घसैत-घसैत आ लपटैत-झपटैत
हासिल करत मूल मर्म ओ ज्ञान
बनत विद्वान्‌ भेटतै सम्मान
देशहि नहि हर ठाम जहान
बस लिख-लिख बस पढे-पढे
रे मन शैतान! जुनि कुदे बेजान
धनि-धनि पुरखा लिखि छोड़ि गेला
जे पढि हम सभ किछु सिखि लेलौं
ओना तऽ कतेको एला-गेला
लेकिन बचला जे लिखि गेला
जे जतेक पढत – से ततेक लिखत
जे जतेक लिखत – से ततेक पढत!
मन होइछ जे नित प्रयास करी
जीवनक हर घड़ी बस लिखिते रही
पढिते रही – लिखिते रही-पढिते रही!

हरिः हरः!

**

शुभकामना! मिथिला राज्य निर्माण बिना सचमें मिथिला लेल कियो किछु नहि कय सकत। एहि बेर धनाकर ठाकुर व सहभागी समस्त धरनाकर्मीकेँ १९०३ ई. मिथिला नक्शा बनबयके प्रकरण समेत राज्य निर्माण हेतुक तैयारीपर प्रकाश दैत मैथिली भाषा के संवैधानिक मान्यता सऽ वंचित राखैत राज्य निर्माण आयोग द्वारा १९५३के गाथा व समस्त प्रकरण ऊपर एक विस्तृत स्मारपत्र नहि केवल राष्ट्रपति, भारत बल्कि सांसदक दुनू सदनके ध्यानाकर्षण करैत समाधान ताकयके काज होइ ताहि शुभकामनाक संग, समय भेटत तऽ अवश्य सहभागी बनब से वादा करैत छी! जय मैथिली! जय मिथिला! जय भारत! जय नेपाल! हरि: हर:!

**

बहिरा नाचय अपनहि ताले! गज्जू बुधियार जतेक बनैत छथि ततेक छथि नहि! माफ करब, हमर पुरान खून्नस अछि ओहेन बूडि विद्वान् संग। हमर वर्तमान आलेख श्री रामवृक्छ बेनीपुरीके पुस्तकक आधारपर प्रस्तुत अछि, आ मूलत: ग्रियर्सनकेर आलेखकेँ आधार मानि ओ काज केने छथि। तहिना बचपन सँ एखन धरि विद्यापतिके मादे जतेक बात पढलहुँ-गुनलहुँ से प्रस्तुत केने छी। ई कोनो जातियता वा कम्युनिज्म (मार्क्सीज्म-लेनिनिज्म) आदि के आधार मानि बायस्ड राइट अप नहि जे प्रवीण कोनो ८०० पृष्ठक पुस्तक गज्जू जेना लिखला बाद अपेक्छा राखैथ जे साहित्य एकेडमी हमरे पुरस्कृत करत, आ नहि करत तऽ खुराफात करैत अपन बुद्धिमें ब्याधि लगाय बस नव-नव नाटक करय शुरु करब! बताहक बथान नामक आलेख ताकि के पढब। ओ बताह छथि आ कूतर्क सँ दुनियाके नव बात सभ बपजेठ भाषामें सिखबय चलल छथि। हरि: हर:!

**

चूँकि विदापति नाच एक परंपरा छैक किछु खास वर्गमें तऽ ओकरा फूटा कऽ बुझय लेल ओ कूतर्क सँ एक विद्यापति ठाकुर (बार्बर) लिखैत ब्राह्मणवादके विरोध करैत छथि, हुनकर सोच छन्हि जे मैथिलीपर ब्राह्मणक एकाधिकार जे बनल आभासित अछि संसारके तेकरा ओ डिफिट करता आ एक सर्वसुलभ व सर्वमान्य मैथिली सर्वहारा द्वारा स्वीकृत करबैत नव कीर्तिमान बनौता, लेकिन मैथिलीक अनेको भाषिकापर यदि ओ शोध करितैथ (जेना डा. रामअवतार यादव) तऽ स्वत: स्पष्ट होइतन्हि जे ब्राह्मी मैथिल परिष्कृत होइछ आ वर्ग-विभेदके कारण सर्वसाधारण (गाँधीजीके हरिजन परिभाषा अनुरूप) के जे बोली छैक ताहिमें फरक छैक। एक उदाहरण देब, गज्जू व रामा एकहि संग संस्कृत पढलाह। गज्जू पंडित परिवार के रहलाके कारण शुद्ध उच्चारण करैत रहलाह, लेकिन रामा हुनकासँ बेसी मार्क्स अननिहार अपन स्वाभाविक बोलीके कारण शुद्ध उच्चारण नहि कय सकल छल। बादमें रामा उच्च पदपर आसीन तऽ भेल, लेकिन संस्कृतक उच्चारण ओकरा लेल आइयो कठिन छैक। आब प्रवीण एक आलेख लिखय आ प्रमाणित करय जे गज्जू गबन केला तऽ कि जायज होयत? हरि: हर:!

**

मिथिला-गान

जखन जनकपुर जन्म हमर भेल तखन खुशामद अनका कि
करब खुशामद अनका कि हम करब खुशामद अनका कि
जखन जनकपुर जन्म हमर भेल……

जगतजननि जगदम्बा सीता-२ बहिन हमर छथि चिन्ता कि
जखन जनकपुर जन्म हमर भेल……

जगतपिता श्री रामचन्द्रजी-२ मिथिला छोड़िकऽ जेता कि
जखन जनकपुर जन्म हमर भेल…..

कमला कोसी गंगा गण्डकि-२ अंगना पखारैथ चिन्ता कि
जखन जनकपुर जन्म हमर भेल….

हिमराज हिमशिखर हिमालय-२ चोटी हमर अछि चिन्ता कि
जखन जनकपुर जन्म हमर भेल….

– प्रेम ना. झा ‘भगवानजी’ (जनकपुर).

 

**

३ दिसम्बर २०१२

मिथिलाके चिन्हयमें लागत समय!

कारण बस एक जे मन्दिर गेलहुँ मुदा ईश्वर प्रति भावना मजबूती संग नहि बन्हेबाक कारण बस देखावटी हाथ जोडि चैल देलहुँ।

बिहारके नेता हो या फेर मिथिलाके ओ अहंकारी बिहारी प्रवृत्तिक नेता जे सोचैत अछि कि बस कोहुना वोट ले आ चुनाव जीत – तेकर बाद खूब लूट!

बताओ? ओकरा नेता कहबैक शख छैक, लेकिन अपनहि सऽ अपन मायके कर्ज उतारबाक जगह उल्टे मायके अस्मिता हरण करबाक लेल ओ गद्दारी करैछ। पीच रोड निर्माण करबाओत, पिचिंग १.५” करबाक छलैक, ओकरा ओ ठीकेदारके मार्फत बस पौने इन्चमें सेहो बिटुमीन (अलकतरा)के मात्रा एवं गुणस्तर कम आ ताहि तरहें एको वरखा नहि खेपयवाला सडक निर्माण करबाबैछ आ खरखांही लूटैछ नेता! बूडि! 

नितीशजी जखन माँ उग्रतारा (महिषी) में उत्सव के उदघाटन करैत छथि, कला-संस्कृति-पर्यटन विभाग जखन सूचीपर चढाबैछ तखन हिनका पता चलैत छन्हि आ पन्द्रह वरख शासनकालमें केवल आततायी भाषाके प्रयोग करैत जाति-जातिकेँ लडबैत घरवाली आ सार-सरहोजि-चम्मच-बेलच संग खिखियैत बितबैत छथि। यौ जी! नितीशमें सेहो मिथिला प्रति बहुत सम्मान नहि छन्हि मुदा बिहार लेल ओ जरुर सोचैत छथि आ काजो करैत छथि। हवाबाजी सेहो खूब करैत छथि। हुनका छजबो करय छन्हि। अहाँ वा जगन्नाथजी बस खोंखी टा केलहुँ आ अपन दूरगामी शासन कोना चलत तेकर किला जनताके खनतामें घुसाय के केलहुँ! नितिशजी सेहो कहाँ दैन अहींके लाइन पर चलि रहल छथि। उत्सव खूब करैत छथि मुदा विकास बेर पछुवैत पराय छथि। ठकू! मैथिल जखनहि जाति-पातिके नामपर बँटल रहता तऽ अहिना बहरिया सभ ठकैत रहत!

हरि: हर:!

**

पता नहि होयबा में हमरो सभक कमजोरी अछि, लेकिन हम सभ करू कि… दूधकट्टू धियापुता माँरहि पीबि सुखी छी! आब जे पीढी अछि ओकरा हिन्दी-अंग्रेजी सऽ फुर्सते नहि छैक। कहू जे ओ कि जानय जेतैक गोसाउनि पीढी जे मिथिलाके हर अंगनामें बसैत छथि। संसारके कोनो कोणमें एतेक शालीनता नहि जे मिथिलाक परंपरामें छैक आ ताहि हेतु जगज्जननी सिया एहिठामक धरासँ अवतरण भेलीह।

पैछला साल ‘दहेज मु्क्त मिथिला’क आह्वान-प्रयास सँ सौराठ सभा विकास समिति संग संयुक्त कार्य करैत कला-संस्कृति विभाग द्वारा पर्यटन सर्किटमें माधवेश्वरनाथ मन्दिरके सेहो मधुबनीके अनेको जगह शामिल कैल गेल छल, मुदा वरख बीति गेल काज किछु नहि!  हरि: हर:!

**

दमुमिके समस्त सदस्यगण! कतेको बेर पहिले सेहो आह्वान केने छी, आ एक बेर फेर कय रहल छी।

हम सभ अपन धरोहरके बारे एहि फोरम पर विस्तार सँ जानकारी दी।

विगतमें सेहो किछु जानकारी संकलन केने रही, लेकिन आरो बेसीके जरुरत अछि। हमर सभक प्रयास हेबाक चाही जे अलग-अलग एरियामें किछु-न-किछु धरोहर कन्जरभेसन के काज कैल जाय।

हरि: हर:!

**

मिथिला लोक उत्सव आ कि मिथिलामें जातीयताके भावना भरकाबयके षड्यन्त्र?

परसू भोरे जखन समाचारपत्र (जागरण) में पढलहुँ जे बिहार सरकार द्वारा मिथिलाक हृदयविन्दु दरभंगामें जिला-प्रशासनके मार्फत तीन-दिवसीय ‘मिथिला लोक उत्सव’ केर आयोजना कैल जा रहल अछि तऽ एकाएक शंका उत्पन्न भेल जे ई कि, कहीं विद्यापति संस्थान द्वारा आयोजित विद्यापति समारोहके बस एक जाति के हेबाक षड्यन्त्ररूपी आरोप के प्रमाणित करबाक कुचेष्टा तऽ नहि? मिथिलामें आब मैथिली एवं मिथिला संस्कृति प्रति जागरुकताके मत्थर करबाक दुष्प्रयास तऽ नहि थीक ई?

विशेषज्ञ आ स्थानीय लोक सभ सँ राय लेल तऽ हमर शंका बहुत हद तक पुष्टि होइत नजर आयल। मैथिलीमें आमंत्रण पत्र तक नहि छपाओल गेल। आइ सुनलहुँ जे मराठी कार्यक्रम आ बाहरी कलाकार तऽ कि-कहाँदैन देखाय बाहुल्य अशिक्षित वोट-बैंक के दिमागके लुभायब आ एहि तरहें ओकरा सभमें अप्रत्यक्ष मिथिला प्रतिके जेहो किछु लगाव बनि रहल अछि तेकरा नाश करब। कहीं विद्यापति समारोह जाहिमें समस्त मिथिलाक सभ जाति-पाँतिक लोक-संस्कृतिके समेटल जाइत छैक ओकर असर आम जनमानसमें पडतैक तऽ बिहार सरकारके प्रभाव कम नहि भऽ जाय ताहि लेल केवल (नाम लेल मिथिला लेकिन बाकी सभ मिथिला-विरोधी) प्रदर्शन करैत अफीम सुंघाबैत वोट-बैंक टाइट रखबाक खेल होवय जा रहल अछि। एहि सँ गणतंत्रके मजाक उडत आ असलियत के विकास कम ढकोसलाके विकास बेसी होयत।

किऐक नहि विद्यापति समारोहमें राजकीय सहयोग सँ आरो विलोपान्मुख लोकसंस्कृतिकेँ संरक्षणके बात कैल गेल?

किऐक अलग सँ त्रिदिवसीय समारोह के घोषणा करैत मिथिलाके कलाकार या मैथिली फिल्मके समावेश नहि कैल गेल?

एहि समारोहमें केवल नाम लेल मिथिला आ बाकी सभटा नन-मिथिला किऐक?

बहुत रास प्रश्न उठि रहल अछि जाहि पर समस्त मैथिलक ध्यानाकर्षण होयब परम आवश्यक बुझि पड़ैछ।

हरिः हरः!

**

४ दिसम्बर २०१२

कार्यक्रमके बस किछुएक शुरुआती पल के अलावे बाकी पूरा सुनलहुँ। बहुत सुशील आ सम्भ्रान्त श्री एस सी सुमन जी सभ बात के रखैत सुन्दर संगीत सँग संचालन करैत रहलाह… बीच-बीचमें श्रोता सभक फोन अबैत रहल आ एना लागल जे श्रोताके स्तरमें बदलाव लाबय लेल सेहो किछु उपाय संचालक महोदयके करय पडत। गंभीर विषयपर गंभीर विचारक के सोच के कमी देखैत आगामी समय में किछु खास लोकके चुनाव करैत विचार लेबय पडत जेकर असर अवश्य आमजन पर पडत से हमर विश्वास अछि। संचालक महोदय अपनो विचार जरुर राखल करैथ जे देशहित के मुद्दापर पहिले कैल जाय – जेना काल्हिक मुद्दा रहल जे राष्ट्रपतिके सहमति लेल देल समय पर राजनीतिक दल के सकारात्मक रवैया रहल वा नहि आ राष्ट्र लेल सहमतिके सरकार जरुरी… आदि… । विराटनगर राजनीतिक केन्द्र साविकहि सऽ रहल अछि आ राजनीतिके विषय विचार देनिहार के कमी नहि! 

संगीत-गीत-कला प्रति संचालक महोदयके निजी अनुभव स्वयं जबरदस्त अछि लेकिन आब २१म शदीमें आधुनिकताके रंग किछु संगीतके फ्युजन जरुरी। नित्य दिन कार्यक्रमके मार्फत श्रोताकेँ किछु विशेष लाभ अर्जित हो से जरुर प्रयास हो!

शुभकामना सहित श्रोताक संख्या जल्द वृद्धि हो!

हरि: हर:!

उपरोक्त कार्यक्रम समस्त मैथिल सहित अन्यके सुनबाक लेल आग्रह – लिंक निचां अछि:

http://www.hellofm992.com/#

**

प्रत्येक सोम नेपाली समय ९ बजे, भारतीय समय पौने नौ बजे सँ मैथिली कार्यक्रम मिथिला विभुति श्री एस सी सुमन द्वारा प्रस्तुत – जरुर श्रोता बनी आ आनन्दक संग अपन भाषा – अपन सरोकार में सहयोग दी! जय जय!

काल्हिक कार्यक्रमपर हमर प्रतिक्रिया:
कार्यक्रमके बस किछुएक शुरुआती पल के अलावे बाकी पूरा सुनलहुँ। बहुत सुशील आ सम्भ्रान्त श्री एस सी सुमन जी सभ बात के रखैत सुन्दर संगीत सँग संचालन करैत रहलाह… बीच-बीचमें श्रोता सभक फोन अबैत रहल आ एना लागल जे श्रोताके स्तरमें बदलाव लाबय लेल सेहो किछु उपाय संचालक महोदयके करय पडत। गंभीर विषयपर गंभीर विचारक के सोच के कमी देखैत आगामी समय में किछु खास लोकके चुनाव करैत विचार लेबय पडत जेकर असर अवश्य आमजन पर पडत से हमर विश्वास अछि। संचालक महोदय अपनो विचार जरुर राखल करैथ जे देशहित के मुद्दापर पहिले कैल जाय – जेना काल्हिक मुद्दा रहल जे राष्ट्रपतिके सहमति लेल देल समय पर राजनीतिक दल के सकारात्मक रवैया रहल वा नहि आ राष्ट्र लेल सहमतिके सरकार जरुरी… आदि… । विराटनगर राजनीतिक केन्द्र साविकहि सऽ रहल अछि आ राजनीतिके विषय विचार देनिहार के कमी नहि! 

संगीत-गीत-कला प्रति संचालक महोदयके निजी अनुभव स्वयं जबरदस्त अछि लेकिन आब २१म शदीमें आधुनिकताके रंग किछु संगीतके फ्युजन जरुरी। नित्य दिन कार्यक्रमके मार्फत श्रोताकेँ किछु विशेष लाभ अर्जित हो से जरुर प्रयास हो!

शुभकामना सहित श्रोताक संख्या जल्द वृद्धि हो!

हरि: हर:!

**

प्रत्येक सोम नेपाली समय ९ बजे, भारतीय समय पौने नौ बजे सँ मैथिली कार्यक्रम मिथिला विभुति श्री एस सी सुमन द्वारा प्रस्तुत – जरुर श्रोता बनी आ आनन्दक संग अपन भाषा – अपन सरोकार में सहयोग दी! जय जय!

काल्हिक कार्यक्रमपर हमर प्रतिक्रिया:
कार्यक्रमके बस किछुएक शुरुआती पल के अलावे बाकी पूरा सुनलहुँ। बहुत सुशील आ सम्भ्रान्त श्री एस सी सुमन जी सभ बात के रखैत सुन्दर संगीत सँग संचालन करैत रहलाह… बीच-बीचमें श्रोता सभक फोन अबैत रहल आ एना लागल जे श्रोताके स्तरमें बदलाव लाबय लेल सेहो किछु उपाय संचालक महोदयके करय पडत। गंभीर विषयपर गंभीर विचारक के सोच के कमी देखैत आगामी समय में किछु खास लोकके चुनाव करैत विचार लेबय पडत जेकर असर अवश्य आमजन पर पडत से हमर विश्वास अछि। संचालक महोदय अपनो विचार जरुर राखल करैथ जे देशहित के मुद्दापर पहिले कैल जाय – जेना काल्हिक मुद्दा रहल जे राष्ट्रपतिके सहमति लेल देल समय पर राजनीतिक दल के सकारात्मक रवैया रहल वा नहि आ राष्ट्र लेल सहमतिके सरकार जरुरी… आदि… । विराटनगर राजनीतिक केन्द्र साविकहि सऽ रहल अछि आ राजनीतिके विषय विचार देनिहार के कमी नहि! 

संगीत-गीत-कला प्रति संचालक महोदयके निजी अनुभव स्वयं जबरदस्त अछि लेकिन आब २१म शदीमें आधुनिकताके रंग किछु संगीतके फ्युजन जरुरी। नित्य दिन कार्यक्रमके मार्फत श्रोताकेँ किछु विशेष लाभ अर्जित हो से जरुर प्रयास हो!

शुभकामना सहित श्रोताक संख्या जल्द वृद्धि हो!

हरि: हर:!

**

प्रत्येक सोम नेपाली समय ९ बजे, भारतीय समय पौने नौ बजे सँ मैथिली कार्यक्रम मिथिला विभुति श्री एस सी सुमन द्वारा प्रस्तुत – जरुर श्रोता बनी आ आनन्दक संग अपन भाषा – अपन सरोकार में सहयोग दी! जय जय!

काल्हिक कार्यक्रमपर हमर प्रतिक्रिया:
कार्यक्रमके बस किछुएक शुरुआती पल के अलावे बाकी पूरा सुनलहुँ। बहुत सुशील आ सम्भ्रान्त श्री एस सी सुमन जी सभ बात के रखैत सुन्दर संगीत सँग संचालन करैत रहलाह… बीच-बीचमें श्रोता सभक फोन अबैत रहल आ एना लागल जे श्रोताके स्तरमें बदलाव लाबय लेल सेहो किछु उपाय संचालक महोदयके करय पडत। गंभीर विषयपर गंभीर विचारक के सोच के कमी देखैत आगामी समय में किछु खास लोकके चुनाव करैत विचार लेबय पडत जेकर असर अवश्य आमजन पर पडत से हमर विश्वास अछि। संचालक महोदय अपनो विचार जरुर राखल करैथ जे देशहित के मुद्दापर पहिले कैल जाय – जेना काल्हिक मुद्दा रहल जे राष्ट्रपतिके सहमति लेल देल समय पर राजनीतिक दल के सकारात्मक रवैया रहल वा नहि आ राष्ट्र लेल सहमतिके सरकार जरुरी… आदि… । विराटनगर राजनीतिक केन्द्र साविकहि सऽ रहल अछि आ राजनीतिके विषय विचार देनिहार के कमी नहि! 

संगीत-गीत-कला प्रति संचालक महोदयके निजी अनुभव स्वयं जबरदस्त अछि लेकिन आब २१म शदीमें आधुनिकताके रंग किछु संगीतके फ्युजन जरुरी। नित्य दिन कार्यक्रमके मार्फत श्रोताकेँ किछु विशेष लाभ अर्जित हो से जरुर प्रयास हो!

शुभकामना सहित श्रोताक संख्या जल्द वृद्धि हो!

हरि: हर:!

**

काल्हि एक नवतुरिया एला आ चैट मैसेज लाइनपर हाइ कहि संबोधन केला – आ ई मानल बात छैक जे अहाँ हमरा हाइ कहब तऽ हम अहाँके के बाइ कहब।

दोसर किछुए देर बाद फेर एला – हुनकर पहिल संबोधन रहल ‘नमस्कार सर’! चलू देखी के छथि – विचारि हमर जबाब रहल ‘जय-जय’! तखन शुरु भेल हुनकर अंग्रेजीके पाँति सभ, तऽ हमरा बुझायल जे केओ उत्तर-प्रदेश दिसका हेता, नामक टाइटिल उलझन सोझराबयमें कखनहु के बड़ मदद करैत छैक से जाँचल-परखल तऽ पायल जे ओ बहरिये छथि… हलाँकि तेहेन टाइटिल छन्हि जे बड़ा सन्देहक परिस्थिति उत्पन्न करैत छैक, तहू में यहि ओ टाइटिल मैथिलकेर हो तऽ सहजहि सन्देह जानि-बूझि बनायल जाइत छैक। जेना पिता लिखता ‘मिश्र’ आ अंग्रेजिया बेटा लिखता ‘मिश्रा’! आब अहाँ हुनका समझा नहि सकैत छियन्हि, बस हुनका समझियौन – समझिये न अंकलजी! लोग बाहरमें मिश्र देखते ही समझ जाते हैं कि ई बिहारी होगा! समस्या एहि तरहक छन्हि। दिल्ली-पंजाबमें लोक के देखेबाक छन्हि जे हम बिहार के नहि छी। धन्यवाद नितीश कुमार! एहि परिस्थितिमें बहुत हद तक सुधार आनि देलियैक अपने। बिहारी के तऽ स्वाभिमान लौटल, मुदा मैथिलक के नेता जे किछु करत आ मैथिल के गिरैत स्वाभिमानके रक्षा करत? एखनहु इन्तजार अछिये।

खैर कनेक काल संदेहक स्थिति रहल आ परखैत-जाँचैत कनेक काल में सामने सऽ जबाब भेटल जे घर दरभंगा थीक, कतय – तऽ सकरी लग कोनो गाम अछि। मतलब बड़ी घुमा-घुमाकऽ बाजय के स्थिति किऐक रहल हुनका संग से नहि जानि, मुदा कोनो बात जेकरा सऽ वास्तवमें हमरा सरोकार छल तेकर जबाब घुमैये के भेट रहल छल। खैर! हमरो दाबी जे अंग्रेजी कमजोर नहि! बहुत वर्ष अंग्रेजिये अभ्यास करैत जीवन बितेने छी आ बच्चहि सऽ अंग्रेजिये पाँवरोटी-टी अशर्फिया दोकानमें खाइत आयल छी। पूछलियैन जे हमरा संग दोस्ती केना? कहला जे बस अपन कोनो मित्रके तकबाक क्रममें हमर पेज देखलाह आ माथ-ललाटपर त्रिपुण्ड, दोस्ती लेल अनुरोध पठा देलाह। चलू भाइ! हमरा लग तऽ जेकर दोस्तीके हाथ बढैत अछि, बस लपैक लैत छी। हम सभ दोस्त बनि गेलहुँ। तऽ कि दोस्तीक माने बस अहिना? कहला नहि, हमर मिथिला ग्रुप सभ सेहो हुनका बड नीक लगलन्हि! वेल! खुशी भेटल! तखन हिनका पता हेबाक चाही जे मैथिली मात्र हमर पहिल पसन्द अछि, तखन एना अंग्रेजीमें खुसुर-फुसुर? कहला जे नहि सर से हम दिल्लीमें जन्मल-बढल छी। तऽ कि माता-पिता घरमें मैथिलीक प्रयोग करैत छथि वा नहि? तेहेन कोनो बात नहि छैक, हम जाहिठाम रहैत छी ओतय ७५% लोक मैथिले छथि लेकिन हिनकर सभक चालि-ढालि देखि हमरा मैथिली सँ प्रेम नहि भेल…. आदि-इत्यादि आ कतेको बात हुथियारला पर स्वीकार केला! गाम नहि गेल छी… तहू लेल कतेक तरहक डार्हि-पात सभ पकड़ैत चोरी धरैते पुनः लाइनमें अबैत बड़ीकाल धरि चाटा-चाटी चलैत रहल। बादमें वैह – सम्पर्कमें बनल रहब कहि हम सभ एक दोसर संग विदाइ लेलहुँ।

ई कोनो एक युवाके हाल नहि बल्कि ९०% युवा मिथिलाके आइ संदेह में छैक जे ओ मैथिली बाजत तऽ दुनिया ओकरा मोजर नहि देतैक। माता-पिता सेहो आब गाम सऽ बाहरे छथिन तऽ हुनका दिल्लीमें अर्थात बाहरमें पड़ोसिया अंकल-अन्टीके संग सङोर करबाक छन्हि तखन ओ मैथिलीके प्रयोग कोना कय सकैत छथि। एतेक लोक (बंगाली, आसामी, मिजो, नागा, मराठी, खासी, संथाली, पंजाबी, मारवाड़ी…) अपन भाषा के कम से कम अपन घरमें जरुर प्रयोग करैत अछि कारण एहि सँ ओकर विशिष्टता कायम रहि जाइत छैक आ अपन पहचान एक अलग आत्मसम्मान दिअबैत छैक से बात हम सभ मैथिल बड जल्दी बिसरैत छी वा एना कही जे बिसरबाक कुचेष्टा करैत छी। तखन हमर धियापुता सभ मैथिली के संग कोना नजदीक बनत? आर के तऽ बात छोड़ू! एहि बेर गाम गेल रही तऽ देखलहुँ जे नीक-नीक परिवारमें लोक आपसमें हिन्दीमें बात कय रहल छलाह। हमरा तामशो चढय, लेकिन किनको घर भीतरक परिवेश पर बजनिहार हम के? सोचि के चुप रहि गेलहुँ। बेशक लोक मैथिली सँ अपनहि घृणा करय लागल छथि जेना चिन्ता भऽ रहल अछि। एकर समाधान लेल सोचब बड़ जरुरी बुझा रहल अछि।

फेसबुक के प्रमाणक तौरपर लियऽ! देखू! ९०% युवा आ युवती आ हुनका संगे हुनकरे माता-पिता सब सेहो हिन्दीके प्रयोगमें मस्त छथि। बस किछुवे लोक मैथिलीके संग छथि, लेकिन संयोग कही वा आशीर्वाद सियाजी (मैथिली) के जे १०% मैथिली प्रयोग केनिहार ९०% पर हावी छथि। सगरो मैथिलीके सुन्दर-अविरल सुरसरि-धारा निरन्तर बहि रहल अछि। एक-पर-एक रचना सभ गढल जा रहल अछि। मैथिली साहित्यके सागरमें मोती आ कोरल के खजाना आरो उत्कृष्ट बनि रहल अछि। हिन्दी-अंग्रेजी के खिच्चैड़ पकेनिहार फेफियैत जिबैत एक दिन मैर जाइत छथि, क्रिया-कर्म सेहो फझीहतपूर्ण कऽ देल जाइछ आ एखन हमर सिद्धि पूरा नहि भेल अछि जे कहि सकी सटीकरूपमें जे गति केहेन भेटैत छन्हि मुदा दर्शन आ अध्ययनके आधारपर कहि सकैत छी जे बिजलीघरमें यदि मृत-शरीर जरा देल जाय तऽ पचकठिया याने पाँच गोट अपन लोकक शोक पर्यन्त प्राप्त करबासँ ओहि मृतात्माकेँ वञ्चित राखल जाइछ आ कहि सकैत छी जे ओहेन व्यक्तिके स्मृतिशेष प्राण उड़िते विलीन भऽ जाइछ। किछु तहिना जेना दिल्लीके दिलवाली सड़कपर मानवक बहैत धारमें हम-अहाँ हेरा जाइत छी।

समाद एतबी मित्र! अपन भाषा आ अपन संस्कृति संग यदि गद्दारी करब तऽ अपटी खेतमें प्राण गमायब! सावधान!

