प्रवीण डायरी २०१२ – भाग २

१ अप्रैल २०१२

धन्यवाद मैथिली साहित्य परिषद्‌ राजविराज (सप्तरी) नेपाल!

आजुक कार्यक्रम मिथिला-मैथिली लेल एक नव इतिहास सृजना केलक। राष्ट्रीय सम्मेलन २०६८ – एक प्रथम सम्मेलन जे समस्त संघ-संस्था के संग मिथिलाके धरती पर आयोजित कैल गेल आ कोनो राष्ट्र के प्रधानमंत्री – जेना नेपाल के प्रधानमंत्री सम्माननीय डा. बाबुराम भट्टराई जी अयलाह आ एहि कार्यक्रम के नहि सिर्फ उद्‌घाटन कयलाह बल्कि अपन संबोधन मैथिली में करैत नेपाल के नव संघीय गणतंत्रमें सम्मानजनक स्थिति रहत एहि बात के प्रतिबद्धता जाहिर कयलन्हि। हम समस्त मैथिल हुनक एहि प्रतिबद्धता प्रति आभार प्रकट करैत छी। आ अहुँ सभके प्रति आभार अछि जे मैथिलकेर विपन्न अबस्था रहितो एतेक पैघ कार्यक्रम के आयोजनके अदम्य साहस कयलहुँ।

ओना सभ ठाम किछु ने किछु लोक एहेन रहैत छैक जे खाली दोख निकालैत छैक… ताहि सभ सऽ हम सभ कोनो तरहें अभिप्रेरित नहि छी बल्कि अहाँ सभके प्रति नतमस्तक छी। आभारी छी।

आबयवाला समय में एहेन लोक के केओ आ कोनो तरहक पूछ नहि हेतैक – बस हम सभ अपन मातृभाषा आ मातृभूमि लेल सदा अनवरत कार्य करैत रही। बहुत धन्यवाद अछि।

हरिः हरः!

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आइ राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन २०६८ राजविराज के दोसर दिन पुनः काल्हुक सफलतम आ भव्यतम्‌ आयोजनके निरन्तरता दैत अत्यन्त सफलतापूर्वक संचालन कैल जा रहल अछि। कनेक काल पहिने कार्यक्रम के उद्‌घोषक-प्रवक्ता श्री श्याम सुन्दर यादवजी संग भेल वार्ता अनुसार कौल्हका संध्याकेर अधूरा कार्यपत्र प्रस्तुतिके निरंतरता दैत एहि पर टिप्पणी संकलन कार्य कैल गेल। दोसर सत्रमें मैथिली-मिथिलाके वर्तमान अबस्थापर विचार गोष्ठी कैल गेल। तदोपरान्त मैथिल महासंघ के पुनर्गठन लेल तीन सदस्यीय समिति बनबैत आवश्यक प्रक्रिया जारी अछि। राजबिराज घोषणापत्र के लेल सेहो काल्हिये जे तीन-सदस्यीय समितिके गठन कैल गेल छल ओ अपन कार्य समयके अभावमें पूरा नहि कय सकबाक कारण घोषणापत्र जारी करबाक कार्य काल्हि भिन्सरमें कैल जायत।

सांस्कृतिक कार्यक्रम आ आजुक विभिन्न कार्यक्रम के फोटो सभ के इन्तजार रहत जे कार्यक्रमके प्रमुख उद्‌घोषिका एवं प्रवक्ता श्रीमती करुणा झा द्वारा बाद में प्रस्तुत कैल जायत।

मिथिला-मैथिलीके विकासमें एहि सम्मेलन के द्वारा नया इतिहास के रचना होयत। संगहि नेपालके प्रधानमंत्री द्वारा देल गेल भरोस आबयवाला समय में मैथिली-मिथिलाके सम्मानके अवश्य बढायत। एहि कार्यक्रममें समस्त नेपाल के संघ-संस्थाके उत्साहपूर्वक सहभागिता मिथिला-मैथिलीके स्वाभाविक चिन्ताके उजागर करैत अछि।

जैह बजै छी सैह मैथिली – एहि मूल नारा के संग कैल गेल एहि आयोजन सऽ मैथिली के छवि के धुमिल करयवाला अनेको राजनीतिक विद्वेष के समाप्त करयमें अवश्य सहयोग पहुँचत आ मैथिली भाषा के संरक्षण लेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्यपत्र जेकर प्रस्तुति प्राध्यापक अमरकान्त झा कयलन्हि आ टिप्पणीकार शीतल झा, डा. सुनील कुमार झा, अमरेश ना. झा, कार्यक्रम संयोजक विष्णु मंडल, सुप्रसिद्ध मैथिल अभियानी रामरिझन यादव, करुणा झा, डा. अखिलेश झा, श्याम शेखर झा, एवं अनेको गणमान्य व्यक्तित्व सभ अपन-अपन विचार रखलन्हि। तहिना सहभागितामें सभासद यदुवंश झा, अयोध्यानाथ चौधरी, डा. राम भरोस कापड़ि, सुनील मल्लिक, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, रुपा झा, मिना ठाकुर, देवेन्द्र मिश्र, कन्दर्प ना. लाल उर्फ लालकाका एवं अनेको संघ-संस्थाके प्रतिनिधित्व केनिहार सभके विशाल उपस्थिति रहल।

हरिः हरः!

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आइ भले कतेको मैथिल स्वयं अपन मातृभाषा बाजय में लाज मानैत होइथ,
अपन मातृभाषा प्रति स्नेह बढाबय के जगह राजनीतिक विद्वेष करैत होइथ,
व्याकरण आ शब्दकोषके लोकप्रिय करऽ के जगह गन्दगी पसारैत होइथ,
धिया-पुताके मैथिली में शिक्षा ग्रहण करय लेल उत्साहवर्धन नहि करैत होइथ,

मुदा नेपालमें सम्माननीय प्रधानमंत्री डा. बाबुराम भट्टराई के सुविधा लेल जखन मैथिल महासंघ – अध्यक्ष अमरेश ना. झा पूछलाह जे कि नेपालीमें बुझब सहज होयत तऽ हम सभ नेपालीमें बाजिके अहाँके स्वागत-अभिनन्दन आ अपन माँग-अनुरोध सभ राखी – डा. बाबुराम भट्टराई नहि सिर्फ हुनका मन कयलन्हि बल्कि स्वयं आवाज दैत बजलाह जे नहि-नहि नेपाली नहि, मैथिलीमें बाजू। उपस्थित लगभग ५००० आदमीके अपूर्व भीड़ हुनक एहि महान्‌ स्नेह प्रति आविर्भूत होइत सहसा जोरदार थपड़ी बजबैत स्वागत कयलक आ तेकर बाद प्रखर वक्ता हुनका सँ दू टूक शब्दमें अपन बात रखलन्हि जे मिथिला के नाम आ माँग प्राकृतिक छैक – नव नेपालमें सेहो एहि प्रति सम्मानजनक व्यवहार राज्य पक्ष के लेल सर्वथा अनिवार्य छैक। कोनो भी हाल में एहि उत्कृष्ट आ समृद्ध भाषा एवं भाषाभाषी समेत मिथिला क्षेत्रके अबस्था संविधानमें समुचित भेटब जरुरी अछि।

राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन २०६८ के यैह क्षण अलौकिक छल – आ एकर बाद जखन स्वयं प्रधानमंत्री अपन सम्बोधन सेहो मैथिलीमें रखलन्हि।

Harih Harah!

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२ अप्रैल २०१२

नाश नजदीक भेला सऽ बुद्धि बिपरीत रहैत छैक

पछिला दिन तक हम सभ देखलहुँ जे श्रीहनुमानजी रावणके समुचित सल्लाह देलनि लेकिन रावण ताहि बात के हास्य-व्यंग्यमें उड़ा देलक – तुरन्त हनुमानजी लंकाके जरा के ओकर झूठ अभिमान के तोड़लथि… तदापि… रावण के अपन निजबल के घमंड यथावत्‌ रहल। तखनहि तऽ समूचा लंकाके लोक चिन्तित भेल जे जखन दूत एतेक बलवान्‌-बुद्धिमान्‌-शक्तिवान्‌ छलाह तऽ आब तऽ सीताजीके रावणक बंधन सऽ मुक्त करय लेल स्वयं स्वामी पुरुषोत्तम राम औता… आब रावण समेत समस्त निशाचर समाजके नाश निश्चित अछि। काने-कान बात मंदोदरी तक सेहो पहुँचलैन आ परम-पतिव्रता मंदोदरी अपन प्राणनाथ रावणकेँ बुझबय लगली… लेकिन रावण पुनः अपन पत्नीके अबला नारी समान डेराइत अपन पति के कम आँकय सऽ रोकैत हुनकहु बात के हंसैत किनार कय देलाह। सभ के हितोपदेशमें एकहि टा बात जे राम नहि सिर्फ एक मानव परन्तु सर्वश्रेष्ठ छथि आ हर तरहें एक असहाय स्त्रीके हरण रावण लेल अत्यन्त विनाशकारी अछि। आइ विभीषण सेहो अपन ज्येष्ठ सहोदर के बहुतो तरहें समझेला… लेकिन… अभिमानके नशा बहुत तीक्ष्ण होइत छैक। एकर प्रत्यक्ष प्रकरण प्रस्तुत अछि। विभीषणजीके नीतिपूर्ण बातमें किछु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सीख अछि, हम किछु विन्दु निम्न प्रकारें उल्लेख करब:

१. मंत्री, वैद्य आ गुरु – भय या आशा में खाली मुँह पोछयवाला दुलार करैत छथि – मीठ बजैत छथि तऽ राज्य, शरीर आ धर्म के क्रमशः शीघ्रनाश होइछ।

२. जे मनुष्य अपन कल्याण, सुंदर यश, सुबुद्धि, शुभ-गति आ नाना तरहक सुख चाहैत हो, तेकरा परस्त्री के ललातके चौठके चाँद समान अपवित्र बुझैत त्याग कय देबाक चाही। (स्मरण राखू – मिथिलामें चौठक चाँदके दर्शन करय के परंपरामें बादमें कोनो राजा के कल्याण हेतु तांत्रिक विधि द्वारा पूजा के चलन अछि, ओकरा अपवाद मानल जाइछ।)

३. चौदहो भुवनके मालिक किऐक नहि हो, लेकिन ओहो जीवसँ वैरी कयके नहि ठहैर सकैत अछि। भले मनुष्य गुणके समुद्र आ चतुर हो, लेकिन रत्ती भैर लोभ केलक तऽ ओकरा भला लोक में गिनती नहि हेतैक।

४. काम, क्रोध आ लोभ – ई सभ नरक के रास्ता थिक।

५. भले केकरो संपूर्ण जगत्‌सँ द्रोह के पाप लागल हो, लेकिन शरणागत बनला पर प्रभुजी ओकरो त्याग नहि करैत छथि।

६. पुराण आ वेद के कहब छैक जे सुबुद्धि आ कुबुद्धि सभके हृदयमें रहैत छैक, जतय सुबुद्धि छैक, ओतय नाना तरहक संपदा रहैत छैक आ जतय कुबुद्धि छैक, ओहिठाम विपत्ति के अंबार रहैत छैक।

७. संतके बड़ाई – महिमा – यैह छैक जे ओ खराबो कयलापर खराब करनिहार के नीके करैत अछि।

हरिः हरः!

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३ अप्रैल २०१२

नेपालक मिथिला क्षेत्रके संवर्धन के केओ नहि रोकि सकैत छैक, कारण एहिमें कर्मठ युवा नेतृत्वकर्ता सभ के कमी नहि छैक। आइ श्याम सुन्दर यादवजी के एहि फोटोमें देखि पुनः स्मृतिमें आयल पूर्वाञ्चल पर्यटन प्रदर्शनी जे किछु दिन पूर्व नेपाल टूरिज्म बोर्डके तत्त्वावधान में विराटनगरमें आयोजित भेल छल। एहिमें सप्तरी जिल्लाके मिथिला क्षेत्रक विभिन्न वस्तु, फोटोग्राफ, पेन्टिंग, हस्तकला, आदि प्रदर्शनीमें राखल गेल छलैक। एगो सिक्की सऽ बनल ग्रिटींग कार्ड ततेक नीक लागल जे सहृदयता संग रु.५००/- में कीनि के कलाकार के उत्साहवर्धन के संग-संग सहभागी प्रतिनिधिके सेहो उत्साहवर्धन करय के मौका भेटल। ओ दिन दूर नहि जे मिथिलाके एहि उत्कृष्ट सामग्री सभके माँग अन्तर्राष्टीय बाजारमें सेहो होवय लागत। लेकिन कोनो बाहरी सम्मान के संभावना तखनहि बनत जखन हम समस्त मैथिल अपन वस्तु के सम्मान स्वयं करब। मिथिला पेन्टिंग के मोल कतेक अनमोल छैक – अमैथिल मित्र सभके घरमें देखय लेल भेटैत अछि, लेकिन मैथिल स्वयं एहि उत्कृष्ट पेन्टिंग सऽ अपन घर सजाबयमें आगू नहि देखैत छथि। शिकायत नहि, अधिकार सऽ कहय चाहब जे अहाँ स्वयं पहिले ग्राहक बनू। वैष्णो देवीके दर्शन लेल दूर जायब लेकिन सखड़ेश्वरी (छिन्नमस्तिका) भगवती के दर्शन लेल सेहो लालसा हमरा-अहँके मनमें हेबाक जरुरी अछि। आजुक संसारमें हम सभ पाछू एहि लेल पड़ैत छी जे आइयो हम-अहाँ स्वयं अपन समस्त मानके सम्मान नहि दैत छी।

हरिः हरः!

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४ अप्रैल २०१२

आचार्य किशोर कुणाल मित्रताक अनुरोध पठौलनि, स्वीकार कयला उत्तर हुनकर वाल पर लिखलः

It gives immense pleasure to see your esteemed self becoming my friend – I feel Lord Mahadeva blessed me by awarding such a precious personality’s company through internet and social networking website as Facebook. Thank you so much Sir. Harih Harah!!

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भाइयो/बहनो/साथियों! आप सबोंको हिन्दीमें बातें करते देख अब मुझे भी नहीं रहा गया – कुछ हिन्दी भी झाड़ लूँ….

चर्चाएँ जितनी होती हैं सभीका अपना एक असर कुछ-न-कुछ व्यक्तियों पर जरुर पड़ता है। अतः चर्चा जारी रखें।

दहेज मुक्त मिथिला एक प्रयास है – एक मुहिम है जिसमें केवल स्वेच्छा से ही लोगोंको जुड़नेके लिये अपील है। आप शपथ लें – दहेज न लेना है – न देना है – न ही लेन-देन करनेवालों से जुड़ना है…अर्थात्‌ स्वयंको इस धार से हंटाना है। बहस करें, पर अपनी सोच किसी पर थोपें नहीं। जो लें वो अपनी जगह पर हैं,जो त्यागें वो भी अपने जगह पर हैं। कौन अच्छा – कौन बुरा इसके लिये समाज अपने दृष्टिकोण से सबको नंबर देता ही है।

विडंबना जरुर है कि इतने सख्त कानून रहते हुए भी आखिर लोगोंमें भय क्यों नहीं है?

आइये, यह सब बहुत ही गहराई से दर्शन की बातें हम सब बुद्धिजीवी वर्ग मिलकर करें।

जान-बुझकर मुझे कोई कहेगा कि आप ऐसे लोगों से अपने बेटे-बेटियों का कुटमैती कीजिये जो दहेज को जायज कहकर आपपर अपनी अनेकों माँगें थोप देते हैं – उन्हें मेरी इतनी जबाब काफी है कि मेरे बच्चे ऐसे परिवार के लिये नहीं हैं। बस! बहस यहीं खत्म हो जाता है।

मैं साफ हूँ तो मुझे सफा-सुथरा कुटुम्ब ही चाहिये और दहेज मुक्त मिथिला जो परिकल्पना है वो ऐसे माँगरूपी दहेज से खुद को दूर रखनेवाले लोगोंके लिये है।

धन्यवाद!

हरिः हरः!

PS: Those interested to make yourself a true member here and make a world of dowry free people, please join and register yourself at this website www.dahejmuktmithila.org and also inform about this to your friends and families. No pressure to choose our way though! 

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५ अप्रैल २०१२

ओ चलैथि मोर पाछू-पाछू, हमरो नीक लगैयऽ
हम जतहि छी ओतै ओहो, सचमें नीक लगैयऽ!

मुइड़ के देखी से नहि जानी बस ओ पाछू आबैथ
गीत प्रेम के जे सभ गाबी सैह सभ ओहो गाबैथ!

समय-समय पर हुनको मुँह सँ… होऽऽ
समय-समय पर हुनको मुँह सँ नारा वैह लगैयऽ
हम जतहि छी ओतहि ओहो, सचमें नीक लगैयऽ!

देखू जमाना कतऽ छै भागल पैछला के कि याद करू
रौँदा मारि कत माँजू तख्ता बैसला के कत बाद भरू

ठोकि कील कत पौआ-पाइसो… होऽऽ…
ठोकि कील अकत पौआ-पाइसो खाटो घून धरैय़ऽ
हम जतहि छी ओतहि ओहो, सचमें नीक लगैयऽ!

हरिः हरः!

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११ अप्रैल २०१२

मिथिला के विनाशोन्मुख हेबाक कारण रावणी अभिमान तऽ नहि? 

अभिमानी के ज्ञान लेल सेहो ईशके कृपा चाही!

विगत किछु भाग पर हमर मिथिलामुखी विचार जे सुन्दरकाण्ड संग सन्दर्भ जोड़ि के देखैत आबि रहल छल से किछु व्यस्तताके कारण खण्डित भेल अछि। आशा करैत छी जे निकट भविष्य में रिक्त स्थान के भरब। जेना किछु समय पहिने कहने रही जे आखिर मैथिल एतेक विद्वान्‌ रहितो मिथिला विपन्न किऐक अछि, एहि पर विचार देल जाउ… एहि क्रममें किछु मित्र बहुत सटीक बात कहलखिन जे अभिमान भेला के कारण मैथिल अपन आगाँमें दोसरके मोजर नहि दैत छथिन आ अहिनामें ओ अपन ऐश्वर्य तऽ दूर अस्मिता तक के सुरक्षा में चूक करैत मिथिलाके विपन्न बनौने छथि।

संयोगवश सुन्दरकाण्डके पाठमें आजुक प्रसंग अछि जे रावणक दूत शूक वापस अबैत छथि आ रावणसँ कैल गुप्तचरी के संग अन्य यथार्थ परिस्थिके जानकारी दैत छथि… जखनहि सुनबैत छथि जे विभीषणजी केर सलाह अनुसार श्रीरामचन्द्र समुद्र सँ रास्ता लेल प्रार्थना कय रहल छथि कि रावण अपन प्रख्यात अट्टहास करैत कहय लगैछ.. भऽ गेलौ-भऽ गेलौ… जखनहि सचिव बनेलकौ डरपोक विभीषण के तऽ ओकर ऐश्वर्य आ जीत कोना हेतौक से बुझा गेल…! गौर करय जोग बात छैक जे लक्ष्मणजीके दू टूक बात के असर ओकर भितर मन पर खूब जोर सऽ पड़ल छलैक… लेकिन अभिमानके फूइस धार एहेन होइत छैक जे लोक सही निर्णय नहि कय के पुनः-पुनः अपन अक्खड़पन सऽ गलत निर्णय पर अमादा होइछ आ एना स्वयं आत्मघाती कदम उठाबैछ। रावण सेहो पण्डित छल, त्रिकालदर्शी सेहो मानैत छैक लोक विभिन्न मनोधारणामें रावण के! तखन रावण कोना परस्त्रीके अपहरण करैत घोर पापके भागी बनल आ एक साधारण राजाके रूपमें परमात्मा राम द्वारा मुक्ति पौलक – एहि रामायणमें एहेन कोनो बात छूपल नहि छैक – के नहि बुझौलक रावण के… हनुमानजी, विभीषणजी, मंदोदरी, माल्यवंत, आ आब शूक सेहो बुझा रहल छैक जे लक्ष्मणजीके पत्रके गंभीरतापूर्वक लेल जाउ… लेकिन के मानैत अछि? उलटे शूक के सेहो पूर्वमें विभीषणके समान परित्याग करैत अछि रावण।

कहीं वास्तवमें मिथिला के लोक में रावणी अहंकार के प्रविष्टी एकर ऐश्वर्यके पराजयके कारण तऽ नहि? एहि संयोगपर हम छगुनतामें पड़ल छी आ आत्मनिरीक्षण करय लेल समय माँगैत छी। अहुँ सभसँ निवेदन करैत छी जे कनेक एहि विन्दु पर सेहो सोचल जाउ।

जय मैथिली! जय मिथिला!

हरिः हरः!

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१२ अप्रैल २०१२

April 12, 2012.

To:
The President
Bharatiya Janata Party
11, Ashoka Road,
New Delhi – 110 001,
India.
Phone: 011-23005700.

Honorable Sir,

We, in Mithila, feel very sad to learn from your press release on dated April 10, 2012 whereby The Central Election Committee of the Bharatiya Janata Party after meeting under the Presidentship of Shri Nitin Gadkari has decided the following names for the ensuing Biennial Elections to the State Legislative Council (Vidhan Parishad).

1. Shri Sushil Kumar Modi
2. Shri Mangal Pandey
3. Shri Lal Babu Prasad
4. Shri Satyendra Kushwah

In above the sitting Chairman of Bihar Legislative Assembly – Pt. Tarakant Jha has not been given the extension to contest the above election and it appears to us that Party has cornered such a vigorous leader from Mithila due to internal politics – whatever – please clarify the position to console the Maithils for how such a strong leader of BJP from Mithila who sacrificed lifetime for party rewarded an outward way from the honorary position and so from the commitments he has made to people of Mithila and Bihar still outstanding and so the expectations still remain very high from him. We understand from our leader that everything the higher leaderships do for betterment of people primarily – of course for party and its rules; but whatever else for honoring the dignity of such an esteemed leader could have been thought – please address this concerns of ours as soon as possible. May this decision not prove the insults to such a dedicated leader and brilliant son of Mithila. We heartily wish party line would take care on this sincere appeal from us – Mithilabaasi.

Thanking you,

Yours sincerely,

Pravin N. Choudhary

Harih Harah!

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Thanks Nitish! This is the real leadership we wish everyone should have in self. Word is word!! You must go to Mumbai and indeed the program is not to show down on Maharashtrian rather show that Biharis live in Maharashtra with rights and morals both. Biharis are not beggars who merely pollute the roads of Mumbai or anywhere in the world – but they truly work hard and establish themselves with full of deserving and diligence. MNS or any other party has no right to intervene in peaceful celebration of one’s own culture, wherever in India or abroad they live. That is the sovereignty. That is the freedom. India is not a colony of anyone. Why Maharashtra or Assam rebel Biharis residing with their hard labors for mere wages for survival. That is their basic rights. Live and let live.

Again, some of the guys from Mithila may not confuse that supporting this cause of Bihar at Mumbai mean degrading my honor for Mithila. I am sad still to see how guys work against Maithils. This is again a note for you to feel embarrassed for whatever internal politics could throw our gigantic leader Pt. Tarakant Jha. Come forward! Show your guts!! How strong and united you are really. Moments to see your power!! 

Thanks and love for all. 

http://www.livehindustan.com/news/desh/deshlocalnews/article1-story-39-0-227920.html&locatiopnvalue=22

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१३ अप्रैल २०१२

सौराठ सभा फेर किऐक?

वैवाहिक पद्धति मैथिल ब्राह्मण के विश्वमें सभ सँ श्रेष्ठ कोना?

मैथिल ब्राह्मण के कुशाग्रता के मूल रहस्य कि?

आइ-काल्हि संसारमें भ्रष्टाचार के प्रकोप पराकाष्ठा पर किऐक?

बहुत रास प्रश्न छैक जाहि पर हम अहाँ सभ के अपन तरहें अनुसन्धान करैत समय-समय पर किछु जानकारी उपलब्ध करबैत आयल छी आ निम्न पोस्टमें संतानोत्पत्ति में सेहो किछु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात के जानकारी राखब सभके लेल श्रेष्ठ होयत। एहिमें स्रोत व्यक्ति श्री यशेन्द्र प्रसादजी छथि जे सौराठ सभा पर बहुत गहरा अनुसन्धान सेहो केने छथि आ संसार केँ एहि सँ परिचित कराबय लेल एक हाई-डेफिनिशन फिल्म बनाबय लेल इच्छा रखैत छथि आ एहि में विश्व-स्तरपर प्रचार चाहनिहार यदि केओ होइ तऽ अवश्य हुनका संग सम्पर्क करैत एहि फिल्ममें प्रायोजक के स्थान ग्रहण करी आ एहि सुन्दर योजना के सफलता प्रदान करी। Yashendra Prasad जी संयोगवश फेशबुक पर उपलब्ध छथि। एहि विषयमें मिथिला सुप्रसिद्ध नेतृत्वकर्ता पंडित ताराकान्त झा संग सेहो विस्तृत विचार कैल गेल अछि। अनुसन्धानमें आरो सहयोग लेल मिथिला के महान्‌ विभुति श्री हेतुकर झा संग सेहो भेंटघाँट कैल गेल आ चर्चा कैल गेल। अनेको तरहक पंजी-पुस्तिका सभ पर अध्ययन कैल गेल। तदोपरान्त अमेरिकामें रहैत सौराठ सभा आ पंजी परंपरा पर शोधकर्ता श्री इन्द्रानन्द झा संग सेहो आवश्यक सल्लाह-मशवरा कैल गेल। समस्त संयोजन के काज श्री निलाम्बर मिश्र (रहिका) द्वारा करैत बात बहुत आगू तक बढल अछि। आवश्यकता अछि जे व्यवसायिक रूपमें एहि योजना संग जुड़निहार के खोज करी हमरा लोकनि। एहि में अहुँके सहयोग अपरिहार्य बुझैछ।

आकांक्षी – प्रवीण
एवं समस्त दहेज मुक्त मिथिला परिवार।

पुनश्च: एहि बेर सौराठ सभा २१ जुन सँ|

Harih Harah!

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१४ अप्रैल २०१२

समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध और समुद्र की विनती, श्री राम गुणगान की महिमा

दोहा :
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥57॥

भावार्थ:-इधर तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्री रामजी क्रोध सहित बोले- बिना भय के प्रीति नहीं होती!॥57॥

चौपाई :
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति। सहज कृपन सन सुंदर नीति॥1॥

भावार्थ:-हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूँ। मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूस से सुंदर नीति (उदारता का उपदेश),॥1॥

ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥2॥

भावार्थ:-ममता में फँसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शम (शांति) की बात और कामी से भगवान्‌ की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसर में बीज बोने से होता है (अर्थात्‌ ऊसर में बीज बोने की भाँति यह सब व्यर्थ जाता है)॥2॥

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥3॥

भावार्थ:-ऐसा कहकर श्री रघुनाथजी ने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मणजी के मन को बहुत अच्छा लगा। प्रभु ने भयानक (अग्नि) बाण संधान किया, जिससे समुद्र के हृदय के अंदर अग्नि की ज्वाला उठी॥3॥

मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥4॥

भावार्थ:-मगर, साँप तथा मछलियों के समूह व्याकुल हो गए। जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना, तब सोने के थाल में अनेक मणियों (रत्नों) को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप में आया॥4॥

दोहा :
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥58॥

भावार्थ:-(काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) हे गरुड़जी! सुनिए, चाहे कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, पर केला तो काटने पर ही फलता है। नीच विनय से नहीं मानता, वह डाँटने पर ही झुकता है (रास्ते पर आता है)॥58॥

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥1॥

भावार्थ:-समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर कहा- हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिए। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है॥1॥

तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥2॥

भावार्थ:-आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिए उत्पन्न किया है, सब ग्रंथों ने यही गाया है। जिसके लिए स्वामी की जैसी आज्ञा है, वह उसी प्रकार से रहने में सुख पाता है॥2॥

प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥3॥

भावार्थ:-प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा (दंड) दी, किंतु मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी ही बनाई हुई है। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री- ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं॥3॥

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥4॥

भावार्थ:-प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जाएगी, इसमें मेरी बड़ाई नहीं है (मेरी मर्यादा नहीं रहेगी)। तथापि प्रभु की आज्ञा अपेल है (अर्थात्‌ आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं हो सकता) ऐसा वेद गाते हैं। अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूँ॥4॥

दोहा :
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥59॥

भावार्थ:-समुद्र के अत्यंत विनीत वचन सुनकर कृपालु श्री रामजी ने मुस्कुराकर कहा- हे तात! जिस प्रकार वानरों की सेना पार उतर जाए, वह उपाय बताओ॥59॥

चौपाई :
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥1॥

भावार्थ:-(समुद्र ने कहा)) हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपन में ऋषि से आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श कर लेने से ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जाएँगे॥1॥

मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥2॥

भावार्थ:-मैं भी प्रभु की प्रभुता को हृदय में धारण कर अपने बल के अनुसार (जहाँ तक मुझसे बन पड़ेगा) सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्र को बँधाइए, जिससे तीनों लोकों में आपका सुंदर यश गाया जाए॥2॥

एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥3॥

भावार्थ:-इस बाण से मेरे उत्तर तट पर रहने वाले पाप के राशि दुष्ट मनुष्यों का वध कीजिए। कृपालु और रणधीर श्री रामजी ने समुद्र के मन की पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया (अर्थात्‌ बाण से उन दुष्टों का वध कर दिया)॥3॥

देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥4॥

भावार्थ:-श्री रामजी का भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुखी हो गया। उसने उन दुष्टों का सारा चरित्र प्रभु को कह सुनाया। फिर चरणों की वंदना करके समुद्र चला गया॥4॥

छंद :
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥

भावार्थ:-समुद्र अपने घर चला गया, श्री रघुनाथजी को यह मत (उसकी सलाह) अच्छा लगा। यह चरित्र कलियुग के पापों को हरने वाला है, इसे तुलसीदास ने अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है। श्री रघुनाथजी के गुण समूह सुख के धाम, संदेह का नाश करने वाले और विषाद का दमन करने वाले हैं। अरे मूर्ख मन! तू संसार का सब आशा-भरोसा त्यागकर निरंतर इन्हें गा और सुन।

दोहा :
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥60॥

भावार्थ:-श्री रघुनाथजी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों का देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य साधन) के ही भवसागर को तर जाएँगे॥60॥

मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम
श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पंचमः सोपानः
Om Tatsat!!

कलियुग के समस्त पापों का नाश करने वाले श्री रामचरित मानस का यह पाँचवाँ सोपान – Harih Harah!

(सुंदरकाण्ड) – Om Tatsat!

Harih Harah!

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आइ समस्त मिथिलावासी जे फेसबुक पर छथि ओ देखलथि जे किछु लोक केहेन गन्दा कार्य में संलिप्त छथि। प्रवीण ना. चौधरी के ऊपर कोन तरहें किछु लोक थाल फेकलथि…. ओहो जुड़ि शीतल के दिन! ताहि में मूल पूनम मंडल छलीह। ओ थाल कोनो खेल नहि छल। हम बहुत आहत छी। आ, आइ दोसर दिन फेर ओ थाल प्रीति ठाकुर सेहो फेकलीह। सभ ग्रुप पर ई तमाशा भेल। ईन्टरपोल सऽ प्रवीण के जेल देबय के बात सेहो भेल। पता नहि हमर एहेन कोन अपराध भेल!

ेकिन हुनकर आरोप में ई बात सत्य छन्हि जे किशोर एन.सी. हमरहि आइ.डी. छी, आ ई बात के जानकारी हम स्नेह आ आदर सहित श्री गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अन्चिन्हार समेत अनेको मैथिल के पहिले दय चुकल छी। एहि में चन्दन झा, कृष्णानन्द चौधरी आ बहुत… lok chhathi…!

Takhan achaanak ehen hamalaa kathi lel? E sabh Maithil ke puraan gandaa aadait me abait achhi. Je shuddh Maithil chhathi o aaiyo America ke Phoenix sa phone karait chhathi je ham sabh nik cause par kaarya kay rahal chhi aa ehi tarahe kaarya ke aagu badhaabait rahi. Lekin e chhadma ID ke sang khelwaar kenihaar kichhu tathaakathit nik lok aakhir ehen bataah kiyaik hoit chhathi.

Ham kichhu samay ke yaachanaa karait chhi, lok paachhu laagi gel chhanhi aa jaahi tarahe sarakaari pad ke durupyog karait e vyaktitva sabh swayam aapas me bhiraik lel vyagra chhathi se bhandaafor ham jaldi karab.

Harih Harah!

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१६ अप्रैल २०१२

विवाह समान पवित्र सम्बन्ध दू आत्माके एक बनाबैक लेल – दू शरीर के एक पूर्ण शरीर – शिव आ शक्ति स्वरूप बनाबय लेल होइछ। एहि में जौं आधार – बुनियाद माँगरूपी या दबावपूर्ण दहेज के बल पर राखल जेतैक तऽ स्वतः दुनू आत्मामें पवित्र सम्बन्ध बनिये नहि सकैत छैक। ओ दू आत्मा कदापि पवित्र सम्बन्ध निर्माण नहि कय सकैत अछि। आइ जे भ्रष्टाचारी आ अनाचार एतेक जोर पर छैक तेकर मूल कारण यैह छैक जे विवाह के पवित्रता के भंग कैल जा रहल छैक। लोक अपन धनक अहंकार आ वासना के कारण विवाह एहि लेल नहि जे स्वच्छ सम्बन्ध बनबैत अपन अगिला पीढीके आरो नीक स्वच्छता प्रदान करैक लेल सोचैत छथि, बल्कि एतबी चिन्ता सभ के खेने जा रहल छैक जे कोनो बयवे अकूत संपत्ति के स्वामी बनी – एहि लेल बेटीके बाप भले अपन सर्वस्व किऐक नहि निलाम करा लैथ – सुइद पर पैसा उठाके किऐक नहि हो लेकिन खूब रास दहेज दैथ, साँठ दैथ आ संगहि अपन सभटा पाप के भागीदार – सभ ग्रह के उपद्रवी शक्ति सेहो कपार पर पठा दैथि…! एहि बात पर सुसंस्कृत परिवार कदापि अपन सम्बन्धीके लेल दबावमूलक कोनो माँग नहि रखैत छथि आ तही लेल उच्च वर्गके सुसंस्कृत लोक कहैत छथि। लेकिन एहेन उच्चवर्गीय सुसंस्कृत लोक के संख्यामें बहुत पैघ कमी आबि गेल छैक।

कि अहाँ उच्चवर्गीय पैसा सऽ बनब या संस्कार सऽ? मनन करू।

जे संस्कार सऽ बनब, हुनका सँ निवेदन अछि जे अपन एक स्वतन्त्र समाज के निर्माण करू। एकर नाम दियौक दहेज मुक्त मिथिला। अपन धिया-पुता के कुटमैती एहने परिवार में करू जे दहेज मुक्त मिथिलाके सदस्य होइथ। लालची आ लोभी सऽ संगत कदापि सुरक्षित नहि आ अगिला पीढी सेहो उपद्रवी आ घोर लालची आयत। बचू एहि कदाचार सँ। अहाँ सभ के सुविधाके लेल एक वेबसाइट बनौलनि अछि किछु युवा-समाज मिलि के, जिनकर आह्वान छन्हि जे अहाँ मात्र शपथ खाउ। संसार के पंचायती आ बहस छोड़ू। बस अहाँ ई शपथ लियऽ जे “हम नहि माँगरूपी दहेज लेब, नहि देब। नहि धिया-पुतामें लेब वा देब। आ नहिये जे केओ एहेन सम्बन्ध बनेता, ओहेन कोनो उत्सवमें सहभागी बनब।’ एहि शपथ lenihaar – please join and make your free society to interact. Let us get your bio-data to provide to several other interested families. You all can interact with one another. Please register at: www.dahejmuktmithila.org and inform about this to all your friends and families.

Best regards/Pravin
& Dahej Mukt Mithila Pariwaar.

Harih Harah!

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१८ अप्रैल २०१२

Gajendra Thakur
December 29, 2011
Gajendra Thakur

pravin ji, namaskaar.

“videha” ken ham edit group kay ka closed sa open karbaak prayaas keliyai, mudaa o option facebook dvaara puraan group ke nai del gel chhai praayah, jahiya del jetai tahiya ekara open group kay del jetai..

nichuka link click kay videha facebook group join kayal jaay
https://www.facebook.com/groups/videha/

saadar
Videha www.videha.co.in
वि दे ह- http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका (ISSN 2229-547X VIDEHA) विदेह २००८ ई. सँ अछि, ई मैथिलीक फेसबुकपर सभसँ पुरान ग्रुप अछि, आ ओ पुरान फॉर्मेटमे छल…
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Pravin Narayan Choudhary
December 29, 2011
Pravin Narayan Choudhary

Sir, Namaskaar! Ham ohitham chhi. Kishore NC hamare ID chhi aa kichhu kaaj intentionally alag roop me karay parait chhaik. Technical yug thikaik. Bahut badhiya gatividhi aa management sa Videh ke etek duri tak apane aanal aa ekar bhavishya aaguwo ham badhiya dekhi rahal chhi. Hamar yogdaan pura rahat.

Jaan da debay, praan da debay!
Mithila ke Maan-Sammaan La – Aasmaan Tauli Lebay!!

Saadar – sadaiv Maithil lel – Pravin
Gajendra Thakur
December 31, 2011
Gajendra Thakur

प्रवीणजी, विदेहक नव अंकमे अहाँक किछु कविता दऽ रहल छी, सादर..गजेन्द्र
Pravin Narayan Choudhary
December 31, 2011
Pravin Narayan Choudhary

Dhanyavaad Sir! E ta hamara lel nav varsh ke ek mahattvapoorn aashirvaad hoyat. Aha sabh ke sahamati hoyat ta hamhu ek pustak prakaashit karay lel sochab.

Harih Harah!!
Pravin Narayan Choudhary
January 4
Pravin Narayan Choudhary

Apanek jaankaari lel – bahut dukhi bha ke nimna soochna preshit kay rahal chhi, kasam se!! [:(]

बहुत आशा छल जे विदेह पर विधान के सम्मान हेतैक,
मनमानीके तरीका छोड़ि प्रजातंत्र के पूरा अरमान हेतैक!

अफसोस, काल्हि रात्रिकाल ग्रुप के एडमिन श्री उमेश मंडल जी द्वारा बिना पूर्व सूचना किछु पोस्ट मेटा देल गेल। जे पोस्टमें कोनो आयोजन प्रति आवश्यक कमजोरी सभके लेल किछु विन्दु उठायल गेल छल आ संगहि ताहि त्रुटिके सुधार करैत एक सुन्दर समारोह लेल मंशा जाहिर कैल गेल छल। जहाँतक स्मरण अछि जे ओ पोस्ट ग्रुपके किछु सम्माननीय सदस्यगण द्वारा समर्थन लाइकरूपमें सेहो कैल गेल छल – श्री अनिल मल्लिकजी हमरा स्मृतिमें छथि। श्री कृष्णानन्द चौधरीके सेहो किछु कमेन्ट ताहिके संग आ मिथिला-मैथिलीके सम्मानवृद्धिके लेल वास्तविकताके अनुपालनक अनुशंसा के संग आयल छल। एक बेर आरो स्पष्ट कय दी जे कोनो विन्दुपर जखन स्वस्थ बहस लेल कोनो बात उठैक तेकरा समुचित स्थान नहि देबैक आ अपन मन-मर्जी के अनुरूप मेटाबयके हथियार प्रयोग करबैक तऽ एहिमें स्पष्ट भेलैक जे तर्कसंगत आ न्याय नहि हेतैक। पता नहि, उमेशजी संग एहि लेल निजी पत्राचार द्वारा प्रश्न सेहो उठायल मुदा ओ एखन धरि चुप छथि। खैर….! एहेन घटनाके हम अत्याचार मानैत श्री गजेन्द्र ठाकुरजी जिनक आमंत्रणपर हम पुनः इ ग्रुप ज्वाइन केने रही हुनकर न्यायपूर्ण समाधान तक पुनः एको पोस्ट नहि कय सकब, नहि जाइन जे किनको पसिन्न पड़तनि ओ ीक आ जे पसिन्न सऽ बाहर हेतैक ओ बेठीक। तखन… समय के बर्बादी उचित नहि।

धन्यवाद!

हरिः हरः!

पुनश्च: अहिंसात्मक प्रतिकार स्वरूप आ समुचित ज्ञान हेतु हमहुँ अपन लगानी कैल समस्त समय आ अपन visheshaadhikaar ke prayog pratikriyaswaroop karait apan sabh post delete karait Umesh Mandal Jee ke agrim sahayog kayalahu, muda o sabh post ke record surakshit achhi kaaran ohi me bahut gota ke bahut yogadaan chhalanhi aa taahi ke sammaan hoyab jaruri chhal. Tadaapi, yadi kinko hamar ehi reaction sa kashta pahuchal hoy ta maaf karab. Lekin prejudiced minded action lel shrewd minded reaction ke avenge kahal gel chhaik, by course of law, it is natural reaction.
Gajendra Thakur
January 8
Gajendra Thakur

ham akhan gaam dis chhi, tila sankranti dhari ghurab aa pher lagaataar net par rahab, aai mushkil sa kichhu kaal lel net par aayal chhi, net bad slow chhai..umesh ji sa gap ham kelau, confusion me comment delete bhay gel chhal, generally videha me comment delete nai kayal jaai chhai..ahan apan post videha me denai shuroo karoo, kono tarahak kono dikkat nai chhai..saadar

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अत्यन्त महत्त्वपूर्ण जानकारी!

(फेक आइडी आ रियल आइडी में फर्क पर प्रकाश)

सच कहैत छी हृदय सँ बन्धु मानब एकरा सूचना यौ
फेसबुक पर किछेक कुकृत्य सऽ जुनि बूझी दुर्घटना यौ!

एक बेर पहिले सेहो ई प्रकरण आयल छल फेसबुक पर हमरा तरफ सँ, आ एहि बेरका प्रकरण तऽ आरो गंभीर आ अत्यन्त जरुरी अछि जे संसार के बुझबाक चाही। एहि समाचार के हम एकदम लीक करय लेल नहि चाहैत रही। ई समाचार हमरा लग पछिला साल सेप्टेम्बर सऽ अछि। लेकिन जे व्यक्ति एहि में फँसल छथि ओ हमरा लेल एक आदरणीय लोक छथि। हमरा कतबू बेजा लागत तऽ आदरणीय के आदरमें कहियो कमी नहि आबय देब। आइ जे हम ई समाचार सार्वजनिक कय रहल छी से केवल मजबूरी में। आइ किछु दिन सँ (जुड़िशीतल दिनसँ प्रायः) – विदेह के ओ समस्त उत्तरदायी समूह शायद हमरा प्रति अपन विद्वेष के जगजाहिर कय रहल छथि आ किछु उग्रपंथीके सहारा लऽ के करब कदापि उचित नहि लागि रहल अछि। पहिले तऽ एकरा मैथिल केर सामान्य खंडी प्रकृति बुझैत हम दरकिनार करैत रहलहुँ, लेकिन आब ई स्पष्ट भऽ गेल अछि जे आखिर कहानी किऐक एहि प्रकारें फेसबुक के सुविधा के दुरुपयोग करैत दोसर पर गंदगी फेकल जा रहल अछि।

१. सर्वप्रथम स्मरण कराबी – लगभग २०११ के जनबरी सऽ हम फेसबुक पर सक्रिय छी – बहुत सुखी भेलहुँ जखन देखलियैक जे फेसबुक पर सभ आदरणीय मैथिल – मित्र – बंधु – परिवार के लोक सभ मौजूद छथि आ संचार के आधुनिक युगमें अपन विचार सँ दोसरके अवगत राखय लेल ई नीक साधन थिकैक, एकर प्रयोग कैल जाय।

२. संयोगवश किछु सार्थक मुद्दा सेहो सामने आयल – जेना दहेज मुक्त मिथिला – सौराठ सभा पुनरुत्थान आ धरोहर के संरक्षण आदि। सहसा फेसबुक के दुनिया एहि सार्थक कदम के एतेक पैघ सराहना करय लगलनि जे आभासी दुनिया सँ निकैल हम सभ सार्थक धरातल पर सक्रिय भेलहुँ। सौराठ सभा लागल – ओतय विचार गोष्ठी राखल गेल – मिडिया आ पर्यटक समूचा हिन्दुस्तान आ नेपाल सऽ एहि विन्दु पर पहुँचलाह। भारत के राष्ट्रीय खबर – नेपाल के राष्ट्रीय खबर बनल। जोश बढल। अगिला समय आरो एहेन समाज के जोड़यवाला कार्य करब से विचार बनैत गेल। कदम बढैत गेल।

३. आइ-काल्हि यदि अहाँ सार्थक काज करैत समाज के एक दिशा देबाक कोशिस करब तऽ बहुत लोक अहाँके अनेक तरहें हतोत्साह करैक प्रयास करता। ओ अपन बुद्धि, तर्क, कुटिलता, आदि सँ कार्य रोकैक अथक चेष्टा सेहो करता। एहि में कतहु दू मत नहि जे यदा-कदा हुनकर क्रियाकलाप के चलते कार्य करनिहार के नीक दिशा-निर्देशन आ कार्यक्षमता में आरो प्रवर्धन होइत छैक, लेकिन नकारात्मक बात आखिर नकारात्मक रहैत छैक।

४. विदेह नामक एक ग्रुप पर हमरो जोड़ल गेल छल आ ओतय बेसी काल गजेन्द्र ठाकुर (तथाकथित सम्पादक) किछु तस्वीर पोस्ट करैथ आ ओहिपर दुनिया याने सदस्य के कहैथ हाइकू लिखू। तखन पूछला पर हमरा सभके बुझबैथ जे हाइकू माने कि होइत छैक। लेकिन सामान्य साहित्य-धार में नव-विधा जोड़य लेल उत्साही ठाकुर के संग देनिहार किछु गानल-चुनल साहित्यकार सभ छलाह ताहि समयमें, कारण मुश्किल सऽ २०० के आसपास कुल सदस्य, ताहू में १९० गो निष्क्रिय रहैत छलैथ। लेकिन अन्य-अन्य रचना सभ अबैत रहैत छलैक। किछु सार्थक उपाय जे यथार्थ के धरातल पर कार्य करबाक लेल होइक से कहैत छलियैक हम सभ, एहि पर एगो पकल-पकायल बात कहि देल जाइत छल जे ओ ग्रुप केवल साहित्य के पोषण लेल अछि आ अन्य कार्य के लेल नहि। फेर ओ क्लोज्ड ग्रुप सेहो रहैक… हमर स्वभाव के अनुरूप नहि छल ताहि लऽ के हम छोड़ि देने रही।

५. लेकिन बादमें केओ कहलक जे आब विदेह पर हाइकू नहि, बल्कि कविता, कथा, गजल, आदि आबि रहल छैक… सिद्धान्त सऽ बान्हल लोक हम अपन रेगुलर आइडी एहि में उपयोग में नहि आनि अपन दोसर पुरान आइडी जे हमर पुकारू नाम याने किशोर के नाम सँ अछि ताहि के द्वारा रिक्वेस्ट पठा के ज्वाइन केने रही। आ कहियो कोनो तरहक सहभागिता नहि रहल ताबत जाबत फेर किछु समाजक उपद्रवी तत्त्वके ओहिठाम सक्रिय देखलहुँ। किछु उत्पाती बात करैत देखलहुँ। ओना हम मैनेजमेन्ट के ओ फंडा जे लड़कीके नाम सऽ आइडी बनबैत लोक के फ्रेण्डलिस्टमें जुड़ैत पुनः अपन इच्छानुसार ग्रुपके सदस्य बनबैत ग्रुपके संख्याबल अनुरूप दंभ भरब पर पहिले भंडाफोड़ कय चुकल छलहुँ, बिलकुल वैह बात विदेह पर होइत देखलहुँ। लेकिन नीक कार्य लेल किछु गलतो होइत छैक तऽ आँखि मुनि लेने रही। तखन ब्राह्मण जाति पर लांछणा – कर्मठ लोक पर आंगूर… ई नीक नहि लागल तऽ किशोर के तरफ सऽ रचना सभ पोस्ट करय लगलहुँ।

६. रचना एहने होइत छैक जे फुसियाहा के कटकटा के लगैत छैक – से लगलैक आ क्रमशः गजेन्द्रजी के एक पत्र आयल जे निचां संलग्न केने छी। हमरा एना बुझायल जे आब विदेह में सुधार आयल छैक आ श्रेष्ठ प्रति आदर कहियो कम नहि करैत छी, भले ओ नंगटइ करैथ, लेकिन भैया तऽ भैये रहता – से सोचि हम हुनका जानकारी देलियैन जे हम विदेह पर छी। प्रायः यैह जानकारी जे हम किशोर नाम सऽ विदेह पर छी से आशीष अन्चिन्हार के पत्र के जबाबमें सेहो देलियैन। यदि पत्राचार के कपी चाही तऽ प्रेषित करब।

७. तखन रवैयामें कतहु कमी नहि अयलन्हि आ उमेश, पुनम, प्रियंका, अरविन्द, संजय, आ अनेको नाम जेकर अन्त पिछड़ा वर्ग, दलित, आदि के नाम सऽ होइत छैक एहेन अनेको टा आइडी गजेन्द्रजी के अपन विचार अनुसार – अपन सोच अनुसार बनल आ आशीष अन्चिन्हार के मैनेजर नियुक्ति करैत दिल्ली में श्रुति प्रकाशन सऽ पुस्तक प्रकाशित करायल जायत से कहि किछु असल में समर्पित लेखक-नाटककार-रचनाकार जेना जे.पी. मंडल, बेचन ठाकुर, उमेश पासवान, उमेश मंडल, सुभाष चन्द्र यादव, मनोज कर्ण, एवं अन्य के संगतिया बनबैत स्वयं के नेतृत्वकर्ता मानि साहित्य अकादमी पर आंगूर तऽ ओकर संयोजनकर्तापर आंगूर … एवम्‌ प्रकारेन्‌ स्वयंके लाइमलाइटमें राखैक नायाब तरीका सभ अपनाबैत विदेह एवं फेक आइडीके टीम बाकायदा मैनेजर आशीष अन्चिन्हार, प्रीति ठाकुर, पुनम मंडल, प्रियंका झा, उमेश मंडल आदि के संग दोकानदारी के ब्यवस्थापन कैल गेल।

८. हालहि एक विदेह नाट्य महोत्सव एक पब्लिक स्कूल के ब्यवस्थापक पक्ष के लगानीमें विद्यालयमें कराबय के संयोजक बेचन ठाकुर लैत गाम-घरमें सरस्वती पूजा के उपलक्ष्य एक उत्सवके रूपमें मनायल गेल आ ताहिमें पर्यन्त अनेको बात के जातीयता के नारा संग जोड़ि समूचा फेसबुक पर शब्दाडंबर के संग प्रेषित कैल गेल। कन्हा कुकूर माँड़हि तिरपित… तर्ज पर अपने सँ अपन पीठ थपथपाबैत गजेन्द्र जी एवं बेचन जी आदि एहि नाटक के दृश्य सभ जखन पोस्ट केलाह तऽ देखयमें आयल जे सचमुच के ओ नाट्य समारोह केहेन छल। एक मैथिली शुभेच्छुक श्री श्याम सुन्दर श्याम जे सिमरा (झंझारपुर) निवासी छथि आ सुप्रसिद्ध कलाकार सेहो, हुनका संग अप्रत्यक्ष रिपोर्ट लेला पर सभ बात स्पष्ट भेल। बेचनजी अवश्य रुचि लेनिहार आ कर्मठ लोक छथि, लेकिन हुनकर भाषा में जातीयता के गन्ध आ ब्राह्मण संग ईर्ष्या हमरा अन्य घृणाकर्ता समान बुझायल आ एहि बात के हम कहियो समर्थन नहि कयलहुँ, उलटा बहुत रास प्रश्न जरुर पूछने रहियैन जेकर घुम-घुमौआ जबाब देने छलाह। लेकिन एहि में दू मत नहि जे गाम-घरमें काज करय लेल कठिनाई के सामना करैतो बेचन जी विदेह के नाम जोड़ैत नीक कयलन्हि। एहि लेल हम बहुत प्रशंसा के पोस्ट सभ ठाम केने रही। आइयो धन्यवाद दैत छियन्हि।

९. विदेह पर अन्तिम समय यैह देखल जे लगातार एहेन भाषा के प्रयोग कैल गेल जे एक विकसित वर्ग याने मैथिल ब्राह्मण ऊपर लांछणायुक्त वचन के प्रयोग करैत रहल… जखन कि ओतय आइयो अधिकांश लोक ब्राह्मण छथि… तखन एकर कारण कि..? ई काज सभ तऽ छुद्र राजनीतिकर्मी सभ के होइछ। बेशक! हमर संदेह सच निकलल। राजनीति के आ कियैक आ कोन आधार पर करैछ सेहो जानकारी अहाँ सभ के देब।

१०. जे केओ एहि पाखण्ड के विरोध करब ओ गजेरी बनब – ओकर नाम के सूची तैयार होयत आ सभ ग्रुप पर सभके वालपर टैग कऽ देल जायत। बहिरा नाचय अपनहि ताले!  लेकिन एहि सँ पोल-खोल बन्द नहि होयत। समूचा फेसबुक सहसा जागत आ एहि बूड़ि मूढात्मा सभ के सत्यके आ कर्म के राह पर जल्दी आनत।

सुखी रहू! प्रसन्न रहू! एकरा मैथिल के दोसर मैथिल प्रति विद्वेष भाव नहि बूझब। एकदम मजबूरी में लिखि रहल छी। आ अगिला अंक जे आयत ओ किछु अहू सऽ वीभत्स रहत। लेकिन एहि सभ के परिणाम नीक अवश्य होयत।

क्रमशः…

हरिः हरः!

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१९ अप्रैल २०१२

मित्र-बंधु-सखा-श्रेष्ठ समस्त मैथिल सँ हार्दिक अपील!

मिथिलाक पाग अछि खतरा में
खुरापाती धियापुता के कारण!
चर्चा बहुत जरुरी करी मिलि
हम सभ मिथिला के पोषण!

पाग याने माथ के मुकुट – अपन इज्जत – अपन स्वाभिमान – अपन शान – अपन मान – अपन पहचान – मिथिला के जान!

उपद्रवी तत्त्व सभ जातीयता के खेल करैत मिथिला के एहि सर्वश्रेष्ठ मुकुटमणि पर पर्यन्त फेकि रहल अछि थाल। हम ताहि लेल अनुरोध करैत छी जे समस्त मिथिला के लोक, एतय तक जे पाग प्रति स्वयं सन्देह में रहैत अनका सन्देह स्थापित करैक दुष्प्रयास केनिहार के सेहो एहि विचार गोष्ठीमें सम्मानपूर्वक आमंत्रित करैत छी – आउ आ मिलि के एहि विषय पर प्रत्यक्ष समाज के राय जानी। एहि में समस्त मिथिलांचल के लोक सहभागी बनी। दहेज मुक्त मिथिला एवं सौराठ सभा विकास समिति जे प्रस्तावित ‘जानकी नवमी’ ३० अप्रील के सौराठ सभा में करय लेल जा रहल अछि, ताहि में एक गोष्ठी के सेहो विचार अछि। एहि गोष्ठीमें हम सभ प्रयास कय रहल छी अपन व्यस्त समय सऽ कनेकबो काल लेल महामहोपाध्याय पंडित ताराकान्त बाबु सेहो अपन किछु आशीर्वचन हमरा सभ के लेल दैथ। हलाँकि हुनकर कार्यक्रम लेल जे जानकारी भेटल अछि ताहि अनुसारे ओ गाम आबि रहल छथि आ एहि में सेहो हमरा सभके दर्शन देबाक कार्यक्रम रखलाह छथि। हम सभ बेनीपट्टीके पास हुनकर गाम सेहो जायब, एक जुलूस के रूपमें आ हुनकर उत्साहवर्धन करब जे कतबो केओ केम्हरो केहनो तोड़य के चेष्टा करत, हुनका समान कर्मठ नेता फेर दोसर एहि पृथ्वी पर आइ मिथिला लेल नहि अछि आ हुनकहि एक बेर फेर मिथिला के अग्रगामी निकास लेल आगू बागडोर थामय पड़तैन। हम समस्त मिथिलावासी अपन बुजुर्ग आ सर्वश्रेष्ठ नेता के संग देबाक लेल एक प्रतिनिधि मंडल भेटय जायब।

एजेन्डा:

विचार गोष्ठी लेल विषय:
१. मिथिला के पाग याने श्रेष्ठता के लाज कोना रहत
२. सौराठ सभा २०१२ – समारोह के स्वरूप केहेन
३. मिथिला राज्य लेल नेतृत्वकर्ता के वर्तमान स्वरूप आ आगामी सुधार लेल सुझाव संकलन
४. मिथिला क्षेत्र के समग्र विकास लेल समाजिक कार्यकर्ता के सक्रिय सहभागिता कोना बढत
५. मिथिला के पौराणिक सौहार्द्रता आ आजुक परिवेशमें जातीय-सांप्रदायिकता के प्रभाव पर चर्चा

समीक्षा: श्री श्री १०८ श्री माधवेश्वरनाथ महादेव मन्दिर जे सम्माननीय सभापति (बिहार विधान परिषद्‌) पंडित श्री ताराकान्त झा केर अथक प्रयास सऽ कला-संस्कृति विभाग अन्तर्गत हेरिटेज के रूपमें चिह्नित भेल अछि तेकर जीर्णोद्धार के वर्तमान अबस्था के समीक्षा – आदरणीय श्री निलाम्बर मिश्र – रहिका एवं डा. शेखर चन्द्र मिश्र सौराठ द्वारा।

विशेष अतिथि आ प्रमुख अतिथि के निर्धारण आदरणीय डा. शेखर च. मिश्र संग वार्ता कयला उपरान्त आ कार्यक्रम के विस्तृत तालिका सेहो बादमें दोसर पोस्ट द्वारा सूचित करब।

एक अत्यन्त जरुरी विषय जे मिथिला में दहेज के प्रकोप पर नियंत्रण लेल हर बेटी लेल रोजगार के गारंटी के विषय पर विशाल हस्ताक्षर अभियान के शुरुआत पं. ताराकान्त झा एवं अन्य वरिष्ठ व्यक्तित्व सँ करैत आगाँ हर गाम में लऽ जाय के कार्य जरुर कैल जायत।

हरिः हरः!

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मनन एहि तरहक बात पर जरुरी,
फोटो आ फन में कतेक गानी मूरी!

मनुष्य तऽ मनुष्य होइछ, एहि में कि अन्य पहचान के लालच… ? हिन्दू दर्शन तऽ वसुधैव कुटुम्बकम्‌ – समूचा संसार – वसुधा के अपन कुटुम्ब समान मानैछ। अंग्रेज भारत पर शासन केलक। अंग्रेज सऽ पहिने सेहो अनेको मुसलमान लड़ाका भारत पर आक्रमण करैत भारतीय रियासत सभ पर अपन कब्जा करैत विभिन्न चरणमें शासन चलेलक। कारण कि तऽ? भारत में छोट-छोट रियासत के राज्य रहल आ सब छिटफूट बँटल रहल, एकरा द्वारा ओकरा पर आक्रमण कराबैत बाहरी आक्रमणकारी भारतमें अपन गोटी लाल केलक। एकर अलावे दोसर कोनो कारण हमरा बुझने नहि छैक। जखन एहि विन्दु पर हम सोचैत छी, मनन करैत छी तऽ बुझाइत अछि जे अपन नाम, पहचान, समुदाय, समष्टि, शरीर, सम्पत्ति, विपत्ति… हर वस्तु प्रति एक लगाव होयब मानव के प्रकृति में रहैछ, रहबाक आवश्यकता सेहो छैक। कतबू किछु हम करी, पेटके भोजन देबहे टा पड़त। निज पोषण उपरान्त उत्तरदायित्वके दायरा परिवार, समाज, समुदाय, समष्टि होइत जीवमण्डल तक पहुँचैत छैक।

मेकाले के सम्बोधनमें गौर करू – यैह सिद्धान्त प्रतिपादित करैत अंग्रेज भारत में अंग्रेजी के शिक्षा पद्धति के प्रवेश देलक आ क्रमशः भारत अपन पौराणिक महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक दर्शन के स्वयं परित्याग करैत चैल गेल… आइ विपन्नता कतेक ऊपर छैक से हम सभ जनैत छी।

चेतना जखनहि आबय तखनहि जगलहुँ। जागू मैथिल!