हरिः हरः!

**

ई तऽ नव गप भेल जे यथार्त सऽ हंटल बुझैछ। नितीशजी याने बिहार सरकार विद्यापति समारोह नहि बल्कि मिथिला लोक उत्सव थिकैक, जाहि के कयला सऽ नितीश सरकार के मिथिलामें ई कहैत जे विद्यापति तऽ खाली ब्राह्मण मात्र के थिकाह, बाकी लोक लेल तऽ कार्यक्रम हम करा रहल छी आ ताहिमें हिन्दीके आइटम सौंग आर अफीमरूपी अमिथिलाक रंगीन नशा पियाबैत बस वोट बैंक के राजनीति करैत मिथिलाके लोककेँ जाति-पाँतिमें बाँटैत अपन गोटी लाल करत! हरि: हर:!

**

हमरा लोक बाजय-भुकयके चलते लठैत बुझैत छथि – तऽ कोनो दिक्कत नहि। लेकिन मूलमें गप एकहि गो, काज करब, ठार्हे बाजब। जिम्मेवारी सऽ कदापि नहि भागब, आ ने लपु-लपु केनिहार के छोडब। जे गछ से कर, नहि तऽ तों हरासंख छें, हमरा कुनबा सऽ बाहर ठेल देबौक।

कर्म मात्र पूजा थीक!

हरि: हर:!

**

५ दिसम्बर २०१२

अनेक भाषा तऽ अलंकृत विद्या थीक, ओ एक अलग विधा आ विन्दु भेल। एहिठाम हिन्दी-अंग्रेजीके लोभमें मैथिलीके उपेक्षा आ ताहिमें बहुत लोक के शामिल होयब आइ मिथिलाक पहचानके लगभग अन्त दिस धकेल देलक कहि सकैत छी। ओ तऽ धन्यवाद दैत छी बस १०% निष्ठावान्‌ साहित्यकारकेँ जे आइयो खालियो पेटे मैथिलीकेँ अपन मातृभाषाके रूपमें सम्मान दैत सृजनशील बनल निरन्तर मैथिली साहित्य-सागरमें नित्य नव-नव रत्न भरि रहल छथि। बाकी के? देखाओ? सरकारी उपेक्षा तऽ जे से… अपने लोक कोन प्रयास कय रहल छथि? देखाओ एको उदाहरण! बलजोरी किछु बाजि के पोन झाड़ि उठला सऽ कि होयत? अहाँ के बड़का बोली सुनबाक हो, बड पैघ-पैघ तर्क देखबाक हो तऽ एगो हॅलमें १० गो विद्वान्‌ मैथिलकेँ बन्द कय दियौक, या तऽ तुरन्ते सहमति सऽ समाधान निकालि देत या फेर सहमतिये सऽ नहि होयत कहि देत! लेकिन मिथिला-मैथिलीके मुद्दापर दस गो के एक जगह बन्द कय देबैक तऽ सभ एक-दोसरके मुँह-कान नोचि सुरतके बेहाल करैत कोनो पागलखाना सऽ तुरन्त निकलल बिकराल पगलेट सनके मात्र मुँह देखायत, बाकी कि? हरिः हरः!

**

True Education
(By Vivekanand) – A must read!! 

Education is not the amount of information that is put into your brain and runs riot there, undigested, all your life. We must have life-building, man-making, character-making assimilation of ideas. If you have assimilated five ideas and made them your life and character, you have more education than any man who has got by heart a whole library.

“Yatha Kharashchandan Bharavahi Bharasya Vetta Na Tu Chandanasya” – The ass carrying its load of sandalwood knows only the weight and not the value of the sandalwood.

If education is identical with information, the libraries are the greatest sages in the world, and encyclopedias are the Rishis. The ideal, therefore, is that we must have the whole education of our country, spiritual and secular, in our own hands, and it must be on national lines, through national methods as far as practical.

Well, you consider a man as educated if only he can pass some examinations and deliver good lectures. The education which does not help the common mass of people to equip themselves for the struggle for life, which does not bring out strength of character, a spirit of philanthropy, and the courage of a lion – is it worth the name? Real education is that which enables one to stand on one’s own legs. The education that you are receiving now in schools and colleges is only making you a race of dyspeptics. You are working like machines merely, and living a jelly-fish existence.

We want that education by which character is formed, strength of mind is increased, the intellect is expanded, and by which one can stand on one’s own feet.

You see, no one can teach anybody. The teacher spoils everything by thinking that he is teaching. Thus Vedanta says that within man is all knowledge – even in a boy it is so – and it requires only awakening, and that much is the work of a teacher. We have to do only so much for the boys that they may learn to apply their own intellect to the proper use of their hands, legs, ears, eyes, etc., and finally everything will become easy. But the root is religion. Religion is as the rice, and everything else, like the curries. Taking only curries causes indigestion, and so is the case with taking rice alone. Our pedagogues are making parrots of our boys and ruining their brains by cramming a lot of subjects into them. Goodness gracious! What a fuss and fury about graduating, and after few days all cools down! And after all that, what is it they learn but that what religion and customs we have are all bad, and what the Westerners have are all good! At last, they cannot keep the wolf from the door! What does it matter if this higher education remains or goes? It would be better if the people got a little technical education, so that they might find work and earn their bread, instead of dawdling about and crying for service.

Harih Harah!!

**

मानि लेलहुँ जे हमर बात कनेक बेसी कठनगर लागल अहाँके। लेकिन कहलाके बादे अहुँके भक टूटल! पुछू कोना?

अहाँके प्रोफाइल पर मैथिलीके दुर्दशा हम देखलहुँ।
अपन संस्कृति छोडि दोसरक मान-बढौवैल देखलहुँ।
व्यक्तिगत सोच समाज लेल नहि परन्तु स्वार्थमें लिप्त देखलहुँ।
भले अहाँ किछु केने होइ मुदा सार्वजनिक तौर पर नुकैले देखलहुँ।

केवल मैथिलीभाषी छी कहला सऽ मैथिलीके रक्षा नहि हेतैक, एहि लेल सोचय पड़त आ करय पड़त।

दोसरके गरियेला सऽ आ दोसरमें दुर्भावना देखैत अपन भाषा-संस्कृति-पहचान संग दुष्टता रखला सऽ हमरा लोकनिक आरो बेसी नोकसानी भऽ रहल अछि; एहि यथार्थ बात के मनन करू।

व्यक्तिगत रूपमें हमर बात के खराब नहि मानि बस सामूहिक रूपमें दुनियाक रीत अनुरूप बात बुझबाक चेष्टा जरुर करब। अमेरिका आ बेलायत में रहब तक हमरा मंजूर अछि लेकिन गाम (मिथिलाधाम) बिसरब तऽ कपार के धुन्नी उड़ा देब, बात जानू साफ भैया, बौआ, बुच्ची आ लप्पूचन!

अनेक भाषा तऽ अलंकृत विद्या थीक, ओ एक अलग विधा आ विन्दु भेल। एहिठाम हिन्दी-अंग्रेजीके लोभमें मैथिलीके उपेक्षा आ ताहिमें बहुत लोक के शामिल होयब आइ मिथिलाक पहचानके लगभग अन्त दिस धकेल देलक कहि सकैत छी। ओ तऽ धन्यवाद दैत छी बस १०% निष्ठावान्‌ साहित्यकारकेँ जे आइयो खालियो पेटे मैथिलीकेँ अपन मातृभाषाके रूपमें सम्मान दैत सृजनशील बनल निरन्तर मैथिली साहित्य-सागरमें नित्य नव-नव रत्न भरि रहल छथि। बाकी के? देखाओ? सरकारी उपेक्षा तऽ जे से… अपने लोक कोन प्रयास कय रहल छथि? देखाओ एको उदाहरण! बलजोरी किछु बाजि के पोन झाड़ि उठला सऽ कि होयत? अहाँ के बड़का बोली सुनबाक हो, बड पैघ-पैघ तर्क देखबाक हो तऽ एगो हॅलमें १० गो विद्वान्‌ मैथिलकेँ बन्द कय दियौक, या तऽ तुरन्ते सहमति सऽ समाधान निकालि देत या फेर सहमतिये सऽ नहि होयत कहि देत! लेकिन मिथिला-मैथिलीके मुद्दापर दस गो के एक जगह बन्द कय देबैक तऽ सभ एक-दोसरके मुँह-कान नोचि सुरतके बेहाल करैत कोनो पागलखाना सऽ तुरन्त निकलल बिकराल पगलेट सनके मात्र मुँह देखायत, बाकी कि?

हरिः हरः!

**

दुनियारूपी जंगलमें

(अत्यन्त मननयोग्य प्रसंग, बिना पढने लाइक-फाइक नहि चाही! – प्रवीण)

एकबेर कोनो आदमी जंगलके बीच राह देने कतहु जा रहल छल। कतहु बीच राहमें ओकरा तीन गो डकैत मिलि लूटि लेलकैक। पहिल डकैत लूटलाके बाद कहलकैक – “एकरा जिन्दा राखयके काजे कि” कहैत मारय लेल तलवार निकालकैक आ कि दोसर कहलकैक “अरे! नहि! एकरा आब मारयके काजे कि? बरु एकरा हाथ-पैर बान्हि एहिठाम छोड़ि दहीन!” एतेक कहैत ओ पहिल डकैतके ओहि आदमीके मारय सऽ रोकि देलकैक लेकिन संगहि हाथ-पैर बान्हि ओतय छोड़ि ओ सभ चलि गेल। कनेकबा कालक बाद तेसुरका डकैतके ओहि मजबूर लोकपर बड दया एलैक तऽ ओ पुनः वापस आबि ओकरा हाथ-पैर खोलि आजाद करैत कहलकैक – “हम बहुत दुःखी छी तोहर एहेन हाल देखि, चल तोरा आजाद करी एहि बन्धन सऽ।” आ तेकर बाद आरो दया करैत कहलकैक – “चल हमरा संगे। हम तोरा लोक सभ जाहि बाट सऽ जाइत छैक से उच्च-पथ (हाइवे) पकड़ा दैत छियौक।” बड़ीकाल धरि चललाके बाद उच्चपथ आबि गेलैक। तखन ओ लूटल लोक ओहि तेसुरका डकैत के जबाब देलकैक – “महोदय! अहाँ हमरा लेल एतेक मदैत केलहुँ, चलू न हमरा संग हमर घर तक!” “नहि! नहि!” डकैत जबाब देलकैक, “हम नहि जा सकैत छी। पूलिसके पता चलि जेतैक।”

ई संसार स्वयंमें एक जंगल थीक। तीन डकैत जेकरा प्रस्तुत कैल गेल अछि ओ त्रिगुण याने सत्त्व, रज आ तम थीक। ई वैह डकैत थीक जे सत्यके ज्ञानके बुझनिहार मनुष्यके लूटैत अछि। तामशके इच्छा छैक कि ओकरा खून कऽ दियैक। राजस ओकरा हाथ-पैर बान्हिके राखि संसारमें छोड़ि दैत छैक। लेकिन सत्त्व ओकरा तामश आ राजस सँ बचबैत छैक। सत्त्वके सहयोग सँ विवेकी मनुष्य क्रोध, काम एवं अन्य तामशी शत्रुसंग निबटैत सत्त्वहिके सहयोग सँ पुन: राजसकेर विभिन्न सांसारिक बँधनसँ मुक्त होइत अछि। तदापि सत्त्व सेहो एक डकैते थीक, ई मनुष्यकेँ घर तक याने मुक्तिकेर अन्तिम मंजिल तक कदापि नहि अबैत अछि। सत्य मंजिल केर ज्ञान कदापि नहि दऽ पबैत अछि, हलाँकि ओहि मार्गतक पहुँचा दैत अछि जे परमपिता परमेश्वर संग भेटा सकैत अछि, पूर्णतः ब्रह्मलीन कय सकैत अछि। आर तखन कहैत अछि: “देखू बाबु! ओतय अहाँके घर अछि जेना बुझैछ। यैह बाटसँ सभ जाइत छैक, अहुँ चलि जाउ।”

हरिः हरः!

**

Ehi nara ke samast Maithil sang jarur share kari: Dr. Dhanakar Thakur – Sansthaapak Adhyaksh, Antar-Rashtriya Maithili Parishad ke aahwaan sang ham samast Maithil thaarh chhi. Delhi ke Dharna-Pradarshan me avashya sahabhaagi bani. On December 10, 2012, at Jantar-Mantar! Harih Harah!!

शांतिपूर्ण मिथिलाक गौरवमंयी परम्पराक अनुसार व्यवहार हो –
नारा जरूर जोर स लगाबी:

” जाबत मिथिला राज्य नहि – भारतक संविधान पूर्ण नहीं।”

” मिथिला राज्य के बनायत- भारतक सार्वभौम संसद”

“भारत के के बनौलक – मिथिलाक सीता गार्गी ”

“भारत के के बनौलक- मिथिलाक ऋषि गौतम कणाद ”

“भारत के के बनौलक- मिथिलाक गायत्री आ वाल्मिकी।”

“भारत के के बनौलक- मिथिलाक वाचस्पति आ भारती ।”

“जाबत मिथिला राज्य नही – चीनक घुडकी शांत नही ”

“जाबत मिथिला राज्य नही – भारतमे स्थिर सरकार नही”

“जाबत मिथिला राज्य नही – भारतक स्थिर विकास नही”

” सुसंस्कृत भारतक की पहचान- मिथिला राज्य! मिथिला राज्य!!”

“पूर्णिया हो या चंपारण – सब हम छी मिथिलावासी”

“सहरसा हो या शेखपुरा – जल, अन्न स मिथिला पूरा”

“सुपौल सेतुस गांधी सेतु -मिथिला हेतु , मैथिली हेतु!”

“भागलपुरस मुज़फ्फरपुर- माछ, मखान , लीचीस पुर”

“मुंगेर हो या मधुबनी – सब हम छी मिथिलावासी”

” दरभंगा हो या दुमका- सब हम छी मिथिलावासी”

“मिथिलावासी- भारतवासी – विद्यापति भारतके शान”

“मिथिलाके जं नहि सम्मान – होयत माता सीताक अपमान ”

अपना स्थानस एही नारा के प्रिंट आउट निकाली!

हरि: हर:! – फेसबुकिया प्रवीण!

**

अपार हर्षक संग पुन: अपने समस्त मैथिल मुदा विशेषत: जे विराटनगर सँ नजदीक रहैत छी – चाहे नेपाल वा भारतक मिथिला, से सभ गोटे एहि बेरक द्विदिवसीय विद्यापति स्मृति पर्व समारोहमें जरुर सहभागी बनी।

विशेषता:
*संस्कृतिके झलकाबयवाला विशाल झांकी जुलूस संग नगर परिक्रमा
*आदर्श विद्यालय प्रांगणमें विशाल जनसभा बीच सम्माननीय उपप्रधानमंत्री बिजय गच्छदारजी द्वारा समुद्घाटन एवं संबोधन
*स्मारिका विमोचन व विशिष्ट सम्मान समारोह
*नेपाल व भारत दुनू दिससँ पधारल एक-पर-एक कवि-विचारक-विद्वान-नेतृत्वकर्ता आदि द्वारा विषयपर विचार प्रस्तुति
*विद्यापति गीत के निरंतर प्रवाह
*मिथिलाक मधुर खान-पानके मेला – प्रवेश लेल अग्रिम टिकट बुकिंग
*मिथिला पेन्टिंगके विशाल प्रदर्शनी
*मैथिली सिनेमा ‘सजनाके अंगनामें सोलह श्रृंगार’के रात्रि शो (टिकट अग्रिम बुकिंग कयलापर मात्र)
*कवि गोष्ठी – विचार गोष्ठी
*बाल-बालिका फैशन शो, मिस्टर आ मिस मैथिली कम्पीटीशन (उम्रसीमा ८ वर्ष सँ १५ वर्ष – रेजिष्ट्रेशन तिथि दिसम्बर १५ सँ २० धरि, सम्पर्क: मैथिली सेवा समिति, कार्यालय)
*विरेन्द्र झा, संजय यादव, रामा मण्डल, गुरुदेव कामत, अनु चौधरी, मिथिलेश ठाकुर, एवं अन्य गायक-कलाकार द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमके प्रस्तुति
*विराट मैथिल नाट्यकला परिषद् द्वारा नाटक मंचन
*मैथिली पुस्तक-विमोचन
*समापन व प्रमाणपत्र वितरण समारोह

नोट: मैथिली लेखन करनिहार स्मारिकामें अपन लेख पठा सकैत छी। मेल करू: bsps_2069@yahoo.com पर।

हरि: हर:!

**

६ दिसम्बर २०१२

Yes, I do write English and appreciate as clearer and purer you used to write above post in English. Indeed I support the point made by yourself and in absolute agreement with your sentiment too. However, my post did not mean for you or anyone who truly starts with HI – but when a known Maithil being prejudiced use it – especially when I have several times made it public that please do not use HI whenever start a chat with me; I must bid a bye alone. No issue further, Nilesh Karna! It is really good to see you having attachment with our own language, tradition, culture and overall a very special civilization on earth. Jay Maithili! Jay Mithila!! Love! Harih Harah!!

**

यदि समाज ने हाँ कर दिया तो वो कुप्रथा नहीं था, लेकिन समाज की दृष्टि भी कभी-कभार छोटे-दूरी तक बढियां देख गलती कर सकती है जैसा मैं समझता हुँ। दहेजकी समस्या शुरुआत में नहीं रही होगी और किसी समय यह कुछेक तवकेमें रहा होगा जैसा मुझे लगता है। क्रमश: सभी ने इसे अपनानेकी पूरी कोशिस करते हुऐ अब इतना भाव दे दिया कि यह एक भयंकर रोग बनकर समाजको खोखला करते जा रही है और लोग इसके कारण कोखमें ही बेटियोंका भ्रुण हत्या करने से नहीं हिचकते। यदि भूलवश बेटी पैदा हो भी गयी तो अत्याचार से सारे जीवन कराहती रहती है फिर भी अपनी सिसक किसीको शायद ही सुनने देती है। असमानताकी मार, पढाई से वंचित, पतिपर निर्भर, व्यभिचारी मानसिकताके कुदृष्टिसे परेशान, पर्देके पीछे जीना या फिर बाजारमें सरेआम अपनी इज्जतको बेचना… कितना गिनेंगे? लाचारी तो इतना कि जब बेटी औरत बनती, माँ बन जाती तो खुद भी वही सारे जुर्म करनेमें लिप्त हो जाती है जो कभी खुद भी झेली थी। कैसी विडंबना है? पश्चिममें तो पूरब जैसा नहीं है पर वहाँ फिर पूरबवाला शुद्ध संस्कार का अभाव है। क्या प्रकृति ने ही ऐसा विधान रचा है?

हरि: हर:!

**

यदि नेपालके राष्ट्रियता सभ दिन पुर्खेक गौरव-कथामें टिकल रहत तऽ,
पृथ्वी नारायण शाह आ गोरखालीके गौरव गाथामें टिकल रहत तऽ,
गोरखाली सेना सऽ पराजयके मुँह देखने तिरहुतबासीक सन्तति सभक राष्ट्रियता कि हेतैक?

पृथ्वी नारायण शाह द्वारा पराजित काठमांडुके नेवारी सभक राष्ट्रीयता कि हेतैक?

गोरखाली संग युद्ध नहि वरन् सन्धि-मित्रता मार्फत नेपालक होयबाक लेल आयल राइ-लिम्बु सभक राष्ट्रियता कतय अँटेतैक?

(लिंक)

बासुदेव लोहनी

**

हलाँकि तिरहुतवासी गोरखा राजाके संग लडाईमें हारल आ कि मगध राजासऽ दछिन दिस सऽ हारल – आ कि अपनामें राजधर्मके निर्वाह नहि करैत जेना आइ आपसे मे माइर-काटमें भिडैत अछि ताहि कारणे बर्बाद भेल आ राज कायम नहि राखि सकल ई एक अनुसंधान के विषय होयत। परसु डा. राम अवतार यादव संग बात भऽ रहल छल तऽ बुझलहुँ जे भारतक एक-पर-एक विद्वान् नेपालहिकेर मल्लकालीन राजा द्वारा मैथिलीके समस्त पाण्डुलिपि ग्रहण कयलन्हि मुदा व्याख्या कहाँ दैन अपन बात जोडि अन्दाजमें मिला-जुलाके कय देलन्हि जाहिपर एखनहु शोध कार्य होयबाक आवश्यकता अछि। हुनकर मानब छन्हि जे मिथिला बेसी नजदीक आजुक नेपाल संग रहल, नहि कि भारत संग! तहिना विद्यापतिके सेहो कीर्तिलता नामक पहिल पोथीके पाण्डुलिपि नेपालहिके संग्रहालय सँ प्राप्त भेल, बहुत काज एखन होयबाक लेल बाकी अछि। हरि: हर:!

**

७ दिसम्बर २०१२

आइ भोरे सुति उठि श्री कन्दर्प लालकाकाजी के समाद फेसबुक पर देखलहुँ जे मोंन छूबि गेल:

ओ लिखने छथि जे अपन अनुजवर्ग क दुलार-सिनेह-आशीर्वाद देब कोनो खास बात नहि, परन्तु श्रेष्ठसँ लेनाय कला थीक।  (किछु अहिना।)

स्मरणमें आबि गेल नीतिश्लोक:
——————————-

अभिवादनशीलस्य चराचरस्य – चत्वारि तस्य वर्धन्ते – आयुर्विद्यायशोबलम्!

अपनासँ श्रेष्ठसँ आशीर्वाद लेबऽ में समर्थ के अभिवादनशिल कहल जाइत छैक, जेकर चराचर जगत् में चारि वस्तुके निरन्तर वृद्धि होइत छैक: आयु, विद्या, यश आ बल!

हरि: हर:!

**

धन्यवाद किशोरजी! समाधान सहज नहि छैक, लेकिन छैक। हमर चिन्तन ओहि ठाम सऽ तही लेल रखने छी जखन ई समस्या नहि वरन् समाजमें प्रदर्शन के एक औजार छलैक जेकरा क्रमश: विकृतिरूपमें स्वीकृत कैल जा लागल छैक। यदि मिथिलाके इतिहास देखल जाय तऽ एतय दहेज बिलकुल नगण्य छलैक। केवल पैघ-पैघ राजा-महाराजा-जमीन्दारके परिवार में एकर थोर-बहुत प्रयोग रहलैक। मिथिलाके परंपरा तऽ एतेक शुद्ध-सुसंस्कृत बादो तक रहलैक जेकर प्रमाण छल सौराठ-ससौला-सझुआर समान ४२ गो स्थल जतय लोक कन्वर्ज फर मैरिज के थ्योरीपर एकत्रित होइथ, आ विवाह संबन्ध अधिकार निर्णय उपरान्त होइत रहलैक। कूल-मूल-शील आदि प्रमुख छलैक। मुदा जखन मिथिलाके अस्मिता के ध्वस्त कय देल गेलैक, दलाल प्रवृत्ति अपन छद्म लाभ कमाय लेल कोनो वृत्त अपनाबय लागल, बलजोरी पैसाके दम्भ सऽ लोक के कीनल जाय लागल तखन दहेज के दुष्प्रवृत्ति मिथिलाके आक्रान्त कय देलक आ समस्त सभा फूर्र भऽ गेल। मिथिला चुँकि ऋषि-मुनि-विदेहक धरती थीक तऽ चिन्ता बहुत पैघ नहि, परिवर्तन शुरु भऽ चुकल छैक। कतेको युवा निठल्ला घटकक इन्तजारमें बैसल छथि। कारण बेटी सेहो आब पढाई कय रहल छैक आ आत्मस्वतंत्रता के जागरण भऽ चुकल छैक। युवाके बुझय पडतन्हि जे आब दहेजलोभी माता-पिताके नहि रोकब तऽ हरियाणावाला हाल भऽ जायत। हरि: हर:!