Harih Harah!

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२० अप्रैल २०१२

ऐसे विभिन्न कारणों से गये दिन लोग अबला नारी पर जुर्म ढाते हैं – ऐसे जुर्मोंके पीछे दूसरी भ्रष्ट नारीका हाथ अक्सर देखा गया है। पुरुष अकेला हवसी नहीं हो सकता – उसकी हवसकी आग में घी डालनेका काम कोई कुटिल नारी ही रहती है। वैसे तो नारीका सम्मान केवल इसीलिये सर्वोच्च हो जाता है क्योंकि वही माँ बनती है… पर कुटिल – कपट -भ्रष्ट नारी यदि माँ भी बने तो इस संसार का कल्याण कम और नुकसान ज्यादा होता है – इनके संतान भी अक्सर अपराधी प्रवृत्ति अपनाने वाले ही होते हैं।

देखें ये समाचार – चरित्र खराब होना समाज के लिये कितना घातक है। एक विवाहित पत्नीको पति से कैसे अलग करती है एक दूसरी औरत और फिर न्याय के लिये दौड़ती है तीसरी औरत… समाज और इनका संस्कार कहाँ छुपा हुआ है जो ऐसे घृणित लोगोंको सजा दे, जो मिथिला का पौराणिक परंपरा रहा है और न्याय यहाँ घर-घर बसती आयी है… वो कहाँ छुपी हुई है।

http://www.jagran.com/jagran/article_display.page?locale=1&id=9144911

मंथन योग्य विषय: वैवाहिक परंपरा – अधिकार निर्णय – सिद्धान्त – शुद्ध-सात्त्विक संतानोत्पत्ति!

सौराठ सभा एवं ऐसे ४२ स्थानोंमें आज से करीब ८०० वर्ष पूर्व ही मिथिला के तत्कालीन राजा हरसिंह देव के समय से उनके कुषाग्र बुद्धिमान मंत्रीमंडल और सल्लाहकार ने एक ऐसी प्रथा चलायी जिसका वैज्ञानिक महत्त्व होने के साथ-साथ ऐसे वैवाहिक सम्बन्धों से अगले पीढी सुन्दर, बुद्धिमान, कुषाग्र, सुसंस्कृत एवं हर तरह से इस संसार के लिये कल्याणकारी होना था। लेकिन भ्रष्टाचार कहाँ नहीं होता…. सात्त्विकता गयी, तंत्र टूटता गया… यहाँ भी लोग संस्कार को प्रथम और कुल-पाँजि को प्राथमिकता देने के बजाय खुद को खुले बाजार में बिक जाने के लिये उपलब्ध कराया… यही कारण बना जो सौराठ सभा या अन्य वैवाहिक सभा में दूलहे बिकने लगे, चारों तरफ भ्रष्टाचार व्याप्त हो गया और फिर शुद्ध-सुन्दर परंपरा भी समाजके लिये बढियां करने के जगह अकल्याणकारी होने लगा। आज वो जगह शापित लग रहा है। हमलोग अथक प्रयास कर रहे हैं कि एक बार फिर से मिथिलाकी गरिमामय अस्मिता को पटरी पर लाया जाय। शुद्धता-सात्त्विकता के साथ बिना माँगरूपी दहेज का व्यवहार से वैवाहिक सम्बन्ध कायम हो। अगला पीढी पुनः तेज मस्तिष्क और सुसंस्कृत आये और इस संसार का कल्याण हेतु पुनः मानव-जीवन सम्बन्धित नये-नये शोध जारी हो, प्रगतिके पथ पर सभी आगे चलते रहें। मिथिला जो आदिकाल से करती आ रही है वो आगे जारी रहे।

अफसोस कि आजकल सक्रिय संस्था भी भ्रष्टाचारी में लिप्त है। यदि सात्त्विकता और समाज हित के लिये बिना लाभ अर्जन के उद्देश्य से आप कोई संस्था की स्थापना करेंगे तो लोगोंमें रुचि नहीं जगती क्योंकि इससे अपना जेब गरम तो होना है नहीं, ऊपर से कौन यह झमेला सिर पर ले कि लोगों के आगे हाथ जोड़े – विनती करे – दहेज का विरोध करे – कन्या भ्रूण हत्या का विरोध करे – सभी बेटियों के लिये शिक्षा अनिवार्य करने घर-घर जाय..। युवाओंके उत्कंठा से स्थापित दहेज मुक्त मिथिला नामक संस्था बस कुछेक सक्रिय सदस्योंके साथ इस भार को उठाये वगैर सभीके सहयोग भला कितने दूर तक सफर तय करती है, यह देखने लायक होगा। सच्चाई का जीत अंततः होता ही है, इसी आत्मबल के साथ समाजमें सुधार के लिये आह्वान करते हुए फिलहाल फेसबुक से और सौराठ सभा में कार्य करते हुए यह संस्था मिथिलाको दहेज मुक्त करनेका सपना संजोए हुए है।

हरिः हरः!

(e post Hindi me achhi, je newspaper ke article par comment roop me preshit kene chhi.)

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जातियता के नाम पर संगठन आ स्वयं के ब्राह्मण कहैत कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी जे भारत के हृदयस्थली उत्तर-प्रदेश में हारिक समीक्षा में असन्तुष्ट ब्राह्मण केँ अपन ब्राह्मण होइतो पार्टीके महासचिव बनय के उपमा देलाह – अरे! राहुलजी! अहाँ तऽ ओहिना राजकुमार छी – विरासतमें राजसुख भेटल अछि। भारत के जनता के कहियो प्रजातंत्र के मूल्य बुझऽ देलियैक – कहियो विरोधी दल के एकत्रित रहय देलियैक – सत्ता लेल कि नहि कैल गेल… अन्त-अन्तमें जखन किछु नहि सुझायल तऽ इमरजेन्सी लगा के अपन हिटलरशाही कायम रखलहुँ – अफसोस लेकिन सच जे अपनहि भाइ के खून अपनहि भाइ द्वारा करबाओल गेल – विभिन्न तरहक झोल-झंझैट सऽ भारत में समाजवाद के जैड़ सऽ उखाड़ल गेल। जे केओ समाजवादी बचबो कैल, ओकरा रगमें एहेन सुइया लगा देल गेल जे खाइत-खाइत जानवर के चारा – कोयला – इस्पात – टेलिफोन – सिमकार्ड – खाद-बीज – अलकतरा – आ जानि जे किछु भेटलैक से खेलक। आब तऽ नीक के आ बेजा के… चिन्हब कठिन भऽ गेल अछि। तखन ब्राह्मण के शुद्धीकरण के दौर में फेर ई कि सभ घोषणा कय रहल छी? समुचित संस्कारके बीजारोपण लेल संस्कृत आ मातृभाषा के माध्यम सऽ पढाई के काज करबाउ। हम सभ अहाँके एहि योगदान लेल जय-जय करब।

जय मैथिली! जय मिथिला!

हरिः हरः!

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२२ अप्रैल २०१२

केओ जरय जतेक जरबाक छैक,
केओ मरय जतेक मरबाक छैक,
हम पहिरब पाग! राखब मिथिलाके लाज!
ई हमर पहचान छी राखब एकर लाज,
हम पहिरब पाग! राखब मिथिलाके लाग!

धोती-कुर्ता-अंगपोच्छा के 
रहलै अछि पहिरन प्रधान,
स्वच्छ रहब वा मैट में
लोटायल यैह हमर परिधान,
आब केओ झगड़ा लगबय
जौँ धोती के बनबय लूँगी,
तऽ कहि दी जे मिथिलामें
धोतिये बनै छै ओ लूँगी,
हे! ई सभ फोकटिया के बात भेल!
राजनीति सऽ मेल तोड़ऽ‍ के खेल!

बचू एहेन मानसिकता के लोक सँ,
जेकर नहि कोनो ठौर!
निज घिनाइल अपनहि ओ बतहा,
दोसर के उतारय मौर!
पाग मौर वा पगड़ी मुरेठा,
ई सभ थीक सिरस्त्राण,
जे पहिरि संहार कैल गेल,
संसार सऽ दानवक खान!

के नहि अछि संसार मे जेकरा,
अपन माथ संग प्रेम!
समूचा शरीर के श्रृंगार करब,
सिर के झाँपब क्षेम!
उघरल माथ उच्छृंख मानल,
संस्कृतिक ई अछि हेम!

हरिः हरः!

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२४ अप्रैल २०१२

कतेक प्रसन्नता के बात भेल आ कतेक गरिमा बढल जे हमरे सभ के बीच सँ एक युवा श्री रोशन कुमार झा साहित्य के नाम पर भऽ रहल ढकोसला सँ आजिज भऽ के आब यथार्थ में किछु करय लेल प्रण लेलाह छथि।

हिनकर प्रण कि?

ई चाहैत छथि जे फेसबुक पर हम बहुत मैथिल एकत्रित छी आ हमरा सभ में मैथिली लेखन प्रति बहुत हार्दिक प्रगाढ प्रेम सेहो अछि। किछु लोक एहेन लेखक, कवि, रचनाकार, साहित्य-सेवी सभ के गलत उप
योग करैत अपन प्रकाशन आ पत्रिका सँ जोड़ि फेर मजाक उड़बैत छथि जाति के नाम पर… से एहेन लोक के माकुल जबाब भेटबाक चाही आ एहेन लेखक-रचनाकार सभकेँ लेल एक वास्तविक योजना बनबाक चाही।

हिनकर योजना कि?

ई दू गो योजना बनेलैथ अछि। एक – सर्वप्रथम एक पुरस्कार के घोषणा मैथिली साहित्य सुधा सम्मान जे हरेक प्राकृतिक रचनाकार के सिर्फ अपन रचना के लेल भेटत आ ओ रचना सभ या तऽ मिथिलाक गामघर नामक ग्रुप पर पोस्ट कैल जाय वा mithlakgaam@gmail.com पर अपन फोटो सहित अपन मौलिक रचना के पोस्ट करैथ। रचना में मैथिली के कोनो विधा भऽ सकैत छैक। कथा, कविता, चुटकुला, नाटक, उपन्यास वा कोनो तरहें जे मैथिली भाषा में रचना करैत होइथ से एहि माध्यम सऽ अपन रचना सभ पठा सकैत छथि आ प्रत्येक महीना के उत्कृष्ट रचना जे तीन निर्णायक द्वारा सर्वश्रेष्ठ घोषणा करैत होयत तिनका १००१ रुपैया के नकद पुरस्कार संग प्रमाण पत्र उपलब्ध करायल जायत। ओना ई निर्णायक मंडली पर रहतैन जे कोन महीना कोन विधा के पुरस्कार लेल पसिन्न करता, लेकिन रचना हर विधा के स्वीकार कैल जायत आ पुरस्कार लेल निर्णायक केर बहुमतक फैसला सर्वमान्य होयत। स्मरणीय हो – यदि रचना पहिले कतहु प्रकाशित कैल गेल जा चुकल हो तऽ देलो पुरस्कार वापसी के मामला बनत। अतः रचना पहिल बेर कैल गेल होयबाक अनिवार्यता रहत। निर्णायक मंडली में सम्माननीय चन्द्रमणि झा, सारिका ठाकुर आ हितेन्द्र गुप्ता अपन योगदान देबाक लेल स्वीकृति प्रदान कयलनि अछि। सहयोग सभक वाञ्छित छैक।

दोसर – जे कोनो रचना निर्णायक मंडली द्वारा चुनल जायत तेकरा प्रत्येक महीना मिथिलाक गामघर नामक पत्रिकामें प्रकाशित कैल जायत आ समस्त रचनाकार सभके लेल नव जीवन के शुभकामना संदेश सेहो पठायल जायत। संगहि एहि पत्रिका में विभिन्न प्रकार के मिथिलामुखी योजना आ ताहि पर कार्यान्वयन सभ जे होयत तेकर संक्षिप्त रिपोर्ट सभ प्रकाशित कैल जायत। ई शुरु में केवल ईन्टरनेट पर रहि सकैत अछि, लेकिन क्रमशः प्रिन्टेड रूपमें सेहो प्रकाशित होयत आ मिथिला के हर क्षेत्र में एकरा पहुँचाओल जयबाक इन्तजाम सेहो रहत।

हमर पुरा शुभकामना रोशनजी आ हिनकर ‘मिथिलाक गामघर’ संग अछि आ रहत। खबरदार! जे फेर कोनो गलत राजनीति आ पक्षपातपूर्ण निर्णय होयत तँ हम कि केओ नीक लोक एहि सँ जुड़य लेल परहेज करताह। अतः स्वच्छ आ ईमानदार ढंग सँ हिनका सफलता भेटैन – एहि लेल हम सभ केओ कामना करी।

हरिः हरः!

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२५ अप्रैल २०१२ – बिहार गीत मे मिथिला केँ समुचित स्थान नहि देलाक विरोध मे चेतावनी जारी, मिथिला राज्य केर मांग दिश अपन झुकाव आरम्भ होयबाक पहिल विन्दु

Remember Bihar! This is gonna cost you as higher as you intentionally ignored Mithila in it.

We Maithils are very sad to note such attitude, it is like a wound unrepairable for us. 

Wake Maithils! Fight for your right!

Aab nahi ta kahiyo nahi!!

You deserve your own entity as an autonomous state, forget the delusion with Bihar.

Show your strength by uniting on this cause.

Jay Maithili! Jay Mithila!

Harih Harah!

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२७ अप्रैल २०१२
माय, हम तऽ हिन्दी बजबौ!
माय, तोरा हम बहुत खौंझेबौ!
माय, हम तऽ फिलिम बनेबौ!कि राखल छौ मिथिला में
जे कहै छेँ हमरा रुकय लेल
देखही ओकर चमकी सुन्नर 
मोंन हमर बड़ लुभा गेल
माय, तोरा हम बहुत सतेबौ!
माय, तोरा हम बहुत तड़पेबौ!
माय, हम तऽ हिन्दी बजबौ!
माय, तोरा हम बहुत खौंझेबौ!
माय, हम तऽ फिलिम बनेबौ!

Harih Harah!

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हमर बौआ छै मिथिलाके संतान गै बहिना
तोहर बौआ बनय अंग्रेजिया हैवान!ई संस्कार के फेर कोना भेल बाज गै बहिना!
जरुर सिखेले अपने तू अंजान!हमर बौआ…..

भोरे उठि दतमैन करय आ जाय छौ गाछी-खेत गै…
जाय छौ गाछी खेत गै!

पानी पटा के सभ नवगोछली आबय लऽ घास-पात गै
आबय लऽ घास-पात गै!

माल-जाल सभ खुशी राखय ई, खुशी राखय इन्सान गै बहिना
ई थिक बेटा मिथिला के संतान!

हमर बौआ….

तोहर छौड़ा नित उठि कानय – मम्मी-मम्मी ब्रश दे!
मम्मी-मम्मी ब्रश दे!

टी-ब्रेड के ब्रेकफास्ट सऽ लिवय करय कमजोर गै!
लिवर करय कमजोर गै!

बूकिश नौलेज पर छौ चमकैत… गै! राखय नै व्यवहारक ज्ञान गै बहिना
ई बनलौ अंग्रेजिया हैवान!

हमर बौआ….

हरिः हरः!

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२८ अप्रैल २०१२

मित्रो! जो कर्मठ नेता होते हैं उन्हें अपने इतिहास की समृद्धि को बरकरार रखनेके लिये अपनी जिम्मेवारी की समझ होता है और एक बार फिर मैं प्रिय नेता नितिश कुमारजी के इस कदम का दिल से स्वागत करता हूँ। राजनीति की खींचतान के कारण ऐसे बहुत सारे महत्त्वपूर्ण धरोहर खिन्न होकर रह गया, पर नेतृत्वकर्ताओंके तिरस्कारपूर्ण रवैये के कारण विकास तो दूर कम से कम इनका ठीक से रख-रखाव तक नहीं हो पाया। मिथिलांचल की समृद्धि चरम पर रहने के बावजूद आज की विपन्नता किसी को भी रुला देनेवाली है। इसमें बिहार सरकार को दोषी मैं तब मानता जब स्वयं मैथिल अपनी ऐश्वर्यको बचानेके लिये सक्रिय रहते। आज भी समय है। जागो और अपने क्षेत्रोंके ऐसे महत्त्वपूर्ण धरोहरोंके लिये सरकारकी घोषणानुसार सुसज्जित करने में लगो। गप्पें मारने से भला क्या होगा – ऐ दोस्तों! समय का महत्त्व समझो। फेसबुक के माध्यम से भी हम-तुम बेहतर कर सकते हो।

आज ऐसे ही शुरु किया गया दहेज मुक्त मिथिला और इसके पवित्र आह्वान को हिन्दुस्तानके प्रमुख पेजोंपर देखकर तुम्हारे किये कामों के प्रति संतोष बढा और आगे इससे भी बेहतर हम कर सकें इसके लिये दृष्टिकोण मिला। विगत में सौराठ सभा का पुनरुत्थान और माधवेश्वरनाथ महादेव मन्दिरका जीर्णोद्धार की बातें बिहार सरकार की कला-संस्कृति विभाग द्वारा किये जाने जैसे महत्त्वपूर्ण बातोंकी जानकारी तुमलोगोंको जरुर होगा। समय आ गया है कि आगामी ३० अप्रील जानकी नौमीके सुअवसर पर हमलोग फिर संकल्प लें कि मिथिलाको दहेज मुक्त बनाना है और अपनी धरोहरोंकी रक्षा करना है।

दहेज मुक्त मिथिला परिवार!

हरिः हरः!

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नयाँ गणतान्त्रिक नेपालमा राज्यहरुको संरचना जब सम्म प्राकृतिक आधारहरुमा हुँदैन र मात्रै राजनीतिक हथकंडा अपनाएर निर्माण गर्न खोजिन्छ, न त शान्ति आउँछ न हि राज्य निर्माण हुन सक्छ। यस्तो खालको प्रस्ताव नयाँ नेपाल को लागि पार्टीको गंभीरता माथि नै प्रश्न उठाउँछ। एक मधेश प्रदेश को माँग लाई मत्थर पारेको विभिन्न न्युँहरु अगाडि ल्याइएको थियो, तर मिथिला को नामोनिशान नै सिधाउनु कुन खालका प्रवृत्ति देखाउछ यो मलाई बोल्नु पर्दैन, सबैले स्वाभाविक रूपमै बुझ्न सक्छ। अब मलाई विश्वास भयो कि नेपाल मा संविधान बनाउन केहि मधेशवादी दल र अन्य साना दल हरु वाहेक अन्य कुनै पनि दल जसमा तीन ठुला राजनीतिक दल पनि छन्‌ कोही गंभीर छैनन।

यदि मधेशलाई दुइ प्रदेश को तर्जमा निर्धारण गर्नु छऽ भने मिथिला प्रदेश को स्वाभाविक माँग पूर्णतः जायज हो र यसको लागि जनकपुर बाट शुरु भएको आन्दोलन नेपाल मा नया इतिहास सृजना गर्ने छ।

नेपालमा शान्ति को स्थापना होस्‌ भनी मेरो कामना छ।

हरिः हरः!

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२८ अप्रैल २०१२

कैसे बने मिथिलाधाम?

काबिल तो हम बहुत हैं
पर होता नहीं कोई काम
मिलते हैं महफिल में
पाने बस शोहरत नाम
छलकाते हैं शब्दों से
झूठी जयकारा जाम
रो रही है माँ और जमीं
भूल बैठे निज धाम
कहने को हम तेज हैं
पर रो रहा हमारा गाम
होता गर बस कहने से
बन जाते हम भी राम!

मिलो दिल से ऐ सनम – बस दिखाने की रीति है बुरी
जब हृदय पुकारे प्रेम से आओ समझ मिलनेकी घड़ी!

जय मैथिली! जय मिथिला!

(मेरे सारे नेता-मित्रोंको समर्पित – नेता हो अभिनेता हो पर बनते क्यों तू निकम्मा हो!)

हरिः हरः!

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आइ हमर जीवन के एक महत्त्वपूर्ण दिन अछि कारण एक स्थानीय टीवी मकालु टेलिविजन पर चलि रहल ‘जीवनक अनेक रंग’ लेल पत्रकार डिम्पल देव अन्तर्वार्ता लेल आबि रहल छथि। मकालु टेलिविजन के धन्यवाद – संगहि डिम्पल के सेहो धन्यवाद जे मैथिलीमें एतेक सुन्दर कार्यक्रम चला रहल छथि आ मैथिली-मिथिला प्रति समर्पित सेवक सभके अन्तर्वार्ता लैत एहि कार्यक्रम के संचालन कय रहल छथि।

परन्तु आइये हमरा लेल एक असीम कष्टदायक दिन सेहो अछि कारण किछु लोक अनायासे संग एहि लेल छोड़ि रहल छथि जे कहीं हमर नाम बेसी नहि भऽ जाय आ ओ पाछू नहि छूटि जाइथ। जखन कि हमर एहेन कोनो मंशा नहि अछि जे अगबे नाम लेल काज करी। काज करब तऽ हमर नाम टा नहि चमकत बल्कि जीवन सेहो सफल बनत। भगवान्‌ पठेबे केलाह छथि किछु काज करैक लेल, अगबे नाम लेल नामी मरैछ। हम सभ तऽ गैरखोर, फटहा, लूच्चा रहितो बस अपन समाज में जे जतय अकर्मण्यता छैक तेकरा भगाबय लेल प्रतिबद्ध छी।

दहेज मुक्ति लेल चलायल आन्दोलन के कौल्हका हिन्दुस्तान पेपर में छपल कहानी सऽ कतेक लोक आशीर्वाद दऽ रहल छथि तऽ कतेक लोक एहि सँ ईर्ष्या करैत संग छोड़ि रहल छथि। सभ के लेल शुभकामना!

हरिः हरः!

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२९ अप्रैल २०१२

मिथिलामें कुटमैती के वर्तमान प्रथा के एक गाथा – फुर्सत में मात्र पढी! 

बापक दुलैर बेटी

भिनसरे काका साइकिल के साफ करैत काकी सँ कहलखिन जे खाना सबेरे तैयार करैथ आ बहिन लेल कथा-वार्ता में गुनदेवजी के संग मधुपुर जेबाक छन्हि। काकी उत्सुकतावश काका सँ पूछलखिन – कि कोना वर-घर? काका कहलखिन – जाउ ने! कतेक पूछय लगैत छी! खाना बनाउ, माथ जुनि खाउ। काकी सदैव जेकां चुप्पे रहैत बरबरेली जे – जाउ.. अहाँके आदत नहि सुधरत… एक रत्ती हमरो सभ के बता देब तऽ कि बिगड़त अहाँके? .. फेर काका साइकिल साफ करैत रहलाह आ काकी चुल्हा निपय लगलीह। बहिन के शोर करैत कहलखिन जे बापक खेनै जल्दी बनबैक छौक, दु पैली चाउर के धो आ आलु काट, कोठी पर सऽ कुम्हरौरी के मटकुरी ला… जल्दीमें भात आ आलु-कुम्हरौरी के झोरहा बना दैत छियन्हि। तोरो कपार केहेन छौक दाइ… कतेक जगह पुरि गेल एहि साल… देखही आब आइ कि होइत छैक।

काका नहा-सोहा पूजा-पाठ सऽ फुर्सत पाबि फेर आवाज लगौलनि – हे! सुनैत छी… जल्दी परसू। गुनदेवजी अबिते हेता। जल्दी-जल्दी पिढिया लगाके खेनै परैस देल गेलनि आ हबर-दबर दस कर खाइत काका तैयार भऽ के साइकिल लेने दरबाजा पर आबि गुनदेवजीके इन्तजार करय लगलाह। कथा-कुटमैती में जाइ वास्ते कन्यागत संग देनिहार बहुत समयके पाबंद होइत छथि – से कनेकबा काल में गुनदेवजी चिकरय लगलाह – भाइ! हम आबि गेल छी। काका सेहो दलानके घर सऽ बहरा गेलाह आ ‘नारायण-नारायण’ कहैत कुटमैती प्रस्तावना दिस विदाह भऽ गेलाह।

मधुपुर गाम सऽ कनेकबा दूर धारके ओहिपार छोट-छिन बस्ती! प्राकृतिक सुन्दरता के बखान कि जतय प्रकृति के मनोरम आशीष पवित्र नदी कमला-बलान बहैत हो! काका आ गुनदेवजी के पहुँचय सऽ पहिने वरागत के दरबाजा पर चौकी ऊपर उजरका जाजिम बिछायल मसलंग लागल आ दु-चारि टा कुर्सी सेहो सजा के राखल छलैक। कुटुंब दरबाजा पर एलाह… रे फल्लमां! जल ला, कुटुंब के पैर धो। गमछी दहुन। तारातारी सभटा भेल आ कनेक काल कुशल-क्षेम आ खेती-पाती-मौसमके कहर आदिके बात भेला उपरान्त कथा-वार्ता शुरु भेल। वरागत बजलखिन जे अहोभाग्य जे अपने समान कर्मठ लोक हमर दरबाजा पर आयल छी… अपनेक बचिया के पढाइ-लिखाइ के बारे में सुनल – बहुत सुन्दर लागल। आइ-काल्हि जौं बेटी पढल-लिखल नहि हो तऽ उचित नहि। ऊपर सऽ हुनकर स्वभाव आ सुशीलता अपनेक गामके एक कनियाँ हमरा गाम में छथि हुनका द्वारा सुनल से बहुत प्रसन्नता अछि आ हम सभ अपने ओतय कुटमैती करय लेल तैयार छी। बात-ब्यवस्था लेल गुनदेवजी के कहि देने छियन्हि। आपसी वार्ता एहि तरहें होइत रहल आ अन्ततोगत्वा काका पूछलखिन जे हम तऽ खाली हाथ बस बेटी टा देबय लेल अपनेक दरबाजा पर आयल छी। से हमरा अपने आदेश करू।

गुनदेवजी सेहो काका के पक्ष सऽ बात रखैत कहलाह जे – एहेन सुशील कन्या अपने एहि परिवार में देबैक से कम पैघ बात नहि भेल हिनका सभ के लेल, ब्यवस्था कोन बात भेल.. बस बरियाती के स्वागत हेबाक चाही।

एतबा सुनैत देरी लड़का के पित्ती जे नारायणपुर के उच्च विद्यालय के शिक्षक छलाह से कूदि पड़लाह – कोनो लड़का अपांग छैक आ कि एकर कुटमैती आर कतहु सुन्दर परिवार में संभव नहि छैक, गुनदेवजी! अहाँ कहने बिन ब्यवस्था हम सभ विवाह लेल हाँ कही?