**

जखनहि लडकी स्वतंत्र हेतैक तऽ आत्मनिर्णय के अधिकारी बनतैक। प्रेमके अनेक कारण, दहेज सेहो एक, बेशक! कोन छेत्र कतेक प्रभावित से कहब हमरा योग्य नहि! विषय मादे सुसंस्कृत परिवार अपन च्वाइश अवश्य नीके रखैत आयल छथि। दहेजक दुष्प्रभाव लिट्रेसी रेटके पिछडल तवकामें बेसी, कारण कोहुना के सलटाबयके प्रवृत्ति हावी। समस्याक निदान समर्थ-वर्गमें कम! पुन: नीक गतिके पकडवाक आवश्यकता, अन्यथा सम्हारयमें कठिनाइ स्वाभाविक! हरि: हर:!

**

कुछ-कुछ बातें हमें अन्दर तक झकझोर जाती है। मेरे जीवनमें भी कुछ ऐसे ही विन्दुएं मिले जहाँ अन्तर्मन ने मुझे हिलाकर रख दिया। आओ कुछ आपसे रुबरु शेयर करें:

*१९९०-९१ में उजान हाइ स्कूलके प्रांगणमें उन दिनोंके बहुचर्चित भाजपा नेता आडवाणीजी का कार्यक्रम था, हमारे गाँव से लोग वहाँ जा रहे थे। संयोगवश नेपालसे मैं भी गाँव ही घुमने गया हुआ था और लोगोंके साथ हो लिया, चलो देखते हैं। वहाँ जानेपर पता चला कि बाबरी मस्जिद जैसे अनेकों जगह हिन्दुओंके मन्दिर पर पहले के विदेशी मुसलमान शासकों द्वारा बर्बरतापूर्वक जुर्म किया गया था लेकिन अब ये राजनीतिक पार्टी भाजपा इन जुर्मोंके विरुद्ध बिगुल बजायी है जिसमें आमजनोंका साथ चाहिये। जी हाँ! मैं काफी प्रभावित हुआ था और हमारे चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयके श्री टी के झा जो अंग्रेजीके प्राध्यापक थे मंच संभाल रहे थे उनसे अपना परिचय देते हुए मंचसे कुछ बोलनेका आग्रह किया था जिसे उन्होंने न सिर्फ माना बल्कि मेरे परिचयको कुछ खास अन्दाजमें लोगोंसे बयाँ किया जो काफी प्रभावित-प्रेरित किया था। मंचसे मैंने भी अपनी आवाजमें इतिहासपर टंकित कलंक को मिटानेके लिये सभीको एकजुटता से आगे आनेकी अपील की थी और संकल्प लिया था कि अपने स्तरसे ऐसे कलंके चिह्नोंको मैं भी अवश्य प्रतिकार करूँगा और आत्मविश्वास था कि इसमें हमारे आजके मुसलिम भाई भी हमें साथ देंगे क्योंकि कलंक न केवल हमारे लिये बल्कि उनके लिये भी है।

*१९९२ में मेरा बि.कम. पार्ट टूके कुछ पेपर का एक्जाम मिस होना – बाबरी मस्जिद ध्वस्त होनेके बाद जो दंगा भडका था बस उसके कारण! फारबिसगंज कालेजके तत्कालीन प्राचार्य डी. एन. राय के जातियता-विद्वेष दिखाते हुए ब्राह्मण व ऊँचे जातिके विद्यार्थियोंको एक्सपेल करनेके कारण अररिया व फारबिसगंज कालेज के विद्यार्थियोंने मिलकर उनपर प्रतिक्रियात्मक हमला किया था जिसके चलते स्थापना-वर्ष में ही बिएनएमयु के कुलपति डा. रामबदन यादव जी द्वारा दुबारा जाँच करानेका फैसला लेनेकी बात की गयी थी। लेकिन जब तारीख और केन्द्र तय किये गये तब तक बाबरी मस्जिद ढल गया था और मेरे लिये अररियामें टेन्शन व सूचना सही समय न मिल पाने से परीक्छाका छूटना कैरियरको प्रभावित करनेवाला हो गया। मुझे आज भी इसका दु:ख है!

*१९९८ में बनारस अपनी शादीके बाद ससुराल और तीर्थस्थल समझकर घूमने गया था जहाँ बाबा विश्वनाथ मन्दिरके पास ही लगभग पिंजरबद्ध एक मस्जिद देखकर दिमाग घूम गया था, समझमें न आनेपर लोगोंसे जानकारी मिलीकी अयोध्या जैसा ही ये भी है। अब यह सरकारी सुरक्छामें है। अनुमानत: नित्य खर्च कम से कम लाखोंमें जरुर है और हिन्दु-मुसलमानके बीच कभी भी इसके लिये दंगा छिड सकता है। स्थिति आज भी वैसा ही है।

*२०००‍– में दिल्लीके कुतुबमिनार देखने गये थे कि सहसा मेरी दृष्टि एक शिलालेख पर गया जहाँ यह अंकित था कि इस मिनारमें कम से कम पुराने जमाने के २५० हिन्दुओंके मन्दिर के ईंटे लगे हुए हैं। ऊफ! मैं सिहर गया था।

शायद ऐसे और भी बहुत जगह हैं और मेरे जैसे लोगोंकी संख्या भी कम नहीं है। हमें ऐसे विवादोंका मिल-जुलकर बेहतरीन हल ढुंढना होगा। जुर्म-जबरदस्तीका वो कालिख मिलकर मिटाना होगा। भारत तभी सही मायने में धर्म निरपेक्छ राष्ट्र बन सकती है।

हरि: हर:!

**

Kishore Thakur Jee! Rights of girls in parental properties end with Kanyadaan – is the tradition we live in. Do you know the justification? For this, kindly come and see some of my researches on Dahej Mukt Mithila’s page, in section of files. It would be tough to bring all points again here. But precisely, there is no problem in sharing the equal rights in parental properties if son-in-law commits to look after the old father and mother in laws in need as sons must do.  Ghar jamaiya kraha lel taiyaar ta baap ke properties me hissaa swatah bheta ke paramparaa aaiyo chhaik. Do you know that? Beta ke adhikaar beti ke Hindu riwaaj anuroop nahi del jaait chhaik. Baap ke properties me beta ke adhikaar equal countering ehi lel chhaik je jamay ke apan pita sa aa beta yaane patnike bhai ke apan pita sa natural inheritance right praapt hoit aayal chhaik. Beti ke paitrik sampatti me adhikaar ke wakalat Hindu vivah paddhati me nahi chhaik tekar mool kaaran KARTA KE ADHIKAARI putra maatra hoit chhaik. If we dare to change this, we can can change as you say. Indeed! And now even this has been initiated by some sector of people. Beti seho baap ke mukhaagni debay lagalaik achhi.  Harih Harah!!

**

बहुत नीक-नीक विन्दुपर अपनेक ध्यान खींचयवाला पोस्ट पढि मन गदगद भेल, निश्चित सभके एहि पर सोचबाक आवश्यकता। हलाँकि जे अपने समेटैत अन्तमें लिखलहुँ जाबत तक युवा-युवती (सरोकारवाला)….. तऽ शुरुवेमें अपनहिये लिखने छी जे ओ सभ स्वयं विवाह के निर्णय करय लागल छथि तऽ कि ओ हुनकर द्वारा प्रतिकार नहि मानल जा सकैत छैक? आब तऽ हम एतेक तक देखैत छियैक जे लडकावाला लडकीके ताकैत पहुँचैत छथि आ लडकीवालाके माँग होइत छन्हि जे लडकावाला पूरा करैत छथि। तखन कष्टके बात जे पाला एम्हर सऽ ओम्हर गेल। सादगी नहि रहल।  हरि: हर:!

**

Let’s see after a week from now – say on 13th December, by grace of Prabhujee!

Will be at Pinkcity (Jaipur) India engaged in a wedding event of my Boss’s daughter, it is time to be at service of honorable guests. May God bless the couple to lead a very successful married life ahead.

Photo updates and others will surely continue from mobiles. 

All the best and have nice time everyone. Those interested and in urgency must speak – 9431228293.

Special wishes of success for Dhanakar Thakur Jee and AMP team scheduled to launch the sit-in at Jantar Mantar for Mithila state on December 10, 2012.

Harih Harah!!

**

१३ दिसम्बर २०१२

एहि बेरक धरना सेहो नामहि लेल भेल आ नाममात्रके कार्य सऽ मिथिला राज्यके निर्माण कतेक संभव होयत ताहि पर चिन्ता तऽ नहि मुदा चिन्तन के खूब आवश्यकता अछि।

अफसोस ई भेल जे आखिर युवाके प्राथमिकता देबामें बुजुर्ग नेता-कार्यकर्ताके किऐक डर भऽ रहल छन्हि – कि एकहु टा वक्ता भरोस जोगर नहि छलाह जे आयोजक पक्ष हुनकहु बजबाक अवसर प्रदान करितैथ?

आ अन्त सेहो बहसबाजी आ अनुशासनहीनता सँ कैल गेल तेकर कतेक भर्त्सना करब से कम होयत। पुनः वैह बात जे मैथिल श्रापित छथि से बात प्रमाणित भेल आ एकता तऽ दूर कम से कम विषयपर सेहो एकजुटता नहि बनि पबैछ सेहो दुखद अछि।

धरना दिल्लीमें करब आ मुश्किल सऽ दस गोटे स्वघोषित या अत्यन्त छोट तवकाके प्रतिनिधित्व केनिहार मुख्य व्यक्तित्व दूर-दूरसँ पहुँचब, मुदा दिल्लीके मुख्यवासीके मुख्य व्यक्तित्व सभक घोर कमी देखब…. कि हमर सभक कमजोरी आ मिथिला राज्यक माँग के मजाक नहि उड़ा रहल अछि??

तखन हमर एक प्रस्तावना अछि, आबऽवाला समय में दिल्लीमें केवल युवा समाज द्वारा एक विरोध कार्यक्रम कैल जाय आ एहि सँ केवल खानापुर्ति नहि बल्कि एक ठोस परिणाममूलक विचार सीधा भारत सरकार द्वारा मिथिला राज्य निर्माण सम्बन्ध में सोझाँ आबय ताहि लेल प्रतिबद्धता जाहिर करैत छी।

समस्त युवा मैथिल सँ निवेदन जे अपने लोकनि एहि लेल कमर कसी आ एक उपयुक्त समय के विचार राखी। अधिकतम लोकके जेहेन विचार होयत ताहि अनुरूप कार्यक्रम घोषणा कैल जायत।

Harih Harah!

**

एहि बीच फेर हमरा लोकनिक बीच एक बहस सोझाँ आयल से देखलहुँ, ओ ई जे एहि मंचपर दहेज प्रथाक विरुद्ध कम बात आ आन-आन मुद्दा पर बहुत बात होइत अछि। जी! सहिये कहलहुँ। हमरा ओ दिन बिसरायल नहि जे बाजिके लोक कोना अपन वादा तोड़ि देलाह आ कोन तरहें अपन कमजोरी के छिपाबय लेल झगड़ाके बिया रोपि गेलाह। लेकिन कसम सऽ! हमरा ओहि लफैंर-चुफैंर सभसँ कोनो विचलन नहि भेल आ विश्वास अछि जे ईमानदारीके संग जे एहि मुहिम में लागल छथि तिनको ओहि सभसँ कोनो फरक शायद नहि पडलैन।

तखन बात भेल जे आखिर एहि मंचके ऊपर आन-आन गप हो वा नहि? तऽ हमर विचारे जखन हम सभ एक ठाम बेसी लोक रहब आ सभक अपन-अपन रुचि अछि तऽ अवश्ये सभ तरहक बात हेतैक। मिथिला मूल थीक। कारण हम सभ मैथिल छी। अपन एक अनूठा संस्कृति अछि जेकरा लोक धुमिल केने जा रहल छथि, अपनो आ सहजहि आनो। तऽ बात सभ तरहक करू लेकिन मिथिलाके ऐश्वर्यक प्रवर्धन मिथिलासँ माँगरूप दहेजक प्रतिकार मात्र सऽ संभव अछि।

दहेज दूर करबाक लेल ई मंच आइ धरि जतेक व्यवस्था केलक तेकर सकारात्मक उपयोगिता पर बहस जरुरी अछि। जेना:

१. वेबसाइट सऽ कतेक लोक लाभान्वित भेलाह?

२. माँगरूप दहेज नहि लेब वा नहि देब के ईमानदारी सऽ कतेक लोक एखन धरि पालन केलाह?

३. सौराठ सभाके पुनरुत्थान करबाक प्रयास कतेक दूर तक सार्थक भेल?

४. पत्र‍— पत्रिकाके मार्फत सेहो जागृति कतेक दूर तक पहुँचल?

इत्यादि!

आउ, सार्थक चर्चा करी।

जिनका एना लागल हो जे एहि ग्रुप पर केवल आन-आन मुद्दापर चर्चा कैल जा रहल अछि तिनकर स्वयंके सेहो कर्तब्य बनैत अछि जे अपन योगदान पहिले सुनिश्चित करी। केवल दोसर सँ अपेक्षा मात्र राखब कदापि उचित नहि।

धन्यवाद!

हरिः हरः!

**

आदरणीय नरेन्द्रजी! मिथिला राज्य नहि बनब मिथिला संस्कृतिके पाछू ठेलब प्रमाणित भऽ गेल अछि, तखन अपने किऐक एहि बात सँ कतराइत छी जे राज्य बनेबाक माँग उचित नहि? समूचा भारतमें देखू जे मिथिला सऽ बहुत पुरान संस्कृति राज्यके दर्जा पाबि कतेक फूलित-फलित भेल, मगर मिथिला आ अवध बिहार आ उत्तर-प्रदेश बनि देशके सभ सऽ घिनायल राज्य बनिके रहि गेल। सोचू! हरि: हर:!

**

पूर्णतः लोकतांत्रिक आ युवा तरफ झुकल, युवा प्रति समर्पित! आउ, विचारी एक तारीख आ जुटी हमहुँ सभ दिल्लीमें, धरना पर मात्र नहि बैसि आन्दोलनकेर अन्य-अन्य स्वरूप सेहो आख्तियार करी। भारत सरकार के अफिसियल स्टेटमेन्ट ली जे आखिर हुनकर नजरिया मिथिला राज्य लेल कि छन्हि? हम आइ धरि गोलमें छी। हरिः हरः!

**

Jarur! Delhi ke agrani maatra nahi balki samuchin gyan aa ruchi dunu sa poorn Sagar Mishra Jee ke samyojan me e kaaryakram ke prastaav ham raakhi chukal chhi. Hamra lokani ekar campaigning ekhnahi sa shuru ka di aa desh bhari ke jatek Maithil agrani chintak chhathi tinkaa sabh ke ohi goshthi me bajaabi aa takhan vishal dharna-pradarshan Delhi me kari jaahi sa Kumbhkarna-neend me sutal Bharat Sarakaar ke etek chintaa ho je Mithila Rajya ke nirmaan prati sachet huwe. Ham kanek samjhautaavaadi lok seho chhi, taahi lel hamar maang Mithila Rajya ke rahito ekkahi ber marab-katab se nahi achhi, balki e achhi je step-by-step Mithila ke development package par seho Bharat wa Bihar sarakaar par dabaaw banaabi. Harih Harah!!

**

Uparokt kaaryakram me aatithya grahan karbaak lel samast agrani (including our senior and guide – AMP founder president Dr. Dhanakar Thakur) aa Ex-General Secretary AMP Kripa Nand Jha lagaayat o sampoorn vyaktitwa rahataa je poorv me bahut kichhu kay chukal chhathi aa ekhnahu hinka loknik ruchi chhanhi.

Hamar ek chetaavani je ham sabh vyaktigat naam lel kadaapi nahi mari, balki kaaj karbaak beera (bhaar) grahan karait ehen vachan di je ka saki. Harih Harah!!

**

Ek banner me ta ahiye – Banner ke naam thik: MITHILA, lekin sabh ke e dar hoit chhaik je okra sange jaayab ta hamar naam paachhu pari jaayat.  Lekin e trend ham jarur badail ke rahab, aha dekhait rahiyauk. Kapaar par khun sawaar bha gel hamaraa aab. Saar ka! jahiya sa sunaliyaik je bujurg lok sabh seho khachreti par utaaru hoit jaain-bujhi jhanjhait pasaarait chhathi… tahiye sa thaani lelahu je aab ehi buriraaj-dhiraaj sabh sa kichhu neek nahi bha sakait achhi balki kewal ghinmaa-ghinmi ta ka sakait chhathi. Aab kewal yuwa samaj aagu rahat aa e bujurg sabh ke kewal aatithya dait kaaj karabaak achhi. Harih Harah!!

**

Mithilanchal Mukti Morcha ke Shri Saroj Chaudhary – ABMP ke Shri Ratneshwar Jha – Mithila Vikash Parishad ke Ashok Jha lagaayat Mithila prati soch rakhne samast lok ke naam ikatthaa karu. Sabh ke poochhal jaay je aha sabh ke ki vichaar achhi… khaali hallaa aa ki kichhu kaajo? Harih Harah!!

**

अभी-अभी राजस्थान (जयपुर) से घूमकर (एक शादी में भाग लेकर) लौटा हूँ। कहीं भी जानेपर वहाँकी लोक संस्कृतिसे रुबरु होना मेरा निजी प्रकृति बचपन से ही रहा है। मैंने अपने जीवनके इस मोडतक बहुत कुछ देखा है। भारतके विभिन्न राज्योंमें भी काम के सिलसिले ही सही पर घूमकर यही देखा कि लोगोंका अपना विशिष्टताको बचाकर रखना होता है जिससे उनका विकासका नया रास्ता बनता है। ताजाताजी जयपुर (राजस्थान) में कुछ ही पल विशिष्टता देखनेको मिला पर दिल खुश हो गया। पर्यटनके दृष्टिकोणसे यह जगह काफी विकसित है। आमेरका किला देखकर मंत्रमुग्ध हो गये। उस महान् राजाकी सोच को मूर्तरूपमें मजबूतीके साथ ऐसा देखा जिसे देखनेपर मुझमें नया उर्जा का संचरण होते महसूस किये। फिर देखा वहाँके आदिवासियोंका नाच! अलग-अलग कबीलेके अलग-अलग प्रस्तुति! क्या बात था सच में! उन्हें अपनी संस्कृति बचानेका मानो जुनून सा चढा हुआ है! वन्डरफूल! मैं अपने मोबाइल से उनके प्रस्तुतियोंको कुछ छोटे-छोटे क्लिपोंमें कैप्चर करनेका प्रयास किया है जिसे आप भी हमारे विडियो फाइल में जल्दी ही देख पायेंगे। मेरा मानना है कि राजस्थान हो या पंजाब या बंगाल या गुजरात या आसाम या उड़ीसा या फिर आंध्र प्रदेश या कर्नाटक या तमिलनाडु या केरल या महाराष्ट्र…. भारतके अधिकांश राज्योंका निर्माण समग्र संस्कृति और भाषा एवं भूगोल के अनुरूप हुआ… जिससे वहाँकी लोक संस्कृतिका संरक्षण हो सका। पर खुदको काफी होशियार समझनेवाले राजनेता जो बुद्धि लगाकर उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार आदि नाम रख लिये – फलस्वरूप मूल संस्कृतिको भूल खिचड़ी संस्कृति अपनाने लगे और फिर टूटने लगे। मध्यप्रदेश से मूल संस्कृति के धनी छत्तीसगढ! उत्तरप्रदेश से मूल संस्कृतिके धनी उत्तराखंड! और बिहार से भी झारखंड! अब जो बाकी के ये तिनों प्रदेश बचे हैं इनकी अपनी मूल संस्कृति तो है पर नाम कुछ और ही हैं। भला इन्हें क्या पता कि मिथिला क्या है? अबध क्या है? झाँसी क्या है? यहाँकी सरकार को यह चिन्ता ही कहाँ है कि अपनी अस्मिताकी रक्षा करनेके लिये उनको अपने मूल संस्कृतिका पूरा खयाल रखना होगा। मुझे और जगह का तो नहीं मालूम, बिहारने तो मिथिला संस्कृतिके लिये बिलकुल ही कुछ भी नहीं किया। लोक-संस्कृतिका संवर्धन-संरक्षण तो दूर, उन्हें अपनी पहचान से खुद ही घृणा करनेकी सारी व्यवस्थाएँ पक्की कर दी। मैथिली पढने से जो पहले लोक आयोगकी परीक्षा आसानी से पास कर लिया जाता था और मिथिलाके लोग कुछ ज्यादा ही साहेब बन जाते थे, यह देखकर बिहार सरकार ने मैथिली विषयको ही हंटा दिया। स्कूलमें भी शिक्षक नहीं रखकर अपनी मूल भाषाका शत्रु मूल निवासीको ही बना दिया। बताओ अब? विडंबना या मिथिला राज्य न होनेका दुष्परिणाम? ऐसे बहुत सारे विन्दुएँ हैं जो राज्यकी दर्जा न पाने से मिथिला गंवाया है और अब भी यदि मिथिलाके लोग नहीं चेतेंगे तो गंवाते ही चले जायेंगे।

हरिः हर:!

**

एहि तस्वीरमें आमेर किला (जयपुर) देखि सकैत छी। चारू कात ऊँच पहाड के चोटी-चोटी पर किलाके निर्माण आ घाटी यानि पहाडके जैडमें जनता सभके रहयके आवास निर्माण, पुन: बीचो-बीच राजाके दरबार के बनायब जतय सऽ ठाड्ह भेलापर अपन प्रजाके राजा देखि सकैत छल, पारंपरिक संगीत आ चान्दके दर्शन करबाक बात सभ अत्यन्त गर्वक अनुभूति देलक जे भारत सचमूच सोनाक चिडिया रहल कहियो, आइ भले घोटालेबाज प्रवृत्तिक छद्म धर्म निरपेक्छीके चंगूल रहय ई देश, मुदा कहियो एकर इतिहास एतेक समृद्ध रहल जे समस्त देवताक वास अहीठाम भेल कहनाइ कदापि अतिश्योक्ति नहि! मिथिला तऽ सहजहि जानकीक जन्मभूमि रहल, विदेह सनके राजा भेलाह, बादो-बादो तक नीके लोक (अधिकांशत: भूदेव)के शासन रहल एतय…. लेकिन आब जखन दरभंगा महाराज अपने हिन्दीके चमकमें पडि मैथिलीके नुकसान कयलाह…. जखन जगन्नाथ मिश्र बिहारके मुख्यमंत्री रहैत मैथिलीके बर्बाद कय देलाह तऽ केयो आनक दोख कतेक देबैक? बस अफसोस करू आ अपनहि सऽ अपन घरमें आगि लगाउ! अपनहि निकम्मापन सँ अपन घरके जरैत छोडि दियौक! निकम्मा कोढिया बनल दोसरक चौका-बर्तन करैत जीवन गुजर कऽ लियऽ लेकिन अपन विशिष्ट पहचान आ संस्कृतिके रक्षा लेल किछु नहि सोचू! बूड़ि मैथिल! घमंडे चूर टा रहू!

नेता लूटेरा जनता बौक,
पोखरिमें माछ कूटिया चौक!

हरिः हरः!!

**

E suni mon kaafi duhkhi bhel je apne samaan prakhar imaandaar lok par Kripa Nand Jha saman jujhaaru aa imaandaar kaaryakartaa aarop lagelaah…. lekin apne aaswast rahu je hunka kiyo misguide kene hoytanhi tahi lel ehen haalat bhel…. or may be some other frustration.

Lekin ek baat batao, je why should we over speak about anyone to whatever questions raised by anybody. Yadi Brajastha Maithil dwara sahayog kail gel kaaryakram ke 24th congress ke darjaa nahi del gel ta did you write any letter explaining them the real reason? I think no! Shayad galati sabh sa hoit chhaik, lekin suniyojit galati ke ham hruday sa bhartsana karait chhi.

Apne sammaan-neey lok chhi aa ehen aaltu-faaltu aarop par apan utsaah ke kamajor ekdam nahi karab se hamar nivedan achhi. Ona avasthaa bhelaa par hruday kanek kamjor hoite chhaik. Lekin I promise, ki honi kichhu tehane chhal je bhel. Aab next program ham yuwa ke nettrutwa me dekhay lel chaahait chhi. You have to simply cooperate as a guest.

Harih Harah!!

**

१४ दिसम्बर २०१२

मिथिला राज्य कोन भूतक नाम थीक?
(मैथिलकेर भ्रम स्थिति)

मिथिला राज्य के माँग जल्दी सभक समझमें सहीमें नहि अबैत छैक, एहि मर्म के हमहुँ बहुत देरी सऽ बुझलहुँ। जेना एखनहु कतेको युवा जाहिमें विशेषरूपसँ अपन पैर पर ठाड्ह आत्मविश्वास सऽ भरल लोक मिथिला राज्यक माँगके विरोध करैत अछि। ओहि युवा के संसार में कतहु राखि देबैक तऽ फिट भऽ जायत ओ अपन मैथिलत्वके जोतिके खाइत अछि मुदा मिथिलाक अस्मिता लेल ओकरामें कोनो खास सोच नहि छैक। जस्टीफिकेशन लाख उपलब्ध करा देत, लेकिन कहियो इहो सोचैत जे आखिर हमरा में कोन माटि-पानिक शक्ति प्रवेश केलक जेकर कमाइ हम खा रहल छी, से सभटा बिसैर उलटे पढौनाइ चालू करत आ छोट‍— -पैघ सभटा बिसैर बस बुद्धि बघारब शुरु कय देत! देखलियैक नऽ जखन बिहार गीत बनेलक तऽ २००-२५० वर्षक ध्यान रहलैक आ लाखों-करोडों वर्षक इतिहासके धनी मिथिलाके दरकिनार कय देलक बिहार सरकार! नेपाल में देख लियौक जे मधेस चाही मुदा मिथिलाक पहचान लेल कोनो विचार नहि! बस ढूइस लडयवाला बलजोरी थोपयवाला कहानी सभ गढल जा रहल अछि। मैथिलकेँ विकास के चिन्ता छन्हि आ विकास लेल कि हेबाक चाही, कि भेल तेकर सभक कोनो लेखा-जोखा नहि छन्हि। कियो कोनो दलील तऽ कियो कोनो! किनको ई कहाँ जे वास्तवमें मंथन करी कि हम कि छलहुँ कि छी आ अहिना रहत तऽ कि होयब। पहचान बनैत छैक विशिष्टता सँ, अहाँके समस्त विशिष्टताके तऽ दाउ पर लगा देलक, घर सऽ बैला देलक, खेत जे उर्वर छल तेकरा बाउल सऽ भैर देलक…. बरु पहिले प्रकृतिक अपनहि रूप छलैक जे नदी सभ खुजल छलैक तऽ आइ जेना नहि कि टाका कमाइ लेल चमचा-लोभी ठीकेदार द्वारा बान्ह कटबाय बस भसियाबैत-बलुआबैत रहत! कहाँ गेल मिल सभ? पेपर, सुगर, राइस-फ्लोर-आयल मिल? माछ-मखान-पान खाली किताबे में रहि गेल? पाकिस्तानी मीठा पान खूब प्रसिद्ध अछि, लेकिन मिथिला के कथी भेटैत अछि हिन्दुस्तानके हर कोण में, बताउ तऽ? चौका-बर्तन साफ करनिहार? मजदूरी करैत रैयत में बसनिहार? सारा देश लेल सोचैत अपन घर के लोकविहीन रखनिहार? दोसरक खेतमें काज करब मुदा अपन गाममें निकम्मापनी देखेनिहार? ऊफ! मिथिलाके एहेन दुर्दशा लेल आखिर हम सभ किऐक नहि आत्ममंथन करी? देख लियौक जे स्वतंत्र भारतमें राज्य निर्माणके बुनियाद कि रहलैक? मिथिलाक दुर्भाग्य जे १८१६ के सुगौली समझौता सऽ दू दिस बँटि गेल आ तहिये सऽ मिथिला अपन कोनो अस्मिता नहि कायम राखि सकल? तऽ अंग्रेज या ताहि समयक राजाके कमजोरी सऽ मिथिला कि आइ दू सौ वर्ष तक कनिते रहय? हाँ! बाहरी आ भितरी दुनू दुष्ट तेहेन जोगार लगा देलक जे मैथिल आपसे में लडैत रहय आ बहरीके शासनमें पडल रहय! जी! पहिले जमीन्दारी दऽ के, फेर आरक्छण दऽ के, फेर जातीयताके दंगा पसारि, फेर मिथिलाके पैघ तवकामें सनक पसारि जे तोहर भाषा मैथिली नहि मगही थिकौक…. आ अनेको भ्रान्ति पसारिके आपसमें ततेक टुकडा बनौने अछि जे घर सम्हारैत-सम्हारैत अहाँके करोडों डिबिया तेल जरि जायत! न राधा के नौ मन घी हेतैन आ ने राधा नचती!