काका सीधा लोक – गुनदेवजी के देखायल एहि कुटमैती करय के ईश्वरके अनुकम्पा बुझैत आयल छथि आ आब शुरु भऽ गेल अछि घमासान… गुनदेवजी एक तरफ एहि कुटमैतीमें एको पाइ के माँग के विरोध कय रहल छथि, हुनका परिवार, कनिया, संस्कार, कुल-मूल.. एतबी चाही अपन कुटुम्बके बेटा के विवाह में… मुदा दियाद सभ के झमेला दरबाजा पर देखनुक भऽ गेल। केओ केम्हरो सऽ बाजय लागल जे बुझू तऽ आइ-काल्हि बिना ब्यवस्था विवाह करब तऽ महादरिद्रीके संकेत करैछ। से लड़की के पिता के अपनहि सोचबाक चाही। काका के नहि रहल गेलन्हि.. ओ बजलाह जे हे! अहाँ सभ के सुन्दर-सुशील कनियां दी, हम ड्योढि खानदान आइ आर्थिक रूप सऽ भले पिछड़ल होइ लेकिन संस्कार आइयो हमर सभ के सभ सँ बेसी प्रशंसनीय अछि… से आयल छी अहाँ के द्वारि पर आ बेटीके बाप थिकहुँ तऽ पाग हाथ में रखने छी अपनेक लोकनिक चरणमें समर्पित करय लेल… लेकिन एना झमेलाबाजी करैत हमर मन के विचलित कय देलहुँ। बुझू हमर आत्मा अप्रसन्न भऽ गेल। हम एहि कुटमैती करय लेल तैयार नहि छी। हम विपन्न लोक भले कि ब्यवस्था दऽ सकब। बेटी हमर सम्पत्ति थिकी। बस हुनकहि टा दऽ सकब। विशेष अहाँ सभ स्वयं विचारू। यदि हम एहि लायक होइ जे अहाँ सभ के परिवार सऽ जुड़ि सकी तऽ जोड़ल जाय आ पूर्ण आदर्श के रूपमें… नहि तऽ आज्ञा देल जाय।

एतेक सुनला के बाद एक बेर सभ सन्न रहि गेल। लड़का के पित्तीके सेहो मुँह अपन बात पर रहितो आगू फैसला करैक लेल कुण्ठित भऽ गेलनि। लड़काके परिवार के पता छलैक जे कनियां बहुत सुशील आ सुन्दर के संगमें एक नीक, ईमानदार, कर्मठ आ अयाची पिता के बेटी छथि आ एहेन कनियां फेर दोसर जगह कहिया भेटत। लड़का के जेठ भाइ मूल अभिभावक – एम्हर वास्तविकता के आत्मसात्‌ करैत छलाह ओम्हर अपन समाज-परिवार के फिजूल दबाव बुझितो किछु बाजि हुनका सभके प्रतिकार करऽ के स्थितिमें नहि छलाह। ई समय भले किछु सेकेण्ड के मात्र रहल लेकिन अत्यन्त गंभीर आ घनघोर छल बहुतो उपस्थित घरवारिक आ अतिथि लेल। यदि केओ हल्लूक छलाह तऽ काका जे आइ धैर कोनो काज केवल ईश्वर के कृपा सऽ होइत बुझैत छलाह आ अपन बेटीके तकदीर पर हुनका एकदम उम्मीद छलन्हि जे जतय हेतैक नीके हेतैक। चुप्पी काका तोड़लाह – उठु गुनदेवजी! चलबाक तैयारी करू।

लड़का के जेठ भाइ आब समय के जोर बुझैत सभ किछु बिसैर बस अपन आत्माके बात बजलाह – कहय लगलाह उदासीन भाव सऽ… देखू! केहेन अछि हमरा सभ के दस्तुर। एक बेटीके पिता अपन पाग लऽ के ठाड़्ह छथि हमरा लोकनिक सोझाँ… आ हम सभ अतिथिसेवी मिथिलावासी हिनकर मंशा के बुझितो अबूझ बनि रहल छी। मास्टर साहेब! एहेन ढकोसला समाज प्रति हमरा मन में कनिको श्रद्धा नहि बचि गेल आब जे हम दहेज मुक्त विवाह करी तऽ हमरा कोसय… हमर परिवार के कोसय… हमर भाइ के कोसय… हम सभ कलंक अपन माथ पर रखलहुँ। हमरा चाही बस एक सुशील सुशिक्षित नारी जे घरमें हमर भाइ के संग लक्ष्मी बनि के आबैथ – हमर वृद्धा माय के सेवामें लागैथ – हमर समस्त परिवार लेल नव-उपहार जे हुनक शील-स्वच्छ-आचार सऽ एहि घरमें प्रवेश करय… बस.. एतबी टा चाही। आ आइ जे व्यक्तित्व हमर दरबाजा पर हमर छोट भाइ लेल आयल छथि हिनकर हरेक छवि सऽ हम समस्त परिवार प्रभावित छी आ आशा करैत छी जे हिनक कनियां सेहो एतबा प्रभावशाली हेतीह। बस, हमरा चाही यैह परिवार – नहि चाही कोनो ब्यवस्था-विचार के व्यवहार।

गुनदेवजी के संग-संग काका के चेहरा पर ऐश्वर्यपूर्ण मुस्कान आबि गेल – आत्मसंतुष्टि के प्रवेश याने ईश्वर प्रति समर्पण आ समक्ष उपस्थित भगवान्‌रूपी व्यक्तित्वके त्याग प्रति नतमस्तक होइत जेना कोनो भक्त अपन भगवान्‌ प्रति समर्पित होइछ… बस किछु एहने समागम बनल ओहिठाम… लेकिन कुटिल हृदय के लालची-लोभी लेल एतेक सुनब कठिन बनि गेल… फुफुवा उठला मास्टर साहेब… बाजि उठलाह… हे रौ! रामा! तोंही सभ सऽ पैघ भऽ गेलें? समाज के रहैत तोहर बात नहि चलतौ। एखन हम छी आ हमर बौआ के विवाह लेल अधिकार काका हमरहि छोड़ि के गेल छथि। खबरदार जे तों राजा हरिश्चन्द्र बनिके ई व्यक्तिपूजा आ सुन्दर-सुशील-सुशिक्षित कनियां के उपदेश हमरा केलें तऽ… । बस चुप कर आ बाज – यदि बेटीके बाप नहि करथिन इन्तजाम तऽ डीह बेचि के घरमें भाभौ अनबें? जे परिवार के व्यवहार रहल अछि ओ कोना के करबें?

समाजमें एना अनेको अवसरपर देखल जाइछ जे केओ नैतिकता के बात करत तऽ व्यवहार के आडंबर सऽ पुनः ओकरा त्रास देखायल जाइत छैक। पुनः माहौल में परिवर्तन भेल। फेर एक बेर लड़का के जेठ भाइ रामा ऊपर मास्टर साहेब के दबाव आ बैसल दहेज लोभी समाज के चाप – ई देखि पुनः काका के मन उद्वेलित भेलन्हि। लेकिन रामा भैया के त्याग देखि एहि बेर काका के भीतर एक जोश के प्रवेश भेल छल जे बाद में जरुर हिनकर नीक व्यवहार होयत, एखन समाज के समक्ष किछु गैछ ली आ सभ के मन मना दियैक। बस ई सोचि काका कहलैथ – कि यौ गुनदेवजी! हम तऽ कहने रही ने… आइ-काल्हि लड़की के मूल-गोत्र-कुल-खानदान-सुन्दरता-शिक्षा-सुशीलता… ई सभ फेका जाइछ किनार आ अन्त में एकहि बात अबैछ जे ब्यवस्था कतेक? से बताउ… आब हम अहीं सभ सऽ सुनय लेल चाहैत छी जे कि ब्यवस्था होयबाक चाही। हम छी गरीब, लेकिन दरिद्र नहि जे बेटीके बियाह लेल हम एतबो ब्यवस्था नहि कय सकब। भीखो माँगि के होयत तऽ बेटीके कनियांदान नीक जेकां करब। हिनकर परिवार के सम्मान के रक्षा करब हमर प्रथम कर्तब्य बूझब। कहू मास्टर साहेब! अहीं सऽ पूछैत छी?

मास्टर साहेब के आब एतेक बुझेलैन जे हमर पूछ भेल आ रामा के इच्छा पहिले सऽ छहिये… आब हुनका मुँह सऽ माँग करब भारी बुझाय लागल। कनेक काल ओलमा-दोलमा भेला के बाद लड़की के पिता के भूमिका किछु अपनहि धार पर झूकल देखि मास्टर साहेब सेहो द्रवित भऽ गेलाह आ कहलाह – श्रीमान्‌! अपने सच में महान्‌ थिकहुँ। बेटीके विवाह लेल भीख के गप कहि हमरो तोड़ि देलहुँ। आब जाउ, एहि लड़का लेल एक जोड़ धोती आ कुर्ता के कपड़ा लऽ आउ आ एतय सऽ पाँच गोट गार्जियन जाय साधारण रूपमें विवाह के सम्पन्न कराउ। एतेक कहैत मास्टर साहेब दुनू हाथ सऽ काका के हाथ पकैड़ कहलखिन – एहि हाथ सँ छौड़ा के भैर मन सऽ आशीर्वाद धैर देबैक… बस – एकर विवाहित जीवन सुखमय बनल रहैक आ एहि पृथ्वी पर एकर सभ के नीक-नीक प्रखर सन्तान आबैक आ हमर फल्लां काका के परिवार मर्यादित ढंग सऽ आगू बढय। रे! उमेश! चल आबे। आशीर्वाद ले।

सभ के मन प्रफूल्लित भऽ गेलैक। काका सेहो भैर मन सऽ सभ संग गला मिलय लगलाह। दरबाजा पर अतिथि स्वागत के अगिला दौर आ ओ मिथिलांग के व्यवहार सभ के बीच अनेको ठहाका सऽ दरबाजा पर मानू एहेन अबस्था बनि गेल जेना स्वयं ईश्वर एहि निर्णय सऽ प्रसन्न होइत ऊपर सऽ फूल के बरसात कय रहल होइथ। सभ हंसी-खुशी सम्पन्न भेल – विवाह के दिन तय भेल आ आइ उमेश – कंगना सँ एहेन परिवार के निर्माण भेल अछि जे समूचा खानदान के नाम रौशन कय रहल अछि। त्याग के – बलिदान के – सम्मान भले पृथ्वी पर के लोक नहि बुझैत हो… वा बुझय में देरी करैत हो… लेकिन ईश्वरके घरमें एकर बहुत पैघ सम्मान छैक। एकर जीवित प्रमाण आइ एहि जोड़ीके सदाबहार जीवन सँ देखय लेल लोक के भेटैत छैक। काका नहि छथि, लेकिन हुनकर आत्मा ऊपर सँ ई सभ देखि समस्त मिथिला समाज के एहने आदर्श अपनाबय लेल कल जोड़ि विनती कय रहल छथि। स्वच्छ व्यवहार असल अतिथि सेवा थीक, नहि कि सभ तरहें ठोकि बजा के देखलाके बाद दहेज के माँग कोनो लड़कीके पिता पर थोपब आ तखन अपन पैघत्व बखारब। मिथिला में महान्‌ विभुति सभ के पैदाइश किछु एहने त्याग आ बलिदान के नींव पर भेल छैक। जतय-जतय दहेज रूपी दबाव के लाद कोनो परिवार पर देल गेलैक, ओतय-ओतय कोनो ने कोनो तरहें दरिद्रा अपन ताण्डव देखेबे टा केलकैक, देखेबा टा करैत छैक आ देखेबे टा करतैक।

एहि कथा सँ बहुतो लोभी-लालची परिवार के नजैर खुलतैक, अतः अपने सभ सँ निवेदन जे एकरा अपन हरेक इष्ट-मित्र सँ जरुर शेयर करी।

हरिः हरः!

(उपरोक्त सत्यकथा में पात्र एवं स्थान के नाम काल्पनिक छैक, यदि किनको सऽ मेल खाइत हो तऽ केवल संयोग बुझब आ मानवृद्धि बुझब जे एहेन त्याग आ बलिदान अपनोहो के परिवार में भेल। ईश्वर कृपा बुझब। दहेज मुक्त मिथिला निर्माण में सहयोगी बनब। लोभी-लालची मिथिला के नियंत्रणमें कार्यरत होयब। धन्यवाद। – अपनेक – प्रवीण चौधरी ‘किशोर’ – ग्राम: कुर्सों, वर्तमान – विराटनगर – नेपाल।)

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काल्हि जानकी नवमी – शायद काल्हि हम यात्रामें रहब आ ताहि हेतु अपन साधना सऽ अहाँ सभ लेल प्रसाद बाद में वितरण करब। लेकिन ओहि सँ पहिने एक समाद दऽ दी। कोनो नवमी वा अष्टमी वा कोनो शुभ मुहुर्तमें जखन देवी-देवता के जन्म दिवस पड़ैछ, तेकर महत्त्व हमरा सभके लेल देवी-देवता के विशिष्ट चरित्र पर मनन करैक लेल विशेष होइत छैक आ तदनुसार अपन निजी जीवन-स्तर में सुधार लायब सेहो सहज होइत छैक। जानकीजी – अर्थात्‌ सीताजी के जन्मदिवस पर हमरा लग एक सहारा – हमर परम प्रिय पोथी तुलसीदाकृत रामचरितमानस महासागर में सऽ किछु निकालि अहाँ सभ लेल राखि रहल छी। एहि पर मनन जरुर करी। विशेषतः हमरा लोकनिक युवा-वर्ग एहि सभकेर विशेष अध्ययन करैथ आ अवश्य अपन जीवन में एहेन चरित्र अपनेबाक प्रयास करैथ।

स्मरण रहय – दहेज मुक्त समाज निर्माण हेतु संकल्प लेबाक आह्वान पहिले केने छी आ फेर एहि समाद सँ अपने लोकनिकेँ अनुरोध कय रहल छी जे काल्हुक विशेष शुभ अवसर पर अपन संग-संग समस्त मिथिलाकेँ दहेज के दानव सँ मुक्ति दियाबय लेल शपथ खाउ आ स्वच्छ समाज के निर्माण में सहायक बनू।

निम्न पोस्टमें सीताजी के श्री राम जी संग प्रथम दर्शनके प्रसंग हिन्दी व अंग्रेजीमें हमर नोट के संग अछि। चुँकि सीताजी के मिथिला नैहर छन्हि आ हिनक महिमा विशेषतः अहाँ सभ जानिते छी… एहि लेल अपन लेख-रचना-स्वाध्याय हम धर्म मार्ग ग्रुप लेल केने छी जे ग्लोबल छैक। मैथिली के परिचय हिन्दी व अंग्रेजीमें – सभ के लेल। अहुँ सभ देखू जे सर्वसमर्थ सीताजी कोना अपन पिता जनक प्रति समर्पण प्रथम दृष्टिमें रामजी संग नेह जुड़ला के बादो केने छथि, एहि प्रसंग सऽ यैह ज्ञान होइछ जे अपन माता-पिता के सम्मान सर्वोपरि।

हरिः हरः!

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१ मई २०१२

Am just back from Saurath Sabhagachhi…

We heard very bad news there about attack on protestors for Mithila Rajya in Janakpur – those killed in the attack must be declared martyrs and protest must be addressed by the government without much delay and much losses.

Rest feedback will come tomorrow.

Harih Harah!!

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शान्तिपूर्ण तरीका सँ कैल जा रहल मिथिला राज्यक माँग कयनिहार आन्दोलनकारी ऊपर बम बिस्फोट द्वारा आक्रमण के हम सभ घोर भर्त्सना करैत छी, संगहि एहि आक्रमण में शहीद भेल समस्त आन्दोलनकारी केँ शहीद घोषणा करैत उचित क्षतिपूर्ति देबाक माँग करैत छी। एहि तरहक ई पहिल आक्रमण सऽ नेपाल के संघीयता पर कुठाराघात मानल जा सकैत अछि आ एहि लेल सरकार आन्दोलनकारी के सुरक्षा सुनिश्चित करैथ सेहो माँग कय रहल छी। संघीयता लेल नेपाल में अति प्राचिन इतिहास, भाषा, साहित्य, संस्कृति में समृद्ध मिथिला राज्य के गठन करैत नया संघीय नेपाल के नींव मजबूत बनबैथ सेहो माँग एहि ज्ञापन पत्र के मार्फत राखि रहल छी।

हरेक शहीद प्रति अनेकानेक नमन एवं शोक-संतप्त परिवार के धैर्य-धारण लेल कामना – एहि शहादत केँ मिथिला-मैथिलीसेवी कदापि ब्यर्थ नहि जाय देथिन से समस्त मिथिलावासी सँ निवेदन। पूरा भारत आ नेपाल के मिथिला एहि शोक-लहर सँ संतप्त अछि। मिथिला के इतिहास में एहि नव पन्ना जुड़ब शायद विधके सिर्फ एहि लेल मंजूर भेलन्हि किऐक तऽ मिथिलावासी सभ किछु जनितो अन्ठा के sootay ke pravrutti apananune chhalaah, aab ehi bomb ke aawaz sa hunak Kumbhkarani ninn avashya tootat. 

हरिः हरः!

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३ मई २०१२
मिथिलानी सभ दिन घोघहि रहली, मुदा गार्गी सोझाँ अयलीह
याज्ञवल्क्य सन विद्वान्‌ मैथिल सँ, भरल सभा ओ प्रश्न उठेलीह!मैथिल सहिष्णु प्रजाति होइछ जे बचा न सकल अपन संसार
जुड़ैत दोसरक संग समूचा मिथिला बँटल आइ दुइ फार अपार!अमिट सेतुके रूपमें दू देशक बीच, काज करय मिथिला के पुत्र
सुगौली संधि हो या कोनो दोसर हस्ताक्षर बनल मैथिलके पुत्र!

इतिहास ठाड़्ह सभ बाँचि रहल अछि, लेकिन केकरा फुर्सत छैक
लाठी-बंदूक-बम बदौलत शक्ति जेकर ओकर राज चलैत छैक!

रंजू जानकी के रूपमें आबि शहादत सऽ धरती माँ कोरा समेली
जौँ राम नहि आबैथ आबो तीर-धनुष के महिमा सदा लेल हरेली!

गप्पी मैथिल गप्प नहि चलतौ करय पड़तौ आब काज तोरो
मिथिला के मान के जोगबय लेल उठबय पड़तौ आब राज तोरो!

जय मैथिली! जय मिथिला!

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जनकपुर में भेल बम काण्ड के भर्त्सना के नहि केलक?

अफसोस हम एखन धरि कतहु भारत द्वारा एहि घटना के निन्दा आ मिथिला लेल न्याय करबाक आग्रह नेपाली काउण्टरपार्ट द्वारा कतहु नहि पढलहुँ… कि अहाँ सभ कतहु कोनो अफिसियल टिप्पणी यदि पढने होइ तऽ जानकारी कराबी।

राष्ट्रसंघ जेना संज्ञान लैत एहि विषयमें अपा प्रतिक्रिया देलक अछि ओ अत्यन्त मार्मिक आ मैथिल लेल एहि शोक के घड़ीमें दर्दनाशक अछि। लेकिन एहेन अपराधिक घटना के यदि एखनहु केओ राजनीतिक दृष्टि सऽ देखैत छथि तऽ ओ नहि केवल मिथिलाके दुश्मन छथि बल्कि अपन जमीर के सेहो ओ भला सोचनिहार नहि छथि। एहि सोच के परिवर्तन लाबैथ कारण मिथिला के राज्य तऽ सनातन सत्य थिकैक आ एकर सम्मान अहाँके करहिये टा पड़त। माइनस मिथिला संसार शून्य अछि।

घर में जगार हो, बनल रहे संस्कार आ संसार हो!

जय मैथिली! जय मिथिला!

हरिः हरः!

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५ मई २०१२

स्वतंत्र विचार

संक्रमण काल लंबिनु भएन। शान्ति जसरी पनि बहाल गर्नु पर्छ। जनतालाई वाक्क भइ सकेको छ। मलाई प्रधानमंत्री भट्टराई जी को भनाई धेरै नै सोहायो र प्राकृतिक तवरको लाग्यो। संविधान सभाको काम सकिने बेला भै सकेको छ र यस पछि फेरि नेपाली जनता ले राजनीति-राजनेतामा विश्वास गर्छन्‌ जस्तो मलाई लाग्दैन। तर केहि भन्नू सकिदैन। एउटा आम नागरिक भएर मैले पनि धेरै परिवर्तन यहाँ आफ्नो २७ वर्षको नेपालवासमें देखेको छु। भारतको भूमिका लाई नकार्न सक्ने अबस्था कहिले देखिन्न। भविष्य पनि भारत ले आफ्नो सुरक्षा नीति अनुरूप गर्ने छ, यसमा अतिश्योक्ति छैन। यस लाई द्वंद्व को मानसिकताबाट होइन ईमानदार, विकासशील र रचनात्मक बनेर हेर्नु पर्ने आवश्यकता छ। नेपालमा शान्ति ल्याउन सहमतिको स्वागत गर्दै …..

http://www.simplesite.com/tajakhabar/89630275

Harih Harah!!

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काल्हि रवि दिन हम अपने सभसँ एक छोट मिटींग लेल अनुरोध करैत छी। समय भिनसर दस बजे सऽ संध्या ५ बजे तक जखन कही, हम तैयार भेटब। (Sabh ke bichar sandhya 3-4 ke beech bhel. Kripya upasthit rahi.)

विषय: सौराठ सभा के अनलाइन वर्सन – अर्थात्‌ सभागाछी के काज इन्टरनेट आ फोन द्वारा हर शहर – नगर – महानगर में सूचना केन्द्र के स्थापना करैत करय लेल इन्तजाम।

भूमिका: जेना कि आइ-काल्हि लोक मिथिला सँ बाहर-बाहर विभिन्न जगह अपन ठौर-ठेगान बना के स्थायी रूप सऽ बाहरे रहल लागल छथि आ हुनकर धिया-पुता जे विवाह योग्य छथि हुनका सभ के मिथिलामें कुटमैती करऽ में बहुत दिक्कत के सामना करय पड़ि रहल छन्हि… आ सभके इच्छा यैह जे मिथिलाके कुटमैती करी – तऽ एहि सभके लेल दहेज मुक्त मिथिला के द्वारा विगत में www.dahejmuktmithila.org के निर्माण कयला के उपरान्तो शायद समुचित लाभ जनमानस तक नहि पहुँचि रहल छन्हि आ समस्या के निदान किछु अंशमें मात्र भेल बुझाइत अछि… ताहि लेल यदि वेब एडमिनिस्ट्रेशनके संग-संग अन्य अफिसियल एसिस्टान्स के हिसाब सऽ सौराठ सभा के समस्त सुविधा सदस्य सभ लेल उपलब्ध करायल जायत तऽ शायद संस्था के उद्देश्य पोषण के संग-संग कोष-निर्माण आ धरोहरके संरक्षण के बात सेहो शीघ्र समाधान होयत। एहि लेल एक अन्य थ्रेड पर हम अपन कन्सेप्ट डिजाइन (रफ) रखने छी। ताहि ड्राफ्ट प्रोपोजल पर अहाँ सभ अपन विचार राखी।

संगहि हम सभ अपन-अपन शहर में अखबार में इश्तिहार दऽ के समस्त मैथिल केँ जानकारी दी जे आब सौराठ सभागाछी के सुविधा अनलाइन सेहो उपलब्ध अछि, अहाँके शहरमें, अहाँ फल्लाँ जगह फल्लाँ सऽ सम्पर्क करी… तऽ शायद एकर माइलेज काफी ज्यादा हेतैक।

आरो सम्बन्धित बात पर चर्चा के लेल उपरोक्त मिटींग में अनलाइन रहि के निर्णय करी|

Harih Harah!

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नेपालक महान् नेता जय प्रकाश आनन्द केर गिरफ्तारी आ जेल यातना पर हुनक टाइमलाइन पर लिखल – ५ मई २०१२
May JP live a peaceful journey through imposed imprisonment – we understand the height of our leader and pray with Lord to keep him safe every time. Harih Harah!!
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६ मई २०१२

दहेज मुक्त विवाह लेल सौराठ सभा अनलाइन लागि सकैत अछि कि?

यदि:

१. हर शहर में एहि लेल एक सूचना केन्द्र के स्थापना कैल जाय।

२. हर जगह किछु व्यक्ति वा संस्था के सहयोग सऽ परंपरा के निर्वहन कैल जाय।

३. जाति-पाति के बंधन नहि हो, सुविधा सभ के लेल हो आ अपन-अपन संस्कार आ रीति-रिवाज अनुरूप हो।

४. वैवाहिक सम्बन्ध निर्धारण लेल जेना मैथिल ब्राह्मण आ कायस्थ के संग-संग राजपुत, देव समाज आ किछु अन्य में सेहो सिद्धान्त के परंपरा छैक, ताहि के विकास सभ जाति लेल अपन-अपन रिवाज अनुरूप कैल जाय।

५. प्रवासी मैथिल केँ कुटमैती लेल सुविधा विशेष रूप सऽ उपलब्ध करायल जाय।

६. माँगरूपी दहेज प्रयोग कयनिहार के लेल उपरोक्त कोनो सुविधा उपलब्ध नहि हो।

७. एहि प्रकार के सुविधा लेल अनलाइन रजिष्ट्रेशन के सुविधा या फेर युजरनेम आ पासवर्ड सिस्टम के मैट्रिमोनियल साइट मैनेजमेन्ट फन्डा पर कार्य हो।

आ एहने बहुतो आर विन्दुपर आइ सन्ध्या ३-४ के बीच बेसी सऽ बेसी संख्यामें अनलाइन उपलब्ध रहैत अपन-अपन विचार सऽ दहेज मुक्त मिथिलाके उत्साही युवा सभकेँ काज बढाबय लेल प्रेरित करी।

दहेज मुक्त मिथिला परिवार
https://www.facebook.com/groups/dahejmuktmithila/

हरिः हरः!

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६ मई २०१२ – मिथिला लेल शहादति देनिहाइर रंजू झा सहित ५ जनाक स्मृति मे बनायल गेल गीत ‘ई आगि नहि मिझाय, जरैत रहय’ केर यूट्युब लिंक शेयर करैत

ई आइग नहि मिझाय जरैत रहय….

धन्यवाद गीतकार, गायक, प्रस्तोता, आ समस्त मैथिल आँखिमें नोर भरल अछि लेकिन हृदय में लागल आगि ताबत जरैत रहय जाबत मिथिला राज्य निर्माण नहि भऽ जाय।

समस्त मिथिलावासी के सोचय लेल मजबूर करयवाला ई घोर निन्दनीय घटना के जतेक भर्त्सना हो कम होयत, लेकिन आब भर्त्सना मात्र कतेक करू? बस मिथिला निर्माण में सहयोग लेल आगू बढू, हाथ में हाथ जोड़ैत बस मिथिला राज कायम करू।

जागु मैथिल जागु यौ… दूधक कर्ज उतारू यौ!

बहुत सुन्दर कमलेश – एहि काज लेल अहाँ के हम बहुत धन्यवाद करैत छी।

हरिः हरः!

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श्रीरामजी द्वारा वर्षा ऋतुके वर्णन – भक्ति, वैराग्य, राजनीति आ ज्ञान भरल बात सऽ भरल कथा-वर्णन! (किष्किन्धाकाण्ड दोहा १२ सऽ दोहा १५ तक)। अनिवार्य पठनीय एवं मननीय!  हरिः हरः!

१. मयुरके झूँड मेघ देखि एना नचैत अछि जेना वैराग्यमें अनुरक्त गृहस्थ कोनो विष्णु-भक्त केँ देखि प्रसन्न होइछ।

२. आकाशमें मेघ घुमैड़-घुमैड़ गर्जना करैछ जाहिमें प्रिया (संगिनी सिया) के बिना रामजी के पर्यन्त डर लागि रहल अछि।

३. बिजलीके चमक मेघमें रुकि नहि पबैछ जेना दुष्टके प्रीति स्थिर नहि रहैछ।

४. मेघ पृथ्वीके लगमें आबि नीचाँ उतरि एना बरसैछ जेना विद्वान्‌ विद्या पाबिकेँ नम्र बनैछ।

५. बुन्नीके चोट सऽ पर्वत एना सहैत अछि जेना दुष्टक वचन संत सभ सहैछ।

६. छोटो नदी भरला पर अपन किनाराके तोड़ैत एना चलैछ जेना थोड़बे धन भेला सऽ दुष्ट मर्यादाके तोड़ैत चलैछ।

७. पृथ्वीपर पड़िते पाइन एहेन गंदा भऽ जाइछ जेना शुद्ध जीवके माया घेर लैत अछि।

८. जल जमा होइत-होइत पोखैरमें एना भैर रहल अछि जेना सद्‌गुण सभ एक-एक कयके सज्जनके पास चलि अबैछ।

९. नदीके जल समुद्रमें जाय ओहिना स्थिर भऽ जाइछ जेना श्रीहरिके पाबि अचल भऽ जाइछ।

१०. पृथ्वी घास सऽ परिपूर्ण भऽ के एतेक हरियर भऽ जाइछ जाहिसँ बनल रास्ता सेहो बुझयमें नहि अबैछ, जेना पाखंड मतके प्रचार सऽ सद्‌ग्रंथ गुप्त भऽ जाइछ।

११. चारू दिस बेंगक आवाज एहेन सुन्दर लागैछ जेना विद्यार्थी समुदाय वेदपाठ कऽ रहल हो।

१२. अनेकों गाछ सभमें नव-पल्लव आबि जाइछ जाहिसँ ओ हरियरे-हरियर आ सुशोभित भऽ जाइछ जेना साधकके मन विवेक-ज्ञान प्राप्त कयलापर भऽ जाइछ।

१३. मदार आ जवाशा (दू किस्मक गाछ) बिन पत्ताके भऽ जाइछ जेना श्रेष्ठ राज्यमें दुष्टक उद्यम नहि चलैछ।

१४. धूरा कतौ तकलो पर नहि भेटैछ जेना तामश (क्रोध) धर्मके दूर कय दैछ।

१५. अन्नयुक्त लहराइत खेतक हरियरी सऽ पृथ्वी केना शोभित भऽ रहल अछि जेना उपकारी लोकक सम्पत्ति बनैछ।

१६. राइतक घनगर अन्हारमें भगजोगनी एना शोभा पबैछ जेना दम्भीके समाज सभ के जुटान भेल हो।

१७. भारी बरखा सऽ खेतक कियारी ओहिना टूटि गेल अछि जेना स्वतन्त्र भेला सऽ स्त्री बिगैड़ जैत अछि।

१८. चतुर किसान अपन खेत सऽ अनावश्यक घास-गंदगीके निकालि फेक रहल छथि जेना विद्वान्‌ लोक मोह, मद आ मानके त्याग करैत अछि।

१९. चक्रवाक पंछी देखैय नहि दऽ रहल अछि जेना कलियुग पाबि धर्म भागि जैछ।

२०. ऊसर में बरखा होइछ लेकिन ओहिठाम घासो नहि उगैछ जेना हरिभक्तके हृदयमें काम नहि उत्पन्न होइछ।

२१. पृथ्वी अनेको प्रकारक जीवसँ भरल ओहिना शोभायमान बनैछ जेना सुराज्य पाबिके प्रजाके वृद्धि होइछ।

२२. जतय-ततय अनेको राही-बटोही थाकि के रुकि गेल छथि जेना ज्ञान उत्पन्न भेला पर इन्द्रिय शिथिल भऽ के विषयके तरफ जेनाय छोड़ि दैछ।

२३. कखनहु-कखनहु हवा एहेन जोर सऽ बहैछ जाहिसँ मेघ उड़ियाके गायब भऽ जाइछ जेना कुपुत्रके उत्पन्न भेला सऽ उत्तम धर्म – श्रेष्ठ आचरण नष्ट भऽ जाइछ।

२४. यदाकदा मेघक कारण दिनमें सेहो अन्हार गुज्ज भऽ जाइछ आ कखनहु सूर्य प्रकट भऽ जाइ छथि जेना कुसंग पाबि ज्ञान नष्ट भऽ जाइछ आ सुसंग पाबि ज्ञान उत्पन्न भऽ जाइछ।

जय श्री राम! सीताराम सीताराम!

हरिः हरः!
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वर्षा ऋतु वर्णन

दोहा :
प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ।
राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ॥12॥

भावार्थ:-देवताओं ने पहले से ही उस पर्वत की एक गुफा को सुंदर बना (सजा) रखा था। उन्होंने सोच रखा था कि कृपा की खान श्री रामजी कुछ दिन यहाँ आकर निवास करेंगे॥12॥

चौपाई :
सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा॥
कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए॥1॥

भावार्थ:-सुंदर वन फूला हुआ अत्यंत सुशोभित है। मधु के लोभ से भौंरों के समूह गुंजार कर रहे हैं। जब से प्रभु आए, तब से वन में सुंदर कन्द, मूल, फल और पत्तों की बहुतायत हो गई॥1॥

देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा॥
मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा॥2॥

भावार्थ:-मनोहर और अनुपम पर्वत को देखकर देवताओं के सम्राट् श्री रामजी छोटे भाई सहित वहाँ रह गए। देवता, सिद्ध और मुनि भौंरों, पक्षियों और पशुओं के शरीर धारण करके प्रभु की सेवा करने लगे॥2॥

मंगलरूप भयउ बन तब ते। कीन्ह निवास रमापति जब ते॥
फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई॥3॥

भावार्थ:-जब से रमापति श्री रामजी ने वहाँ निवास किया तब से वन मंगलस्वरूप हो गया। सुंदर स्फटिक मणि की एक अत्यंत उज्ज्वल शिला है, उस पर दोनों भाई सुखपूर्वक विराजमान हैं॥3॥

कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरत नृपनीति बिबेका॥
बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए॥4॥

भावार्थ:-श्री राम छोटे भाई लक्ष्मणजी से भक्ति, वैराग्य, राजनीति और ज्ञान की अनेकों कथाएँ कहते हैं। वर्षाकाल में आकाश में छाए हुए बादल गरजते हुए बहुत ही सुहावने लगते हैं॥4॥

दोहा :
लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पेखि।
गृही बिरति रत हरष जस बिष्नुभगत कहुँ देखि॥13॥

भावार्थ:-(श्री रामजी कहने लगे-) हे लक्ष्मण! देखो, मोरों के झुंड बादलों को देखकर नाच रहे हैं जैसे वैराग्य में अनुरक्त गृहस्थ किसी विष्णुभक्त को देखकर हर्षित होते हैं॥13॥

चौपाई :
घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥
दामिनि दमक रह नघन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥1॥

भावार्थ:-आकाश में बादल घुमड़-घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया (सीताजी) के बिना मेरा मन डर रहा है। बिजली की चमक बादलों में ठहरती नहीं, जैसे दुष्ट की प्रीति स्थिर नहीं रहती॥1॥

बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।
बूँद अघात सहहिं गिरि कैसे। खल के बचन संत सह जैसें॥2॥

भावार्थ:-बादल पृथ्वी के समीप आकर (नीचे उतरकर) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान्‌ नम्र हो जाते हैं। बूँदों की चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टों के वचन संत सहते हैं॥2॥

छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥
भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी॥3॥

भावार्थ:-छोटी नदियाँ भरकर (किनारों को) तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धन से भी दुष्ट इतरा जाते हैं। (मर्यादा का त्याग कर देते हैं)। पृथ्वी पर पड़ते ही पानी गंदला हो गया है, जैसे शुद्ध जीव के माया लिपट गई हो॥3॥

समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा॥
सरिता जल जलनिधि महुँ जोई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई॥4॥

भावार्थ:-जल एकत्र हो-होकर तालाबों में भर रहा है, जैसे सद्गुण (एक-एककर) सज्जन के पास चले आते हैं। नदी का जल समुद्र में जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्री हरि को पाकर अचल (आवागमन से मुक्त) हो जाता है॥4॥

दोहा :
हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥14॥

भावार्थ:-पृथ्वी घास से परिपूर्ण होकर हरी हो गई है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते। जैसे पाखंड मत के प्रचार से सद्ग्रंथ गुप्त (लुप्त) हो जाते हैं॥14॥

चौपाई :
दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥
नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥1॥

भावार्थ:-चारों दिशाओं में मेंढकों की ध्वनि ऐसी सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियों के समुदाय वेद पढ़ रहे हों। अनेकों वृक्षों में नए पत्ते आ गए हैं, जिससे वे ऐसे हरे-भरे एवं सुशोभित हो गए हैं जैसे साधक का मन विवेक (ज्ञान) प्राप्त होने पर हो जाता है॥1॥

अर्क जवास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ॥
खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी॥2॥

भावार्थ:-मदार और जवासा बिना पत्ते के हो गए (उनके पत्ते झड़ गए)। जैसे श्रेष्ठ राज्य में दुष्टों का उद्यम जाता रहा (उनकी एक भी नहीं चलती)। धूल कहीं खोजने पर भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्म को दूर कर देता है। (अर्थात्‌ क्रोध का आवेश होने पर धर्म का ज्ञान नहीं रह जाता)॥2॥

ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी॥
निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा॥3॥

भावार्थ:-अन्न से युक्त (लहराती हुई खेती से हरी-भरी) पृथ्वी कैसी शोभित हो रही है, जैसी उपकारी पुरुष की संपत्ति। रात के घने अंधकार में जुगनू शोभा पा रहे हैं, मानो दम्भियों का समाज आ जुटा हो॥3॥

महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं। जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं॥
कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना॥4॥

भावार्थ:-भारी वर्षा से खेतों की क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतंत्र होने से स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतों को निरा रहे हैं (उनमें से घास आदि को निकालकर फेंक रहे हैं।) जैसे विद्वान्‌ लोग मोह, मद और मान का त्याग कर देते हैं॥4॥

देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं॥
ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा॥5॥

भावार्थ:-चक्रवाक पक्षी दिखाई नहीं दे रहे हैं, जैसे कलियुग को पाकर धर्म भाग जाते हैं। ऊसर में वर्षा होती है, पर वहाँ घास तक नहीं उगती। जैसे हरिभक्त के हृदय में काम नहीं उत्पन्न होता॥5॥

बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा॥
जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना॥6॥

भावार्थ:-पृथ्वी अनेक तरह के जीवों से भरी हुई उसी तरह शोभायमान है, जैसे सुराज्य पाकर प्रजा की वृद्धि होती है। जहाँ-तहाँ अनेक पथिक थककर ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्पन्न होने पर इंद्रियाँ (शिथिल होकर विषयों की ओर जाना छोड़ देती हैं)॥6॥

दोहा :
कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं॥15 क॥

भावार्थ:-कभी-कभी वायु बड़े जोर से चलने लगती है, जिससे बादल जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं। जैसे कुपुत्र के उत्पन्न होने से कुल के उत्तम धर्म (श्रेष्ठ आचरण) नष्ट हो जाते हैं॥15 (क)॥

कबहु दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग॥15ख॥

भावार्थ:-कभी (बादलों के कारण) दिन में घोर अंधकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं। जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है॥15 (ख)॥

हरिः हरः!

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७ मई २०१२
Mithila ke o har keerti mahan
Hey Shahid aha ke shat pranaam!!Kari Shat Pranaam Jagadamb naam
Kari Shat Pranaam Avalamb naam!!
Balidaan Aha ke Mithila Traan
Hey Shahid Aha Ke Shat Pranaam!!Mithila Ke O Har Keerti Mahaan!!
Hey Shahid ….

Achhi Ishak Bhumi Mithila Mahan
Banay Satya Dharma Atithi Saman!!
Tair Gel Aha Ke Aatma Naam
Hey Shahid Aha Ke Shat Pranaam!!

Mithila Ke O …
Hey Shahid Aha…

Bhal Kewo Katabo Kanthak Dhasaan
Bani Akkhaj Aayu Videhak Gaam
Mili Gel Aha Ke Har Ek Praan
Hey Shahid Aha ke Shat Pranaam!!

Dedicated to the Martyrs of Mithila Raj!!
Akhand Samsaar Mithila ke Raj!!

Harih Harah!!

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८ मई २०१२

We promote dowry free marriages for below reasons:

1. The pairs stand and hold the relationship for long life on righteousness and equality.

2. The children become proud of such parents who have tied the nuptial knot on high esteems of dowry free marriages without suppressing the natural and basic human rights of one another.

3. The surrounding people also feel proud of such pair who have sidelined the pious tradition of dowry for taking or giving gifts due to natural affections now ill-shaped and grooms’ sides impose several demands on brides’ sides – in case on non-fulfillment, they neither become good life partners nor they produce better children to give new lights and proper directions to the world.

4. Dowry free marriages would encourage building a new developed society without any cunning thoughts to ditch anyone.

5. It gives utmost satisfaction to the pairs and near-dear relatives for such sacred marriages too.

There are lot more reasons we want people follow the dowry free marriages and also promote the same to their society, friends, communities and everyone they meet. At least, every individual feels that this is his/her right to talk at least once with all and note the feeling about promoting dowry free marriages.

Dahej Mukt Mithila
Visit us at: www.dahejmuktmithila.org

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८ मई २०१२

सौराठ सभा आ सभ सऽ पैघ बाधा

सभा लागक चाही, सभ कहत। अहाँके प्रयास बड़ उचित दिशामें अछि – इहो कहत। भगवान्‌ अहाँ सभके सफलता प्रदान करैथ – प्रार्थना सेहो भऽ रहल अछि हर गाम में। … लेकिन सौराठ सभा के भूमि पर जखन पहुँचब तऽ समस्त ताजगी कोनो बाशी – गन्हाइत भोजक फेकलहबा आँठि-कुठि समान निस्तेज कोनो ढेरी समान नजर अबैछ… सभाके कन्छैर पर धकियेने दोकानदार आ ओहिठाम उपस्थित सौराठ गामके युवा लगायत फुर्सतके क्षण में मस्त अनेको लोक आ ओहि राहे गुजरनिहार बटोही सभ एक बेर पान-चाह के बहाने ओतय ठाड़्ह होइत छथि आ फेर कनेक काल शुरु होइछ सभाके पुरनका बड़का-बड़का गाथा – एक पर एक कहानी बस पान लगबिते समाप्त सेहो भऽ जाइत छैक… लोक सभ विस्मित-मिश्रित अन्दाजमें सभ बात सुनि अपन मन के मना चैल दैत छथि अपन मन्जिल दिस। छूटल लोक पाछाँ सऽ हा-हा-हि-हि करैत हुनक जिज्ञासा के मखौल उड़बैत फेर किछु पानक सिठ्ठी आ कूड़ा-कड़कट सभ ओहि आठि-कुठि ढेरी में आरो गन्हाइ लेल फेक अबैत छथि। रोड के ठिकेदार आ विभिन्न योजनाके पोषक ठक-ठेकेदार सभ के सेहो ई फ्री-फिल्ड अड्डाके रूपमें काज अबैछ। पाछू पड़ल अनेरुआ सभास्थल के उपयोग जेना होयत से करी एहि सोचके मानसिकता के कमी नहि ओहिठाम। अबस्था एतेक विपन्न जे केओ यदि जाय तऽ कानि उठय। कतेक रास कीर्ति सभ – कोनो आधा निर्मित तऽ कोनो पूरा बनल लेकिन सून्न-सपाट कतहु कौओ कुचरनिहार के बाट नहि। केहेन अभिशाप सऽ ई पुण्य भूमि अभिशप्त अछि? के थीक एहि श्रापके पाछू? कि गाथा अछि? एहि सभ पर शीघ्र एक लेख में समेटबाक चेष्टा कय रहल छी हम… अहाँ सभके निजी अनुभव आ विचार लेल आग्रह करैत छी।

हरिः हरः!

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हे शहीद! मिथिला राज बनत तखनहि अहाँ सभक आत्मा के शान्ति भेटत। यैह प्रार्थना आइयो इटहरी – सुन्सरीमें समस्त मैथिल समाज अहाँ सभके अपन हार्दिक श्रद्धाञ्जलि अर्पण करैत प्रण कयलनि।

हे शहीद! असमानता आ उत्पीड़न के जमाना आब नहि रहि गेल छैक, नेपाल नया संघीयतामें प्रवेश कय रहल अछि आ सभके अपन प्राकृतिक पहिचान – भाषा – संस्कृति – इतिहास के संरक्षण के पूरा स्वायत्तता-स्वतंत्रता छैक, संविधानमें सेहो एहेन ब्यवस्था हेतैक तखनहि नेपाल शान्ति पायत; अन्यथा उद्वेलन-आन्दोलन रुकत नहि आ सभ दिन लोक आपसमें मार-काट करैते रहि जायत। अन्ततः घर फूटे गंवार लूटेके हाल होयत आ मिथिला मधेस के ऐश्वर्यमें कमी आयत नहि कि आरो कोनो लॅलीपॅप सभ सऽ केओ केकरो बहला-फुसला सकैत अछि।

जय मिथिला! जय मधेश! जय नेपाल! जय जनमानस!

हरिः हरः!

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नेपाली पत्र-पत्रिकामा समाचार सम्प्रेषणका लागि दिएको प्रेस विज्ञप्ति अनुसार:

मैथिली सेवा समिति – इटहरी शाखाको आयोजनामा आज एक शोकसभा गरियो। जनकपुरको रमानन्द चौकमा मिथिला राज्यको माँग गरि रहेका सत्याग्रही माथि गरिएको बम प्रहारमा मारिएका शहीदहरु विमल शरण कुर्मी, झगड़ू दास, रंजु देवी झा, सुरेश उपाध्याय र दिपेन्द्र लाल दासको आत्माको चिर-शान्तिको कामना गर्दै शोक सभाको आयोजना गरियो। मैथिली सेवा समिति इटहरीका अध्यक्ष श्री हृदय ना. झाको सभापतित्वमा संचालित सभामा प्रमुख अतिथि केन्द्रिय महासचिव श्री प्रवीण चौधरी, उपाध्यक्ष श्री फूलकुमार देव लगायतका वक्ताहरु ले आफ्नो मन्तव्य राख्नु भएको थियो। समितिका सह-सचिव राजु राय ले स्वागत मन्तव्य दिनु भएको थियो भने कार्यक्रमको संचालन सदस्य श्री वासुदेव कर्ण ले गर्नु भएको थियो।

मैथिली सेवा समिति – इटहरी।

हरिः हरः!

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८ मई २०१२ – प्रा. परमेश्वर कापड़ि – मिथिला राज्य संघर्ष समिति केर संयोजक जे जिन्दा शहीद बनि अपन इलाज काठमांडू अस्पताल मे करा रहल छलाह, तिनकर जन्मदिन पर देल सन्देशः
Aha ke e janmadin par mubaarakbaad dait hruday prafullit achhi je Mithila ke naam ek ber fer vishwa ke maanchitra par laabayvaalaa aha ek Itihaas Purush ke roop me hamra sabhak beech sthaapit bhelahu. Ma Janaki aha ke safalta debe ta karati. Jay Maithili! Jay Mithila!!
हे नेपालक मिथिलाके इतिहास रचनिहार
अहाँके एहि जन्मदिन पर दी कि उपहार?निरंतर संघर्षमें डूबल अहाँ रहलहुँ मझधार
नहि डिगलहुँ अपन पथ सँ कहियो सरकारमुँहतोड़ जबाब भेटल ओहि गपके खेतिहार
गबैत गाथा निज नेतागिरीक न थकनिहार

जातिक झगड़ा एतय नहि अछि ई देखेनहार
ढोंगी-पाखंडी ई बाजि बस कन्नी काटनिहार

जे बुझय मोल मायक भाषा ओ दूधक भार
ओ कर्म करय नहि कि भभकी सँ डरनिहार

हे कापड़ि परमेश्वर मिथिला राजक कर्णधार
बनि रहत अहाँक मिथिला राज नीक संसार

हे नेपालक मिथिलाके इतिहास रचनिहार
प्रवीण के तरफ सऽ अहाँ लेल यैह उपहार!

जय मैथिली! जय मिथिला!

हरिः हरः!

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९ मई २०१२
कि तू गोल-गप्प टा देमें
आ कि किछु करबो करमें?बचपन तोहर खेलहि बितलौ
युवा अबस्था मेलहि बिततौ
कह के तखन खेतहि जोततौ
सभटा कि तू भरना लगेमें
आ कि किछु अपनो करमें?
कहियो पढाइ कहियो खेलाइ
कहियो दौड़ाइ कहियो हंसाइ
काज तखन बस बात हेराइ
गोल-गप्पहि तू समय गमेमें
आ कि किछु करमो तू करमें?

देख संसार के युवा आइ तों
तोरा सऽ कत दूर छौ बढल
अपन मातृभूमिक सेवा लेल
देक्सी करितो जँ किछु करमें
एहि सँ मिथिला राज बनेमें!

कि तू गोल-गप्प टा देमें
आ कि किछु करबो करमें?

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हरिः हरः!

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१० मई २०१२

भीजल कुकूर

शेरुआ सभक दुलारू छल मुदा कुकूर छल। एहेन कोनो दिन नहि जे शेरु के नाम लेनिहार केओ नहि छल ड्योढि पर। शेरुओ केहेन दुलारू जे भिनसर फल्लाँ बाबु ओहिठाम चाय पीबय तऽ ब्रेकफास्ट चिल्लाँ बाबु ओहिठाम आ लन्च-डिनर हर तरहक फेसिलिटी लेल अलग-अलग द्वारि छलैक ओकरा लेल। ड्योढि के बात छलैक, किछु नंगट धियापुता सभ शेरुआ के बेसी दुलरपना सऽ खीझय लागल। लेकिन केकरो खिझने कि हेतैक। कुकूर जँ दुलारू हुवे तऽ बुझियौक जे मालिक के माथ पर विराजमान रहैत अछि। कतबो केओ ओकरा किछु कहि दौक, लेकिन ओकर शेखी कम नहि होइत छैक। समय पर शेरुआ अपन हिसाब चुकबैत छल। एसगरे समूचा ड्योढिके सुरक्षा में शेर जेकाँ धर्म निर्वाह करैत छल। हाय रे शेरुआ!

एगो नंगट छौड़ा के पता नहि रहैक जे कुकूर के यदि मटिया तेल छूल हाथ सऽ छूबि देतैक तऽ कुकूर बताह भऽ जाइत छैक। कहबी छैक, कुकूर के नाँगैर उठा एक रत्ती मटिया तेल ढाइर देला सऽ ओ नंगचंग होइत हूड़दंग मचा दैत छैक। से दीपावलीके बेला बनेला के बाद ओ तऽ अपना भैर तैयो दुलारे करैक लेल गेल छल, मुदा शेरुआ पलैट के ओकरा बाँहि पर दकैच लेलकैक। छौड़ा छल नंगट लेकिन बुद्धि में ओकर लोहा सभ मानैत छलैक। ओहो कि केलक जे कुकूर के लेने-देने पोखैर में फाँगि गेल आ तेकर बाद मचल खेल। कुकूर के होइक जे हम ओकरा हबैक ली, नंगटा के होइक जे हम आइ एहि कुकूर के दुलरपना घोंसाड़ि दी। बस जहाँ अथाह पाइन में गेल कि सर्र दिना डूबकी मारि छौड़ा कुकूरबा के छोड़ि देलक आ ओकर संगी सभ मारि ढेपा ओहि कुकूर के पाइन सऽ बाहर नहि निकलय देलक। अफ-अफ करितो कुकूर तखन बिपरीत दिशामें भागल आ भैर नम्हर मूड़ा पोखैर टैप कऽ मन्दिर दिसन जा के पोखैर सऽ बाहर निकलल। लेकिन तेकर बाद कुकूर के एक सीख भेटलैक, ओ जहाँ नंगट छौड़ा सभ के ठाड़्ह देखय आ कि केकियैत दोसर दिशामें भागि जाय। बड़ समस्या भऽ गेलैक ओकरा लेल एक दिनके पोखरीक हेलाइ।

नेपालमें राजनीतिक अबस्था किछु भीजल कुकूर वाला बनल देखि आइ ई कथा स्मरण में आबि गेल। लोक करैत काल तऽ सोचबो नहि करैत छैक जे दुलरपना के अन्तिम गति दुर्दशा मात्र होइछ, बस दुलरपना के बहकावामें एहेन बहैत अछि जेकर कोनो परावार नहि। लेकिन आब देखियौक, एतेक छोट नेपाल में यदि वश चलतैक तऽ सभ अपन पहचान, अपन सम्मान, अपन शेखी लेल एक-दोसरके काँचे खा जेतैक। लेकिन जीवन कोना चलतैक तेकर चिन्ता केकरो नहि देखैत छियैक। नेपाल के जनता के सिहरैत भीजल कुकूर जेकाँ बन्दकर्ता नंगट सभ के देखिते पराइत देखैत छियैक आ भविष्य लेल कपार हाथ धेने बैसल तऽ मन काइन उठैत अछि। शेरुआ हमरो बड़ पसिन्न छल। लेकिन ओकर दयनीय अन्त हमरा आइयो कचोटैत अछि।

हरिः हरः!

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११ मई २०१२
जतेक लिखैत दर्द होइत अछि हमरा, पढितो अहुँक कष्ट होइत हैत!
इतिहास नहि छल एहेन कहियो, मिथिलाके खूनक नोर कनेने हैत!पुण्य भूमि जानकीजीके नगरी, सदा सनातन मिथिला राजधानीमें
अपन लोक अपनहि के मारलक, बस किछु पैसा के लोभ मात्र में
लेकिन बनल ई राजनीतिक हत्या, मधेस के नाम पर जनकपुर में!

ई बात घोर अपराध बनल अछि, कहैत अछि समस्त संसार सुनू
लेकिन मधेसवादी किछु लोक, बुझैत अछि मिथिला के निज शत्रु
मधेस टूटल जातिक नाम पर, थारु-मुसलिम-जनजाति आने बरु!
मिथिला तऽ रहल सभ दिन ओतय, मैथिली के बोली प्रिय वाणी
सुकुमारि सिया सन बेटी एतय, बस एक विद्या धन सऽ विद्यापति
के नहि जानैछ जे मैथिल आ मिथिला के पहचान प्रीतिक प्रकृति!

पहुँचू जनकपुर हे मैथिल, बरु प्राण जाय या रहय एहि जग धार
काल्हिये १२ मई २०१२ के, वैशाखक ३० गते करु आर या पार!

हरिः हरः!

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It was indeed the moment of greatest pleasure for every Indian. The superior world did not want it.It was the brilliant enterprise of NDA Governance and very specially of Atal Jee – the Man in White Dhoti-Kurta-Bandi and that also of George Fernandes – the Hero of his time with determined mind-set always in Pajama-Kurta and what to mention of the Man behind success – Dr. A. P. J. Abdul Kalam; the trio deserves kudos always from heart of every dedicated Indian. I remember, America then had imposed economic sanctions on India; and Atal Jee had given a very hard reaction to that – India does not require to beg before anyone in world. He proved it. Despite America imposed that hard economic sanctions, NDA did so well in its early ears that every Indian started saying from core of heart that India is shining. However, the over ambitious leaders of BJP filled with pride could not understand well the nerves of allies from Non-Hindi spoken areas and that ditched India for long. The crushed Congress again came in power due to those corrupt friends of NDA. In politics also, there is need of morality, minus this we cannot go ahead as India after NDA could not maintain the same pace and speed of development together with a feeling to a common Indian that India glows its glories to entire world. We are once again seeing the appeasement all around and corruption riding over heads of all. Atal Jee is too old to come back in power, but BJP and NDA allies must think on his directions of ruling over India. His governance could give a lot to India and also to the world communities.

Harih Harah!

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१२ मई २०१२

जीवनके अनुभव

जहिया सऽ ज्ञान होइत छैक लोक एक मुख्य बात पर ध्यान दैत छैक जे लौकिक व्यवहार कोना चलत – भले बचपन के समय अपन श्रेष्ठ के आज्ञानुसार चलैक बात हो या किशोरावस्थामें अपन निज अस्तित्व के ट्रायल, फेर युवावस्थामें स्वच्छन्द आचरण करय के अनुभूति आ तकर बाद विवाह उपरान्त जिम्मेदारी के अनुभव करैत धिया-पुताके पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा, स्वास्थ-परिचर्चा एवं अन्य… हरेक समय मनुष्यके मानुषिक आचरण में रत रहब स्वाभाविक छैक।

जौँ-जौँ समय बीतल जा रहल छैक लोक में लोभ-लालच आ सांसारिकता के प्रसार बढल जा रहल छैक। देखियौ एहि समाचार में – द्वितीय विश्वयुद्ध जे रुसके धरती पर लड़ल गेल छलैक आ लाखो सैनिक के जान गेल छलैक – अर्थात्‌ शहीद भेल छलैक, तेकर कब्र के खुनि ओहिठाम सऽ विभिन्न प्रकार के हथियार, गोला-बारुद, क्रास, हेलमेट, सैनिक के हाथ में पहिरल अंगूठी आदि के लूटेरा कोना किछु पैसा के खातिर कय रहल छैक।

कि पैसा के मोल एतेक बैढ गेल छैक? कि लोक में नैतिकता के एतेक पैघ ह्रास भऽ गेल छैक? आखिर लौकिक व्यवहार में मानवता के घटोत्तरी कोन बात के अग्रिम द्योतक थीक? कोनो तूफान सऽ पहिने जे विरानी अबैछ से तऽ नहि?

हरिः हरः!

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आत्म-निरीक्षण

देखू! देखू! मिथिलाके लोक कोना मैथिली संग करैत छथि दुर्व्यवहार!
स्वयं बदैल रहल छथि मिथिलामें मैथिली सन के मीठ भाषा के व्यवहार!

एहि गाम के हम बहुत पैघ प्रशंसक रही, छिहो। गाम में एक सऽ एक कर्मठ परिवार आ पुत्र जे नहि सिर्फ अपन गाम के शान छथि बल्कि भारत या विश्वके कोनो कोणमें अपन प्रखर आ संस्कार के सुगंध सऽ सुवासित रखने छथि। लेकिन आइ हमर भ्रम सच साबित भऽ रहल अछि जे मधुबनी के बहुतो गाम सऽ मैथिली के पलायन भऽ गेल छैक। सभ सऽ बेसी परित्याग मधुबनीमें भेल अछि मैथिली के… जे कि मिथिलाके गढ मानल जैछ – ई आरोप प्रमाणित भऽ रहल अछि। नहि तऽ भैरव स्थान सन के गाम के अड़ोस-पड़ोस सऽ कीर्तन-प्रेमी सत्संगी सभके नवाह संकीर्तन कार्यक्रममें आमंत्रित करय लेल हिन्दीके सहारा लेबाक कोन जरुरी छैक? कहैत चली जे मैथिली-मिथिलाके दुर्दशा करनिहार आन नहि, मैथिल स्वयं बेसी जिम्मेवार छथि।

ओना धार्मिक अनुष्ठान्‌ के एहि कार्यमें सभ कुशल-मंगल साथ पूरा होय एहि लेल सिद्धि विनायक सँ प्रार्थना करैत छी।

हरिः हरः!

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१३ मई २०१२

अहाँ मिथिला के माय

मिथिला के शहीदपुत्र
विमल शरण के माय
अहाँ मिथिला के माय
विमल मिल गेल
सिया सम धरामें
बस मिथिला लेल
पुत्र मैथिल बुझय
अहाँ मिथिला के माय
कोन तरहें प्रकट करी
मनके असीम वेदना
बस प्रणाम करी
एहि महान्‌ माय
अहाँ मिथिला के माय
विमलपुत्र के जनलि
शहीद बनला भाइ
अहाँ मिथिला के माय!

हरिः हरः!

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१५ मई २०१२

युवामें जागरुकता

आजुक युग में संसार के युवा सभ इन्टरनेट के माध्यम सऽ अपन आवाज दुनिया में पसारैत अछि आ एहि सँ सभमें आवश्यक जागरुकता सहजता के संग पसैर रहल अछि। आइ मिथिलांचल के युवा के जोड़य लेल जे ई उपाय कैल गेल अछि ओ बहुत बेहतर आ निरंतर एहि मार्फत सऽ मिथिलाके युवा अपन मातृभूमि आ मातृभाषा प्रति सजग बनैत रक्षा के लेल तत्पर हेता ई हमरा विश्वास अछि।

हम समस्त मित्र मंडली सँ आग्रह करब जे मिथिला के फेसबुक याने निम्न वेबसाइट पर अपने लोकनि जरुर शामिल होइ।

http://mithilanchal.wall.fm (एहि पर क्लीक करू आ आवश्यक निर्देशानुसार अपन प्रोफाइल बनाउ, तदोपरान्त अपन विचार एक दोसर के संग शेयर करू, ठीक जेना फेसबुक पर करैत छी।)

सुनबा में आयल अछि जे फेसबुक आइ न काल्हि प्रिपेड होवयवाला अछि… एहि लेल मिथिला के ऊपर जतेक महत्त्वपूर्ण विचार सभ अछि से फेसबुक पर मात्र नहि शेयर कय के अपन-अपन योगदान के सुरक्षित करय लेल विचार जरुर करी। मात्र मनोरंजन लेल जे छी तिनकर कोनो बाते नहि… !

बम बैद्यनाथ!

हरिः हरः!