कतेक अफसोस जताउ! नेतो सभ केहेन तऽ कनाह कुकूर समान! बुझू जे कोनो विधान नहि, मुँहें पाछू कानून! मन भेल बहि गेलौं, मन भेल कहि गेलौं! मने पर सभटा! मिथिला के दिन सही में लदल बुझैछ! जखनहि घरवारी के चिन्ता खतम तखनहि अनवारी घर के लूटत! कृष्ण के संग तऽ अर्जुन के छलन्हि जे बूडित्व प्रवेश करिते गीताक पाठ पढेलापर घरहि के दुश्मन सभके लेल पुन: गांडीव उठाय हर बल सँ पाण्डव राज कायम कैल गेल, मुदा मिथिलाक अर्जुन सभ आपसे में भिडल छथि। कृष्णे केर क्लास लगाबैत छथि। गांडीव उठायब तऽ दूर, उल्टे कृष्णेके खेहारैत छथि। कृष्णो सोचैत छथि जे आखिर हस्तिनापुर तऽ थिकैक नहि, मिथिला थिकैक, एतय तऽ सभ पाहुन कहिके फाडयके मालिक बनल अछि…. हारि के बेचारे ओहो साइड लागि जाइत छथि। सियाजी गेली आ नवकी सिया सभ पर भूलवश दहेजक चाप चढि गेल। जनकजी जे केला सैह हमहुँ करब सोचि किछु सम्पन्न वर्ग शुरु केला आ धीरे-धीरे ई समाजके हर वर्ग के कैन्सर जकाँ जकैड लेलक! बेचारी आजुक मैथिलानी न घर के न घाटके! धोबीके कुकूर! लाज लगैत अछि मुदा लिखय पडत! जे बाहर गेली से बाहरे, मे घर पर छथि ओ घरे! तखन लैंगिक विभेद के अन्त कोना हेतैक मिथिलामें? एकीसम शदीमें विकास तखनहि संभव जखन जीवनरूपी पहिया समान अधिकार के बुनियाद पर चलत। अहु तरहें हम सभ पिछडल छी, सुधार लेल कोनो खास मजबूत प्रयास केम्हरौ सऽ नहि होइछ। कि कहू!

तखन एक बेर जोर लगाउ, एक बेर मिलियौ सभ एक ठाम आ देखियौक जे परिवर्तन कोना नहि होइत छैक! अगिला बेर जे दिल्लीमें मिथिला राज्य लेल धरना हेतैक ताहिमें अपन-अपन लगरपन (असगरे पहाड तोडयवाला अहं) के परित्याग कय तेना समन्वय करियौक जे समूचा ब्रह्माण्डमें मिथिला के विदेह सभ जागि गेलौक से सूचना जाय!

जय मैथिली! जय मिथिला!

हरि: हर:!

**

लोग कहते हैं कि मिथिलाका अस्मिताकी चिन्ता केवल ब्राह्मण को है! मैं इससे सहमत नहीं हूँ! पूछो क्यों? क्योंकि मिथिला केवल ब्राह्मण जाति का नहीं रहा बल्कि यहाँका राज व्यवस्था इनके हाथ ज्यादा रहा, आगे भी रहनेकी स्थिति केवल अग्रता से तय किया जाता है। परन्तु मेरा कहना आज के गणतंत्रकी स्थितिमें गलत होगा। आज तो जिसकी संख्या और एकता ज्यादा है भाइ वही राजा बन सकता है। हरि: हर:!

**

मेरे नगर में मुझे लोग बोलने लगे हैं कि तुम अकेले मिथिला की ठीकेदारी ले रखे हो, मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। कसम से! हरि: हर:!

**

हमें कोई बता दे कि मिथिला कभी जातीयता के बुनियाद पर सनातन पहचान बना?

ये तो हमारे गणतंत्रकी नियम के साथ हो रहा बलात्कार मात्र है जो संख्या के आधार पर वोट बैंक निर्माण करो और अपनी पहचानके साथ खुद डाकू बनो!

हरि: हर:!

**

१५ दिसम्बर २०१२

हमरा सभके दोसर के बुराइ पर ततेक ध्यान नहि देबाक चाही जतेक निज-कमजोरी आ बुराइ पर अखिलेश! उपरोक्त कमेन्ट करनिहार के अहाँ गलत रूपमें बहसमें उलझाबय के प्रयास कय रहल छी, हलाँकि सैद्धान्तिक रूपमें अहाँके विरोध जायज अछि। अहाँ जाहि प्रकरणके सामने रखलहुँ से बिलकुल सच अछि। लेकिन ओहि उत्साहके डाक्टर साहेब कतेक सकारात्मक रूपमें ग्रहण केलाह से हुनकर पूर्व लेखनी सऽ पता चलैत अछि। अत: सकारात्मक टिप्पणी सेहो जरुरी छैक। हरि: हर:!

**

रेडियो अपन मिथिला सँ सदिखन सकारात्मक सहयोग दैत आयल एहि ग्रुपके सदस्य, पत्रकार, स्वयंसेवी, मैथिल सुदिप कुमार झा एक बेर फेर विगत किछु दिन पूर्व दहेज मुक्त मिथिला लगायत नेपालक राजनीतिक असर मिथिला-मैथिलीपर केहेन पडल अछि ताहि सम्बन्ध एवं आगामी विद्यापति स्मृति पर्व समारोह २०६९ (विराटनगर) के विषयमें रेडियो परिचर्चामें हमर विचार लेलन्हि जेकर सकारात्मक असर श्रोतावर्गमें जरुर पडल हैत से हम कल्पना करैत छी। सुदीपजी सँ अनुरोध जे उपरोक्त कार्यक्रम के बाद कोन तरहक प्रतिक्रिया सभ श्रोतावर्गसँ भेटल ताहि सँ यदि अवगत करेता तऽ अवश्य हमरा लोकनिक अभियानके सार्थक दिशा-दशा प्रदान करबाक मार्गदर्शन भेटत! प्लीज! Sudip Kumar Jha जी, अपनेक सहयोगक याचक – प्रवीण!

हरि: हर:!

**

२०६७ वि.सं. में मिनाप (जनकपुर) छल, आ आब विराटनगरमें सेहो विराट मैथिल नाट्य कला परिषद् अछि। कार्यक्रमके एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि कहि सकैत छी। हिनकहि प्रस्तुति देखू एहि बेर:

आब कोना चलब?

१३ पुस समय ४ बजे के आसपास प्रमुख अतिथिके सोझाँ!

हरि: हर:!

**

एहि बेरुक कार्यक्रमके थीम रहत ‘राष्ट्रीयता सर्वोपरि – मातृभूमि देवस्थल:’ आ धून बाजत विद्यापतिक मधुर कोकिल स्वर संग मैथिली राष्ट्रगीत नेपालक अशान्त अराजक राजनीतिक अवस्थाक समाधान लेल शान्तिपूर्ण आह्वान!

हरि: हर:!

**

हमर सपना बस एकहि टा
पहचान मैथिल आ मिथिला!
बनि के रहत हमर मान
मातृभूमि के सच सम्मान!

हरि: हर:!

**

१६ दिसम्बर २०१२

जायज ही तो कहा प्रधानमंत्रीने! इमोशनल रिजोल्युशन से भला भारत और पाकिस्तान आपसी मसले कैसे सुलझा सकते हैं? जब धर्मकी बुनियादपर खुद को भारत से तोडकर अलग कर चुकी पाकिस्तान सर्व धर्म सम भाव भारत पर आज भी धर्मके नामपर तोड-फोडको बढावा देती है, काश्मीरके बहाने भारत पर आतंकवादकी युद्ध भार लादती है तो फिर केवल डिप्लोमैटिक विजिट और बातोंसे मलहम लगानेकी एटिच्युड से भला क्या होना? आवश्यकता है कि दोनों राष्ट्रमें भाईचारा और सहोदर प्रेम हो न कि सौतेले भाई के जैसा! हलाँकि मुस्लिम दमनके शिकार भारत बहुत पहले से इस्लाम धर्मके प्रति सहिष्णुता खो चुकी है, पर आज भी यदि विवेक से काम लेकर उन कलंकके टीकोंको मिलकर मिटा लें तो सौहार्द्रता जरुर बनेगी।

हरि: हर:!

**

अपन विचार बहुत बादमें बदललैक अछि। यदि अहाँ इतिहास के विषयमें जानकारी रखैत छी तऽ देखब जे बामुश्किल ५% लोक बाहर जाय रोजगार ताकय लेल बस आइ सऽ ४० वर्ष पूर्व धरि मिथिलाक हर गाम लोक सऽ भरल छलैक, लेकिन सरकारी उपेक्छा आ मैथिलीपर निरन्तर प्रहार कतहु के नहि रखलक आ लोक के मजबूरन गरीबी सऽ लडय लेल पलायन करय पडलैक। ११० वर्षमें मिथिला प्रति कोनो न्याय के उदाहरण राखू, हमरो खुशी होयत! एतय तक जे खुद मिथिला के पुत्र मजबूरन बिहार जिन्दाबाद करैत अपन घर के तरेरल नजरि सऽ देखलक! विरले केओ ललित सम पुत्र बनल जे मिथिला लेल सेहो केलक भले सपना बिहारके बढबाक देखलक! हरि: हर:!

**

पहचान कि थिक?

हम के? हमर के? अपन कि? आन के? आर एहेन बहुत रास प्रश्न सहजहि स्वयंके भीतर मानव-व्यवहार-जगत् में उठैत रहैत छैक। आध्यात्मिक दृष्टिकोण सँ हम मानव परमात्माक अंश आत्मारूप सदा-सनातन छी, मानवरूप स्वरूप आ मानवता हमर व्यवहार-धर्म-पहचान थीक। तदापि व्यवहारमें जखनहि माय के कोख छूटल आ कि पहचान माय-बाप-परिवार-परिजन-समाज-समुदाय-टोल-गाम-शहर-जिला-राज्य आ राष्ट्र आदिक पहचान अलग-अलग बनि गेल। कलियुगमें एहि लौकिक पहचानके माथपर हावी होयब स्वाभाविक कारण दौडमें केकरो सऽ कियो पाछू छूटय लेल नहि चाहैत अछि। विश्वके हर कोण में देखू, बस अपन पहचान आ वर्चस्व लेल सभ केओ बेहाल अछि। लेकिन जे अति-सहिष्णु प्रजाति (जेना मैथिल) अछि ओ बाहर में चुपचाप गुलामीके ढोंग करत आ घर वापसी करिते जोर सऽ खोंखी करत। घर के अवला नारी पर दमैश के रोब झाडत जे इज्जतके परवाह करे आ अपन शेखी कायम करे…. आदि-आदि!

मिथिला आ मैथिलक पहचान आइ जे खतरामें अछि से मात्र अति-सहिष्णुताके कारण, गुलामी गछय लेल तत्पर रहबाक कारण, दोसर संग तान आ सूरमें सूर मिलेबाके चाटुकारी गुण-धर्मके कारण, घरमें दमशयके प्रवृत्ति आ बाहरमें गर्दैन झुकाय कन्हियायल दृष्टि सऽ बात तकैत बस दौडि भीड सऽ बाहर भागयवाला गुण के कारण! सौंसे सऽ मिथिला पार अछि आइ! नहिये भारत, नहिये नेपाल! ग्लोब पर कतहु नहि! ढोंगी मैथिल बस ढंग जनैत अछि! काजक जोग के?

हरि: हर:!

**

हमर विचार आ जमीनी अनुभव दुनू में आन्दोलन लेल बारह वरण के जोडब संभव नहि, आन्दोलन ओकरहि द्वारा होइत छैक जे माथपर फेटा बान्हि आगू बढि चुकल छैक जाति किछु भऽ सकैत छैक। बाजब जतेक आसान छैक करब ततबे मुश्किल! संख्या सऽ क्रान्ति नहि होइत छैक, एहि लेल दृष्टिकोण आ लगरपन के आवश्यकता छैक। आम जन एहि सऽ जुडतैक ताहि लेल केकरो पास औकात नहि छैक जाबत स्वस्फुर्त सवर्ण सर्वहारा स्वयं आगू कदम नहि बढेता, के केकरा पूछतैक जे हौ भाइ आन्दोलन में चलब? ओना, हम स्योर छी जे मुर्लीधर भाइ मिथिला राज्यक माँग करनिहार के नजदीक सऽ जनिते नहि छथि जेकर चलते गोल-मटोल भाषामें पोस्ट बनेलाह छथि। बता दी जे भुवनेश्वर गुरमैता जे पंजाब युनिवर्सिटीके वाइस चान्सलर रहलाह ओ मैथिली लेल काज केलाह, संविधानके आठम अनुसूचीमें मैथिलीके दर्ज कराबऽ में मैथिली महासागर (साहित्य-शास्त्र-उपशास्त्र)के भूमिका के संग गुरमैता (जाति सँ गुआर) अपन तात्कालीन मित्र के. सुदर्शनके उपयोग करैत अटलजी द्वारा एतेक पैघ कार्य संभव करेलाह। तहिना उपरोक्त धरनामें ब्रजस्थ मैथिल लगायत विभिन्न जातिक प्रतिनिधित्व छलैक। लेकिन केकरा लग एतेक पैसा छैक जे लूटेरा नेता सभ जेकाँ बस-ट्रक-ट्रेन भरिके आदमी जुटाओत? ताहि हेतु देखावा पर कोनो विचार रखला सऽ नहि होयत, व्यवहारिक बात करय जाउ। अहुँ सभके योगदान भेटतैक तऽ ओ खानापुर्ति हेतैक, लेकिन अहीं सभ किऐक पाछू छी? हरि: हर:!

**

While learning something from Geeta, I loved two definitions so much. One, the hypocrite, and another the thief. Hypocrite is he who speaks one and do another. Thief is he who does not share nature equally and fairly with all fellow beings. Those needing more elaborate debates may comment. Harih Harah!!

He who restrains the organs of action but sits revolving in the mind thoughts about sense objects is of deluded understanding and hypocrite. Harih Harah!!

In charge of the various necessities of life, the demigods, being satisfied by the performance of yajña [sacrifice], will supply all necessities to you. But he who enjoys such gifts without offering them to the demigods in return is certainly a thief. Harih Harah!!

**

जतय श्याम सुन्दर पथिकजी मिथिलाक शीप व कला एवं सप्तरी पर्यटनके संवर्धन लेल अपन सहभागिता स्वीकार कयलाह ततय काठमांडु सऽ श्याम किशोरजी अपन पुस्तक संग अन्य मैथिली लेखकक पुस्तक उपलब्ध करेबाक प्रतिबद्धता जाहिर कयलन्हि आ पटना सँ शिवकुमार जी जे चेतना समितिमें वर्षों सऽ पुस्तकके बिक्री-वितरण करैत आबि रहल छथि ओहो अपन गुवाहाटीके यात्रा पोसपोन करैत विराटनगर अयबाक पुष्टि कयलन्हि अछि। समारोह के तैयारी जोर पर अछि, अपनो लोकनि जरुर आबी! हरि: हर:!

**

समस्त दहेज मुक्त मिथिलाके सदस्यके सूचित कय रहल छी जे अगिला २८-२९ दिसम्बर के होमय जा रहल विद्यापति स्मृति पर्व समारोह २०६९में दहेज मुक्त मिथिला सेहो एक सहयोगी संस्थाके रूपमें पार्टनरशीप केलक अछि आ सम्मान समारोह लेल दू गोट दहेज मुक्त विवाह सौराठ सभा सँ कयनिहार के सम्मान कैल जायत, इच्छूक सदस्य जरुर सहभागिता एवं सहयोग पठाबी। ओना ई कार्यक्रम के पूरा प्रायोजन हम अपन निजी कोष सँ करब से जानकारी देबय लेल चाहब। सम्मान में प्रमाण-पत्र आ पाग-दोपटा रहत से जानकारी देबय लेल चाहब। सम्मान कार्यक्रममें सहभागिता हेतु आवश्यक जानकारी सम्मानित व्यक्तिकेँ आदरणीय शेखर चन्द्र मिश्र जीके मार्फत पठेने छी। पत्र पठेबाक जरिया इमेल द्वारा सहज रहत। हरि: हर:! Shekhar Mishra Jee sa anurodh je hamara apan email ID jaldi post karaith.

**

मिथिला आन्दोलन केर असर सम्माननीय मुख्यमंत्री पर किछु एहि तरहें पडल जे ओ केवल वोट बैंक के चिन्ता नहि करैत मिथिलाके पिछडापन पर चिन्ता करैत बिहार राज्य के विशेष राज्यक दर्जा भेटला उपरान्त मिथिलाके विशेष विकास होयत से अभिव्यक्ति मिडियामें देलाह छथि। अवश्य, राज्यके माँग के समुचित संबोधन वर्तमान मुख्यमंत्री द्वारा एहि तरहें होयब स्वागत योग्य कदम अछि। बिहार के विशेष राज्यके दर्जा दियेबाक लेल मिथिला सँ लाखो लोक पटना रैलीमें पहुँचल छल आ आगामी समय में सेहो नितीश समान प्रखर नेताके संग मिथिलावासी जरुर रहत से विश्वास दियाबैत छी। पिछडापन के दूर करबाक लेल बिहार हलाँकि अक्छम बनि चुकल अछि आ फूइसक लली-पप बहुत दिन सँ दैत आयल अछि, यदि आजुक घोषणा सेहो किछु तेहने लली-पप थीक तऽ जानब मिथिलावासी! हरि: हर:!

**

१७ दिसम्बर २०१२

अधजल गगरी छलकत जाय!

सातो अन्हराके दुबारा एक दिन फेर हाथीके छुआबैत पूछल गेलैक तऽ फेर सभ अलग-अलग तरहें हाथीके चिन्हैत पैर छूबैत खंभा, पेट छूबैत बडका ढोल तऽ कि – कि कहैत रहल मुदा लास्टवाला अन्हरा अपन आइ-क्यु सऽ सही-सही कहि देलकैक सेहो बिन छूनहि!! आब तऽ समूचा चैनपुरमें हल्ला भऽ गेल जे बाप-रे-बाप ई अन्हरा साधारण लोक नहि, आदि-इत्यादि आ लोक सभ ओकरा फूल-माला सँ लादि देलकैक! सहरसा के जिलाधीश आ दरभंगाके जिलाधीश सभ सेहो सुनैते ओकरा पुरस्कृत करबाक सिफारिश बिहार सरकार लग कय देलकैक। दिल्ली, जम्मु, हैदराबाद आ कलकत्ताके मैनेजमेन्ट कंपनी सभ सेहो अपन विशेष टोली पठा देलकैक जे आखिर देखियैक कि ओ आन्हर कोना ई चमत्कार कय देलकैक। लास्टमें अन्हरा परेशान भऽ के कहलकैक जे एतेक करय जाय गेलह लेकिन हमरा आँखि कियो नहि बना देलक। ओ तऽ पैछला बेरक अनुभव सऽ हम कहि देलियऽ जे पैछलो बेर सातो गोटे अलग-अलग छूबलियै से अलग-अलग कहैत छलियैक आ अहू बेर सभ कियो अलग-अलग कहय लगलैक तऽ हम बिन छूनहिये कहि देलियैक जे हाथी थिकैक। हमर गागर अधा नहि जे हम अनेरौ के छलकब! 

हरि: हर:!

**

गज्जूके गजनोर! (व्यंग्यात्मक आलोचना)

गज्जू बेर-बेर बिसरैत अछि मुदा जाडक मास अबिते ओकर गजनोर पुन: स्रवित होवय लगैत छैक। अपन आँखिसँ ओकर ई नोर कहिया रुकत तेकर अनुमान साहित्य अकादमी के आइ धरि नहि लागि सकलैक अछि। बहुत साहित्यकार सभके चुटपुटिया लेख के सम्मान भेटि गेल लेकिन गज्जू के ८०० पृष्ठक मोटका नवका शास्त्र ‘बतहोपनिषद्’ के सम्मान नहि होयब साहित्य अकादमीके साखपर प्रश्न ठाड्ह करैत छैक। मुदा गज्जू कम छट्ठू नहि, बताहक-बथान बनाय सवर्ण-गैरसवर्णक राजनीतिसँ साहित्यक दुनियाके बादशाहत बनाबय लागल, बताहके कमी नहि बतहबथानमें! फेर सुनलहुँ जे हस्तिनापुर प्रवासमें गज्जू शीतलहरके झोंका पबिते अपन बतहोपनिषद्के श्रद्धाञ्जलि देबाक लेल सवर्णके गरियाबय लागल अछि। कतेक नौटंकी केलक गज्जू! समानान्तर सम्मानक धारा बहा देलक बेचारा, ई सोचि जे बतहोझा गामके बताह साबित करत। बतहबथानक लोकके सहारे किछु संभव कय लेत। लेकिन संसार सनातन सिद्धान्तपर चलैछ गज्जू बताह के ई एहसास कहिया हेतैक? समानान्तर सम्मान या फेर प्रायोजित सम्मानक अस्मिता अलग छैक, राष्ट्रीय सम्मानके अलग। बरु एतेक समय अपन स्तर-सुधारमें लगबैत, समय सऽ दबाइ खाइत आ बतहोधर्म सऽ नितान्त दूर साहित्य सुधा रस पान करैत आ पुन: दोसर रचना रचैत जे संसार लेल हितकारी होइत, आ विकासक युगमें जाति-पाँतिके नामपर बँटवारा करऽ सऽ बहुत दूर बस गुणस्तर पर सम्मानित होइत। कृष्णानन्द फिलमानके अभावमें गज्जू हाथी मदमस्त भागि रहल अछि!

हरि: हर:!

**

१८ दिसम्बर २०१२

In some of the groups running with name and fame of Bihar, I don’t justify the discussion of Mithila Rajya because the motive of that group is completely different. The debate for formation of Mithila state with fellow citizens of Bihar or India or Nepal is meaningless unless you organize the same with complete knowledge of federalism and grounds for formation of states in a federal nation according to its central constitution. Why one should waste his/her time discussing this issue with cipher guys? If I have no knowledge of my own history, my geography and time-to-time changes (transformations) caused by several affecting reasons – in total the background and present status, I have no right to advocate really. Similarly, if I know all and the counterpart has no knowledge at all, please avoid discussing with them as they can only waste your time.

Harih Harah!!

**

बिहार बनल कारण आधुनिकताके वयार आ बुद्ध सऽ जुडल लोकप्रियता के मोल संग अलग-अलग संस्कृतिके एक संग जोडि रखबाक प्रेरणा तत्त्व हावी छल। लेकिन बड पैघ परिवार बनला सऽ विकास तऽ दूर लोक-संस्कृतिके संरक्षण तक नहि कैल जा सकल। अन्य राज्यक तुलना बिहार अति पिछड़ल राज्य बनल रहल। बादमें उड़ीस टूटल, फेर झारखंड टूटि गेल आ अपन मौलिकताक संरक्षण लेल पूरजोर प्रयासमें लागल अछि। अंग्रेजे द्वारा बनायल गेल मूल राज्य बंगाल सऽ निकलल बिहार, बिहार सऽ निकल उड़ीसा आ झारखंड; आ आब जे बिहार बचल अछि ताहिमें तीन अलग-अलग संस्कृति मिथिला, मगध आ भोजपुर संयुक्त रूपमें अछि। लेकिन तिनू के विकास गति बिहार-बिहारी के नाम तर धँसल अछि। बुद्धक विहार क्षेत्र सऽ बनल बिहार जाहि परिकल्पना पर बनायल गेल आखिर एतेक पिछड़ल किऐक रहल, मंथन योग्य विषय बुझैछ। कहबी छैक जे ढेर जोगी मठ उजाड़! कहीं बिहारक हाल यैह कारण सऽ तऽ एहेन नहि बनि गेल? आइयो केन्द्रमें बिहारक मूर्ति द्वारा मुख्य कार्यक जिम्मेवारी वहन कैल जाइछ, लेकिन अग्र पंक्तिमें कियो बिना चमचागिरीके प्रवेश नहि पाबि सकैत अछि। कतबो शक्तिशाली नेता हो लेकिन राष्ट्रीय नेताक छवि पाबयवाला बिहारी नेता के? किछु-किछु रहल ललित बाबुमें तऽ आब किछु-किछु देखाय पड़ैछ नितीश कुमारमें – लेकिन मूल संस्कार के रक्षा करय लेल हिनकहु सभमें दमवाली बात देखय लेल नहि भेटैछ। इतिहास गवाह छैक जे यदि अपन मूल डीह आ मूल संस्कृतिके कोनो परिवार त्याग केलक तऽ संसारक भीडमें कतय हेरा गेल से कियो नहि बुझि सकल। उदाहरण लऽ लियऽ! गामक फल्लाँ बाबु कलेक्टर बनलाह आ शहरे रहि गेला, एगो बेटा अहमदाबाद, दोसर जहानाबाद आ तेसर मुर्शिदाबाद! बेटी सेहो लखनउके नबाबे संग! तिनकर सभक संतान होशंगाबाद, जम्मू आ मथुरा-वृन्दावन! अपन सहोदरके कि हालत सेहो दोसर के पता नहि। बिखैर गेला पूरा परिवार! छैथ कतहु, हमरा कि पता! बिहार बनि गेल बिखरल परिवार समान कारण ढकोसला विकास के नाम पर सेहो आब जखन एक प्रखर पुत्र नितीश अपन लगन सऽ किछु कार्य करबाक पैंतरा करैत छथि तखन, अवश्य बिहारी एक सम्मानजनक पहचान बनि गेल अछि। लेकिन समेटल परिवार, विकासशील परिवार के ई लक्षण कदापि नहि जे फल्लाँ बाबु कलेक्टर साहेबक परिवारके कहलहुँ। भगवती घरमें बादूड़ घरवास करैत छन्हि एखन!