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समझौता जिस शर्त पर भी जरुरी था और पहली बार मुझे अच्छा संकेत दिख रहा है कि लोगोंमें सद्‌बुद्धि प्रवेश किया है और प्रदेश का नाम या किसी भी झमेले को जनमत संग्रह से सुलझायें… राजनीति करनेवालोंसे ऊपर की बात है और जनता की शक्ति दिखानेकी बात है। चलो! अब तो सबोंके मुँह पर ताले जड़ेंगे। और जैसे भी माँगोंको केवल जनता ही जायज या नाजायज करार दे सकती है। अपने कल्याण के लिये फालतू मुद्दोंका राजनीतिबाजोंके चक्करमें पड़कर अशान्ति आखिर कब तक झेले आम जन? यह सहमति नेपाल के लिये अच्छा भविष्यको दीखानेवाली है।

इसके आगे कुछ नहीं मालूम। राजनीति करनेवालोंकी दुकानें तो पब्लिकमें झगड़ा लगने से ही चलती है, तो अब यह आम जनोंको समझना होगा कि उनके दुकान चलानेके लिये खुद मरो-कटो या फिर शान्तिपूर्ण ढंग से अपनी पहचान अनुसार प्रदेशका नाम चुनो। सीमा अंकन न होना फिर से काम अधूरा दिखा रहा है… पर समझौता के लिये थोड़ा आगे चलना जरुरी है।

हरिः हरः!

http://onlinekhabar.com/2012/05/162949.html#comment-39346

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१६ मई २०१२

मिथिला (नेपाल)

काल्हि ११ प्रदेश बनायब ताहि विन्दु पर बिना नाम व सीमा निर्धारित केने नेपाल में राजनैतिक दल (प्रमुख उत्तरदायी दल जेकरा सभ लग पूर्ण बहुमत उपलब्ध छैक) सहमति बनेलक। एहि सँ नेपालमें लगभग सभ जात-जाति-संस्कृति-भूगोल-भाषा के समग्र रूप पर विचार करैत बादमें प्रदेशके नामकरण होयत। यदि विवाद तैयो नहि सुलझत तऽ बादमें जनमत संग्रह कराबैत समस्याके निदान निकालल जायत। एतेक भेला के बाद लगभग सभ असन्तुष्ट पक्ष के बात पर सम्बोधन भेल मानल जा रहल अछि। एहिमें मिथिला जेकर गरिमा आर कोनो प्रदेश सऽ उच्च छैक पुनः अपन स्थिरता के ग्रहण करय, हम यैह कामना करब। चाहे जाहि आधार पर हो, एहि प्रदेशके अपन प्राकृतिक स्वरूप छैक आ ताहि लेल एकर अपन राज्य बनब तय छैक।

रहल बात राजनीतिक दुकानदारी के… तऽ ओ एखन नहि रुकत, इहो तय छैक। मधेस के समग्रता एकटा महत्त्वपूर्ण आ जरुरी विषय छलैक। आब जेना ई विषय अपन विभिन्न अपरिपक्व आ अदूरदर्शी निर्णय के कारण रसातल में जाइत बुझा रहल अछि। लेकिन यदि पहाड़ी शासक वर्ग पुनः अपन चेतना मधेस या मधेसी के प्रति सम्मान नहि राखत तऽ कहियो ई आन्दोलन उग्र रूप लऽ सकैत अछि आ ओ युद्ध शायद पहिले भेल सभ युद्ध (आन्दोलन) सँ वीभत्स आ निर्णयात्मक होयत।

आजुक परिस्थितिमें नेपाल के संक्रमण काल बेसी लंबा करबाक क्षमता नहि रहला के कारण सहमति उन्नैस-बीस करैत करब जरुरी छल, शायद एहि बात के आत्मसात्‌ करैत जे सहमति ११ प्रदेश बनायब ताहि पर भेल, एहि सँ पहाड़ी शासक वर्ग आ सहिष्णु मधेसवादी मध्य-धारामें राष्ट्रमें शान्ति चाहनिहार सभ प्रसन्न अछि आ संविधान बनय के आशा पूर्ण रूपमें बनल देखि रहल अछि। क्रमशः आगामी समय में अन्य महत्त्वपूर्ण विन्दु पर आपसी सहमति मात्र रास्ता बनत जे सभ समस्याके निदान ताकत। नेपाल अत्यन्त लंबा राजनीतिक अस्थिरतामें अपन बहुत किछु पहिले गुमा चुकल अछि आ आबो यदि अनिश्चितता के त्याग नहि करत तऽ एहि राष्ट्र के अस्मिता पूर्णतः धुमिल होयबाक भय बुद्धिजिवी व सम्भ्रान्त नागरिक समाज देखि रहल छथि।

राजनीति करनिहार सँ अपन भविष्य के सुरक्षा लेल होशियारी देखायब जरुरी, नहि तऽ कम से कम एतेक तऽ तय अछि जे आगामी समय में एहेन राजनीतिज्ञ के लोक अपन क्षेत्रमें प्रवेश लेल तक आज्ञा नहि दैथ तऽ एहि में अतिश्योक्ति नहि होयत।

मिथिला के स्वरूप पर विकिपेडिया में प्रस्तुत कैल बहुत बात जानकारी लेल महत्त्वपूर्ण अछि। एक बेर जरुर समय निकालि देखी आ एहि में संशोधन लेल सुझाव सुम्पी।

हरिः हरः!

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१७ मई २०१२

प्रिय मित्र!

हम अहाँके सूचित करय लेल चाहब जे फेशबुकके दलानपर दहेज मुक्त मिथिला नामक एक ग्रुप खुलल अछि जेकर लिंक अछि https://www.facebook.com/groups/dahejmuktmithila/ आ हमरा लोकनि एहिसँ जुड़ल छी, अपने सेहो जुड़ी। मिथिला के दहेजक दानव सऽ मुक्ति लेल अहाँके नाइन टा के योगदान सऽ इ मूहिम बहुत आगू बढतैक।

बेटा-बेटी एक समान।

दुनूके होइ एकहि सम्मान॥

माँगरूपी दहेज के विरोध करबाक छैक – आर्थिक रूप सऽ पिछड़ल परिवार के उत्थान के प्रयास करू। सक्षम परिवार के सेहो दहेजके माँगपूर्तिमें आर्थिक दशा बिगड़ैत छैक। तखन कमजोर वर्ग के आगू केहेन समस्या हेतैक, स्वतः भयावह एवं समाजके विभिन्न वर्गमें बाँटयवाला छैक जाहि सँ अपराध, कदाचार, अनाचार, भ्रष्टाचार आदिके बढोत्तरी होइत छैक। दहेज के पैसा सही ढंग सऽ उपयोग सेहो नहि होइत छैक। लोक आडंबरमें डूबैक लेल बाध्य होइत छथि। अनावश्यक खर्च आ फेक-फेका बेसी होइत छैक। अहु सभ सऽ बेसी घातक जे बेटीके असम्मान होइत छैक। बरु, बेटीके पैतृक संपत्तिमें अधिकार देल जाय। प्रसिद्ध सिने अभिनेता हालहि पटना आयल छलाह तऽ घोषणा कयलाह जे हमर वसीयतमें श्वेता आ अभिषेक लेल फिफ्टी-फिफ्टी के बात उल्लेख छैक। बिलकुल! हमरा लोकनि गौर कऽ के देखी जे आखिर कि बात छैक जे मिथिलाके ललना एतेक पाछू छथिन। सिर्फ पुरुषवादी सोच टा एकर कारक छैक आ कि इ मजबूरी जे बेटीके विदाई बेटीके बाप लेल सिरदर्द छैक जेकरा खातिर बेटावाला ब्लैकमेलर बनैत छथिन?? विडंबना जे बेटी आ बेटा हर परिवार में छैक… तदापि बेटी बेर में दरिद्रा आ बेटा बेर में ओ पौरुष जेकर कि उदारता बुझू हिमालय पहाड़… बफ रे बफ… ताहि समयमें जे बापके नाक आ मर्यादा रहैछ… हाय यौ जी… बेटी बेर में वैह बाप के गर्दन गार्तमें रहैछ। ओह!! बहुत भेलैक नाटक। एहि एकीसम सदी में यदि मिथिलापुत्र स्वयं एहि लेल कमर नहि कसता तऽ बेटी-बहिन कहियो आगू नहि बढतीह आ इ एक प्रकार के मिथिलापुत्रीके जानि-बूझि पाछू ठेलयवाला बात हेतैक। एहि विरोध कार्यक्रम में समेत बेटी-बहिन के सहभागिता शून्य छैक… किऐक… तऽ जेकरा लेल इ समस्या छैक ओकरा लग इन्टरनेट के इ तक नहि छैक। जे सम्पन्न परिवार के बेटी छथिन हुनका कोन छैन। बाप कमाके होइ वा कर्जा कऽ के वा बासडीह बेचि के… हुनकर काज ओ करबे करथिन… कोनो सम्पन्न परिवारमें ओ जेबे करतीह। हुनका कोनो उम्र भेलैन अछि अहि प्रकार के विरोध कार्यक्रम में सहभागी बनक लेल!! जिनकर उम्र भेलैन ओ एखन यौवन मेला में भ्रमण कय रहल छथि, गाम सऽ बाहर पतिके संग एखन शहर पहुँचि गेल छथि। पतिदेव कमाके पूर्ति कैये रहल छथिन। के जाइछ एहि झमेला में!! आ जे उम्रदार महिला छथिन, ओ तऽ सहजहि… नहि तऽ बेसी साक्षर आ नहिये हिम्मतगैर… तखन के सम्हारत एहि विरोधके एहि बागडोर के??? केवल मिथिलापुत्र!! केवल युवावर्ग!! ताहि हेतु आह्वान अछि अपने मित्रवर्गमें जे एहि मूहिम के सहयोग हेतु कम से कम एहि धारमें अपने जुड़ी। शपथ ली – दहेज नहि लेब, नहि देब। बेटा-बेटी के सेहो नहि लेब वा देब। जे केओ एहेन लेनदेन के व्यवहार करैथ, ताहिमें सहभागी तक नहि बनब। एहि शपथ के संग अपने दहेज मुक्त मिथिलाके सदस्यता ग्रहण करैत एहि मूहिम के हर गाम, हर शहर आ हर प्राणी तक पहुँचय में सहयोग करू। आब इच्छूक दहेज मुक्त विवाह करनिहार अपन परिचय आदि एकर अफिसियल वेबसाइट पर सेहो राखि सकब – www.dahejmuktmithila.org पर। आगामी २८ सेप्टेम्बर २०११ कलशस्थापना के दिन एक कलश एहेन स्थापित करी, एहेन जयन्ति पारी जे ईश्वर-कृपा सऽ मानवकल्याणकारी होइक – एहि कार्यक्रम जे दिल्लीमें होयत, अपने सेहो सहभागी बनी आ एहि कार्यक्रमके सफलता हेतु सेहो अपन अमूल्य सहयोग दी, से सभ मित्रवर्गमें हार्दिक अनुरोध अछि।

जय मैथिली! जय मिथिला!!

हरिः हरः!!

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१९ मई २०१२

मिथिला समाज में पुरुष प्रधानता के कारण महिला पाछू छूटल छथि एहि में दू मत नहि। लेकिन प्राचिन मिथिलामें मैथिली (मैथिल पुत्री) में एक पर एक विदुषी होयब एहि बात के सूचक बुझैछ जे शिक्षा में मिथिलाके महिला प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूपमें सहभागी रहलीह आ हिनक मस्तिष्क कमजोर नहि रहलनि। आधुनिकतामें सेहो भले ओ उच्च-स्तरीय पढाइ करैत छथि वा नहि, लेकिन प्राकृतिक मजबूत दृढशक्ति, स्मृति, विचारक क्षमता, व्यवहार-कुशलता आ आवश्यकतामें प्रखर प्रदर्शन एहि बात के प्रमाणक अछि जे मैथिलानी कोनो दृष्टिमें संसार के महिला सऽ पाछू नहि छथि।

ओनाहू कहल जाइत छैक जे एक पुरुष पहिया मात्र जँ चलतैक तऽ जीवनरूपी गाड़ी बहुत आगू नहि चलि सकैत छैक। अतः नारीरूपी पहिया के मजबूती प्रदान करब, माता-पिता-पति-परिजन-परिवेश पर निर्भर करैत छैक।

नारी लेल शिक्षा के तहिना वकालत कैल गेल अछि जेना ढोल, गंवार, शुद्र आ पशु लेल। तुलसीदासजी एहि पर लिखने छथि: ढोल गंवार सूद्र पसु नारी – ये सब है ताड़न के अधिकारी। ताड़ब के दू अर्थ निकलैछ लौकिक व्याख्या में – एक जे ताड़ना याने प्रताड़ना – तात्पर्य बुझाबय लेल दण्डरूपी हिंसा के उपयोग आ दोसर जे शिक्षा लेल उपदेश आ प्रशिक्षण। प्रथम के सेहो अन्तिम अर्थ शिक्षा मात्र सऽ जुड़ल छैक। भले ढोल पर लोक हाथ चलबैत हो या पशु या शूद्र या नारी – एकर अन्यथा अर्थ नहि निकालि केवल एतबी बूझल जाय जे सामंजस्य बनाबय लेल आवश्यक शिक्षारूपी दण्ड यदा-कदा उपयोग कैल जैत छैक। लेकिन आजुक समयमें नारी के जगह कतेको व्यभिचारी पुरुष सेहो नारी द्वारा ताड़ना पबैत उदाहरण देखल जा सकैत छैक। नारी के द्वारा पुरुष के पोषण सेहो होवय लागल छैक। तखन समाजमें सामंजस्य लेल अनुचित आ अन्याय के हराबी, हम सभ ई संकल्प ली।

हरिः हरः!

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२० मई २०१२

प्रश्न: हे भगवान्‌! हमरा लेल आइ स्वाध्यायमें अहाँके तरफ सऽ कि आदेश अछि?

भगवान्‌: बौआ! हाथमें गीता लियऽ आ आँखि मुँदिके कोनो एक पन्ना निकालू आ फेर आँखि खोलू… सोझाँ जे श्लोक आबय तेकर अध्ययन करू आ सभके लेल फेसबुक मार्फत बाँटि दियौक।

हम: धन्यवाद प्रभुजी! हम अपनेक आदेशानुसार अहिना कयलहुँ आ निम्न श्लोक सभ सोझाँ आयल से स्वयं सहित सभक लेल राखि रहल छी।

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥६-२०॥
सुमात्यन्तिकं यत्तद्‌बुद्धिग्राह्ममतीन्द्रियम्‌।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥६-२१॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥६-२२॥
तं विद्याद्‌दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्‌।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥६-२३॥

When the mind, absolutely restrained by the practice of concentration, attains quietude, and when seeing the Self by the self, one is satisfied in his own Self; when he feels that infinite bliss – which is perceived by the purified intellect and which transcends the senses, and established wherein he never departs from his real state; and having obtained which, regards no other acquisition superior to that, and where established, he is not moved even by heavy sorrow; let that be known as the state, called by the name of Yoga – a state of severance from the contact of pain. This Yoga should be practiced with perseverance, undisturbed by depression of heart.

Harih Harah

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२३ मई २०१२

बात ई नहि जे कतेक अर्थ या सामग्री के संकलन भेल आ एहि सँ औरही (सिरहा) अग्निकाँड के पीड़ित लेल कतेक सहयोग हेतैन – मूल विन्दु ई छैक जे मानवता के मर्म आखिर विराटनगरवासी में छैक आ ताहि अनुरूप सिरहा सऽ बहुत दूर विराटनगर जे वास्तवमें एक विकसित प्रदेश के रूपमें छैक एहिठाम लोक में विचार छैक आ तत्परता सेहो। मैथिली सेवा समिति – विराटनगर अपन कार्यक्रम अन्ना हजारे के ऊपर भारतीय प्रहरी के अत्याचार के विरोध हेतु भारतीय दूतावास में ज्ञापन देला सऽ हो – जनकपुरमें बम हमला में शहीद बनल मिथिला-राज्य माँग करनिहार लेल श्रद्धाञ्जलि सुमन अर्पण कयला सऽ हो – साहित्य-संस्कृति संरक्षण लेल विद्यापति स्मृति पर्व समारोह मनेला सऽ हो – लैंगिक विभेद अन्त करबाक लेल जागृतिमूलक संकल्प दिवस मनेबाक सऽ हो… समय-समय पर अपन कार्यक्रम करैत मैथिलमें एकजूटता के संदेश दैत आयल अछि। एहि सँ एक सुन्दर भविष्य बनैत देखि रहल छी। मैथिलीभाषी मृदु होइत छथि, मानवता लेल सनातन अपन योगदान दैत आयल छथि। राजनीतिक माहौल बिपरीत रहला के बावजूद अपन ध्यान मानवता प्रति समर्पित राखब व्यक्तिगत हमरा बहुत चुनौतीपूर्ण लागल, लेकिन एकर सराहना हम स्वयं कोनो शब्द में नहि कय सकैत छी। एहि में अनिल मल्लिक जी के उत्साहजनक सहयोग सऽ आत्मविश्वास एतेक बढल जे आगामी समय में आरो सुन्दर कार्यक्रम करबाक प्रतिबद्धता जाहिर करैत छी।

विराटनगर के समस्त समाज की जय!

जय मैथिली! जय मिथिला!

सेवा हि परमो धर्मः।

मानवता सऽ पैघ कोनो मूल्य नहि!

हरिः हरः

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२४ मई २०१२

मानवमें शक्तिसाली बनबाक होड़

ओ चाहे जाहि विधा के अपनेला सऽ किऐक नहि हो, परन्तु सभ मानवमें शक्तिसाली बनबाक एक अजीब प्रवृत्ति होयब प्रकृति के देन बुझैछ। जेना पैघ मांसाहारी जीव छोट के माइरके खाइ के स्वभाव रखैत छैक, ठीक तहिना शक्तिसाली बनबाक होड़ अपन-अपन ढंग सऽ हर मानवमें देखल जाइछ।

इतिहास रहलैक अछि डायन-जोगिन के – श्मसान साधक – अघोड़ी – तांत्रिक – ओझा – भगता आदि के! हिन्दू धर्माचरण में शक्तिके उपासना के विशेष परंपरा देखल गेल छैक। मार-सम्हार दू किसिम के धार पर लोक शक्ति के उपासना करैत अछि। हलाँकि विज्ञान एहि आधुनिक काल में सभटा के एक तराजू ‘अंधविश्वास’ में राखि सभ बात के एकमात्र मनोवैज्ञानिक प्रभाव कहि समाप्त करैक प्रयास करैत छैक, आ शिक्षित वर्ग एहि तरहें विज्ञानमें बेसी विश्वास करैत छैक नहि कि वैह पुरान रूढिपूर्ण परंपरा आ अंधविश्वास के कारण कतहु अपन जीवनशैली के प्रभावित करैत छैक। यदि कतहु एहेन बात छहियो तऽ ओ नगण्य छैक आ विज्ञान के धारणा अनुसार मात्र मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कारण यदा-कदा पढल-लिखल परिवारमें आइयो एहेन तरहक अंधविश्वास बनैत छैक। लेकिन अशिक्षित आ कमजोर वर्गमें आइयो शक्ति-प्राप्ति लेल उपरोक्त विधा के बहुत महत्त्व छैक।

राग आ द्वेष के कारण मानुषिक व्यवहारमें एहेन शक्ति प्रति आकर्षण आयब स्वाभाविक छैक आ सनातन नियम सेहो छैक। गीतामें श्रीकृष्ण बहुत सुन्दर ढंग सऽ एना रहस्योद्‌घाटन केने छथि:

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्‌ संजायते कामः कामात्‌ क्रोधोऽभिजायते॥२-६२॥
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्‌बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥२-६३॥

भावार्थ:
ईश्वरके शरणागत (परायण) नहि बनैत – जे विषयके चिन्तन करयवाला पुरुष अछि तेकर विषयमें आसक्ति भऽ जाइछ, आसक्ति सऽ कामना उत्पन्न होइछ, आ कामना सऽ क्रोधके उत्पत्ति होइछ (कारण हर कामना के पुर्ति लेल साधन नहियो रहलापर कामनापुर्तिके तीक्ष्ण भाव आसक्ति द्वारा उत्पन्न कामना में होयब स्वाभाविक छैक।)॥२-६२॥ क्रोध सऽ विवेकशून्यता होइत अछि, अविवेक सऽ स्मृतिके भ्रंश (नाश) आ स्मृतिभ्रंश सऽ बुद्धिके नाश होइत अछि। बुद्धिके नाश सऽ स्वयंके नाश होइछ, संसारसागरमें डूबब निश्चित होइछ॥२-६३॥

अवश्य उपरोक्त सिद्धान्त हरेक मनुष्यके अपन जीवन के दिशा-दशा निर्धारण में बली बनैछ। एहि लेल पुनः ईश्वरके एक सुन्दर दिशा-निर्देशन देल गेल अछि जे योगी आ संत पुरुष अवश्य अपन आचरण में धारण करैत अछि।

रागद्वेषवियैक्तस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌।
आत्मवश्यैर्विद्येयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥२-६४॥
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि पर्यवतिष्ठते॥२-६५॥
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शातिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌॥२-६६॥

भावार्थ:
जे मनके वशमें रखनिहार पुरष राग-द्वेष सऽ रहित आ अपन वशमें कैल इन्द्रिय द्वारा विषयके भोग करितो अन्तःकरणके निर्मल बनबैछ, अन्तःकरणके निर्मलता सऽ ओकर समस्त दुःखक नाश भऽ जाइत छैक, किऐक तऽ प्रसन्नचित्त पुरुषके बुद्धि अतिशीघ्र स्थिरता प्राप्त करैत छैक॥२-६४/६५॥

लेकिन ईशमें मनक निक्षेप नहि करनिहार केर बुद्धि आत्मविषयक नहि रहलाके कारण एहेन अयुक्त पुरुषके आत्मविषयक भावना सेहो नहि रहैत छैक। भावनारहित पुरुषके शान्ति नहि भेटैत छैक। आ अशान्त पुरुषके भला सुख कोना?  (गीता २-६६).

वर्तमान प्रसंगमें एक महिला डायन बनय लेल गुरुके आज्ञानुसार पहिले अपन ३ वर्षक भतीजा के बलि-प्रदान देलक आ पूलिसके छानबीनमें आगां गुरु के कथनानुसार अपनो बेटा के बलिदान देबाक सोच रखने छल से स्पष्ट केलक अछि। एहि डायन लेल वीभत्स अपराध के बोध कम आ शक्ति-सामर्थके भूख बेसी उपरोक्त गीताके सीख के व्यवहारिक रूपमें ग्रहण करैक लेल पूर्ण अछि।

पाठक/साधक वर्ग सँ निवेदन जे अन्तःकरण के शुद्धि इन्द्रियके वशमें राग-द्वेष रहित भऽ के अपन-अपन मानवीय जीवन उच्च मूल्यांकन करी आ समाज के शुद्धीकरणमें सहयोगी बनी।

हरिः हरः!

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मन झूमि-झूमि नाचय जहिया भेट होइथ मिथिला के ओ संतान
जिनकर मिथिला प्रति बनल रहैछ किछु करय के विचार महान!अवश्य आइ फेर हमरा लेल एक अत्यन्त शुभ दिन छल कारण एक पर एक मैथिल विद्वान्‌, विचारक, कार्यकर्ता, नेतृत्वकर्ता आ विचाररूपी यज्ञमें उपस्थित समस्त प्रणेता के दर्शन भेल।नहि मात्र नयन जुड़ायल बल्कि अपनेक लोकनिक सान्दर्भिक आ ज्ञानवर्धक जानकारी सभ सुनि मन आनन्दित भेल। डा. अशोक अविचल, अनन्त झा, प्रेमकान्त झा, बिमला देव, डा. नित्यानन्द लाल दास, डा. कमलकान्त झा, रत्नेश्वर झा, डा. धनाकर ठाकुर, श्रीमती करुणा झा, श्रीमती साधना झा, शुभचन्द्र झा, सुधीर नाथ मिश्र, डा. मोती लाल शर्मा, प्रमोद चन्द्र ठाकुर, भु.पू. विधायक लक्ष्मी ना. मेहता, प्रमोद चन्द्र ठाकुर, उदय शंकर मिश्र, ई. राम प्रसाद देव, डा. रविन्द्र कुमार चौधरी, डा. शंभु नाथ झा, राम नारायण चौधरी, अभयशंकर झा, अमलेश झा, प्रमोद कुमार झा, संजय कुमार ठाकुर, शिवचन्द्र कलाकार, बिरेन्द्र प्रसाद, राम प्रकाश यादव, मोहन दास राय, प्रकाश कुमार, नरेन्द्र कुमार पाण्डेय, कृत्यानन्द राय, रश्मि कुमारी, रामानन्द ठाकुर, किरण झा, रेणु झा, शंकर झा, उमाशंकर प्रसाद, गिरिजानन्दन झा, अमरनाथ झा, गजेन्द्र प्रसाद वर्मा, हर्ष ना. दास, रामा नन्द झा, निखिलेश झा, मोहन मिश्र, अरविन्द ठाकुर, मनमोहन झा, एवं अनेको गणमान्य मैथिल सुधिजन – अपनेक लोकनिक विचार आ मिथिला राज्य लेल प्रतिबद्धता सुनि मन में विश्वास जागल जे भले संसार कतबो मिथिलाके पहचान समाप्त करय लेल शपथ खा लेने हो – भले कतेको मैथिल स्वयं अपन आत्मीयता के प्रेम सऽ बिछैड़ गेल होइथ आ अपन पहचान संग अपनहि शत्रुता करैत होइथ – लेकिन मिथिला सनातन छल, अछि आ रहत। भौगोलिक पहचान सेहो जल्दिये बनत।

Aajuk vishay chhal: Bharat me Mithila Rajya

Ehi kaaryakram me Nepal ke samvidhaan me Mithila ke sammaanjanak sthaan lel seho shubhkamana del gel.

Harih Harah!!

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२७ मई २०१२

मिथिला राज्य निर्माण में बाधा के मूल विन्दु आपसी एकता में कमी, स्वयं के मैथिल रूपमें पहचान करनिहार के अन्तर्मन में द्वंद्व आ येन-केन-प्रकारेन अगड़ा-पिछड़ा तथा जातिवादिता के नाम पर बँटल मैथिल जनता मात्र अछि।

मिथिला राज्य निर्माण लेल ब्राह्मणवादी बेहाल रहैछ – ई आरोप लगबैत छथि मिथिला के बहुल्य संख्या जाहिमें अधिकतर पिछड़ा वर्ग आ जातिके विद्वान्‌, नेतृत्वकर्ता, समाजसेवी, कार्यकर्ता आदि बेसी आगू छथि। एहि विषय पर गहन चिन्तन आ मनन होयबाक आवश्यकता देखि रहल छी।

एहि में कतहु दू मत नहि जे ब्राह्मण, कायस्थ, राजपुत, केवट, मुसलिम, लगायत विभिन्न अगड़ा जाति व वर्ग जिनका बीच शिक्षा के जोर रहैत अछि; ओ सभ निज पहचान आ अपन भाषा प्रति जागरुक छथि। तदापि अपन पहचान के रक्षा या फेर मिथिला के स्वाभिमान के जोगेबाक लेल अपन समय या सहयोग देबा में ततेक तत्पर नहि छथि, उदासीन छथि। पिछड़ा वर्ग स्वाभाविक रुप में पाछू छथि, जीवनके आवश्यकता पुर्ति मात्र प्रथम कर्तब्य बुझैत अपन जीवन कोना गुदस्त होयत ताहिमें लगबैत Chhathi.

Rahal baat samajik agra – tahu me Maithili-Mithila prati samarpit rahait Maithili Consciousness ke; e phenomenon naturally kichhu reserved caste, classes aa cadres me maatra chhaik. Obviously ohi me Brahman ke maatraa 90% approximately chhaik. Yaih kaaran chhaik je anya apan akarmaltaa par aatma-nirikshan nahi kay bas karanihaar par dosh madhait chhaik, je Maithili-Mithila Consciousness kewal brahmanvaadi pravrutti lel reserved chhaik, ehi me general people ke support nahi chhaik… etc.

Ehi phenomenon ke best resolution ki bha sakait chhaik? Vichaar prastut karu.

Harih Harah!

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औझका प्रसाद:

संसारमें रहैत विभिन्न तरहक उद्वेलन्‌ – व्यक्तिगत जीवन, समाजिक जीवन, राष्ट्रीय आ राजकीय ब्यवस्थामें उथल-पुथल आ तेकर जीवन पर प्रभाव – शारीरिक व्याधि, बाल-बच्चा केर भविष्य, निज रुचि के अनेको बात जे मन के वेग सँ एम्हर-ओम्हर दौड़ैत रखने छल – फेर प्रभुजीके सहारा लेल गुहार करैत परमप्रिय साधन गीतामें समाधान ताकल तऽ निम्न भेटल। अहुँ सभ के संग यदि एहेन कोनो विशेष उद्वेलन के अबस्था आबय तऽ अवश्य गीता अध्ययन करैत तुरन्त समाधान खोजब आ मन के स्थिर करैत उपस्थित सुझाव के पालन करब। देखू, केहेन प्रेम अछि ईश्वर के जे एहेन उद्वेलन के घड़ी कतेक महत्त्वपूर्ण सुझाव भेटल अछि। प्रभुजी, अहाँ के सदिखन जय हो! 

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥१२-८॥
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्‌।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय॥१२-९॥
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि॥१२-१०॥
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्‌॥१२-११॥

Fix thy mind on Me only, place thy intellect in Me; (then) thou shalt no doubt live in Me hereafter. If thou art unable to fix thy mind steadily on Me, then by Abhyasa-Yoga do thou seek to reach Me, O Dhananjaya. If also thou art unable to practice Abhyasa, be thou intent on doing actions for My sake. Even by doing actions for My sake, thou shalt attain perfection. If thou art unable to do even this, then taking refuge in Me, abandon the fruit of all action, being self-controlled.

In the preceding Slokas – first, the concentration of the mind on the Lord is enjoined; in case of inability to do that, Abhyasa-Yoga is advised; if one finds that to be too hard, the performance of actions for the sake of the Lord alone, has been taught. Those who cannot do this even, who want to do things impelled by personal or other desires, are directed to give up the fruits of those actions to the Lord – i.e., not to anticipate, dwell, or build on, or care for, the results knowing them to be dependent upon the Lord. Those who cannot control their desires for work are taught to practice indifference to the effects thereof. 

मुझमें मनको लगा और मुझमें ही बुद्धिको लगा; इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। यदि तू मनको मुझमें अचल स्थापन करनेके लिये समर्थ नहीं है तो हे अर्जुन! अभ्यासरूप योगके द्वारा मुझको प्राप्त होनेके लिये इच्छा कर। यदि तू उपर्युक्त अभ्यासमें भी असमर्थ है तो केवल मेरे लिये कर्म करनेके ही परायण हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मोंको करता हुआ भी मेरी प्राप्तिरूप सिद्धिको ही प्राप्त होगा। यदि मेरी प्राप्तिरूप योगके आश्रित होकर उपर्युक्त साधनको करनेमें भी तू असमर्थ है तो मन-बुद्धि आदिपर विजय प्राप्त करनेवाला होकर सब कर्मोंके फलका त्याग कर।

हरिः हरः!

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२८ मई २०१२

अन्ततोगत्वा जनता के मन के भय सही भेल आ अनिश्चितता के समाप्ति एक सुदृढ आ सभके इच्छा पुर्ति करयवाला संविधान नहि बनि सकल। पैघ-पैघ राजनीतिक विश्लेषक सभक दावी सही भेल आ राजनीतिक दल सभके जिद्दी स्वभाव के कारण कोनो दूरदर्शिता देखबय सँ चूकल नेपाल के संविधान सभा। जनता के धन के क्षय भेल। संविधान के नाम पर ब्यापार भेल। नेता सभ अपन दस पुश्त के लेल कमाइ कयलक। कार्यकर्ता संग मात्र धोखा के बरसात भेल। तदापि समय-समय पर कार्यकर्ता के हाथ में लाठी, हथियार, बम, बारुद दैत ओ राजनीति के तीरंदाज अपन गोटी लाल करैत रहल छल जे शायद संविधान बनि गेला सऽ खत्म भऽ जइतैक आ स्वच्छता संग शान्तिपूर्ण ढंग सऽ राष्ट्र के आर्थिक विकास जे कतेको वर्ष सऽ बाधित छैक से आगू बैढतैक… लेकिन के रोकि सकैत अछि होनी के। एकटा कथा स्मरण में अबैछ –

पंडितैन के बड़ खोचारला पर पंडितजी नून-तेलके जोगाड़ हेतु जजमैनका दिस चलला – लेकिन स्वभाव सऽ भूखलो पेट अनुसन्धान करब हुनकर आदैत के कारण पुनः बीच रास्ता एक श्मसान में पैसि किछु ताकय लगलाह… आ कनेकबा काल में भेटबो केलनि… एगो मानव मुँड! पढय लगलाह ओकर कपार – आ देखलाह जे ओहिपर लिखल छैक जे एखन किछु गति आरो होयबाक ओकर बाकी छलैक।  जिज्ञासावश ओ तुरन्त ललका कपड़ामें ओहि मुँड के बान्हि चोट्टहि घर वापस अयलाह आ ओकरा सुरक्षित कतहु राखि आँगनवाली के मना केलखिन जे ओकरा नहि छूबैक, ओहिमें हमर किछु जरुरी वस्तु राखल अछि। तेकर बाद ओ फेर घर सऽ बाहर चलि गेलाह भिक्षाटन लेल।

एम्हर घरवाली सोचलैथ जे पंडितजी आखिर कोन एहेन वस्तु के एतेक सुरक्षा सऽ रखलैथ जे हमरा छूबय सऽ मना कयलैथ अछि… एतेक सोचैत ओ जबरदस्ती ओहि पोटरी के खोलली तऽ एगो मानव मुँड देखि चौंकि गेलीह। तामशे हहाइत ओ ओहि मुँडके उखैड़में राखि समाठ सऽ थकूचि के राखि ओकरहि चूरा बना देलीह आ पंडित जी अबिते हुनका आगाँ एक थारी में अगबे चूरा परोसि देलीह। पंडितजी जखन थारीमें हड्डीके चूरा देखलाह तऽ पत्नी सँ ई कि थीक पूछैत तुरन्त अपन रखलहबा पोटरी दिस दौड़ि देखलाह आ शंका दूर भेलन्हि जे वैह मुँडके चूरा पत्नी परोसि भोजन लेल देलीह अछि। ओ मुँड पर लिखलहबा बात के स्मरण कयलाह आ पंडितजी हँसय लगलाह। आखिर एहि मुँड के किछु गति जे बाकी छल से यैह जे हमर पत्नी हाथे उखैड़में समाठ के चोट सऽ चूरा बनि गेलाह। … 

तात्पर्य यैह जे नेपाल एक छोट स्वतंत्र राष्ट्र दू विशाल राष्ट्रके बीचमें अछि आ कोरैला बच्चा जेकाँ कहियो एम्हर तऽ कहियो ओम्हर फँगैत रहैत अछि। कखनहु एक माय के स्तनपान करैत अछि तऽ कखनहु दोसर माय के। लेकिन माय जखनहि दू टा राखत तऽ शौतिया डाह के कारण दुनू माय एक-दोसर के ईर्खा के जहर सऽ कोरेला बच्चा के नशामें डूबेने रहत जे कहियो बच्चा जवान नहि भऽ जाय आ अपन चेष्टा तक अपनहि नहि करय। बच्चा के पोरगर वृद्धिगर अंग निहारैत दुनू माय कखनहु गाल छूबि दुलार करैत अछि तऽ कखनहु ठूड्डी आ कखनहु केशमें हाथ फेरैत ततेक मलार चुवाबैत अछि जे बच्चा ओहि दुलारे तरे तर रहैत अछि आ अपन जहरीला खून के परिवर्तन करैक लेल कोनो ज्ञान तक नहि करैत अछि। बड़ जोश चढैत छैक तऽ बच्चो अपन दुनू माय के बीच प्रतिद्वंद्विता के लहर उठबैत अछि आ एहि सँ कोनो नीक फायदा के बजाय आरो नुकसान कय लैत अछि। तखन आब बच्चे थीक, बचकाना तऽ तखनहि जेतैक जखन नीक ज्ञान सऽ अपना आप के होशियार बनौत। चलू बच्चा ऊपर कतेको सौतेला बाप के सेहो हाथ छैक। एहि बच्चा के कल्याणमें समय लगतैक।

Harih Harah!

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२९ मई २०१२
बँधुगण! हमरा लोकनिक मिथिला समाज में एक विशेष प्रवृत्ति देखल गेल अछि जे कहियो कोनो समाज शुद्धीकरणके प्रयास करबैक तऽ ओहि कूरीतिके पोषक वर्ग अहाँके वा अहाँके ओहि मुहिमके प्रति लाँछणायुक्त वीभत्स विचार आ व्यक्तिगत आक्षेप आदि के प्रकरण यदा-कदा भऽ सकैत अछि। एतबा नहि! दोसर एक अति प्राचिन परंपरा रहल अछि मिथिला में जे हम जे करब से अहाँके कमजोर नजैर आयत आ अहाँ हमरा काटब, आ तहिना हम अहाँके बात के काटब आ एना में नीक-नीक बात करय के प्रवृत्ति कमजोर बनैत छैक। हूबा टूटैत छैक। आ नीक-नीक योजना पाछू छूटैत छैक। लेकिन आब हम सभ एहेन कट्टरबुद्धिधनी के फालतू बुझैत यदि नकाइर देबैक तऽ स्वतः योजना आगू बढत। सफलता भेटत। दहेज के परिभाषा कठिन छैक। मुदा माँगरूप दहेज याने विवाह पूर्व शर्त जे लड़की पर अत्याचार थिकैक एकर प्रतिकार मात्र मूल उद्देश्य आ संगहि मिथिलाके गाम-गाम आ हरेक समाज में एक धरोहर अछि जाहि पर मैथिलके पलायनवादी – प्रवासी बनबाक कारणे ओ समस्त धरोहर आइ विपन्न अबस्थामें अछि … से हम सभ ओहेन धरोहर के पहचान करी, ओही गामक समाज के सहयोग सऽ आ कमौआ बेटाके लगानी सऽ ओहि धरोहर के निर्माण-जीर्णोद्धार संभव छैक। एहि पर हम सभ कार्य करी। संगठन विस्तार करी। यैह थीक दहेज मुक्त मिथिला। आउ आ जुड़ू एहि पुण्य मुहिममें। हरिः हरः!
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छै ओकरा ई दाबी जे हम मिथिला के युवा वर्गमें छी
पैर अपन हम ठाड़्ह नहि केकरो आश्रय बैसलमें छीअछि होश अपन आ जोश तैं जे निज कर्म धर्ममें छी
माय-बाप-बड़ जे कहैथ करी आ हुनक पदचिह्नमें छीमुदा बेर बियाह के जौँ आबय तऽ फेर करी मुद्रा आगू
सुन्दर सुशील कनिया वा वर लेकिन देखी मुद्रा आगू

आडंबर के कि घटा सकब उलटे नव फैशन मुद्रा आगू
आदर्श कि हम देखा सकब बस नित रभसी मुद्रा आगू

नहि जानि एहेन युवा सऽ कि मिथिला निर्माण करै छी
निज भ्रष्ट समाजक संग आ अपने मोंने मियां मिट्ठू छी॥

हरिः हरः!

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३० मई २०१२
मिथिलामा अर्ती दिने को कमी छैन काम गर्ने को अत्यन्तै कमी छ। दिनेश यादव जी ले उठाउनु भएको औचित्यहरु प्रति सजग को हुने? मिथिला क्षेत्रमा व्यक्तिवादी सोचका मान्छेको कमी छैन। आफ्नो विकासको लागि सबै सजग छन्‌, तर समुदायको विकास होस्‌ भनी कामना राख्ने र त्यस अनुसार केही काम पनि गर्ने को मात्रा एकदमै न्यून छ। जो कोही काम गर्ने छन्‌ त्यस्ता लाइ अपरिपक्व र अदूरदर्शी पत्रकार, समाजको अगुआ र धेरै ले मात्र आरोप-प्रत्यारोपमा अल्झाउछ। कार्यक्रम बनाउने, क्रियान्वयन गर्ने र सो को लागि कार्यकर्ता, कोष र केन्द्र निर्माण गर्ने सोचका एकदम नगण्य मान्छे छन्‌। यसमा कहीं दुइ मत छैन कि विशिष्ट वर्ग आफ्नो सक्षमता लाइ समाज-निर्माणका लागि खर्चिने परंपरा अहिले पनि निर्वाह गरि रहेका छन्‌, तर उपरोक्त पत्रकारिताको चिन्तामा त्यस्तो वर्गलाइ समेत दोषी र मैथिलीका ठेकेदार भनेर औंल्याइएको छ। उपरोक्त लामो लेखमा कतै पनि समाधानको बाटो न सुझाउनु कस्तो अन्यौलताको सृजना गर्नु हो यो सहज नै बुझ्न सकिन्छ। वास्तवमा मिथिला वा नेपाल व भारतीय उप-महाद्वीपको जुनै भागमा आफ्नो भितरी ईर्ष्या जातीयताको नाममा पाइन्छ र दिनेश यादवजी पनि यसको शिकार हुनुहुन्छ भने प्रष्ट भयो। (दिनेश यादव को कान्तिपुर मा लेखेको लेख – औचित्यहीन आन्दोलन माथि मेरो प्रतिक्रिया)
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जानकारी (सूचना)

औरही (सिरहा) में भेल भीषण अग्निकांड पीड़ित लेल मानवीय राहत के संग ३ डाक्टर के टोली आ आवश्यक औषधि समेत लऽ के आइ मैथिली सेवा समिति के अध्यक्ष डा. शंभुनाथ झा, मैथिली विकास अभियानके अध्यक्ष ई. अरविन्द कुमार लाल, पत्रकार नवीन कर्ण एवं अन्य मैथिलीसेवी के संग लगभग ३ गाड़ी भैर लत्ता-कपड़ा आ खाद्य सामग्री के संग-संग आर्थिक मदद लऽ के औरही तरफ प्रस्थान कयलथि अछि। मानवीय सेवाके रूपमें औरहीवासी के लेल एहि सहयोग सँ पुरान खुशी आ रौनक के किछु अंश पर्यन्तके वापसी होइ एहि भावना के संग ई जानकारी अपने समस्त महानुभाव लेल प्रेषित कयल अछि।

किछु आर्थिक सहयोग जे मधेसी सिविल सोशाइटी के तरफ सऽ एखन धैर बैंकमें पहुँचय के पुष्टि नहि भेल अछि से बाद में फेर दोसर टोलीके मार्फत पहुँचाबय के कार्य होयत।

धन्यवाद!

प्रवीण ना. चौधरी
महासचिव, मैथिली सेवा समिति, विराटनगर।

हरिः हरः!

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२ जून २०१२

अति प्रसन्नता के संग सूचित कय रहल छी जे आइ संध्या कनेक देरी सऽ दहेज मुक्त मिथिला के लेल पूर्व नियोजित बैठक सम्पन्न भेल। पहिले सऽ निर्धारित समय ६ बजे संध्याकाल ओल्ड कफी हाउस में केवल आजुक विशिष्ट अतिथि सदस्य सागर मिश्र भाइ पहुँचि पेलाह आ हिनकर एहि तरहें समय के पक्का आ वचन के पक्का दुनू बात लेल हृदय आनन्दित भेल। मुदा हम स्वयं शर्मिन्दगी महसूस कयलहुँ कारण विचारल बात बहुत कारण सऽ समय निर्वाह करयमें सहायक नहि भेल। तीस हजारी कोर्ट में किछु कानूनी कार्य में विलंब भेला के कारण देरी भेल मुदा ठीक सात बजेमें हमहुँ पहुँचि गेलहुँ आ मदन भाइ, राजीव भाइ, रुपेश भाइ, चाचाजी सेहो पहुँचि गेलाह। तहिना आइ कार्यालय सऽ कनेक देरी छुट्टी भेला के कारण राघव भाइ समय सऽ नहि पहुँचि सकलाह आ एहि सभ बीच हमर ज्येष्ठ भाइ के तबियतमें अचानक आयल खराबी के कारण एम्समें भर्ती कराओल जयबाक समाचार औला के कारण सेहो किछु मानसिक तंगी भेल। खैर… जेना-तेना। सभ भैयारी मस्ती में गर्मी के झेलैत भेंट कय सकलहुँ आ अपन-अपन क्षमता के सुन्दर संजोग संग आगाँ अपन माटि-पानिलेल एकजूट बनैत कार्य करब से शपथ लेलहुँ। दहेज मुक्त मिथिला के पंजीकरण प्रमाणपत्र काल्हि वा परसु तक भेटि जायत तेकर निस्तुकी कयल गेल। मदन भाइ जमा पैसा सभ संतोषजी के सुपुर्द कयलाह। सागर भाइ, रुपेश भाइ सेहो अपन-अपन सहयोग देलनि। आगामी समय में हम सभ नीक-नीक कार्यक्रम आ सुविधा सभ के प्रवेश करायब एहि पर राजीव भाइ संग संक्षिप्त वार्ता भेल। एवम्‌ प्रकारेन‌ औझका मिटींग इमरजेन्सी में कन्क्लुड करय पड़ल। धन्यवाद!

हरिः हरः!

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३ जून २०१२

Back to Biratnagar – thanks dear friends at Delhi for your beautiful companies and we would soon be able to introduce upgraded online services for world wide Maithil people by providing

a. Adhikaar Nirnay (as per rule of panjiyan for traditional marriages popular and essential among Maithil Brahmins, Kayashth, Raajput, Dev Samaj and several other castes of Maithilians)

b. Matrimonial profiles for dowry free marriages for all castes for convenience of people looking for suitable bride and grooms

c. By providing a real channel for helping your own people through united efforts and contributions on humanitarian services and that for conservation of cultural and other heritages of Mithila. Feel connected with your own land by doing some services to your native land.

These are the three major points we feel to upgrade our services for Mithila – through Dahej Mukt Mithila – its official website www.dahejmuktmithila.org and we believe, every Maithil has a view to connect with his/her native land by doing whatever little from their earning, be they anywhere in India or abroad. This purpose will be served by us.

Harih Harah!!

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७ जून २०१२

एहेन कोनो घड़ी नहि जाहिमें ज्ञानेन्द्रियरूपी दस घोड़ा मनरूपी रथ के दस अलग-अलग दिशामें तानय लेल तत्पर नहि रहैछ। मुदा साधना आ आस्था दसो घोड़ा के कोनो एक दिशामें अग्रसर होयबाक लेल प्रेरित कय सकैत अछि। आउ, आइ फेर विचलित मन, बिछड़ल मित्र – अपहृत आ असमंजस के भंवरीमें फँसल, एहि संसार में रुपैया-पैसा के खेलमें अपना के शेर बुझनिहार संग दुर्दशा के आध्यात्मिक खोज निकाली।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
ामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयंत्यजेत्‌॥१६-२१॥

Triple is this gate of hell, destructive of the self – lust, anger and greed; therefore one should forsake these three.

Destructive of Self: making the self fit for no human end whatever.

काम, क्रोध तथा लोभ – ये तीन प्रकार के नरकके द्वार* आत्माका नाश करनेवाले अर्थात्‌ उसे अधोगतिमें ले जानेवाले हैं। अतएव इन तीनोंको त्याग देना चाहिये।

*सर्व अनर्थोंके मूल और नरककी प्राप्तिमें हेतु होनेसे यहाँ काम, क्रोध और लोभको ‘नरक के द्वार’ कहा है।

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्‌॥१६-२२॥

The Man who has got beyond these three gates of darkness, O son of Kunti, practices what is good for himself, and thus goes to the Goal Supreme.

Gates of darkness: leading to hell (Naraka) which is full of pain and delusion.

हे अर्जुन! इन तीनों नरकके द्वारोंसे मुक्त पुरुष अपने कल्याणका आचरण करता है*, इससे वह परमगतिको जाता है अर्थात्‌ मुझको प्राप्त हो जाता है।

*अपने उद्धारके लिये भगवदाज्ञानुसार बरतना ही “अपने कल्याणका आचरण करना” है।

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌॥१६-२३॥

He, who setting aside the ordinance of Saastra, acts under the impulse of desire, attains not to perfection, nor happiness, nor the Goal Supreme.

Perfection: fitness for attaining the end of man.

जो पुरुष शास्त्रविधिको त्यागकर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धिको प्राप्त होता है, न परमगतिको और न सुखको ही।

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥१६-२४॥

So let the Saastra be thy authority in ascertaining what ought to be done and what ought not to be done. Having known what is said in the ordinance of the Saastra, thou shouldst act here.

Here: in this world.

इससे तेरे लिये इस कर्तव्य और अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्रविधिसे नियत कर्म ही करने योग्य है। 

संक्षेप में: काम, क्रोध आ लोभ छोड़ी। अपन कल्याण हेतु एहि तीन के सर्वथा त्यागि सुन्दर आचरण करी। एहि में शास्त्रके प्रमाण मानी, जेना गीता-उपदेश अपने आपमें सर्वोत्तम अछि। हमहुँ अहाँ एहि अनुसार अपन कर्म करी।

शास्त्रवित्‌ धर्माचरण – स्वयं सहित दोसर लेल सेहो एक हृदय सऽ एक रूपमें प्रेम प्रवाह बनेने रहू। प्रभुजी प्रसन्न, सभ प्रसन्न!

हरिः हरः!

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Dear Friends!!

Dowry must be defined with a huge uproars and loud voices all around our surroundings. The constitution of India has done it so well. “Anything gifted beyond one’s own wishes is dowry.” i.e. demand form dowry must be eradicated. Let me come on floor of reality with some illustrations for you – suppose a girl completes her graduation and parents desire to marry her, would naturally look for a master degree passed or a settled or anyway superior to that graduate girl. As soon as parents so wish give a liberty to the superiors to put some values against superiority – that to allow the girl to have natural right of 50% in the family further. Well, commercially, these two things justify the self-wished gifts, ornaments, lands, and several kinds of stuffs to be given as so called dowry. Legally this self-wished gifts/cash/golds/stuffs are not dowry at all. What is dowry then? The demands as payment against the superiority of grooms and that for natural rights of inheriting the assets of husband’s asked from girl’s parents/family – say as a precondition of marriage, thus to be called as dowry. The documents section of this group defines it welly. I believe, your sincere efforts may certainly bring revolutionary changes in our society to become educated for these terminologies.

Now come on morale – those families which adopt purity in their social behaviors never impose the preconditions for payment of dowries; but you cannot stop the greedy people to practice the same purity in their behaviors socially. Here is the problem. One cannot force anyone to do what he/she likes. Everybody is free. So, the need of dowry free society is felt by us and we have started a movement to let people discuss neutrally the good and bad of it and make self commitment. That is the only way to eradicate the ills from our society. Refer – the ways adopted by Raja Rammohan Roy for abolishing the Sati Pratha. Likewise, let us try to eradicate this ill and devil from our society. Since we are Maithils and are brilliants seeds on earth, nothing is impossible for us to achieve. Let us try to show the higher gesture for fellow human beings. There is revolution, I am sure.

Harih Harah!!

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देखू भाइ-बहिन! हमर मैथिली प्रथम भाषा थीक आ एहि भाषा केर उपयोगिता आ महत्त्व के चर्चा हम अहाँ सभ संग करैत आयल छी। किछु बात कहब आइ फेर – चुँकि मैथिली के पढाइ विद्यालय में पहिले जेकाँ शायद नहि रहि गेल छैक, महाविद्यालयमें सेहो ऐच्छिक विषय के रूपमें पढाओल जाइत छैक, मुदा बुनियाद कमजोर रहला के कारण हम-अहाँ अपन मातृभाषाकेर साहित्य सँ बहुत दूर अन्य द्वितीय राष्ट्र भाषा के रूपमें हिन्दी व अंग्रेजी आदि पढैत छी – कतेक लोक (अधिकांश कहू) तऽ हिन्दी आ अंग्रेजी अपन कैरियरमें फायदाकारक बुझि सेहो अपन मातृभाषा सऽ दूर रहनै पसिन्न करैत छथि… एतय तक जे बियाह होइते आ धिया-पुता के जनैमते पहिले सऽ योजना अनुरूप अपन मातृभाषा के घोर शत्रु रूप में क्रूरतापूर्वक त्याग करैत छथि… भले कनिया के हिन्दी बाजय के टोन में मैथिलपन वा बिहारीपन किऐक नहि हो… लेकिन ओ बजती हिन्दीये… जेना – ऐ जी.. कखन से कहते हैं कि बौल बैर दीजिये – लेकिन आप सब अनसुना जैसे बस में anhaar rakhe huwe hai…  … yaane Hindi baajab ta lok bar neek bujhat… bahar ke bujhat, shaharvali bujhat… tahina dhiya-puta sang… otahu beta idhar aanaa, jara paani laanaa… uncle ko namaste karo… aa palait ke gaam vaali diyaadini sa kahathin je bauwa sab hinka Maithili bisair gelain… (rahait chhathin shahar vali kaniya Darbhanga/Madhubani me).  Delhi vali lel ta sahajahi… ha-jee… ha-jee… ma-jee…  

Hey bhai sab! Maithili bisarab maay ke dudh ke karz ke bisrab saman achhi aa ghor paap achhi. Se saavdhaan!!

Harih Harah!

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९ जून २०१२

मिथिला लेल कार्यरत हर शख्स आ हर संस्थाके हमर नमन!

पहिले जखन हम स्वयंके मात्र होशियार बुझी तहिया नहि बुझैत छल जे दोसरो के कैल प्रयास कोनो परिवर्तन आनि सकैत अछि… लेकिन आब जखन केवल दोसर के द्वारा कैल जा रहल प्रयास पर गहन मन्थन करैत छी तऽ अपन तुच्छता के पहचान भेटैत अछि। एहि तरहक एक राजनीतिक दल अखिल भारतीय मिथिला पार्टी जेकर अध्यक्ष सुधीर बाबु के विचार सुनि हृदय आनन्दित भेल आ विश्वास बढल जे मिथिलामें आइयो ऋषि-मुनि अपन छद्म स्वरूपमें हमरा सभ संग छथिये। रत्नेश्वरजी समान प्रखर महासचिव आ पैघ-पैघ विद्वान्‌ के सहयोग, हर तरहें हरेक मैथिल संग हमर आह्वान अछि जे नहि केवल अखिल भारतीय मिथिला पार्टी वरन्‌ मिथिला के नाम संग जुड़ल हरेक संस्थाके मजबूती लेल एकजूट बनू।

हरिः हरः!

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१० जून २०१२

जन्मदिन आ शुभकामना

आधुनिक काल में जन्मदिन मनाबय के परंपरा पहिले सऽ बहुत अधिक जोर पकड़ने जा रहल अछि। बच्चहि सऽ जन्मदिन के अवसर पर केक काटब, मोमबत्ती जरा के फेर मिझायब, केक के टूकड़ी माता-पिताके मुँहमें खुवायब, फेर ओही टूकड़ी केक के आधा पापा-मम्मी खाइत आधा बौआ वा बुच्ची याने जन्मदिन के अभिनेता के मुँह में खुवायब, फेर बैलून फोरैत संगी-साथी सभ नाच-गान करब, हैप्पी बर्थडे टू यू गबैत पूरा माहौल में एहि बात के संज्ञान करायब जे बर्थडे ब्वाय/गर्ल के बर्थडे मोमेन्ट सेलिब्रेशन चलि रहल अछि… इत्यादि के खूबजोर फैशन आइ भारतीय उपमहाद्वीप में हर जगह देखल जा सकैत अछि। जन्मदिन मनाबय के परंपरा अपन-अपन तरीका में सभ उम्र के लोक में देखल जाइछ। कॅलेज के विद्यार्थी सभमें ग्रिटींग कार्ड आ ताहिपर अंकित अनेको प्रकार के भावनात्मक अभिव्यक्ति जे पढनिहार के दिल आ दिमाग दुनू के हिला दैछ ताहि प्रकारके रंगी-चंगी कार्ड के प्रयोग एतबा होइछ जे आर्चीज आ अनेक मल्टीनेशनल कंपनी सभ एहि व्यवसाय के पराकाष्ठा पर पहुँचबैछ। आब तऽ बेसी कार्य अनलाइन होवय लागल छैक। अनलाइन मैसेज द्वारा शुभकामना आदान-प्रदान के एहि युग में ग्रिटींग मैसेज सेहो जेपेग फरमेटमें वा विभिन्न अन्य फरमेटमें फोटो स्वरूप डाउनलोड कय के आदान-प्रदान करबाक जुनून जेना चलल छैक। पत्नी द्वारा पतिके जन्मदिन आ पति द्वारा पत्नीके जन्मदिन मनेबाक तऽ आरो लुभावना तरकीब सभ पसरल छैक। भले पति आब अपन चौथापन में किऐक नहि होइथ, लेकिन पत्नी संग सम्बन्धित बहुत तरहक स्मरणीय दिवस मनाबय के बाध्यता पाछू पड़ल रहैछ। वीआइपी सभ के जन्मदिन मनाबय लेल तऽ खैर पूरा महकमा भिड़ल रहैछ। ओ भले कोनो राजनेता हो वा नौकरशाह वा कूटनीतिज्ञ… हुनक संग-मंडली के सभ केओ हाकिम साहेब – हुकम के बादशाह केर सेवामें एहि दिवस के बखूबी लाभ उठबैछ। आइ जतेक सुन्दर फ्लावर बुक्के प्रेजेन्ट करथिन साहेब के खुशी ततबा बेसी आ कृपापात्र बनल रहबाक पूरा गुंजाईश। फेसबुक व अन्य सोशियल नेटवर्क पर तऽ जन्मदिन मनेबाक एक विशेष फीचर सेट कैल गेल छैक। कारण सभ के नजैर ओहि सूचना पर स्वाभाविक रूप में जाइछ जे आइ कोन मित्रक जन्मदिन थिकैक। मित्र भले अहाँके परिचित पूरा होइथ वा नहि, बल्कि फेसबुक पर अहाँके मित्र छथि। हुनक जीवन के, चरित्रके, विचारके वा कोनो एहि बात के जाहि सऽ अहाँ प्रभावित होइ वा नहि… बल्कि जन्मदिन के अवसर पाबि दू शब्द कहय लेल अहाँके किछु घटैत थोड़बे न अछि… ‘हैप्पी बर्थडे’!

लेकिन जन्मदिन के वास्तविक अर्थ कि? आजुक दिन अहाँ एहि पृथ्वीपर पदार्पण कयलहुँ एहि बात के स्वयं मनन करब आ अपन परिवेश के मनन करय लेल एक अवसर प्रदान करब – सैह ने? स्वयं मनन करी जे आजुक दिन हम एहि पृथ्वीपर पदार्पण करैत एतेक वर्ष के उम्र बिता लेलहुँ आ लब्धि कि सभ भेल अछि – आध्यात्मिक, आधिदैविक आ आधिभौतिक उपलब्धि पर स्वयं केर चिन्तन लेल एहि विशेष अवसर पर बर्बस अहाँके ध्यान जेबे टा करत। यदि सकारात्मक परिणाम सोझाँ नहि आयत आ तदापि अहाँ एहि विलक्षण उत्सव के मना रहल छी तऽ खालीपन बुझायत, ढकोसला बेसी लागत, अगबे नाच-नौटंकी लागत। यदि अपन जीवनमें संघर्ष, स्मरणीय विन्दु, यथार्थ में सुन्दर चारित्रिक प्रस्तुति आदि सऽ लोक अपन जीवन के मूल्यांकन करैत छैक आ एहेन विशेष अवसर पर अपन समेत दोसरो लेल स्वाभाविक रूपें प्रेरणा पाबय के मौका दैत छैक। दोसरके देल शुभकामना व आशीर्वाद सऽ आगू आरो नीक करय लेल अपन जन्म के सार्थकता हेतु उत्साह सेहो पबैत छैक। ई भेल जन्मदिन मनाबय के सार्थक समर्थन।

लेकिन एहि बीच एक बात कहब – भारतीय दर्शन अनुरूप जन्मदिन मनेबाक विशेष परंपरा ऐश्वर्य-सम्पन्न देवी-देवता लेल मात्र देखैत छी। जेना रामनवमी – मर्यादा पुरुषोत्तम रामकेर सुन्दर जीवन चरित्र लीला सँ आम-प्रेरणा लेल मनायल जयबाक परंपरा; श्री कृष्ण केर जीवन चरित्र लीला सँ प्रेरणा लेल हुनक जन्मदिन कृष्णाष्टमीके रूपमें मनेबाक परंपरा; अनेको त्योहार आदि में सेहो महत्त्वपूर्ण विधान-महत्ताके प्रेरणा प्राप्ति लेल मनेबाक विशेष परंपरा; अर्थात्‌ जे जीवन में कर्मठ कर्म करैत मूल्यवान्‌ – महान्‌ बनलाह तिनकर जन्मदिन वा अन्य-सम्बन्धित दिवस मनेबाक परंपरा रहल अछि। आधुनिक युगमें सेहो गाँधी जयन्ति, बुद्ध जयन्ति, महावीर जयन्ति व अन्य महान्‌ विभूति के जन्म-दिवस मनेबाक परंपरा रहल अछि – जैर में एके टा बात जे एहि महान्‌ चरित्र सभके जन्म-समय कतेक वैभवपूर्ण छल जे एहि संसारमें एतेक सुन्दर जीवन चरित्र प्रस्तुत करैत हमरा सभ व अगिला पीढीके स्मरण करय लेल उदाहरण बना गेलाह – ओहेन जीवन-चरित्र सँ हम सभ प्रेरणा लैत अपन जीवन सफल बनाबी, बस एहि लेल।

लेकिन जेना-जेना आइ जन्मदिन मनेबाक रंगी-बिरंगी तरीका सभ बनल जा रहल अछि एहि सँ बुझैत अछि जे एहि विशेष अवसर के महत्त्व के बिसैर आसुरी प्रवृत्ति में डूबय के बेसी हिस्सक लागि रहल अछि जे मानवता लेल खतरा के सूचक भऽ सकैत अछि। विचारक आ दर्शक लेल एहि तरफ बेसी मनन करैक लेल हमर अनुरोध अछि। भारतीय दर्शन आ आध्यात्म के महत्त्व के संरक्षण में संसार के कल्याण छैक। एहि तरफ हम सभक ध्यान आकर्षण करैक लेल चाहब।

जय मैथिली! जय मिथिला! जय मानवता!