मिथिला राज्य यदि आजुक बिहारके अस्मिताक विरुद्ध अछि तऽ विकास लेल कि सोचलहुँ?

ओ जे पेपर मिल आ सुगल मिल सभ छल तेकरा पुनर्स्थापित करबाक लेल कि प्रगति अछि?

साक्षरताके दर बढाबय लेल आ शिक्षाक नीक प्रसार लेल अनिवार्य मातृभाषामें शिक्षा पद्धति अनुरूप मैथिली संग दुर्व्यवहार कहिया रूकत?

सामरिक रूपमें मिथिलाक अधिकांश भूमिके बाढमुक्त करबाक लेल नदीके जोड़बाक परियोजना, नहर निर्माण, झील संवरण, एहि सभपर कोनो योजना एखन धरि कार्यान्वयन किऐक नहि भेल?

मिथिलाक विशेष कृषि उत्पाद जेना पान, मखान, माछ – एकर व्यवसायीकरण-वैज्ञानिकीकरण कहिया होयत? कोनो अनुसंधानो भेल एहि सभ तरफ? सरकार या सरकारके नुमाईंदाकेर कोनो ध्यान अछि एहि तरफ? एतेक रास पोखैर छैक, एतेक रास भूमि छैक, एहेन मीठ मोडरेट क्लाइमेट छैक…. तऽ ध्यान केकर जेतैक एहि सभ के समुचित संवरण-संवर्धन दिस?

शिक्षाक केन्द्र रहल मिथिला, आइ मैथिलकेँ कोटा आ बेंगलुरु के संग पुद्दुचेरी जाय के बाध्यता किऐक?

सरकारी रोजगार नहि उपलब्ध रहलाके कारण, सभ रोजगारोन्मुख बनैत उच्च स्तरीय पढाइ सऽ विमूख अपन भूमिके बंजर छोडि पलायन करय लेल बाध्य, समाधान लेल सोच कि? उलटे यशगान जे अच्छा है, चाँदपर भी बिहारी जाकर रोजगार कर सकता है कहि फूला देनाय आ एम्हर कंबल ओढि घी पिबय लेल बस मंत्री, ठीकेदार, दलाल, आदि बेहाल? एहेन भरुवागिरी सोच बिहारमें किया?

आ तखन यदि मिथिला राज्य लेल माँग अलग होयत तऽ अपने में चैत-चैत खेलाइत जाँघपर थाप मारयके प्रवृत्ति कियैक?

हरि: हर:!

**

Dear Mr. Roy! Ise todna nahi kahte hai aur federalism me historical, cultural, geographical, lingual bases ke aadhaar par regional autonomy ka advocacy hota hai. Maine isiliye starter post me logo se studies karne ki baate kahi hai aur wagair padhe-likhe log jab aapas me gantantra aur batwaare ki baate karate hai to thik waisa hi hota hai jo Nepal me abhi ham sabhi dekh rahe hai. Jharkhand, Uttarakhand, Chattisgadh ne self-development ke liye apne tareeke se baate kar rahe hai, apani sanskriti ke liye khare hai aur mool tattva ki raksha se aaj bhale poverty/corruption dikhe par lambe duri me unhi ka jeet hona tay hai. Harih Harah!!

**

Very true! Alas the same could live even today. Situation is different. Right since the time of formation of Bihar, Mithila and Maithili have been pushed behind the walls of Hindi and the so-called Buddhist hypes. Maithili language has been degraded by removing from the courses of studies, from BPSC mainly. No effort to increase the education through native language Maithili in Mithila, rather put heavier loads of Hindi and other curricular to end the Maithili literature’s ocean from Mithila. No efforts to save industries – agriculture – culture – language – traditions – arts/crafts…. nothing special for Mithila; then what to sing of Mithilaism Kedar Roy Jee? Kewal khokhlaa geet gaayab taahi sa waih puraan baat je Maithili rajani = sajani ke bhashaa thik se pramaanit hoyat aa jena aai swayam Maithil apan bhasha sanskruti sa ghruna karay lagalaah chhathi se self-suicidal saabit hoyat. Kahu takhan Mithilattvak ki mahattva?? Harih Harah!!

**

1935 me Dr. Amarnath Jha ke Maithili lel sifaarish Bharatiya Congress me, aa Dr. Rajendra Prasad tatha Dr. Sachidanand Sinha dwara Hindi ke okaalati…. 1953 ke state construction committee ke Mithila Rajya banaabay lel bhasha ke ashtam anusoochi me nahi hoybaak excuse dait statehood nakaarab… fer 2002 me katek kathor prayaas sa 8th schedule me Maithili ke grant karab aa 2003 me gazette me aanab… aab Mithila lel platform taiyaar achhi, but political motivation aa circumstance ke sang-sang Mithila lel prayaas katek chhudra achhi, jameen par katek kamajor avasthaa, Bihar ke kharaat lootayvala ke jaati-paati me Maithil ke baati raakhab – Mithila lel favorable kichhuwo ta nahi…  takhan neta sabh seho aapas me sang debaak jagah ek-dosar ke dhariyaa utaaray par laagal chhathi… kahu ki change bhel? Harih Harah!!

**

I have got the Manusmruti, with detailed elaboration, name of chapters, contents, etc. Can you please tell me the which chapter this sloka is derived to mention here?

However, my query is still not met. I am looking for the word “MADHESH”.

And, you mention that Khas bhashis had fare deal of knowledge of these people belonging to Madhya Desh and so they called them Madhisey or even Madheshi; but I have referred to their Shastras where they refer to themselves as Ganga Tatvaasis. Where does Ganga situate in their knowledge, any idea?? You can also refer to their scriptures or find their ID’s as per Puranas in several kathaas.

Harih Harah!!

**

१९ दिसम्बर २०१२

बहुत कम लोग हैं जो एजुकेशनका सीधा अर्थ अनुशासन जानते हों, लेकिन रोजगार (रोटी) और उसमें भी भ्रष्टाचारिता करनेकी जुगाड याने कमाई मोटी करनेकी लालसा आजके एजुकेशन सिस्टमको डिफाइन कर रही है। मैकाले जो ब्रिटीश पार्लियामेन्टमें अंग्रेजोंको भारतपर शासन चलानेका गुड सिखाया था वो पूर्णत: सफल होते दिख रहा है।

जबकि भारत भूमिपर तंत्र-मंत्र-यंत्र का मूल वेद के बिपरीत आत्मघाती कहें या फिर आसुरिक समूह खुद भी होते रहनेकी परंपरा रही है और नि:संदेह भारतीय दर्शनमें ही द्वंद्वपर कब्जा पानेसे ही ब्रह्मलीन होनेकी सिफारिश की गई है, लेकिन हम जिस युग में आज चल रहे हैं अवस्था इतना लचर हो जायेगा देखकर हैरानी तो होता ही है साथ ही राजनेता और राजधर्म को भी निम्न स्तरपर जाकर केवल उलझनेवाली पोलिसी मुझे साल रहा है।

आखिर मिथिला जैसी पहचान और परंपराको आपने बर्बाद करनेका हर काम कर ही डाला, लेकिन मिथिला में जब आओ एक कंडिशनल लली-पप खिलाकर हमें भी लोभी बनाकर चले जाते हो। विदेहके संतान मैथिल तुम्हारी झाँसे में आ जाते हैं और पटना-दिल्ली-काठमांडूमें बैठे तुम्हारे दलाल जो मिथिलाके होते हुए नित्य नुकसानके लिये तुम्हारे साथ कदम बढाकर चलते हैं उनके फेके जालोंमें दाना चुगते हुए फँस जाते हैं। भाई! दाना भी देते हो तो कुछ अच्छा दो जो सनातन-स्वरूपको कायम रख सके! इसमें भी हरामकी कमाई और तुम्हारे ब्रह्मलूटकी जोगाड – याने जाति-पाँतिमें लोगोंको इतना तोड डालो कि आपसी एकता मूल तत्त्व सांस्कृतिक पहचान खत्म हो जाये और लोग लडते-भिडते तुम्हारे दिये बाढ और स्कूली दुपहरिया मिल (भोजन) के खराती अन्न लूटते हुए ताडी पीकर एक हरे पत्ते (रु.१००के नोट)में अपनी वोट तुम्हें बेच दें…..  क्या जुगाड सेट कर लिये यार! गणतंत्र नाम देते हो और गन-प्वाइन्टपर काम करते हो!

आमजनोंको अंग्रेजिया एजुकेशन और उधारकी पद्धतिसे पढानेका व्यवस्था हमें गुलामीकी तरफ अग्रसर कर रहा है और मिथिला जैसी एजुकेशन हब अब दरिद्री झेल रहा है। जागो लोगो! जागो!

हरि: हर:

**

हम उदाहरण राखि चुकल छी, जिनका देखबाक हो से आबि के देखी। भूखन राम, भागमनि कुमारी आ अनेको दलित, महादलित, पिछडल वर्ग आब एजुकेशन के बल सँ एहि सभ सँ दूर निकलि गेल छथि। आब हुनकर जीवन-स्तरमें नंगाफरोशी आ कोनो तरहक अनहाइजेनिक प्रस्तुति नहि जे केओ कखनहु घृणा करय। आब ओ सभ मरल जानवरक माँस या चमरा के संग स्वयंके पोषित नहि करैत छथि जे हुनका केकरो सऽ निम्न देखय के जरुरत पडत। हरि: हर:!

**

जोश-जोशमें होश गमेलौं बजलौं बात अनेक यौ!
काज बेर में दोग नुकेलौं सठलौं घात अनेक यौ!
जेना कोढियाके बैठकमें, लगलै बाजी कोढिपनके
आगि लगाके जाँच करेलकै, नपलै कोढिपन सभके
भागल सभटा नकली कोढिया आगि दहकिते सभ दिस
अन्तमें बचलै सुच्चा सभटा बाजैत मस्ती राइस-रभिस!
तान कमरिया पडे रहो – जलता है तो जलने दो! 

आब दहेज मुक्त मिथिलामें हम सभ सुच्चा कोढिया सभ बचल छी, बुधियरबा सभ पार अछि! लेकिन फेर कहब जे कोढिये के मिटींग सही, मुदा आउ जरुर विराटनगर के समारोह में। दहेज मुक्त मिथिला एक सहयोगी संस्थाके रूपमें उपरोक्त समारोह के आयोजन करबामें लागल अछि। कोढिपन के परिणाम पता चलत कार्यक्रम भेलाके बाद! 

हरि: हर:!

**

हमें खुशी भी होता है और गम भी। मिडियाके हल्ला करनेपर हमारे युवामें जागृति आती है, पर वही अपने आदर्शको बिगाडकर अपराध करते हैं उस समय भूल जाते हैं कि हमारे अपनोंके साथ भी अपराधिक क्रिया होनेपर हम ऐसे ही जलील होते हैं जैसे आज किसीकी बेटीके साथ दिल्लीके व्यस्त सडकपर हुआ है।

पर मुझे हँसी भी आता है हमारे मैथिल युवकोंके भी इसी पंक्तिमें खडे होकर दिल्लीवासीके साथ होहकारा-में जयकारा करते देखकर! अबे! तुम्हारे साथ कितना बडा रेप हुआ कभी देखे? तुमने खुद अपनी भाषाके साथ रेप कर डाले कभी सोचे? अभी मगरमच्छकी आँसू मुझे दिखा रहे हो? मेरे वालपर काउज पोस्ट करते हो कि रेपिस्टके लिये मौतकी सजाका माँग करो? सुनो कान खोलकर! वे लोग जो अपनी चरित्रको सरेआम निलाम किया है वो जिन्दा ही मर गया समझो! उनके लिये हम क्या मौत माँगेंगे? मेरे वालपर दाकियानूस बात पोस्ट करके होशियारी मत दिखाओ मेरे फेसबुकिया अनुजो!!

अपनी चरित्रको बचाओ, अपनी संस्कृतिको बचाओ!
मिथिला संस्कृतिके साथ फझीहत करनेवालों से बचो और खुद भी ऐसा मत करो।

हरि: हर:!

**

आइ एक सौ आदमी सऽ भेंट भेल। ५ गो बूडि छल! पुछू केहेन? ओकरा मैथिली आ मिथिला सऽ कोनो सरोकारे नहि छैक लेकिन ओ हमरा मिथिलाके बर्बादी गना रहल छल। पकैडके ओकर जेबी सर्च केलहुँ तऽ सभटा उपद्रवी बात सभक चीट निकलल! 

*लव लेटर नेपालीमें!
*विदेशिया घरवालीके फोटो!
*मैथिलीके दरशवाला कोनो बाते नहि!
*बलजोरी हिन्दिये में लिखल दस्तावेज!
*मिथिलामें झगडा लगाबयके लेल मगहिया जासूसी करार!

अरे राम! पकिया विद्रोही छल जे मैथिलक घर घूसि मैथिल बनय के ढोंग करैत अनेरौ के नेतागिरी करय सोचैत छल। भगेलहुँ सारे के!

हरि: हर:!

**

भरत पैखाना केलाके बाद तूँ यदि पैनछूवा नहि करब तऽ तूँहूँ अछूत भेलह। हमहुँ तहिना! सभ तहिना! विचार करह! जे कोनो जातिके दशा में दीनता छेक आ ताहिसँ ओकर दिनचर्या अशुद्ध बनैत छैक तऽ स्वत: अन्यके छूत-अछूतक रोग खिहारैत छैक। हमर अंग्रेजीमें टचेबिलिटीपर एक पुरान शोधकार्य अछि जे ओरकुटपर धर्म-मार्गपर भेटतह! प्लीज रेफर टु दैट! ओकर शास्त्रीय न्याय आ तार्किक न्याय दुनू के समेटने छी। हौ बाबु! बहुत काज केने छी। समेटब तऽ धरानवाला हिमालय ठाड्ह हेबाक चाही!  हरि: हर:!

**

२० दिसम्बर २०१२

अतीत स्वर्णिम – वर्तमान दयनीय: मिथिला   इतिहास मिथिला के अत्यन्त समृद्ध लेकिन वर्तमान अन्जान अन्हरिया के चपेट में अछि जतय डिबिया के भुकभुक्की इजोतसँ बस थोड़ मैथिल जन पहचान के पहाड़ ठाड़्ह करय लेल चाहैत अछि। समस्त संसार सँ अलग विधि-विधान-कर्मकाण्ड के रीति सँ भरल मिथिलाक व्यवहार आइ सहसा आडंबर ओ मिथ्यापूर्ण बुझैत अछि आ तैयो पौराणिक प्रथा अनुरूप कि…
अहंकार केकर चलल आइ धरि? ब्राह्मण शिरोमणि रावण के दुर्दशा संग मृत्यु देबाक लेल स्वयं राम अवतार लेलाह! कि रावण केओ आन छलैक? रामक अंश मात्र रावण छल, अछि आ रहबे करत! सनातन सिद्धान्त थिकैक ई! लेकिन समाजक अगुआ ब्राह्मण यदि जमिन्दारी बले अत्याचार केला तऽ समस्त जातिक विरोध करबावय लेल ई शब्द याने ब्राह्मणवाद एक सोचल‍- समझल राजनीतिक षडयंत्र मात्र, बेसी किछु नहि! हमर ऊपरका लेख ओकरे जबाब थीक!  हरि: हर:!
**

दहेज मुक्त मिथिला छद्म नाम प्रचार आ फूइसक पब्लिसिटी लेल नहि तऽ कहियो काज केलक आ नहिये से करबाक कोनो अवधारणा छैक, अत: एकर चिन्तन संग शनै:-शनै: ई आगू बढि रहल अछि आ यथासाध्य अपन प्रयास, लोकके बीच अपन सिद्धान्त के प्रचार आ बेर-बखत कार्यक्रम सभ कय रहल अछि। फेर बता दी! रजिष्ट्रेशन के मोहताज ओ लोक होइछ जेकरा सरकारी पैसा आ सहयोग के आशा या मजबूरी रहैत छैक। हमर ४२ वर्षक जीवनमें शायदे कहियो खराती भोजन के पसिन केने होयब, स्वयंसेवी सहयोग सँ सुदामा जेकाँ ५ घर याचना करैत काज करब, मुदा हराम आ लूटके पैसा सऽ कोनो प्रगति संभन नहि छैक ताहि हेतु ओहेन आशा या मजबूरी के कदापि प्रतिपालन नहि करब।

संयोगवश, बहुत लोक के शंका छैक जे दहेज मुक्त मिथिला के जमिनी काज किछु नहि भेलैक, तेकर जबाब बहुत प्रखर आ स्पष्ट रूपमें हम डकुमेन्ट फाइल में राखि देने छी। आब दोसर वर्षक काज के लिखब बाकी अछि! चिन्ता नहि करय जाउ, परिवर्तन पर दृष्टि राखू।

हरि: हर:!

**

भास्करजी! धन्यवाद! बहुत लोक के पतो नहि छैक, लेकिन हम भाग्यशाली रही जे अहाँ गामक ओतेक प्रखर आ विशुद्ध विकासवादी व्यक्तित्व सभ संग दहेज मुक्त मिथिला लेल सौराठ सभा के पुन: उत्थान संग माँगरूप दहेजकेर प्रतिकारके चर्चा केने रही। जरुर सौभाग्यशाली छी जे सभक वचन भेटल, सभक सहयोग के उर्जा भेटल। आ कदापि ई नहि इच्छा भेल जे संजय, वचन, भास्कर, विनोद, वरुण केकरो कहि के पेपर में छपबितहुँ। लेकिन शायद न्युज बनियो गेल! हम चाही वा नहि चाही, नीक करब सभ आशीरवाद देत, बेजाय करब सभ गैर देत! हरि: हर:!

**

नेपालको औद्योगिक नगरी विराटनगरमा केहि दिन अगाडि मंसीर २३ र २४ गते मैथिली सेवा समिति द्वारा द्विदिवसीय विद्यापति स्मृति पर्व समारोह २०६८ भव्यता साथ मनाइयो। यस कार्यक्रममा शुरुआत मैथिल समाजका हरेक वर्गका र उमेरका महिला-पुरुष बाल-बालिकाहरुको आफ्नो विशिष्ट पहिरन साथ भव्य उपस्थिति थियो। झाँकी-जुलूसमा मिथिला संस्कृति झल्काउने विभिन्न प्रकारका प्रस्तुतिहरु थिए – मिथिलाका छोरी भगवती सीता र पाहुना-ज्वाँइ मर्यादा पुरुषोत्तम राम संगै दशरथका अन्य छोराहरु जो सबै मिथिलाको महाराजा जनक कै संतानहरु संग धनुषभंग गर्दै स्वयंवर पछि बिहे गरेका थिए र संगमा देवाधिदेव महादेवको सामा-चकेवा, झिझिया, भयो र कार्यक्रम स्थल भूमि प्रशासन चौक (उत्तर) देखि शुरु भएर मैथिल कविकोकिल विद्यापतिको नेपाली भाषाका अन्य दुइ महाकवि भानुभक्त आचार्य र महानन्द सापकोटा सहितको राखेको शालिक त्रिमुर्ति चौकमा श्रद्धाञ्जलि सुमनको फूल-माला अर्पण गर्दै झन्डै ८ कि.मी. जतिको दूरीमा नगर परिक्रमा पूरा गरेका थिए। सोही नगर परिक्रमाको क्रममा यस कार्यक्रममा आमन्त्रित प्रमुख अतिथि उपराष्ट्रपति महामहिम परमानन्द झा आफ्नो सुरक्षाकर्मीको कुरो न मानी विराटनगर आफ्नो घर जस्तै हो र सबै आफ्नै परिवारका आफन्तहरु हुन्‌ भन्दै यही परिक्रमामा संसारी माईस्थान देखि पाँव-पैदल जुलूस संगै हिंडेर कार्यक्रम स्थल सम्म पुग्नु भएको थियो। कार्यक्रम स्थलमा प्रमुख अतिथिको स्वागतमा सैकड़ों आयोजक र आम मैथिल समाजका दर्शकहरु आफ्नो घरको ठुला हाकिम छोरा घर आएका जस्तै भव्य स्वागत गरेका थिए। उपराष्ट्रपतिको गलामा फूलमाला मुख सम्मै भरिएको थियो। नाम परमानन्द जस्तै अनुहार परमानन्दमा मस्त थियो र यही अबस्था त्यहाँ उपस्थित हजारों दर्शकहरुको पनि थियो। उमंगको चरममा उपराष्ट्रपतिको स्वागत गरियेको थियो। यस कार्यक्रमको विधिवत्‌ उद्‌घाटन महामहिम उपराष्ट्रपतिज्यु वाट नै महाकवि विद्यापतिको तस्वीर अगाडि राखिएका मिथिलाको सांस्कृतिक दीप्ति प्रज्ज्वलन गरेर गरियेको थियो। सो अवसरमा नेपाल र भारत दुवै तिरका मिथिला क्षेत्रका अनेकौं गणमान्य व्यक्तित्व, नेतृत्वकारी, विद्वान्‌, कवि, कलाकारहरुको निकै राम्रो उपस्थिति थियो। उद्‌घाटन कार्यक्रममा बोल्दै उपराष्ट्रपति ले मैथिलीको सम्मान बढाउनका लागि समस्त मैथिल एकजूट हुनुपर्ने बताए। राज्यपक्ष वाट पनि मैथिली प्रति उपेक्षामा कमी ल्याउनका लागि मैथिलहरु आफू सचेत भएर आफ्नो महान्‌ संस्कृति, भाषा, साहित्य, कला आदिको संरक्षण गर्न प्रतिबद्ध बन्नू पर्छ भन्नू भयो। प्रधानमंत्री मा. बाबुराम भट्टराई ज्युको विशेष शुभकामना संदेश लिएर कार्यक्रममा सहभागी बन्नु भएको वहाँको प्रेस सल्लाहकार एवं विराटनगर क्षेत्रका वरिष्ठ मैथिलीसेवी रामरिझन यादवज्यु ले समस्त जनमानसमा प्रधानमंत्रीज्युको संदेश पढेर सुनाउँदा एउटा विशेष खुशीको माहौल बनेको थियो। अन्य प्रमुख वक्ताहरु सांसद जयराम यादव, बैद्यनाथ चौधरी ‘बैजु’, डा. धनाकर ठाकुर, डा. राम भरोस कापड़ि, भारतका भु.पू. सांसद सुखदेव पासवान, फारबिसगंजका भु.पू. विधायक लक्ष्मी ना. मेहता, भु.पू. सांसद खुशीलाल मंडल, बिहार विश्वविद्यालयको भु.पू. मैथिली विभागाध्यक्ष डा. देवेन्द्र झा, मिथिलाको महान विभुति कवि सियाराम झा सरस, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, करुणा झा लगायत अन्य साहित्यकार एवं समाजसेवी हरु थिए। उद्‌घाटन कार्यक्रमकै बेला मैथिली साहित्य क्षेत्रमा अपूर्व योगदान दिएका लेखक प्रफुल्ल कुमार सिन्हा ‘मौन’ र नेपाली साहित्यमा योगदान पुर्याउँदै आएको कवि भानुभक्त पोखरेल को अलग-अलग पुस्तक विमोचन गरियेको थियो। सोही कार्यक्रममा विभिन्न क्षेत्रमा उल्लेखणीय योगदान पुर्याएका विशिष्ट व्यक्तित्वहरु लाई सम्मान गरियेको थियो। सम्मानित व्यक्तित्वहरुमा विराटनगर मैथिल समाजका वरिष्ठ र उत्साही समाजसेवी डा. सुरेन्द्र ना. मिश्र, मिथिला चित्रकलालाई वैश्विक परिवेश सम्म पुर्याउने महान चित्रकार एस. सी. सुमन, समस्त मिथिलांचलकै साहित्यजगतमा आफ्नो विशिष्ट योगदान दिनु भएका कवि सियाराम झा सरस, दहेज मुक्त मिथिलाका लागि समाजमा जागृति फैल्याउन विशिष्ट योगदानका लागि राजविराजको करुणा झा, पुर्वाञ्चल क्षेत्रमा मैथिली लेखनमा उत्कृष्ट योगदानका लागि दयानन्द दिकपाल यदुवंशी लाई महामहिम उपराष्ट्रपतिज्युको हाथबाट सम्मान गरियेको थियो। सम्मानित अन्य व्यक्तित्वहरुमा रुपा झा – धीरेन्द्र प्रेमर्षि, वरुणमाला मिश्रा, नवीन कर्ण र गत वर्षको समारोहमा उत्कृष्ट प्रदर्शनका लागि सहभागी विद्यालय तथा बाल-कलाकारहरुलाई पनि सम्मान गरियेको थियो।

कार्यक्रम उद्‌घाटन समारोह पछि समारोहमा राखियेको मिथिला पेन्टिंगको प्रदर्शनीको पनि विधिवत् उद्‌घाटन महामहिमज्युकै कर-कमल बाट गरियो। यस प्रदर्शनीमा मिथिलाको महान कलाकार एस. सी. सुमन र मदनकला देवी को चित्रकलाहरु संगै अन्य स्थानीय कलाकारहरु द्वारा उत्कृष्ट चित्रकारितालाई स्थान दिइएको थियो। प्रदर्शनी उद्‌घाटन गर्दै प्रस्तुतकर्ता चित्रकार एस. सी. सुमन संगको कुराकानीमा नेपाल सरकारको नीति यस कलालाई फ्रस्ट्याउने रहेको र यसका लागि महामहिमज्युको स्तरबाट सहयोग गर्ने प्रतिबद्धता पनि व्यक्त गर्नु भयो। मिथिला पेन्टिंगको विश्वमै माँग भइ रहेको र यसको लागि आवश्यक पहल गर्न नेपाल सरकार प्रतिबद्ध रहेको जानकारी महामहिमले गराउनु भयो। विराटनगर क्षेत्रमा प्रशिक्षण केन्द्र खोल्न पनि आवश्यक पहल गर्नका लागि वहाँ ले आयोजक पक्ष र सरोकारवालालाई सुझाव समेत दिनु भयो। यसका लागि आवश्यक सहयोग आफुले गर्ने आफ्नो भावना पटक-पटक दोहर्‍याउनु भएको थियो। यो मिथिला आर्ट गैलरीमा आम दर्शकहरुको पनि निकै राम्रो चासो देखियो। मिथिला पेन्टिंग प्रदर्शनीको मर्म र अन्य तकनीकी पक्ष को जानकारी स्वयं चित्रकार सुमन ले सबैलाई गराउनु भयो। यस समारोहमा आर्ट गैलरीको विशेषता निकै चर्चामा रहेको थियो।

कार्यक्रमको प्रथम दिन संध्याकाल लगभग पाँच बजे देखि मिथिला रत्न र सुप्रसिद्ध गायक कुञ्जबिहारी मिश्र र वहाँ को संगमा भारतको मधुबनीवाट आएका संगीत-नृत्यको टोलीवाट रंगारंग प्रस्तुति गरिएको थियो। स्थानीय कलाकार र राजविराज वाट आएका सांस्कृतिक टोलीहरुको पनि प्रस्तुति बीच-बीचमा भै रहेको थियो। हजारोंको संख्यामा उपस्थित भीड़ निकै रमाइ रहेको र कलाकार-दर्शक बीच एकरस उत्पन्न भएको भव्य समागमको दृश्यलाई शब्दमा वर्णन गर्नु गाह्रो हुन्छ। केहि दर्शक माथिवाट परि रहेको कुहिरो र स्टेजमा चलि रहेको भव्य संगीत-नृत्यको समागम देखेर आफू स्वीटजरलैण्ड मै रहेको प्रतिक्रिया दिदैं रमाइ रहेको पाइए। राती १२ बजे सम्म सो सांकृतिक कार्यक्रम चल्यो र अन्तमा आयोजक समितिको अनुरोधमा कि अब आजको लागि यो कार्यक्रम विश्राम दिने बेला भयो – अझ पनि दर्शक हरु को मन चाहिं भरेको थिएन।

दोस्रो दिन हुस्सु र कुहिरो ले गर्दा कार्यक्रम निर्धारित समय भन्दा लगभग दुइ घन्टा देरी ले शुरु भयो। विहानको कार्यक्रममा बाल-बालिका द्वारा मात्र प्रस्तुति रहेकोले विभिन्न विद्यालयवाट आएका साना-साना बाल-बालिकाहरुले नै प्रथम दिवस गरे जस्तै दोस्रो दिन पनि नेपालको राष्ट्रीय गीत र मिथिलाको अत्यन्त प्रचलित गोसाउनिक गीतबाट कार्यक्रमको थालनी गरे। त्यसपछि बाल-बालिका द्वारा विभिन्न रंगारंग कार्यक्रमहरु प्रस्तुत गरियो। आयोजक मैथिली सेवा समिति ले आर्थिक रूपले विपन्न बाल-बालिकाहरु लाई उच्च शिक्षामा सहयोग पुर्‍याउने गरी एउटा अक्षय कोषको स्थापना सो कार्यक्रमको मुख्य अतिथि जिल्ला शिक्षा अधिकारी योगेन्द्र बराल ज्युको मुखारविन्दवाट घोषणा गराएर र सो कोषमा विराटनगर समाजको तर्फ बाट अनेकौं दाताले आ-आफ्नो स्वेच्छानुसार दान दिने घोषणा गरे। दान दिनेमा मुख्य ईन्जिनियर रमाकान्त झा, प्रवीण ना. चौधरी, अजित झा, डा. संजय दास, ई. फूल कुमार देव, संजय देव, जितेन्द्र झा, लगायत विभिन्न दाताहरुको योगदानबाट लगभग दुइ लाख रुपैयां संकलन गरेर कोष स्थापना भयो। यस कोष र कोषबाट हुने आर्थिक आमदनीबाट आउने वर्ष देखि कमतीमा तीन जनालाई (उत्कृष्ट प्रदर्शन गर्ने र आर्थिक रूपले कमजोर विद्यार्थी भाइ-बहिनीलाई) आर्थिक पुरस्कार दिइने छ। सो पुरस्कारको घोषणा यही कार्यक्रमको मंचवाट गर्ने योजना रहेको छ।

बाल-बालिकाको कार्यक्रमपछि समारोहमा नेपाल तथा भारत दुवै राष्ट्रका मिथिला क्षेत्रको नामी कविहरुको सहभागितामा कवि गोष्ठी भएको थियो। यसको अध्यक्षता सियाराम झा सरसले गर्नु भएको थियो र समीक्षा डा. देवेन्द्र झा ले गर्नु भएको थियो। मुख्य प्रस्तुतिहरु डा. रामभरोस कापड़ि भ्रमर, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, करुणा झा, पुनम ठाकुर, मिना देव, पुष्पा ठाकुर, अलखनिरंजन, कर्ण संजय, सचिनचन्द्र कर्ण, जागेश्वर ठाकुर आदि कविहरुको भएको थियो। त्यहीं चित्रकार एस. सी. सुमनजीले पनि आफ्नो पहिलो रचना बिना शीर्षक को प्रस्तुत गर्नु भएको थियो जसको सराहना उपस्थित सबै गणमान्य दर्शकले गरे र सो कवितामा शीर्षकको लागि रचनाकार सुमनको माँग अनुसार सभाध्यक्ष सरसजीले गर्नु भएको थियो। तयस्तै कार्यक्रमको संयोजक प्रवीण ना. चौधरीले पनि ठुला-बड़ा कविहरुको प्रेरणामा आफुले रचेको आफ्नो पहिलो रचना प्रस्तुत गर्नु भएको थियो। कवि-गोष्ठीको अवधि निकै रसीलो र दर्शकहरुलाई धेरै मन परि रहेको कारणले निर्धारित समय भन्दा करीब १ घंटा बढी चलेको थियो। यसै क्रममा समयाभावको कारण पूर्व निर्धारित बौद्धिक सभा चाहिं हुन सकेन तर सो को भूमिका राख्न डा. देवेन्द्र झा लाई आयोजक समितिले धेरै नै आग्रह गरे पछि दर्शकहरुको बीच छोटो प्रस्तुति मात्र हुन पाए।

पहिलो दिनमा कुञ्जबिहारी मिश्रको सांगीतिक कार्यक्रम छुटाउनेहरु आज यस कार्यक्रममा पूर्वनियोजित भएर आएका थिए र दर्शकको माँग अनुसार एक चोटि फेरि कुञ्जबिहारीजी र वहाँकै सांगीतिक टोलीबाट रंगारंग प्रस्तुतिहरु फेरि प्रस्तुत गरिएको थियो। त्यस पछि प्रतिविम्ब रंगमंच, जनकपुर को टोलीबाट रंगमंचमा मिथिला संस्कृति झल्काउने विभिन्न झाँकीहरुको प्रदर्शनी गरियेको थियो। सो प्रदर्शनको कार्यक्रम दर्शकहरुका लागि एकदम नौलो र अनौठो भएको कारण भीड़ बढ्ने क्रम देर रातिसम्म जारी नै रहे। कमला-स्नान, झिझिया, सामा-चकेवा र होली – यी चारैवटा प्रस्तुतिमा लगभग एक घन्टाको समय दर्शकको लागि कसरी बिते कसैले पनि थाह पाएनन्‌। विराटनगरको स्थानीय सांस्कृतिक टोली र कलाकारहरु बाट पनि यही बीचमा निकै रमाइलो प्रस्तुति हरु भए। मैथिली विकास अभियानको तर्फबाट नृत्यको कार्यक्रम हरु प्रस्तुत गरिए। विराटनगरकै प्रसिद्ध गायक र संगीतज्ञ प्रबलदीप विश्वास र गायिका अन्नु चौधरीको प्रस्तुति हरु पनि दर्शकले निकै मन परायो। सृष्टि कलाकेन्द्र विराटनगर तर्फ बाट पनि गीत र नृत्यको कार्यक्रम हरु प्रस्तुत गरिए। मकालू टेलिविजनको तर्फबाट हास्य नाटक रंगेलीवाली भौजी हेर्दा दर्शकहरु मक्ख पड़े। कार्यक्रमको अन्तिम प्रस्तुति डा. रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ रचित नृत्य-नाटिका ‘जट-जटिन’ को प्रस्तुति झन्डै राति ११ बजे शुरु भएको तर यस नाटिका को सुस्पष्ट गायन, भाषा-शैली, र अत्यन्त राम्रो प्रस्तुति – प्रतिविम्ब रङ्गमञ्च, जनकपुरको कलाकारहरु द्वारा दर्शकलाई मिथिलाको यो अनौठो प्रेमकहानी प्रति बाँधेर राखेको थियो। यो नाटक सिद्धिये सम्म र समापन समारोह सम्म सबै दर्शक आफुलाई स्वीटजरलैण्डमा मैथिली कार्यक्रमको आनन्द लिइ राखेको अनुभूति गर्दै त्यस दिनको चन्द्रग्रहणले गर्दा भोक-प्यास सब छोड़ेर मस्त भएर आनन्द लिइ रहेको देखियो। आउने समयमा अझ सशक्त रूपमा यस्तो कार्यक्रम गरि राख्ने प्रतिबद्धता साथ आयोजक समिति ले सबैलाई धन्यवाद दिंदै कार्यक्रम समापन भएको घोषणा गरे। विराटनगरको इतिहासमा यस्तो रसिलो र शान्तिपूर्ण द्विदिने विहान देखिन अबेर राति सम्म कहिले न भएको प्रतिक्रिया दिंदै सबै दर्शकहरु आ-आफ्नो घर तिर फर्के, फेरि यो शुभ घड़ी चाँडै आउन् यही कामना सबै ले गरेका थिए।

हरिः हरः!

**

२१ दिसम्बर २०१२

नेपालमें विद्यापतिक जीवनकाल – उपलब्ध हस्तलिपि आ ऐतिहासिक दस्तावेजके आधार शोध-निर्णय

विद्यापति साहित्यशैली

आधुनिक मैथिली भाषा साहित्यपर विद्यापतिक प्रभाव

नेपालमें मिथिला राजक माँग व संघर्ष

नेपालमें मैथिली भाषा आ मिथिलाक पहचान प्रति सरकारी संरक्छण

मधेस आ मिथिलामें समन्वय

मिथिला आ नेपाल

मिथिला आ जातिय विभेद

मैथिल मुसलमानके भूमिका

मिथिलामें पर्यटनके अवस्था आ संभावना पर प्रकाश

मैथिलानी महिला पर दहेज आ समाजिक उत्पीडनके इतिहास, वर्तमान आ भविष्य

मैथिली साहित्यके वर्तमान – कविक सृजनशीलता आ पाठकक उदासिनता

मैथिलक पहचान कमजोरपर आत्म-समीक्छा

नेपाल सरकार – मिथिला राज्य संघर्ष वार्ता पर रिपोर्ट

एतेक विषयपर आलेख चाही स्मारिका लेल! सम्बन्धित लेखक-विद्वान् अपन-अपन प्रयास सँ सहयोग करी!

Rajendra Bimal Ramesh Ranjan Parmeshwar KapariDhirendra Premarshi Shyam Shekhar Jha श्याम सुन्दर पथिक Karuna Jha Sujit Jha Suresh Kumar Yadav S.c. Suman

**

सार्थक आलोचना स्वीकार हो महोदय कृपानंद झा! हलाँकि हम आइ धरि अपनेक प्रशंसक छी, भले किछु बात या मतमें आपसी मतान्तर जे स्वाभाविके दू व्यक्तिमें होइत रहलैक अछि से रहल, आगुओ रहत….. मुदा आइ किछु एहेन बात सुनय लेल भेटल जे कम से कम विश्वास जोग नहि अछि जे अपने समान प्रबुद्ध आ विवेकी लोक द्वारा भेल।

१. धनाकर ठाकुर जी ऊपर अपने जे फालतूके आरोप लगेलहुँ आ मिथिला-मैथिलीके घिनेलहुँ से अपन जगह मैथिलक स्वाभाविकपरिचय रहल, मुदा दिल्लीके दिलवाली भूमिपर ओ नाटक हमरा लोकनिक मानसिक दिवालियापनके जगमें जगजियार केलक बाकी किछु नहि। अपने कि, संसारके कियो व्यक्ति डा. धनाकर ठाकुर समान कर्मठ मैथिलपुत्रके अपमान कदापि नहि कय सकैत छी कारण ओ व्यक्ति केकरो टुकडापर नहि, अपन कर्मबल आ अपार बौद्धिक सामर्थ्य सऽ सामर्थवान छथि जिनकर पासंगो बनबाक लेल एखन हमरा लोकनि (समग्र मिथिलामें बसनिहार या काज करनिहार) के हजारो बेर सोचय पडत। हम अंध-भक्ति नहि करैत छी किनको आ शायद हमरा सऽ बेसी मुँहेपर प्रश्न धनाकर बाबु सँ शायदे केओ पूछने हेतैन, एतेक तक जे हमरा असंस्कारी आ पता नहि कि-कि गैर तक स्वयं ठाकुरजी देने छलाह…. तदापि जिनकर जे सार्थक संपत्ति छैक तेकरा भले केकरो नोचला-पटकला सऽ किछु हेतैक से बात नहि छैक। तखन अहाँके बहुत दिनक सोचल बात शायद ओहि दिन दिल्लीके दिलवाली भूमिपर पूरा भेल। एहि गुरुद्रोह लेल अहाँ जतेक पश्चाताप करब ओ कम होयत। ओना गुरु स्वयं मोम छथि, ओ गलि गेल छथि आ शायद बिसैरियो गेलाह जे भरल लोकमें अपने हुनका पर तुच्छ आरोप लगेलहुँ, गरियेलहुँ, धमकेलहुँ…. बिसरबाक कारणो ओहि अनुभवी व्यक्तिके पास छैक। कारण आइ जाहि धर्मधकेल सँ कहाँ दैन अपने गुजैर रहल छी आ जाहि कारणे मानसिक पीडामें छी तेकर भुक्तभोगी डाक्टर अपन डाक्टरनीसँ पहिने भऽ चुकल छथि। लेकिन मिथिलाके संस्कार के सरेआम निलाम करब हमरा लोकनि के हित लेल नहि भेल जेकर जनतब कीर्ति झा आजाद अपन अफसोस प्रकट करैत राखि चुकल छथि। अवस्थामें सुधार जरुर करब, ताहि लेल हम अनुज कामना करैत छी।

२. उपरोक्त घटना सँ बेसी जघन्य ई भेल जे इन्द्रजितजी समान युवा आ प्रखर कार्यकर्ता संग दिल्लीके दिलवाली भूमिपर दिलचोर घटना घटि गेल, पाकिटमारी भऽ गेल – ओ बेचारा लल्ला-बेथल्ला फक्सियारी काटय लगलाह…. तुरन्ते भेटल नव दिल्लीके दिलवाला मित्र जेना डा. किशन कारीगर आ मिथिलाके थिंकटैंक (रत्नेश्वर झा बेर-बेर कहैत छथि) याने अपने कृपानन्द झा जिनकर कतेक सुझाव आ मार्गदर्शन सऽ हमहुँ सभ नव राह पर अग्रसर होइत रहल छी, दहेज मुक्त मिथिलाके संरक्छक रूपमें बढौनिहार अपनहि थिकहुँ – तिनका पर्यन्त ओ सहायता लेल गोहारलनि लेकिन कोनो प्रकारके सुनबाई तक नहि कयलहुँ…. कतेक पीडा पहुँचा रहल अछि तेकर पारावार नहि!  किऐक एना? किशन तऽ मानलहुँ जे नामे के डाक्टर काजक धियापुता छथि लेकिन मेहनत करब शुरुवे केलाह छथि, अपनेक कोनो कमी अछि जे एक असहाय आ मिथिला लेल लडनिहार के तेहेन विपत्तिमें नहि देखि सकलहुँ?

हरि: हर:!

**

२२ दिसम्बर २०१२

कार्यक्रम तालिका:

पुस १३, २०६९ (दिसम्बर २८, २०१२) शुक्रवार

क्रम संख्या समय कार्यक्रम

१ भिनसर ८ बजे – १२.३० बजे आदर्श उ. मा. वि. सँ झाँकी जुलूस प्रस्थान, त्रिमूर्ति चौक जाय विद्यापति सहित तिनू कविकेर शालीकपर फूल-माला अर्पण। जुलूस के वापसी भाया जनआन्दोलन चौक, बाजार, गोल्छा चौक आ पुन: कार्यक्रम स्थल पर सभामें परिणति!

२ दुपहरिया १ बजे सँ ४ बजे धरि प्रमुख अतिथि उप-प्रधान तथा गृहमंत्री बिजय गच्छदारजी द्वारा कार्यक्रमके विधिवत् उद्घाटन।

कार्यक्रम जेकर उद्घाटन होयत: मूल कार्यक्रम, पुस्तक मेला, मिथिला पेन्टिंग प्रदर्शनी, कला-संस्कृति-पर्यटन प्रदर्शनी। खान-पान प्रदर्शनी।

गोसाउनिक गीत, राष्ट्र व राष्ट्रीय गीत, विद्यापति गीत-संगीत आ संग-संग विभिन्न विषय पर विशिष्ट विद्वत् मन्तव्यके कार्यक्रम। सम-सामयिक विषयपर समेटल कार्यक्रम।

विशिष्ट योगदान लेल सम्मान कार्यक्रम।

पुस्तक विमोचन कार्यक्रम।

‘आब कोना चलब’ नाटक मंचन – बिराट मैथिल नाट्यकला परिषद्, विराटनगर द्वारा।

३ संध्या ५ बजे सँ ९ बजे सुप्रसिद्ध युवा कलाकार पदमा-पंकज (जमशेदपुर) द्वारा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम।

४ ९ बजे सँ ९.३० बजे प्रथम दिवस समापन समारोह।

पुस १४, २०६९ (दोसर दिन):

क्रम संख्या समय कार्यक्रम विवरण

१ १० बजे सँ १२ बजे स्कूली बाल-बालिका द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम

२ १ बजे सँ ४ बजे नेपाल – भारत के विभिन्न जगह सऽ पधारल विशिष्ट मैथिली कवि स्रष्टा द्वारा कवि-गोष्ठी। मूल उपस्थिति: सियाराम झा सरस, श्यामल सुमन तथा नेपाल सँ विद्यापति सम्मानसँ पुरस्कृत राम नारायण सुधाकर, राजेश्वर नेपाली, दयानन्द दिकपाल समेत अन्य।

३ ५ बजे सँ ९ बजे रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम: मुख्य कलाकार अनु चौधरी, विरेन्द्र झा, संजय यादव व अन्य।

हास्य-प्रहसन: मिथिलाक सुप्रसिद्ध हास्य कलाकार अद्भुदानन्दजीक एकल प्रस्तुति। मैथिली-विकास-अभियानक कलाकार द्वारा, डिम्पल देव द्वारा व अन्य।

४ ९ बजे सँ १० बजे समापन समारोह।

Roshan Kumar Jha Aditya Jha Navin Karna Madan Kumar Thakur Kamal Rimal Bhim Prasad GhimireMahananda Sapkota Prahlad Guragain Jitendra ThakurAjit Tiwari

**

आइ भोरे मिथिला आवाजके मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री अजित आजाद भाइकेँ समारोहमें आमन्त्रित करबाक लेल फोन केने रही, कठोर परिश्रम सँ रात्रि जागरण करैत ‘मिथिला आवाज’ पत्रिकाक प्रकाशन कयके भिनसरबामें घर लौटल छलाह आ शायद हमर फोन ततेक भिनसरे औझका मौसम अनुसार अवश्य तंग केने हेतन्हि मुदा भाइ तैयो फोनपर अयलाह आ आमंत्रण स्वीकार केलाह। यदि व्यस्त दिनचर्या सँ आ वर्तमान प्रसंगकेर माहौलसँ समय निकलतैन तऽ जरुर विराटनगरके विद्यापति स्मृति पर्व समारोहमें औता से गछला। हमर प्रयत्न मूलत: मिथिला आवाजकेँ नेपालमें प्रवेश करेबाक लेल अछि। से रोशन जी संग सेहो निवेदन केलहुँ जे अजित भाइके जरुर लाबी, संगहि अहुँ आबी आ मिथिला आवाज पत्रिका नेपालके मिथिला लेल सेहो लाबी। आब विराटनगर दरभंगासँ बहुत दूर नहि अछि, बस ४ घंटाके रस्ता! 

अपने लोकनि सेहो आउ आ समारोह के अभूतपूर्व सफलता दियाउ!

जय मैथिली! जय मिथिला!

हरि: हर:!

**

प्रेस ब्रिफिंग:

विराटनगर (मिथिला, नेपाल)में द्विदिवसीय विद्यापति स्मृति पर्व समारोह अगिला शुक्र-शनि दिसम्बर २८ आ २९केँ होमय जा रहल अछि जेकर उद्घाटन नेपालक उप-प्रधान तथा गृहमंत्री बिजय कुमार गच्छदार द्वारा कैल जायत। समारोहक विशेषता जे मिथिला संस्कृतिके झलकाबयवाला झाँकी जुलूस के पूरा नगर परिक्रमाके संग कवि विद्यापति स्मारकपर श्रद्धाञ्जलि सुमन-अर्पण के संग मैथिली पुस्तक मेला, मिथिला पेन्टिंग प्रदर्शनी, मिथिला पर्यटन प्रदर्शनी, हस्तकला आ शीप प्रदर्शनी, खानपान मेला के संग नेपाल तथा भारत दुवो देशक मिथिलासँ पधारल विद्वान्, कवि, कलाकार सभ द्वारा मिथिला-गान आ पहचान सम्मान केन्द्रित विद्वत सभा, कवि-गोष्ठी, बाल-बालिका द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम सहित रंगारंग मैथिली सांगीतिक कार्यक्रम के आयोजन अछि। सांस्कृतिक मर्यादा तथा मिथिलत्वकेँ जोगेबाक लेल प्रत्येक वर्ष मनाओल जायवाल एहि कार्यक्रम सँ नेपाल राष्ट्रकेँ नव-विकास हेतु मार्गदर्शन के संग वर्तमान राजनैतिक अस्थिरताके अन्त करैत राष्ट्रीय एकताक संदेश संचरण होयत, कहि रहल छथि आयोजक समितिक महासचिव प्रवीण ना. चौधरी। मिथिला राज्य लेल संघर्ष करनिहार तथा शहीद सभकेँ सत्य-श्रद्धाञ्जलि हेतु नेपाल सरकार अवश्य मिथिला-मैथिली प्रति सकारात्मक रूख राखत सहो विश्वास जतबैत छथि आयोजक समितिक संयोजक ई. फूल कुमार देव। विराटनगर नेपालक दोसर सभसँ पैघ शहर थीक जेकर निर्माणमें मैथिलक महत्वपूर्ण योगदान रहल अछि आ समस्त मैथिलकेँ अपन संस्कृति आ विशिष्ट पहचानके जोगेबाक प्रेरणा बाँटैत अछि ई वर्षेणी कार्यक्रम आ विराटनगरवासी मिथिलाक विभूति सभसँ एक मंचपर दर्शन करैत लाभान्वित होइत छथि एहि समारोह सँ। हरेक वर्ष नेपाल राष्ट्र के अति विशिष्ट राजनेता सभक संग पूर्वोत्तर भारतीय मिथिलाके सांसद आ विधायक सभक सेहो सद्भावना संग संपन्न होइत रहल अछि मैथिलक ई गरिमामय समारोह। नव-नव कलाकार-गायक-रंगकर्मी लेल सेहो एहि कार्यक्रम द्वारा सृजनशीलताक पाठ भेटैत आयल अछि। मैथिली पुस्तक मेलाके फायदा सेहो भेटत एहि बेरुक समारोह में आ लगभग २५ हजार दर्शककेर सहभागिता रहत एहि द्विदिवसीय कार्यक्रममें। – आयोजक: मैथिली सेवा समिति, विराटनगर!

**

बहुत सुन्दर बहस! मैथिली लेल राम नरेश जीके विचार सदैव प्रभावित करऽ वाला होइछ। लेकिन नि:संदेह चन्द्रभूषण सरके सल्लाह व्यवहारिक अछि, अकाट्य अछि। शायद एक-दोसर संग नव पहचान के कारण बहसके तुरन्त हम सभ व्यक्तिगत मानि लैत छी या बना दैत छियैक, बनेबाक चेष्टा करैत छी…. लेकिन सच छैक जे मैथिलीके समृद्ध अस्मिताके लूटेरा हिन्दीकेर मायावी प्रेम बनल। लेकिन तर्कसंगत बात यैह जे मैथिल आखिर हिन्दीके किऐक एहि तरहें अंग लगेला? तेकर एकमात्र कारण जे पराधीन भारतके स्वाधीनता लेल हिनकर मार्मिक योगदान आ हिन्दी राष्ट्रीयता लेल स्वीकार कयलाह। जे बाद में स्वाधीन बनलाके बाद कूचक्री राजनितिग्य के कारण आ मायक गहना बेचनिहार मैथिल नेताके कारण मैथिली संग घात होयब शुरु भेल, होइते चलि गेल, चर्चा जे १९३५ ई. में शुरु कैल गेल डा. अमरनाथ झा द्वारा से ६७ वर्ष के बाद मिथिलाक प्रखर योद्धा आ भारतक सभसँ प्रखर प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी द्वारा २००२ में संविधानक अष्टम् अनुसूचीमें प्रवेश पौलक मैथिली, तथापि आइ नौ वर्षमें नौ डेग तक नहि घुसैक सकल अछि मैथिली…… तखन हिन्दीके मायवी प्रेम चमरछोंछ नहि तऽ दोसर कि? यदि स्वाभिमान नहि तऽ जीवनक महत्त्व कि? दिल्लीमें कमायब, हिन्दी बाजब…. लेकिन अपन मैथिलीके लीलाम कय के भले जियबा सँ फायदा कि? मिथिलाक पहचान समाप्तप्राय भऽ रहल अछि, एहि लेल चुप रहैत जिन्दा लाश बनला सऽ फायदा कि?

हरेक मैथिलकेँ एहि लेल सोचय पडत! केवल रोजी टा जीवन नहि, रोजी मैथिली के मूल अछि, हिन्दी-अंग्रेजी सिखाबयवाली माय मैथिली नहि थिकी, ओ पूतना थिकी जे मैथिल कृष्णकेँ दुग्ध-स्तनपानके जगह विषपान करा रहल छथि जेकर प्रभाव आब शुरु होवय लागल अछि जे सभक सोझाँ बच्चा हिन्दी-अंग्रेजीके प्रयोग करैत मिथिलाक विशिष्टताके धूमिल कय रहल छथि। कतेको घरमें यैह उदाहरण भेटत। हमरा अहाँके सोझेंमें लोक हिन्दी, नेपाली आ अंग्रेजीमें बच्चा संग बजैत छथि मुदा मैथिली बाजयमें लाज होइत छन्हि। आत्ममंथन योग्य विषय थिकैक ई।

हरि: हर:!

**

सच छैक जे मैथिलीके समृद्ध अस्मिताके लूटेरा हिन्दीकेर मायावी प्रेम बनल। लेकिन तर्कसंगत बात यैह जे मैथिल आखिर हिन्दीके किऐक एहि तरहें अंग लगेला? तेकर एकमात्र कारण जे पराधीन भारतके स्वाधीनता लेल हिनकर मार्मिक योगदान आ हिन्दी राष्ट्रीयता लेल स्वीकार कयलाह। जे बाद में स्वाधीन बनलाके बाद कूचक्री राजनितिग्य के कारण आ मायक गहना बेचनिहार मैथिल नेताके कारण मैथिली संग घात होयब शुरु भेल, होइते चलि गेल, चर्चा जे १९३५ ई. में शुरु कैल गेल डा. अमरनाथ झा द्वारा से ६७ वर्ष के बाद मिथिलाक प्रखर योद्धा आ भारतक सभसँ प्रखर प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी द्वारा २००२ में संविधानक अष्टम् अनुसूचीमें प्रवेश पौलक मैथिली, तथापि आइ नौ वर्षमें नौ डेग तक नहि घुसैक सकल अछि मैथिली…… तखन हिन्दीके मायवी प्रेम चमरछोंछ नहि तऽ दोसर कि? यदि स्वाभिमान नहि तऽ जीवनक महत्त्व कि? दिल्लीमें कमायब, हिन्दी बाजब…. लेकिन अपन मैथिलीके लीलाम कय के भले जियबा सँ फायदा कि? मिथिलाक पहचान समाप्तप्राय भऽ रहल अछि, एहि लेल चुप रहैत जिन्दा लाश बनला सऽ फायदा कि?

हरेक मैथिलकेँ एहि लेल सोचय पडत! केवल रोजी टा जीवन नहि, रोजी मैथिली के मूल अछि, हिन्दी-अंग्रेजी सिखाबयवाली माय मैथिली नहि थिकी, ओ पूतना थिकी जे मैथिल कृष्णकेँ दुग्ध-स्तनपानके जगह विषपान करा रहल छथि जेकर प्रभाव आब शुरु होवय लागल अछि जे सभक सोझाँ बच्चा हिन्दी-अंग्रेजीके प्रयोग करैत मिथिलाक विशिष्टताके धूमिल कय रहल छथि। कतेको घरमें यैह उदाहरण भेटत। हमरा अहाँके सोझेंमें लोक हिन्दी, नेपाली आ अंग्रेजीमें बच्चा संग बजैत छथि मुदा मैथिली बाजयमें लाज होइत छन्हि। आत्ममंथन योग्य विषय थिकैक ई।

हरि: हर:!

**

आइ मैथिलीक भारतीय संविधानक अष्टम् अनुसूचीमें प्रवेशक नौम वर्ष भेल – समूचा भारतक संग विश्व भरिक मैथिल आजुक दिवसकें मैथिली दिवसके रूपमें मनबैत छथि जाहि अवसरपर मैथिल स्रष्टा अजित आजादके लेख ‘नौ साल नौ डेग’ पढिके हृदय प्रसन्न भेल लेकिन मोंन छुब्ध भेल जे आखिर एना मृदुभाषा मैथिली प्रति बिहार सरकार के मंशा खराब किऐक छैक जे मैथिलीके विकास लेल कोनो एको डेग टा नहि उठेलक… सरकार तऽ जे-से, जे डेग स्वयं मैथिलीभाषी के उठेबाक चाहैत छलैक वा छैक से उठेबा सऽ सेहो पाछू जाइत अछि…. तऽ चिन्ता बढि रहल अछि जे आगामी दस वरखक बाद कि हेतैक? भगवती मैथिली याने सीता नीके करती ततबी सोचि सभकेँ कान्तिपुर हेल्लो मिथिलाके माध्यम सऽ शुभकामना दैत छी।

मैथिलीके एक डेग तऽ जरुर बढाओल गेल जे पूर्ण सुविधा संपन्न दैनिक ‘मिथिला आवाज’के प्रकाशन दरभंगा सऽ शुरु भऽ गेल अछि आ एकर योगदान मैथिलीके सर्वांगीन विकास लेल जरुर हेतैक ताहि शुभकामनाके संग समस्त मैथिलकेँ अपन भाषाके दैनिक पत्रिका पढैत स्वाभिमानक रक्छा हेतु निवेदन करैत छी। संस्थापक चन्द्रमोहन झा आ कार्याकारी अधिकारी कर्मठ स्रष्टा अजित आजादके सेहो धन्यवाद एतेक महत्त्वपूर्ण डेग लेल!

हरि: हर:!

**

२३ दिसम्बर २०१२

The Greatness of Gita: Varah Puran
The greatness of the Gita

Salutation to Shri Ganesha!
Salutation to Shri Radharamana!!

Dhara (the Earth) said:

O Blessed Lord, O Supreme Ruler! How may one, who is held back by his Prarabdha Karma obtain unswerving devotion?

[Prarabdha Karma: There are three kinds of Karma, (1) Sanchita or accumulated and stored up in past lives; (2) Agami or that which is yet to be done; (3) Prarabdha or that which is already bearing fruit. This last is that part of the accumulated actions (Sanchita) which has brought about the present life and will influence it until its close. The knowledge of Brahman destroys all accumulated Karma and makes the current work abortive. But the Prarabdha Karma must run out its course, though the balanced mind of a liberated man is not affected by it.]

The Lord Vishnu said:

If one be devoted to the constant practice of the Gita, even though he be restrained by Prarabdha Karma, yet is he Mukta, happy, in this very world. He is not tainted by new Karma.

No evil, however great, can affect him who meditates on the Gita. He is like the lotus leaf untouched by the water.

Where there is the book of the Gita, where its study is proceeded with, there are present all the holy places, there verily, are Prayaga and the rest. There also are all the Devas, Rishis, Yogis and Pannagas, so also the Gopalas and Gopikas, with Narada, Uddhava, and their whole train of comrades.

Where the Gita is read, forthwith comes help. Where the Gita is discussed, recited, taught, or heard, there, O Earth, beyond a doubt, do I Myself unfailingly reside.

In the refuge of the Gita I abide; the Gita is My chief abode. Standing on the wisdom of the Gita, I maintain the three worlds.

The Gita is My Supreme Knowledge; it is undoubtedly inseparable from Brahman – this Knowledge is absolute, Imperishable, eternal, of the essence of My inexpressible State – the Knowledge comprising the whole of the three Vedas, supremely blissful, and consisting of the realization of the true nature of the Self – declared by the All-knowing and Blessed Krishna, through His own lips, to Arjuna.

[Ardhmatra: literature, the half-syllable, and refers to the dot on the Oum; symbolically, it stands for the Turiya state, hence the Absolute.]

That man who with steady mind recites the eighteen chapters daily, attains the perfection of knowledge and thus reaches the highest plane.

If the whole cannot be recited, then half of it may be read; and he who does this acquires merit, equal to that of the gift of a cow. There is no doubt about this.

By the recitation of a third part, he gains the same merit as by bathing in the Ganga. By the repetition of a sixth part, he obtains the fruit of the Soma-sacrifice.

He who reads, full of devotion, even one chapter daily, attains to the Rudraloka, and lives there for a long time, having become one of those who wait on Shiva.

[Become, etc.: literature, attained to Ganahood.]

The man who daily reads a quarter of a chapter, or of a Sloka, O Earth, attains to human birth throughout the duration of a Manu.

[Attains to human birth: is born every time in a man-body.]

The man who recites ten, seven, five, four, three, or two Slokas, or even one or half a Sloka of the Gita, certainly lives in Chandraloka for ten thousand years. He who leaves the body while reading the Gita, obtains the world of Man.

Again, practicing the Gita, he attains Supreme Mukti. The dying man uttering the word “Gita” will attain the goal.

One who loves to hear the meaning of the Gita, even though he has committed heinous sins, attains to heaven, and lives in beatitude with Vishnu.

He who constantly meditates on the meaning of the Gita, even though he performs Karma incessantly, he is to be regarded as a Jivanmukta; and after the destruction of his body he attains to the highest plane of knowledge.

With the help of this Gita, many kings like Janaka became free from their impurities and attained to the highest goal. It is so sung.

He, who having finished the reading of the Gita, does not read its Mahatmya as declared here, his reading is in vain; it is all labor wasted.

He who studies the Gita, accompanied with this discourse on its Mahatmya, obtains the fruit stated herein, and reaches that goal which is difficult to attain.

Suta said:
He who will read this eternal Greatness of the Gita, declared by me, after having finished the reading of the Gita itself, will obtain the fruit described herein.

These declarations will, no doubt, seem to be mere flights of extravagant fancy, if they are taken in their literal sense. They may be explained either (1) as mere Arthavada or a statement of glorification meant to stimulate a strong desire for the study of the Gita, which being performed from day to day, may, by the force of the truth and grandeur of one or other of its teaching, strike an inner chord of the heart sometime, so much so as to change the whole nature of the man for good; (2) or, the “reading” and “reciting” and so forth, of the whole or a part, may not perhaps be taken in their ordinary sense, as meaning lip-utterance and the like; but in view of the great results indicated, they may be reasonably construed to mean the assimilation of the essence of the Gita teaching into the practical daily life of the individual. What wonder, then, that such a one who is the embodiment of the Gita would be a true Gyani, or a Jivanmukta, or that he would, in proportion to his success of being so, attain the intermediate spheres of evolution and finally obtain Mukti?

Harih Harah!

**

प्रिय स्वजन!

अति सुखक अनुभूति करैत आजुक शुभ दिवस गीता जयन्तिपर अपने लोकनि संग गीताकेर विशेषता जे निज-जीवनमें अनुभव कैल से शेयर करबाक हार्दिक इच्छा भेल अछि। आउ, देखी जे गीता के महत्त्व हमरा लोकनि लेल कतेक अछि।

गीता एक पाँतिमें ओ सुन्दर गीत थीक जे अन्तरआत्मा द्वारा गान कैल जाइछ, सेहो परमपिता परमात्माके आगू-आगू सिखेला सँ! कतेक नीक लगैत छैक जखन स्वयं हमर पिता हमरा आंगुर पकडि संपू्र्ण ब्रह्माण्डके एक-एक बात के परिचय करबैत छथि। सभ सऽ अपूर्व जे बेर-बेर कहैत छथि जे हमर आ पिताके बीच अन्तरंग सम्बन्धके आत्मसात करबाक लेल मात्र स्थूल दृष्टिकोण अर्थात् कतेक टाका-पैसा-शेर-सम्पत्ति भौतिक संसारमें देलाह से देखि के नहि वरन् जन्म आ मृत्युक बीचजे कर्म-धारके दिशा आ दशा बनि रहल अछि आ ताहिमें कर्तब्य-धर्म कि थीक जे करैत परमपिताक संग सदिखन भेटत ताहि पर दृष्टि रखैत जीवन निर्वहन करबाक अछि। कतेको तरहक परिस्थिति आबि सकैत अछि जे विचलन-कंपन उत्पन्न करत, लेकिन सभकेँ समस्थितिसँ स्वीकार करैत आन्तरिक परमानन्दक संग मैत्रीभाव रखैत बस केवल पिताक शरण प्राप्त रहय एहि योग में हर-हमेशा निज आत्माके रखैत पार उतरबाक छैक। बस यैह थीक गीता!

आ किछु खास बात आरो कहबाक इच्छा छल जे कहितहुँ लेकिन कर्मधार किछु आरे तरफ पिताक संग लेबाक लेल कहि रहल अछि, ओना अंग्रेजीमें स्टक छल जे स्वामी स्वरूपानंदजीके द्वारा लिखित अछि से २००७ के बाद आइ फेर अपने मानव बंधुसँ शेयर करय चाहब।

ध्यान राखब, ई सभ वस्तु सभक लेल नहि संभव छैक, ताहि हेतु भाग्यशाली बनू आ पूरा पढू, मनन करू आ यदि कोनो प्रकार के समस्या हो तऽ पुन: वार्ता करब।

जय जगदीश! जय माँ!!

हरि: हर:!

**

मनु पहिल विधान बनेला – ब्राह्मण उच्च कोटिक मनुष्य संबोधित केला वर्णाश्रम धर्म अन्तर्गत! क्रमश: धर्मक आचार-विचार-चर्या में गिरावट आयल, मुदा मनु के संबोधन के कायम माननिहार ब्राह्मणवर्ग अन्य वर्णक कोपभाजनके शिकार बनलाह आ आपसी झगडा चलय लागल। अही झगडाके उपज थीक ब्राह्मणवाद जे उक नहियो रहैत ब्राह्मणकेर फूक लेल कहल जाय तऽ गलत नहि हेतैक। ओना हम जे ब्राह्मण छी आ हमर यदि स्वाध्याय संग करुणामय हृदय अछि, स्वार्थ नहि वरन् याचित पाँच कौर भोजन सेहो पूरा कय रहल अछि छुधा… तदापि हम लोक-कल्याण लेल चिन्तन-मनन-तप-जप करैत छी तऽ ओहेन आरोप के हम कखनहु अपन बूटके नोक पर उडा सकैत छी। बुझलह? हरि: हर:!

**

हमरा छटपटी छूटैत अछि, अक्सर क्रोध के वेग में बहा दैत अछि….

हम अपन सभ बात उचित आ दोसरके सभटा अनुचित देखैत छी…..

बुझाइत अछि जे हमहीं अवतार होइ आ बाकी हमर प्रजा थीक…. लेकिन भूखल एको जनके खुवाबय के औकात हमरा नहि अछि…

हम कखनहु के दरिद्र छिम्मैर बनि जाइत छी….

बड अजीब बीमारी भेल बुझाइत अछि….

हल्लूक बोझ नहि बड भारी बोझके तर छी….

प्रवीण! यदि अहाँके ऊपरका समस्या अछि तऽ अहाँ तुरन्त डा. गीता के शरणमें जाउ आ जाहि तरहें ओ गाइड करैथ तहिना जीवनचर्यामें योग धारण करू।

प्रवीण! सावधान! डा. गीता बड कठिनाइ संग भेंट दैत छथि, या फेर जे दबाइ लिखती ओ अहाँ के बिना हुनकर परिचित कोनो कम्पाउण्डर के नहि भेटत, से ध्यान राखब जे डा. गीता संग इलाज हेतु पहिले समुचित कम्पाउण्डर संग जरुर कन्सल्ट कय लेब।

हरि: हर:!

**

२४ दिसम्बर २०१२

विराटनगरमा मैथिल कविकोकिल विद्यापतिको स्मृतिमा मनाउने गरेको स्मृति पर्व समारोह अब तेस्रो वर्ष अत्यन्तै ठुलो स्तरमा गरिंदैछ। यस विराटनगरको इतिहासमा सहिष्णुवादी मैथिल समाजको योगदान पनि त्यति नै उच्च कोटिमा भएको पाइन्छ। विशेष रूपमा शिक्षा, स्वास्थ्य, अभियांत्रिकी लगायत निजी व्यवसाय र कारोबार चलाउनमा मैथिलहरुको योगदानको मूल्यांकन सधैं सराहनीय भएको पाइन्छ। नेपालको बदलिंदै राजनीतिक अवस्थामा पनि विराटनगर भने देशकै सबै भन्दा बढी शान्तिप्रिय हुनुमा मैथिलहरुको उपस्थिति पनि एउटा कारण मानिन्छ। उच्च शिक्षित वर्ग र सधैं विद्याधनलाइ मात्र सर्वोपरि मान्ने मैथिलहरु आफ्नो संस्कृति प्रति सजग रहनलाई पनि विद्यापति जस्ता विद्वान् कै स्मृति-पर्व मनाउंछन्‌। नीतिश्लोक अनुरूप विद्वान् को पूजा सबै ठाउंमा हुने तर राजाको पूजा देश भरि मात्रै हुने सिद्धान्तमा विश्वास राखेर हरेक वर्ष नै मनाउने यस पर्व समारोहवाट यस पाली फेरि राष्ट्रमा शान्ति र विकासको लागि नारा दिने मंशायले गरिंदैछ यो कार्यक्रम।

विभिन्न भाषाभाषी, जातजाति, धर्म-संप्रदायको देश नेपाल अब एकीसौं शताब्दीमा प्रवेश गरि सकेको छ। दुनियाकै सबै देश अहिले आर्थिक विकास तिर अग्रसर छ र नेपाल पनि यही लक्ष्य तिर अगाडि जानु पर्छ। विशेषत: भारत र चीन जस्ता दुइ ठुला र विकासको नित्य नयाँ पाइला चल्दै गरेका छिमेकी मित्रराष्ट्रहरु बीच भएता पनि यति लामो अवधि सम्म राजनीतिक परिवर्तनको सिलसिलामा संक्रमित भएर बस्नु राष्ट्रको लागि शुभ होइन र राष्ट्रीयता पनि कमजोर हुँदै जाने खतरा बढदै गएकोछ। विखंडन छेत्रीय स्वायत्तताको कुरा गरेर मात्रै हुँदैन भने पनि अप्राकृतिक र बेईमान मंशायवाट लादेको पहिचान वा क्षेत्रीय स्वायत्तता राष्ट्रको लागि अग्रगामी निकास पनि निकाल्न सक्दैन। तसर्थ सबैको ऐतिहासिक पहिचान र संस्कृतिको कद्र गरे बिना कुनै नयां विवाद खडा गरी राष्ट्रमा सहमति बनाउनु पर्छ र शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार संगै राष्ट्रको सामरिक विकासका लागि उपलब्ध प्राकृतिक संपदाको समुचित रख-रखाव र दोहन गर्नु पर्छ।

उपरोक्त कार्यक्रमको लक्छ्य भने मिथिलाको संस्कृतिलाइ जोगाउने पर्यटन विकास, कला-संस्कृति संरक्षण, सांस्कृतिक परंपरा जस्तो विरासतहरुको निर्वहन, मैथिली साहित्यको विकास र समग्रमा राष्ट्रकै विकास रहेको छ। जुन नेपालमा संसार भरिका पर्यटक कुनै समय शान्तिको थलो ठानेर, जनकको र बुद्धको देश भनेर घुम्न आउंथे त्यहीं जान आज कतिपय देशले आफ्नो जनतालाइ मना गर्नु हाम्रो लागि दुर्भाग्यको कुरा हो। हाल यस स्थितिमा केहि सुधार आएता पनि कमजोर राजनीतिक प्रतिबद्धताका कारण कुनै खास उपलब्धि चाहिं हुन सकेको छैन। नेपालको वर्तमान वातावरण शान्ति र विकास दुवैको लागि अनुकूल छैन। यस कार्यक्रमको माध्यम समाजमा सौहार्द्र र सद्भावनाका संग सबैको विकास होस् भनी संवाद संचरण गर्नका लागि प्रयास गरिन्छ। कार्यक्रम मार्फत राष्ट्रलाइ नै यो संवाद जानेछ कि राष्ट्रीयताको शक्ति नै जनताको शक्ति हुनेछ र यसका लागि सबै जात-जाति भाषाभाषीलाइ एकताको सूत्रमा गाँसिनु पर्छ।

हरि: हर:!

**

बहुत परिश्रम सऽ कोनो समारोह सम्पन्न होइत छैक, ताहुमें मैथिली-मिथिलाके कार्यक्रम करबाक लेल तऽ सभ तरहक मेहनत हरेक कार्यकर्ताके करय पडैत छैक। चाहे बाँसके खुट्टा गाडब होय वा पर्दा टाँगब या फेर पोस्टर-पम्पलेट साटब-बाँटब, हरेक कार्य में तल्लीनता सँ कार्य करय पडत सभ गोटा के तखनहि सफलता हाथ लागत। विराटनगरमें विद्यापति स्मृति पर्व समारोह २०६९ के तैयारी एकदम जोर पर अछि, लगभग सभ कार्य हेतु जिम्मेदारी बँटा गेल आ आइ सऽ समारोह स्थलपर कार्य में सेहो हाथ लगा देल गेल अछि! आशा करैत छी जे आब शनि दिन तक जीवन अहिना व्यस्त चलत।

आ कार्यक्रमके सन्दर्भमें आदरणीय सुमन भाइ द्वारा संचालित मैथिली कार्यक्रम अरिपन पर सेहो आइ विस्तार सँ चर्चा कैल जायत जाहिमें अपने सभ सेहो अवश्य भाग लेब। जे दूरमें होइ से इन्टरनेट द्वारा जुडब, लिंक निम्न अछि। आ जे नजदीक में होइ तिनका लेल एफ एम पर ९९.२ मेगाहर्ज ट्युन करबाक अछि। अहुँ सभ फोन करैत उपरोक्त वार्तामें सहभागी बनि सकैत छी। फोन नं. अनलाइन बतेता श्री एस सी सुमन भाइ!

हरि: हर:!

**

२५ दिसम्बर २०१२

हिन्दूके कोनो शास्त्र खुदो नै कहियो स्वयंके हिन्दू कहि निज-मान-मनौवैल केने छैक, तखन मानव आ मानवताके कतेको बेर गान कैल गेल छैक। स्वयंके हिन्दू कहब सेहो एक किस्म सऽ विभेदकारी बात भेल। मानव लेल प्राकृतिक धर्म मानवता मात्र आ व्यक्तिगत धर्म माता-पिता परिवेश सँ प्राप्त अलग-अलग पंथ मात्र थीक। सनातन धर्ममें हिन्दू, मुसलमान, क्रिश्चियन, बुद्ध, जैन, सिख, आ समस्त जीव-जन्तु समेत जीवमंडल हेतु जे धर्म अछि समूचा समाहित अछि। ई बात लोक पहिले सेहो बुझैत छल, पुन: समय अंतरालमें विस्मृति आ विभेद उत्पन्न होयबाक कारण संदेहक परिस्थिति बनलैक अछि आ फेर प्राकृतिक नियम अनुरूप कहियो ई समझ बनि जेतैक से हमरा विश्वास अछि।

आब हमहुँ-अहाँ तऽ कोनो आइये भेल छी से बात तऽ नहि छैक, जखन हमहीं-अहाँ सनातन छी तऽ भला हमर धर्म कोना सनातन नहि, यैह कहैत हम आब सभक पंथरूपी धर्मके आदर करबाक लेल आ मानव जगतलेल मानवता धर्मके सदिखन सर्वोपरि मान्यता दैत जगत हितकारी कार्य करबाक लेल आजुक विशेष अवसर क्रिसमश डे पर शुभकामना देबय चाहैत छी।

मेरी क्रिसमश! ऐण्ड हैप्पी न्यु ईयर २०१३ इन एडवाँस!

हरि: हर:!

**

ई जातिवादिता प्रसार करबाक के युग के बात थीक जहिया जमीन्दारी प्रथाके कारण, सामन्ती सिद्धान्त सऽ शासक जाति याने अगडा जाति जेना ब्राह्मण, क्षत्रिय अपनाकेँ पवित्र शीलसँ भरल देखैत वैश्य आ शूद्रकेर कर्म-आधार पर छूत-अछूतके नियम बनौलक। वास्तविकता एहेन छैक जे कर्मकाण्ड के आधारपर जखन केओ व्यक्ति ताहि तरहक परिस्थितिमें हो जखन ओ दोसरके अपन शारीरिक स्पर्श करयबाक वा करबाक मंशा नहि रखैत हो, याने स्वयंके अशुद्ध मानैत हो तऽ अछूत रखैत अछि। ई नियम आइयो कायम अछि। लेकिन गलत व्यवहार आ कूव्याख्या सऽ एहि सिद्धान्तके प्रतिपालन गलत रूपमें जातिपर थोपल जाइत अछि जे मानव-व्यवहारमें ह्रास के द्योतक थीक। बेशक, यदि डोम न स्नान करत, न चर्या सही राखत आ ने स्वयंके पवित्र राखत तऽ भले केओ ओकरा छूबय लेल वा छुवाय लेल किऐक चाहत? डाक्टर पेशेन्टके ईलाज करय लेल दास्ताना किऐक पहिरत? तऽ विचार आ विवेक सऽ छूत-अछूत होइत छैक, नहि कि जाति सँ। यदि पानि छुवैत छैक तऽ हवा किऐक नहि?  हरि: हर:!

**

ओ कहतै हम छी जनकपुर सँ
काज करत सब टनकपुर सन
तखन फेर ओ देतै जे उपदेश
ताहि सऽ बनतै केहेन सन देश?

बिगड़ल देशक हाल जे देखू
नेता मालामाल छै देखू
जनता छै बेहाल जे देखू
वेश्यावृत्ति कमाल छै देखू!

खूब चलैत छै जोड़ाजोड़ी
मनबै छै क्रिसमश आ होरी
डाँड़्हमें हाथ नचै छै गोरी
तैयो शान्ति जीवन छै कोरी!

कह कतेक दूर बाबाधाम
चलिते रहमें भोर आ शांझ
रुकतौ जीवन एकहि बेर
ओ नहि हेतौ देर सबेर
अपन हाथ बस एकहि बात
ईशक शरण ईशहिके धाम
भेटि जेतौ सच्चे के जाम
घुमैत रहे तों गामहि गाम
ईशक शरण ईशहिके धाम!

हरि: हर:!

**

मिथिला पेन्टिंग याने मानवक जीवनकेर प्रकृतिक प्रेरणा संग जोड़िके रखबाक कला मिथिलाके अति प्राचिन सभ्यता थीक। हरेक घर-परिवारमें पावैन-तिहार आ विशेषतः विवाह-द्विरागमन सन हरखक घड़ी घरक अंगना, देवाल, कोठली आदि सजेबाक लेल अति सहज ढंगसँ गायके गोबर, चाउरक पिठार, सेनुर, गाछ-पात-फूलसँ तैयार कैल गेल प्राकृतिक रंग संग प्रकृतिके विभिन्न रूपकेँ चित्र द्वारा उतारब जाहिमें जीवन्त उर्जाक संग दैवीक शक्ति आ प्रेमक रूप सभ प्रदर्शित करब मिथिलाक विशिष्ट चित्रकला परंपराके परिचायक थीक। मिथिलाक लोक संस्कृतिमें मानव-जीवनकेर अभिन्न आ अन्योन्याश्रय सम्बन्ध प्रकृति आ देवता संग जुड़ल देखायल जयबाक बात सुसभ्यता आ समृद्ध संस्कृतके द्योतक अछि। ओना तऽ बहुतो बात मिथिला क्षेत्रक एखनहु रहस्यपूर्ण बनले अछि, लेकिन १९३४ ई. के बड़का भूकंपक बाद अंग्रेज कलक्टर विलियम आर्चर मिथिलामें भूकंप सँ भेल नोकसानी के निरिक्षण क्रममें घरके देवाल सभ पर बनल एहि विलक्षण चित्रकला सँ प्रभावित होइत बहुतो रास फोटोग्राफी करैत अपन पत्नी मिल्डर्डके संग बहुतो पत्र-पत्रिकामें प्रकाशन करबैत एकरा विश्वपटलपर अनलैन। १९५०-१९६० के बीच बहुते रास भारतीय विद्वान्‌ सभ सेहो एहि क्षेत्रके भ्रमण करैत मिथिला पेन्टिंगपर शोधकार्य कयलन्हि आ अखिल भारतीय हस्तकला समिति के तरफ सँ १९६६ ई. में विशेष दस्ता पठाय मिथिला पेन्टिंग के घरके चहारदिवारी सँ बाहर लाबयके प्रयास कैल गेल आ मुश्किल सँ ताहि समय दू गोट मैथिलानी सहभागिता देखेली। लेकिन संसार भरि एहि चित्रकलाके प्रतिष्ठा पसरल लेकिन एखनहु एकर गति धीमा अछि जेकरा बढेबाक लेल मैथिली सेवा समिति विभिन्न तरहें कार्यरत अछि। बहुत जल्दी एहि लेल एक प्रशिक्षण शिविर सेहो लगायल जायत ताहि लेल हम सभ प्रतिबद्ध छी।

डा. एस. एन. झा
अध्यक्ष, मैथिली सेवा समिति
आयोजक: विद्यापति स्मृति पर्व समारोह २०६९, विराटनगर।

S.c. Suman भैया, कैटेलग लेल!

हरिः हरः!

**

अटल अहाँके अटलता सऽ बनल भारत के नव ओ रूप,
काश! एक बेर फेर बनितौं एहि पैघ प्रजातंत्रके अहीं भूप!
पहिले बेर जखन १३ दिनक राज आयल छल अपनेक हाथ,
मुश्किल में राखल गेल घेर अपनेकेँ नहि भेटल सभके साथ!
लेकिन ओहि अपमान के स्मृतिमें रखलक देशक जनता,
बहुमत सँ अपनेकँ जिता के देलक प्रधानमंत्रीके मान्यता!
अबिते देरी जखन पोखरण परीक्षण कयलहुँ अपने शानसँ,
विस्मित फाटल अचरज सँ तकलक सभ बड़का ध्यानसँ!
रुकलहुँ कहाँ अपने, राखि समेट सभकेँ चलेलहुँ नीक राज,
घरके हो वा बाहर के हो देलहुँ नव गठबन्धन के नीक राह!
आइयो राष्ट्र चलि रहल अछि अहींक पथ-प्रदर्शन पर श्रीमान्‌,
सदिखन सुन्दर बनल रहय आ दहिन रहैथ ओ ईश महान्‌!
लगले रहल एक शख हमर जे देखितहुँ अपनेकेँ हिया-जी भैर,
जानि कतय छी अपने कि अछि हाल इ जाने तरसी बेर-बेर!
बस एक बेर – बस एक बेर, दर्शन दियऽ यौ नेता महान्‌,
बुझब जे दर्शन भेट गेल – श्री कृष्ण आ श्री राम भगवान्‌!
आइयो राष्ट्र चलि रहल अछि अहींक पथ-प्रदर्शन पर श्रीमान्‌,
सदिखन सुन्दर बनल रहय आ दहिन रहैथ ओ ईश महान्‌!
लगले रहल एक शख हमर जे देखितहुँ अपनेकेँ हिया-जी भैर,
जानि कतय छी अपने कि अछि हाल इ जाने तरसी बेर-बेर!
बस एक बेर – बस एक बेर, दर्शन दियऽ यौ नेता महान्‌,
बुझब जे दर्शन भेट गेल – श्री कृष्ण आ श्री राम भगवान्‌!

अपनेक स्नेही आ प्रशंसक – प्रवीण चौधरी ‘किशोर’
परमादरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रति समर्पित!

**

महादेव सभ कार्य डोरिया रहल छथि। अपन भूश्कोल दिमाग तऽ कखनहु के थाकि के साइड भऽ जाइत अछि। मुदा दिगम्बर फेर हँसैत ठाड्ह भऽ जाइत छथि। हुनका अपन भक्तक गान-समारोह बहुत नीक लगैत छन्हि से हमरा पता अछि। बस ओ अहिना हँसैत रहैथ, हुनकहि हँसने संसार हँसत। ओना एखनहु बहुत कार्य बाकी अछि, लेकिन ओ अपने त्रिशूल के चमकपर सभ पूरा करबेता। कूटिल मनुख के ताकत नहि जे सोझाँ आबि जाय! काँकौडपनी सऽ हमरा तही लेल चिन्ता एकदम नहि होइत अछि। ओना कतेको लोक लास्ट मोमेन्टमें कहय लागल छथि जे जाड बड गंभीर छैक से हम नहि आबि सकब, तऽ आब अहाँ नहियो आयब तऽ कार्यक्रम तऽ हेबे करतैक।

पुस्तक मेला एहि बेरुक कार्यक्रमके आकर्षण रहत। एखनहि शिव-कुमारजी कहैत छलाह जे ४० फीटके दूरी में हुनके स्टल लेल स्थान चाही… आ एम्हर हम सभ तऽ ४० फीटमें सभ स्टल कम्पलीट करबाक सोच बनेने रही!  चलू! आइ फेर ४० फीट बढबायब स्टल एरिया! आ एहि बेर मिथिलाके खान-पान, चाय, पकौडी, झिल्ली-मुडही, सभ इन्तजाम रहत। पान विशेष रूपे!  आखिर दर्शक सपरिवार जे भिनसर ८ बजे औता से रातिक १२ बजेतक समारोह-मेला में रहता, भरपूर इन्तजाम जरुरी!

एक आरो बात देखबैक – डोम-हस्तकला, कुम्हार-हस्तकला, माली-हस्तकला लगायत मिथिलाक अनेको जातजातिके विशेष हुनर के प्रदर्शनमें सहभागी बनायल गेल अछि। हरेक बेर नव-नव बातक ध्यान राखल जाय लागल अछि। लोक कतबो हमरा सभके जाति-पाँतिमें बाँटय के कूचेष्टा करत से नहि चलतैक कारण हम सभ अहिना एकजूट समुदायमें बनल रहल छी, आइये नहि बहुत पहिनहि सँ। तखन ने इन्द्रकेँ जनकजीक ड्योढिक बाहरे डोमक घर में आठो सिद्धि देखि आश्चर्य लागल छलन्हि आ भूलवश ओ डोमहिके घरकेँ ड्योढि बुझि प्रवेश चाहैत छलाह सियाजीक विवाहक अवसरपर!   

चारू दूलहा कि जय – ओ दूलहिनियाकी जय
बाजू मिथिला नगरियाकी जय जय जय!

जी! एहि गीत के विशिष्ट गायन करनिहार रामचन्द्र सिंह सेहो आबि रहल छथि। आब अहाँ सभ मिस नहि करब एतेक भव्य समारोह के!

जय मैथिली! जय मिथिला!

हरि: हर:!

**

२६ दिसम्बर २०१२

Friends & Familiars!!

It is high time to move towards the spot management for Vidyapati Smruti Parva Samaaroh – 2069. I shall be offline further, you guys may reach to me on phone: 00977-9852022981. Or, do leave the message on Facebook, shall I be online to see all that you have to say.

Sorry, the Souvenir is not gonna be published right in this event due to shortage of time and non-completion of all articles in Maithili. But it will be published through another event with Neha’s Nights as proposed very soon.

Regards,

Pravin
The Advisor to the Organizing Committee – VSPS-2069.

Harih Harah!

**

मित्र व परिचित!

आब कार्यक्रम स्थलपर व्यवस्थापनक मुख्य कार्य हेतु आइये सऽ हम अफलाइन रहब, अत: हमर नंबर ९८५२०२२९८१ सेहो केवल कार्यक्रम प्रति वार्ता लेल खुलल रहत। समय-समयपर फेसबुक पर सेहो उपस्थिति हेतैक से अपन समाद छोडि सकैत छी।

अफसोस जे स्मारिका आ सिनेमा – ई दू कार्यक्रम हाल बहुत काज अधूरा रहि गेलाक कारण स्थगित कैल गेल अछि जे नेहा-मल्लिक द्वारा नव मैथिली एलबमके प्रकाशन हेतु नेहा-नाइटके संग कैल जयबाक प्रस्तावना अनुरूप निकट भविष्यमें होयत से जानकारी देबय लेल चाहब।

हरि: हर:!

**

२७ दिसम्बर २०१२

समारोह केवल गीतनाद नहि, एकर मूल मर्म पूर्ण संस्कृतिके झलकाबैत सहभागी हर प्राणीमें एक नव उर्जाके संचरण करैछ। उत्साह सँ भरल अपन लोक-संस्कृति प्रति समर्पण करबाक एक समुचित अवसर के सेहो समारोह कहल जाइछ।

सामान्यतया गीतनाद गाबि लेब आ सर्टकटमें काज निकालि लेब के समारोह नाम देबाक परंपरा के कारण समारोह स्वयं प्रश्नक घेरा में चलि गेल अछि।

यदि समारोह सँ एको सद्मार्गक पथ-प्रदर्शन जनमानसमें नहि भेल तऽ समारोह केवल फ्लाप शो टा भेल!

विद्यापति समस्त लोक संस्कृतिके अपन प्रखर व्यक्तित्वमें समेटलाह जाहि के चलते हिनकहि स्मृति संग मिथिलाक समारोह मनयबाक सोच अछि हमरा लोकनिक आ ईश्वर कृपासँ ई निरन्तर चलय, बस!

हरि: हर:!

**

बहुत नीक चर्चा! आदर्श गाम तऽ समूचा मिथिला छलैक जतय एक पर एक विद्वान्, तांत्रिक, ज्योतिष, मर्मग्य, न्यायविद्, आ हरेक विधामें निपूण संतानोत्पति होइत रहल छल। पता अछि ताहि दिन लोक व्यक्तिवादी विकास लेल चिन्तन कम आ समुदाय हेतु चिन्तन-मनन संग कर्म निष्पादन करैत रहल छलाह। एक-दोसर संग कोना सहकार्य होयत ताहि अनुसार समाजिक व्यवस्था छल। केवल अपन कर्म-प्रवृत्तिसँ समाजिक सौहार्द्र बनैत रहबाक परंपरा छल। रहबो किऐक नहि करत? आखिर जनक समान विदेहराजा, कोनो वस्तुक कमी केकरो नहि छल आ केकरो कोनो बातक मानू फालतू लालसा सेहो नहि छल। लेकिन समय बितैत गेल, दरिद्री बढैत गेल, लोभ‍- आ लालचमें ग्रसित धर्मविमूढ हर तरहें बिगडैत गेल आ आब पुन: सनतजी समान पुत्र चैनपुर समान पवित्र गामके आदर्श बनेबाक हेतु चिन्तन करय लागल छथि। भोर होइत छैक, पुन: संध्या आ अन्हरिया राति तऽ पुन: इजोरिया…. प्रकृति कहि रहल अछि जे ई द्वंद्व समास सदिखन दू गो मजबूत पाया बनि पृथ्वीरूपी महल के थमने अछि, थमने रहत। से नहि रहैत तऽ अमृतपान केनिहार देवता मात्र पृथ्वीक सम्राट रहितैथ, मुदा हुनका पता छन्हि जे असुर के वरदान दैत बेर-बेर नहि जन्मायब तऽ सनातन सिद्धान्त खतरामें चलि जायत।

जे भेलैक से नीक, जे हेतैक से नी, जे भ रहल छैक ओ सभ सऽ नीक!

चिन्ता नहि करू, अहाँ बस दर्शक छी एक्टर ओ स्वयं छथि!

जय शक्ति! जय शिव!

हरि: हर:!

**

आइ नोकसान के हिसाब कि लगबैत छी, आब तऽ स्थितिमें सुधारके समय आबि गेल अछि। लोक धर्म परिवर्तन आइ सऽ २००० वर्ष पूर्वहि सऽ विभिन्न तरहे केलक। पहिले तऽ अपन घरे फोडिके केलक, तेकर बाद पंथगामी बनि विचलित भऽ के केलक आ पाश्चात्य समयमें कोलोनिज्मके शिकार बनल क्रिश्चियन धर्म अपनाय के! कतहु गेल स्थिति ओकर ओहने रहल। खाली सींगमें तेल लगेला सऽ पेटमें खरो नहि रहला सऽ कि हाल हेतैक? धर्म कि करतैक? जे चर्चा अहाँ आइ उठा रहल छी आब ई घसल अठन्नी समान बनि गेल अछि। आजुक समयमें शिक्छाके जे अपनेलक ओ आगू बढल आ जे बूरित्वमें फँसल खाली पूर्वाग्रह के भरलक ओ अन्तर्अग्निसँ दहकैत बस झूलसैत-कँपैत रहल। छूआछूत, जातिवादिता, धर्मांधता, अन्धविश्वास, आदि प्रथाके एहि युगमें कोनो भूतो नहि बचल अछि। शिक्छाके प्रखर प्रसार संग सभके आगू बढबाक आ यदि समर्थ होइ तऽ बढेबाक मार्गपर मंथन करू, कर्म करू! हरि: हर:!

**

भारतमें बेरोजगारी न पहले था न आज है और न ही होनेवाला है, परन्तु बेरोजगारी ही सबसे बडी समस्या है। सोचो क्यों? कैसा है ये विरोधाभास?

जी! प्रजातंत्रकी झूठी ढकोसला जो भारतमें काँग्रेसियोंके भ्रष्ट बनने से लादा गया है उसमें एकल सम्राज्य चलानेका एक अनोखा रास्ता है। जब तुम शिक्छामें चोरी-चबारी करके डिग्री लेने को प्रश्रय दोगे तो स्वत: जनता अशिक्छित और बेलूरी बनेगी! और फिर बेरोजगारी होना लाजमी है।

मेरा चुनौती है कि मुझे किसी भी शिक्छित (केवल डिग्रीवाले नहीं, बल्कि हुनरवाले) को बेरोजगार कोई दिखा दे!

हाँ! कुछ शिक्छित जो आवश्यकता से ज्यादा ही शिक्छित हैं वे बेरोजगार हैं क्योंकि उन्हें दादा-पिताकी रोटी कुछ इतना भा गया कि वो अपनी तौल भी असलियत से हँटकर मानते हैं। मैं यदि पावरमें रहता तो ऐसे सारे ओवर-एस्टिमेटर को या तो कैदखाना में डाल देता या फिर पागलों जैसा मानकर इलाज करबाता!

हरि: हर:!

**

२९ दिसम्बर २०१२

समारोह सफलताक संग पहिल दिन पूरा भेल, बाबाक असीम आशीर्वाद जे बिलकुल सोचल अनुरूप समस्त कार्यक्रम लगभग समय सँ पूरा भेल। आब पुन: १० बजे सँ धिया-पुता सभक सांस्कृतिक कार्यक्रमसँ शुरु होयत आ १२ बजे सँ विद्वत् सभा होयत। बाकी अपडेट हम फुर्सत में मात्र दय सकब। टीवीपर प्रसारण आ नेपालक हरेक प्रमुख चैनेल पर देखायल गेल संगहि सहारा समय पर सेहो देखायल जायत। हरि: हर:!

**

३० दिसम्बर २०१२

Dear Pravinji, I never had any doubt on your dedication and integrity towards Maithili,Mithila and Madhes, my belief and confidence has reached a newer height to see you heraldind such a versatile event.I am feeling proud to have participated in Vidyapati smriti parv, than you very much.I am so touched to extend the greetings on behalf of Non Resident Madhesi Association(India), We want to scale greater heights together in coming days.

सुजीत कुमार ठाकुर

**

३१ दिसम्बर २०१२

विद्यापति स्मृति पर्व समारोह २०६९ (विराटनगर)

ई तेसर वर्ष विशाल स्तरपर आयोजित समारोह छल जाहिमें पूर्वसँ कतेको बात भिन्न तथा अभिनव-ओजसँ भरल छल। एहि समारोह के उद्घाटन माननीय उप-प्रधान तथा गृहमंत्री बिजय कुमार गच्छदारजी द्वारा कैल गेल तथा समारोह में विशिष्ट उपस्थितिमें भारत तथा नेपाल सँ अनेको गणमान्य नेतृत्वकर्ता आ विद्वान्‌केर छल। मुख्यरूपेण सुखदेव पासवान (भू.पू. साँसद, भारत), डा. देवेन्द्र झा (भू.पू. विभागाध्यक्छ, मैथिली, बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर), डा. रामावतार यादव (भाषाविद् व पूर्व उपकुलपति, पुर्वाञ्चल विश्वविद्यालय, नेपाल), प्राध्यापक परमेश्वर कापड़ि (मैथिली विभागाध्यक्छ, त्रिभुवन विश्वविद्यालय, नेपाल), सियाराम झा सरस (सुप्रसिद्ध मैथिली स्रष्टा व गीतकार), श्यामल सुमन (सुप्रसिद्ध हिन्दी तथा मैथिली कवि), प्राध्यापक अमरकान्त झा (शोधकर्ता), एस. सी. सुमन (मिथिला पेन्टिंगके प्रसिद्ध कलाकार), अद्भुदानन्द (मिथिलाक सर्वश्रेष्ठ हास्य-कलाकार व विद्वान), कालीकान्त झा तृषित (मैथिली लेखक), दिगंबर झा दिनमणि (विद्वान्‌ कवि), श्याम अधिकारी (हिड़िप्पा साहित्यिक परिषद्‌के संस्थापक), दिनेश श्रेष्ठ, भरत साह, सुजित ठाकुर, कन्दर्प लालकाका (कवि), करुणा झा, मीरा झा सहित सैकडों कविश्रेष्ठ स्थानिय आ राजविराज, जनकपुर, लहान, जोगबनी, सुनसरी सभसँ एहि समारोहमें अपन गरिमामय उपस्थिति देखेने छलाह। आयोजक संस्था मैथिली सेवा समितिके अध्यक्ष डा. एस. एन. झा केर अध्यक्षतामें प्रारंभ कैल गेल उद्घाटन समारोह लगभग १ बजे प्रारंभ कैल गेल आ कार्यक्रममें दीप्ति प्रज्ज्वलन करैत उद्घाटन कयलाह उप-प्रधान तथा गृहमंत्री बिजय गच्छदार जिनका संग देलाह सुखदेव पासवान व संयोजक फूल कुमार देव।

उद्घाटन सँ पूर्व एक विशाल झाँकी सहित प्रभात फेरी नगर-परिक्रमा केने छल जाहिमें मिथिलाक संस्कृतिके विलक्षण झलक देखायल छल, विद्यापति एहि बेर सजल माफामें विराजमान्‌ छलाह आ प्रहरी बैण्ड के राष्ट्रीय ध्वनिके अगुआईमें लगभग ५ कि.मी. के दूरीमें परिक्रमा कैल गेल। भार-भरिया, जनमानस‍क संगतिया, विशिष्ट पहिरन धोती-कुर्ता-पाग-दोपटामें, मैथिलानी, धिया-पुता सभ केओ अपन संस्कृतिके हृदयसँ आत्मसात करैत एहि झाँकीमें सहभागी बनल छलाह। कटही गाडीमें ओहार लागल दुलहिक माय सेहो छलीह। भजन-गानके अनेको समूह छल। जनजाति-समूह के महिला सभ सेहो अपन विशेष कलश जाहिपर मिथिलाक विशेष सज्जा पिठार आ सिनुरके सजावट कैल छल ताहिके संग एहि झाँकीके विशेष शोभायमान कय रहल छलीह। ढोल-पिपही-बाजाके संग निकालल गेल जुलूस शहरमें सभके अपन घर सँ बाहर आबि मिथिलाक आनन्द लेबा लेल बाध्य केने छल। त्रिमूर्ति चौकपर पहुँचि विद्यापति व संगमें नेपाली साहित्य के दू अन्य कविश्रेष्ठ भानुभक्त आचार्य एवं महाप्रसाद सापकोटाकेँ फूलमाला अर्पित करैत श्रद्धाञ्जलि देल गेल। जुलूस किछु समय लेल ओहि स्थलपर कोण-सभामें परिणत भेल आ विद्यापतिक जीवनपर वक्ता लोकनि प्रकाश दैत सियाराम सरसकेर आह्वानपर ओहि स्थलके आरो सुसज्जित करबाक, स्मारकपर छतरी लगयबाक प्रण कैल गेल।

मंतव्यक क्रममें प्रमुख अतिथि मैथिली सेवा समितिक प्रयास आ समारोहकेर विलक्षणता केँ हृदयसँ प्रशंसा करैत मिथिलाक सम्मान अवश्य कायम रहत – यदि मधेस एक नहि दूवो बनैत अछि तऽ स्वीकार्य अछि आ बारा सँ झापा धरिक प्रदेशके नाम मिथिला राखल जैछ तैयो स्वीकार्य अछि कहलनि। तहिना संस्थाके हरेक प्रयासके संग सदिखन रहैत कार्यक्रमके सफलता हेतु शुभकामना प्रदान कयलन्हि। प्रमुख अतिथिक सोझाँ में आयोजक समितिके विशेष प्रस्तुति राष्ट्रीय एकताके पथ-प्रदर्शक गीत, नृत्य आ नाटक छल। लगभग ५ घंटा के अमूल्य समय दैत प्रमुख अतिथि लगायत समस्त दर्शक आनन्दमग्न रहल। तदोपरान्त संगीत सँ सभक हृदयपर राज केलाह प्रसिद्ध गायक-कलाकार विरेन्द्र झा, संजय यादव, अणु चौधरी, स्नेहा झा, मिथिलेश गुप्ता, रामविलास यादव व अलग-अलगसँ आयल कलाकार लोकनि। पहिल दिवसके कार्यक्रम लगभग ११ बजे राति धरि चलल।

दोसर दिन मौसमक प्रतिकूलताके कारण कार्यक्रम निर्धारित समयसँ किछू देरीसँ प्रारंभ भेल। शुरुआत स्कूली बाल-बालिकाके द्वारा गायन, नृत्य सँ कैल गेल। गोसाउनिक गीत अम्बिका-भावना-देवांशी द्वारा प्रस्तुत कैल गेल, तहिना ई सभ सियाराम सरस रचित ‘फूल, तितली आ तुलबुल’ नामक पोथीसँ दू गोट रचनाके रसगर प्रस्तुति देने छलीह। हमर टुटि गेल कानक बाली – नामक गीत पर नृत्यक भव्य प्रस्तुति कैल गेल छल कोसी विद्या मन्दिरक विद्यार्थी द्वारा! तहिना मदर टेरेसा स्कूल, गोदावरी स्कूल, सुम्निमा बोर्डिंग स्कूल आदि द्वारा सेहो रंगारंग प्रस्तुति देल गेल छल।

पुन: शुरु भेल विद्वत् सभा जाहिमें विद्वान् लोकनि ‘सम्पन्न इतिहास – विपन्न वर्तमान’ विषयपर बहुत सारगर्भित चर्चा कयलन्हि। खुलिके बात कयलापर नहि केवल विद्वान् स्रष्टाके जागृति भेटैत छन्हि बल्कि समस्त जनमानस सेहो एकर भरपूर लाभ उठबैत छथि। हरेक दृष्टिकोण पर सोचबाक अवसर प्राप्त होइत छन्हि। कतेको नव विन्दुपर विचार क्रान्ति तरंग उत्पन्न करैत रहल ई विचार गोष्ठी आ लगभग ५ हजार के आसपास उपस्थित जनमानस अपनाकेँ धन्य मानैत एहि कार्यक्रममें विद्वान् के सुनबाक लाभ अर्जित कयलाह। शान्त-गंभीर भीड बस कोनो आह्लादकारी जानकारी पबिते पुलकित होइत तालीके गरगरी सँ स्वागत करैत छलाह। लगभग ५ घंटाके ई विद्वत् सभा पहिल बेर लेकिन बहुत सार्थक भेल। कवि गोष्ठीके समय सेहो समाप्त भऽ गेल छल, किछु तेहने भेल ई विद्वत सभा! तदापि कवि गोष्ठी सेहो कैल गेल। बस १ रचना प्रस्तुति लेल समय दैतो लगभग दू घंटा धरि चलल कवि गोष्ठी! पुन: मिथिलाक पारंपरिक कीर्तन गायन, मिथिला महिमा गान, विद्यापति संगीत, तबलापर युगलबन्दी काठमाण्डु सऽ आयल पिता-पुत्र जोडी (बदन मंडल) के प्रस्तुति सभके हृदयके तरंगित केलक। तदोपरान्त फेर रातिक २ बजे धरि गीत-संगीत के कार्यक्रम भेल आ पैघ‍ पैघ कलाकार कम से कम एक प्रस्तुति देबाक लेल व्यग्र बुझेला। समयके सीमा नंघला के बावजूद आ मौसममें शिमला-काश्मीर जेना वर्फ-बुँद-सहित हवाके झोंका खाइतो संगीतक गर्मीमें दर्शक जमिके आनन्द उठेला एहि कार्यक्रमके!

हरेक कार्यक्रमके केन्द्रविन्दु रहला अद्भुदानन्दजी! कारण दर्शकके हँसबैत-हँसबैत लोटपोट करब हिनक बायाँ हाथक खेल थीक। अद्भुद प्रस्तुति! विराटनगरमें आश्चर्यजनक छाप छोडलाह अद्भुदानंदजी आ हमरा विश्वास अछि जे मैथिलीमें सेहो लाफ्टर शो संभव अछि। आगामी समय में पुन: समारोह सँ सभके नव मार्गदर्शन हो यैह कामना करैत छी।

हरि: हर:!

**

पूर्वक लेख
बादक लेख

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

4 + 1 =