हरिः हरः!

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११ जून २०१२

दहेज विरुद्ध लड़ाई समाजिक एकता से भी दूर होता है, जैसे मैंने कई अच्छे-अच्छे गाँवकी यात्रा किये हैं, वहाँ पर लोगोंमें विशेष जागरुकता देखा है। परिवार में सारे एक पर एक हाकिम-हुकुम हैं और कुटुंबोंको आने से पहले ही बता दिया जात…ा है कि हमारे यहाँ पैसों या सामानोंकी लेन-देनकी बात भूलकर न करें।

मैंने ऐसे भी लोग देखे हैं जिन्होंने कसम खाया हुआ है कि परिवार में केवल गरीब-असहाय लोगोंकी बेटियोंको ही लायेंगे। अपनी बेटियोंको भी गरीब परिवारमें ही शादी करवायेंगे और हमारी बेटियाँ उन परिवारोंमें खुशियाँ लायेंगी। और हम सारे परिवार इकट्ठा आगे बढेंगे। अनूठे प्रेम में बँधे रहेंगे। संसारमें सभी से बढियाँ मुझे ऐसे ही परिवार नजर आये। मुझे खुद भी यही करनेका प्रेरणा मिला है।

इसके अतिरिक्त मैंने जितने महान्‌ लोगोंके जीवनीको पढा है वो सारे दहेज मुक्त विवाह करनेवाले लोग हैं, ना कि कभी उनके परिवारोंने दहेज के बदले अपने बेटोंको बेचा है।

हरिः हरः!

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मिथिला क्षेत्र तऽ ओना प्रतिभा सऽ भरल अछि, लेकिन सच्चाइ इहो छैक जे एहिठाम के युवा में समाजिक कूरीति वा समाजिक विधि-व्यवहारमें केवल अपन अभिभावक के मुँह ताकय पड़ैत छैक। युवामें स्वतंत्रता के बहुत पैघ कमी आ युवा-केन्द्रित कार्यक्रम के सेहो घोर अकाल देखैत छैक। यैह कारण छैक जे मिथिला आइ अन्य क्षेत्र सऽ बहुत पाछू छूटि गेल छैक।

जाबत युवा शक्ति मजबूत नहि हेतैक, कि मिथिला के विकास संभव छैक?

जाबत युवा अपन मातृभूमि आ मातृभाषा लेल संघर्ष करय लेल ठाड़्ह नहि हेतैक, संवैधानिक अधिकार राज्यरूपमें – राज्यभाषा के रूप में कहियो मिथिला-मैथिली के भेटि सकैत छैक?

जाबत दहेज विरुद्ध वा समाजिक कूरीति विरुद्ध युवा आवाज बुलंद नहि करतैक, कि मिथिलामें स्वच्छ आचार-विचार पुनः दोहरायल जा सकैत छैक?

अभिभावक के व्यक्तिवादी विचार स्वार्थपरक बात मात्र में सहभागिता आ युवा में केवल कैरियर प्रति सोच बनायब के प्रचलन कहीं मिथिला लेल जानलेवा तऽ नहि बनि रहल छैक?

एहेन बहुतो प्रश्न छैक, जाहिपर युवा के ध्यानाकर्षण चाहैत छी। आइ कोनो समाज में परिवर्तन अनबाक लेल युवा के आगू आबय पड़ैत छैक। लेकिन मिथिला क्षेत्र युवा के उदासीन व्यवहार सऽ पछड़ल अछि एहि तरफ सभके ध्यानाकर्षण चाहैत छी। किछु वर्गमें सक्रियता देखैतो अछि तऽ ओ फिल्मी पोस्टर निर्माण तक सीमित देखैत छी। काज के करत? स्वयंसेवक के बनत? नारा के आवाज के देत?

हरिः हरः!

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बजनिहार गलत नहि कहलखिन जे कोनो गाड़ी के चलयमें सभ पहिया टंच रहय पड़ैत छैक – चैर पहिया छैक तऽ चारू पहिया, दु-चकिया छैक तऽ दुनू चक्का – आ एवम्‌ प्रकारेन्‌ जतेक चक्का के गाड़ी हो… मुदा सड़क पर स्मूथ रनिंग लेल सभ चक्का टंच रहब जरुरी।

मिथिला के लोक सऽ गप भेटत बड़का-बड़का; लेकिन कठोर सत्य यैह छैक जे एक-पहिया के बदौलत मिथिला नेंगराइत चलैत अछि। आब कहू जे नेंगरा कतहु जीतत कोनो रेस? जहिया समग्र संसार में पुरुषवादी सोच पर संसार चलैत छलैक तहिया मिथिला के पुरुष में हैकमवादी सोच – पुरुषार्थ के बदौलत – तपस्या आ संघर्ष के बदौलत मिथिला सर्वगुण सम्पन्न रहल आ विकसित गाम-ठाम सेहो रहल। लेकिन इतिहास गवाह छैक जे जहिना-जहिना अन्य समाज में नारीके विकास आ नारी के अगुवेला सऽ विकास के दर तेजी सऽ बढलैक, तहिना-तहिना मिथिला के दाकियानूस विचारधारा आ पुरुषवादी तत्त्व के प्रबलता के कारण नारी के पर्दा भीतर राखब आ मिथिला के अत्यन्त पाछू छोड़ब केर महान्‌ भूल कैल गेल अछि।

एहि भूल लेल मिथिला के पश्चाताप करय पड़ि रहल छैक। आ कोनो जादू के छड़ी नहि बनल छैक जे खुल-जा-सिम-सिम कहिते मिथिला में सुधार आबि जेतैक। बदलय पड़तैक दाकिनानूस विचारधारा के आ बदलय पड़तैक थेथर गम्हरायल अभिभावक ढीठाई के। अन्यथा सुधार आबऽवाला सैकड़ो वर्ष में संभव नहि हेतैक। एखन तक तऽ युवा-पलायन आ मिथिला सऽ लोक प्रवास के सहारा लैतो मिथिला के पोषण करैत आयल छैक…. लेकिन आबऽवाला २० वर्ष के बाद ओ सभ लोक कहीं मिथिला के पूर्णतः बिसैर नहि जाइ… एहि डर सऽ विचारक वर्ग आक्रान्त छी।

हमरा बुझने आब मिथिला के युवा बेटा-बेटी के लगाम अपन हाथ में लेबाक जरुरी छैक। अभिभावक के रूढिवादी विचार के बदैल के राखि दियौक।

हरिः हरः!

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सुनू एक सत्यकथा: बाभनवाद के आरोप

फेसबुक के दुनिया में दूर-दराज के मैथिल सभ संग हमरा सभके सौभाग्य सऽ भेंटघाँट भऽ रहल अछि। एहि में अधिकांशतः मैथिल ब्राह्मण छथि, एहि में कतहु दू मत नहि। मुदा मैथिल ब्राह्मणकेर संग-संग मैथिल हर जाति-वर्गके लोक सभ सेहो प्रचूर मात्रा में भेटैत छथि। समस्त मैथिल जे फेसबुक के जरिया जुड़ल छथि ताहिमें सभ कोनो ने कोनो उच्च पद संग प्रतिष्ठित बुझैत छथि। केओ बहुत पैघ पत्रकार, केओ समाजसेवी, केओ उत्साही युवाजन, केओ उद्यमी-व्यवसायी, केओ उच्च शिक्षा में लागल, केओ नीक संस्था के अधिकारी… इत्यादि। हमर लगभक डेड़ दशक के इन्टरनेट यात्रा आ यथार्थ मित्रता के संग जीवनकालमें बहुतो प्रतिष्ठित लोक सभ सँ भेंट के हम ईश्वर कृपा मानैत आयल छी। आ जहिना नीक में नामी, तहिना बेजाय में सेहो कतेको नामी सभ संग भेंटघाँट होइत रहल अछि। फेसबुक पर सेहो नीक आ बेजाय दुनू के भीड़ भेटल। विचारधारा आ व्यवहार – यैह दू बात सँ पता चलैछ जे हम कोन दुनिया में विचरण कय रहल छी, हमर संगत केहेन अछि, हम अपने केहेन छी, हमर विचारधारा में कोना परिवर्तन आबि रहल अछि, केकरा सऽ कोन नव बात सिखय लेल भेटल, जे जानकारी लेल हम लल्ल रही से कोना सहजता संग प्राप्त भेल… इत्यादि अनेको प्रकार के अनुभूति भेटैत आयल अछि एहि विगत किछु वर्ष में। समाजिक सेवा के कटु अनुभव सेहो करैत आयल छी बचपनहि सऽ। देह में खून जाहि पिता के दौड़ि रहल अछि तेकरा सदिखन आत्मसात्‌ करैत आयल छी। आरोप-प्रत्यारोप सेहो झेलैत आयल छी। किछु समय सऽ मैथिली के सेवा में सेहो लागल छी आ एहि समय सभ सऽ बेसी अनुभव समेटय लेल भेटि रहल अछि। कखनहु के ब्राह्मण कुल में जन्म लेबाक आत्मसम्मान सऽ विभोर भऽ जाइत छी तऽ यदा-कदा अपन ब्राह्मण बनबा पर काफी अफसोस सेहो होइत अछि।

कथावाचन सऽ पूर्व पूज्य पिता के एक बात स्मरण करय लेल चाहब – समाजवादी धारा सऽ जुड़ल ओ जखन कहियो अनजाति के घर भोजन करैथ आ विश्राम करैथ तऽ कहाँ दैन पुरान विचारधारा मानयवाली हमर कोनो बूढिया बाबी हुनका ऊपर गंगाजल छिड़ैक शुद्धीकरण के नियम कठोरता संग अपनाबैथ। हमर पिता ओ सभ बात के भैर जीवन हैंस के टैर दैथ। अन्ततोगत्वा शुद्धता के महत्त्व के स्मरण करैत आ हमरा सभके करबाबैत पिता एकहि टा बात कहला जे भले बाबी गंगाजल छिड़काव सऽ हुनका शुद्ध मानैथ लेकिन पिता अपन भीतर आ बाहर के शुद्धता सरल व्यवहार आ सभके सुन्दर प्रेम के सहजता संग स्वीकार करैत बरकरार रखलन्हि ताहि पर अटूट विश्वास रखलनि। जेना रामजी शबरीके ऐँठ बेर एतेक चाव सऽ खेलैन जाहिमें ऐँठक गन्ध कम बल्कि शबरी के ई भाव जे – जे बेर मीठ हेतैक सैह टा रामजीके खुवायब ताहि मंशा सऽ पहिले स्वयं बेर चखैथ आ तखन हुनका खाइ लेल दैथ…. आह! भाव के आगू दुनिया के कहल-सुनल-गनल व्यवहार के कि सम्मान!

आइ एक काँच उम्र के समाजिक कार्य में रुचि रखनिहार युवा संग बात भऽ रहल छल। ओ किछु गछने छलाह कहियो जे हम दहेज मुक्त मिथिला के उद्देश्य पोषण हेतु हुनक जेठ भाइ के दहेज मुक्त विवाह के पूर्ण विवरण शेयर करब एवं दहेज मुक्त मिथिला के मंच सऽ हम सभ हुनक ओहि भाइ एवं परिवार के यशगान के क्रम में सम्मान करब से हमर मंशा छल। मुदा आइ कतेको महीना निकैल गेल, ओ कोनो प्रकार के विवरण नहि देने छलाह तऽ हमरा बुझायल जे कहीं झूठे तऽ नहि कहि देला जे हुनक भाइ के दहेज मुक्त विवाह भेल। खैर आइ भेट भेला चैटलाइन पर आ पूछल तऽ ओ कोनो जानकारी देबऽ सऽ मना कय देलाह – कारण दहेज मुक्त मिथिला के ग्रुप पर सदस्य आ ….

Continued…

Harih Harah!!

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१३ जून २०१२

Who can break the bonds of Karma? (एहि लेख केँ पूरा जरुर पढू। A must read story! इसे पूरा जरुr padhe!) 

(In Krishna’s Words – to be memorized by each of us.)

नेहाभिक्रमाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥२-४०॥
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्‌॥२-४१॥

In this, there is no waste of the unfinished attempt, nor is there production of contrary results. Even very little of this Dharma protects from the great terror. In this, O scion of Kuru, there is but a single one-pointed determination. The purposes of the the undecided are innumerable and many-branching.

Waste of the unfinished attempt: A religious rite or ceremony performed for a definite object, if left uncompleted, is wasted, like a house unroofed which is neither serviceable nor enduring. In Karma-Yoga, however, that is, action and worship performed without desire, this law does not apply, for every effort results in immediate purificiation of the heart.

Production of contrary results: In worship for an object, any imperfection in the process produces positive loss instead of gain. As in cases of sickness, the non-use of the right medicine results in death.

The great terror: Being caught in the wheel of birth and death.

In Karma-Yoga, the one goal is Self-realization. The undecided (that is, about the highest), naturally devote themselves to lower ideals, no one of which can satisfy. Thus they pass from plan to plan.

हिन्दीमें इसे ऐसे समझिये:
इस कर्मयोगमें आरम्भका अर्थात्‌ बीजका नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोगरूप धर्मका थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्युरूप महान्‌ भय से रक्षा कर लेता है। हे अर्जुन! इस कर्मयोगमें निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है; किन्तु अस्थिर विचारवाले विवेकहीन सकाम मनुष्योंकी बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदोंवाली और अनन्त होती हैं।

और आब आउ अपन मातृभाषा मैथिली में तेना कऽ बुझू जे फेर कहियो बिसरेबे नहि करत – अर्थात्‌ हमरा सभ के दोषपूर्ण शिक्षा प्रणालीके कारण अंग्रेजी-हिन्दी वा अन्य कोनो भाषा में कतबो केओ किछु सिखा देत, समझ तेहेन नहि बनत जेहेन अपन मातृभाषा याने माय के बोली में: 

उपरोक्त श्लोक वाचन सऽ पूर्व भगवान्‌ अर्जुन के लंबा-चौड़ा भाषण जे केकरा सऽ लड़ब… सब अपने लोक छथि… अपने के खून बहायब उचित नहि… एना होयत-ओना होयत… से हम नहि लड़ब… सुनला के बाद कृष्णजी हुनका एक कड़ा पंक्ति जे बुझैत छहक किछु नहि आ भाषण पंडित जेकाँ देने जा रहल छ… कहैत पहिले पाँति (श्लोक २-११) सऽ कहलनि जे पंडित वैह जे गेलहा या बिन-गेलहा केकरो लेल शोक नहि करैत छथि। हम नहि छलहुँ कि तू नहि छलऽ आ कि ई राजा सभ… आ एहनो नहि छैक जे आगू हम सभ नहि रहब। जेना जीवात्मा बाल्यपन, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढावस्था, वृद्धावस्था तहिना विभिन्न शरीरके प्राप्ति होइत छैक आ एहि लेल धीर पुरुष कहियो मोहित नहि होइछ। (श्लोक २-१३)। सर्दी-गर्मी आ सुख-दुःख इन्द्रिय आ विषय के संयोगके चलते उत्पन्न होइछ जे विनाशशील आ अनित्य अछि। एकरा सहन करबाक क्षमता के विकास जरुरी अछि। समस्थित बनब मोक्ष समीप होइछ। सत्‌ आ असत्‌ दुनू छैक, तत्त्वज्ञानी एहि दुनूके तत्त्व के जनैत छथि। नाशरहित तऽ ओ जिनका सऽ ई समस्त दृश्यवर्ग व्याप्त अछि। ओ अविनाशीके नाश करय लेल केओ सक्षम नहि।  बाकी जीवात्मा के समस्त शरीर नाशवान्‌ छैक। जे आत्माके मारयवला या मरयवाला बुझैत अछि, ओ दुनू नहि जनैत अछि। किऐक तऽ aatma vaastav me nahi ta kekro maarait achhi aa nahiye swayam marait achhi. E kono kaal me nahi ta janma lait achhi aa nahiye marait achhi. E ajanmal, nitya, sanatan aa puraatan achhi; sharir ke maralo par e nahi marait achhi. Je purush ehi sharir ke naashrahit, nitya, ajanmal aa avyay roop me janait achhi; o purush bhala kona kekro marabaabait achhi wa maarait achhi? Jena manushya puraan vastra ke tyaagi nav dhaaran karait achhi tahina aatma ek sharir ke tyaagi dosar shari dhaaran karaichh. E aatma sabh ke sharir me sadikhan avadhya chhaik. (up to Sloka 30).

Tekar baad Bhagavaan Arjun ke hunkar nij-dharma (laukik duniya me Kshatriya roop me) Sloka 31 me bujhelkhin aa fer laukik vyavahaar ke gyaan seho bujhelkhin je dharmayukt vyavahaar sa kakhnahu muh nahi morbaak chaahi. Ehi sa apayash hoichh je bahut kaal dhair ehi jagat me charcha kail jaaichh. Maananiya purush ke lel apakeerti maran sa badatar hoichh. (श्लोक २-३४). जेकर दृष्टिमें लोक पहिले सऽ बहुत सम्मानित होइछ तेकर दृष्टिमें सेहो लघुताके प्राप्त करैछ। वैरी लोक ओकर सामर्थ्यके निन्दा करैत बहुत किछु नहि कहय जोगर वचन (कलंकपूर्ण) सभ कहैछ। धर्मयुद्धमें मरला सऽ सद्‌गति पबैछ, जीतला सऽ नीक भोग पबैछ। बस वाञ्छित कर्म करू। समस्थित (जय-पराजय, लाभ-हानि आ सुख-दुःख के एकसमान बुझू) बनू। एतेक बात ज्ञानयोग केर भेल आ एकर बाद कृष्णजी कहैत छथि जे आगू अहाँ ओ बात सुनू जे अहाँके कर्मबन्धन सऽ मुक्त करत। तेकर बाद के थीक ओ दू श्लोक:

“एहि कर्मयोगमें शुरूआती बीज के नाश नहि होइछ आ उलटा फलरूप दोष सेहो नहि होइछ, जखन कि एहि कर्मयोगरूप धर्मके कनेकबो साधन जन्म-मृत्युरूप महान्‌ भय सँ रक्षा कय लैत अछि। एहि कर्मयोगमें निश्चयात्मिका बुद्धि एकहि टा होइत छैक; लेकिन अस्थिर विचारवाला विवेकहीन सकाम मनुष्य केर बुद्धि निश्चित अनेको भेदवाला आ अनन्त होइत छैक।”

मनन करू आ देखियौक – संसार में थोड़ेक विवेक सेहो एहि समस्त बात के बुझय लेल काफी छैक। बुझैतो सभ अन्ठा के खराब करब – हमरा लोकनिक व्यवसात्मिका बुद्धि के द्योतक बनत। सावधान!

हरिः हरः!

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१४ जून २०१२

अहाँ सभ के केहेन लागल?

कि ई जानकी नवमी के मनाबय लेल अपनाओल गेल तरीका सही अछि?

दहेज मुक्त मिथिला अपन निरन्तर प्रयास धरोहरके संरक्षण के क्रम में कार्य करैत मिथिला के अति प्राचिन आ अत्यन्त सान्दर्भिक सभागाछी के पुनरुत्थान लेल जे पैछला एक वर्ष सऽ प्रयास केलक तेकर अन्तिम पड़ाव बनि गेल ई दिवस। 

एम्हर ओही दिन जनकपुरमें मिथिला राज्यके माँग करैत शान्तिपूर्ण धरना पर बैसल आन्दोलनकारी के बम आक्रमण करैत शहीद बना देल गेल। 

केम्हरौ सऽ नीक खबैड़ नहि भेटैत अछि जे आइ मिथिला-मैथिली लेल नीक काज भेल – एहि सँ आगू के भविष्य नीक बनत….! 

कि सभ दिन हम सभ अहिना मनहूस बनल रहब?

एहि बेर के सौराठ सभा में विद्वत्‌ सभा के प्रस्तावना देने रही, मुदा विद्वान्‌ में ब्राह्मण छोड़ि दोसर वर्ग के प्रवेश पर आपत्ति जतौलनि ओहिठाम के स्थानीय समाज…. एहि कारण आब दहेज मुक्त मिथिला अपन कोनो गतिविधि सौराठ सभा में नहि कय सकत। अफसोस अछि मुदा कि कैल जा सकैत छैक? व्यक्तिगत हम एक ब्राह्मण जाति सँ छी, अपन निजी योगदान हम ओहिठाम दैत रहब… लेकिन जाहि तरहें हम सभ बिना जातियता के बन्धेज मात्र समाज में शुद्धीकरण हेतु दहेज मुक्ति अभियान आ महिला उत्थान – महिला के लेल शिक्षा के आवश्यकता आदि मुद्दा पर कार्य शुरु केने छी तैयो अहाँ सभ जातियता के भंवरी में फंसायब तखन कोना हेतैक विकास?

अहाँ सभ के विचार के इन्तजार करब। समय बहुत कम रहि गेल अछि। २१ जुन सँ सभा बैसत। शुभकामना दैत छी। विवाह केवल ब्राह्मण के निर्धारित करू, hamara sabh ke kono aapatti nahi, lekin Vidwat Sabha ke je swaroop lel ham wakaalat kene rahi kam se kam taahi par jaatiytaa ke bandhej juni lagao aa Dahej Mukt Mithila ke Saurath me kaaj karay del jao.

Harih Harah!

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१५ जून २०१२

किनकर भक्ति नीक: सगुणरूप परमेश्वर (श्रीराम-श्रीकृष्ण-आदि) या फेर निर्गुण-निराकार अविनाशी सच्चिदानन्दघन ब्रह्म केर?

गीता अध्याय १२ प्रथम श्लोक में अर्जुन पूछैत छथिन भगवान्‌ श्री कृष्ण सँ – हे प्रभुजी अपनेक द्वारा कहल गेल पूर्वोक्त ढंग सऽ निरन्तर अपनेक भजन-ध्यानमें लागि अपने सगुणरूप परमेश्वरके आ दोसर जे केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्मके अतिश्रेष्ठ भाव सऽ भजैत अछि – एहि दुनू प्रकार केर उपासक सभमें अति उत्तम योगवेत्ता के अछि?

भगवान्‌ कहलखिन – पहिले जे ११.५५ में कहने छी कि हमरे में मनके एकाग्र करैत निरन्तर हमरे भजन-ध्यानमें लगैत जे भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धासऽ युक्त भऽ के हमर सगुणरूप परमेश्वरके भजैत अछि, वैह हमरा योगीजनमें अति उत्तम योगी मान्य अछि।

लेकिन जे पुरुष अपन इन्द्रियकेर समुदायकेँ बढियां जेकां वशमें कयके मन-बुद्धि सऽ दूर, सर्वव्यापी, अकथनीयरूप आ सदिखन एकरस रहयवाला, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्मकेँ निरन्तर एक भाव सऽ ध्यान करैत भजैत अछि, ओ सम्पूर्ण सृष्टिके हितमें रत आ सभमें समान भाववाला योगी सेहो हमरे प्राप्त करैत अछि।

जखन कि ओहि सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्ममें आसक्त चित्तवाला पुरुषकेर साधनामें विशेष परिश्रम छैक, किऐक तऽ देहाभिमानी द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त कैल जैछ।

आ, जे हमरामें परायण रहयवाला भक्तजन सभ कर्मके हमरे में अर्पित कयके हमर सगुणरूप परमेश्वरके अनन्य भक्तियोग सँ निरन्तर चिन्तन करैत भजैत अछि; ओ हमरामें चित्त लगेनिहार प्रेमी भक्तके हम बहुत जल्दी मृत्युरूप संसार-समुद्र सऽ उद्धार करयवाला होइत छी। हमरेमें मन के लगाउ, हमरे में बुद्धिके लगाउ; एकर उपरान्त अहाँ हमरहि में निवास करब, एहि में कोनो संशय नहि छैक। यदि अहाँ मनके हमरेमें अचल स्थापन करय सऽ समर्थ नहि होइ तऽ अभ्यासरूप योगके द्वारा हमरा प्राप्त करय लेल इच्छा करू। जौँ अभ्यासमें सेहो असमर्थ होइ तऽ सिर्फ हमरा वास्ते कर्म करय लेल परायण बनू। एहि तरहें हमरे निमित्त कर्म सभ करैत हमर प्राप्तिरूप सिद्धिके प्राप्त होयब।

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्‌॥१२-११॥

जौँ हमर प्राप्तिरूप योगकेर आश्रित होइत उपर्युक्त साधनके करयमें सेहो अहाँ समर्थ नहि छी तऽ मन-बुद्धि आदि ऊपर विजय प्राप्त करयवाला बनिके सभ कर्म के फल के त्याग करू। 

If thou art unable to do even this (doing action for My sake), then taking refuge in Me, abandon the fruit of all action, being self-controlled.  (Today’s Bliss).

देवाधिदेव महादेव केर प्रातःस्मरण स्तुति
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सौराष्ट्रे सोमानाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्‌।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्‌॥
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशङ्करम्‌।
वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे॥
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने।
सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये॥
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्‌।
सर्वपापविनिर्मुक्‍तः सर्वसिद्धिफलो भवेत्‌॥

नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव!

हरिः हरः!

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१६ जून २०१२

मैथिली-मिथिला के नाम पर कमाइ?

मिथिला-मैथिली में लागल लोक काल्हि खाकपति, आइ करोड़पति?

उपरोक्त दू प्रश्न हम राखि रहल छी। जखन कि ओ प्रश्न नहि आरोप अछि। किछु नीक लोक जिनका हम नेतृत्वकर्ता मानैत छी तिनकर आरोप। जिनका हम साहित्य-सेवी आ विद्वान्‌ मानैत छी तिनकर आरोप। आब या तऽ अहाँ सभ एहि आरोप के प्रमाणित करू आ नहि तऽ अपन मनोदशा में सुधार लाउ। निराधार आरोप लगायब अहाँके बीमारी के परिचायक होयत। आ एहि आरोप लेल अहाँ हर तरहक नाम आ आरोप खुइल के ली। कारण हमरा बुझने पहिले तऽ अहाँके आरोप निराधार अछि, आ जौँ अहाँके आरोप सच अछि तऽ ओ व्यक्ति जे मैथिली-मिथिला के भजा रहल छथि से वास्तवमें मैथिली-मिथिला के दुश्मन छथि।

निराधार आरोप कथी लेल?

हमर समझ में मैथिली-मिथिला के लेल बहुत थोड़ लोक हिम्मत रखैत छथि जे काज करी। ओ थोड़ लोक अक्सरहाँ सबल वर्ग के होइत छथि जे अपन लगानी सँ – अपन अद्वितीय टैलेन्ट सऽ – अपन व्यवस्थापन आ सेवा सऽ मैथिली लेल सेवारत होइत छथि।

मैथिली-मिथिला के सेवक करोड़पति कोना?

हम एहि बात के रुबरु देखल अछि जे आइ धैर मैथिली-मिथिला प्रति निःस्वार्थ सेवा करनिहार कहियो भूखल नहि मरल आ ने कहियो कोनो तरहक रोग-व्याधि-दरिद्रता ओकरा घेरलक। मैथिली के सेवा याने साक्षात्‌ सीता जी के सेवा भेल – सीताजी के सेवा करनिहार के संग ऋद्धि आ सिद्धि के वास होयब स्वाभाविक छैक। सरस्वती दहिन रहैत छथिन। लक्ष्मी स्वतः हुनका लग वास करथिन। एहि में कोनो अतिश्योक्ति नहि।

आरोप लगौनिहार के प्रमाण गलत कोना?

अहाँ कहैत छियैक जे काल्हि धरि ओ खाकपति छलाह आ आब मैथिली लेल लड़ैत छथि – मिथिला लेल लड़ैत छथि तऽ करोड़पति बनि गेलाह – यैह बड़का प्रमाण भेल; लेकिन हम कहब जे ई सरासर गलत भेल। एक तऽ विरले लोक में मैथिली-मिथिला प्रति सेवाभावना के जागृति होइत छैक आ जेकरा में ई भावना जाग्रत होइत छैक, ओकर मूलाधार सऽ सहस्त्र-चक्राधार तक जाग्रत होइत छैक। ओकरा कथुओ के कमी नहि रहि जाइत छैक। मीठ-भाषा – सुन्दर धर्मनिष्ठ संस्कृति के संचालक/पालक बनल संसार के नेत्रके तारा बनैत छैक आ पाहुन राम – पाहुन गौरीवर महादेव (हरिः हरः) ओकरा ऊपर सदैव दहिन रहैत छथिन। ओकर विरुद्ध अहाँके प्रमाण नहि, अहाँके अन्तर्द्वंद्व आ सन्देह के अबस्था मात्र अछि। एकर सर्वथा त्याग करू।

लेकिन एक बात जरुर छैक। सत्ययुग तऽ थिकैक नहि। किछु लोक जरुर मैथिली के कार्यक्रम केर अनुदान राशि गवन करैत छथि जे साक्षात्‌ पाप के घैला भरैत छैथ। एहेन लोक के आइ धरि कल्याण नहि भेलैक अछि।

आ, एक बात आरो… नेपाल में सरकार मैथिली के नाम पर दैत छैक कतेक? जे अहाँ लूटैत देखलियैक?

मिथिला (भारत) स एतेक महत्त्वपूर्ण पद पर रहितो मैथिल स्वयं मैथिली-मिथिलाके मुद्दा पर चुप किऐक छथि? केवल नारा चलैत छैक? काज किछु नहि भेलैक, से किऐ?

अहाँके एहि प्रश्न के उत्तर हम एक पाँति में देबय चाहब – आइ धैर जे अमर मैथिल छथि यदि ओ मिथिला या मैथिली के मुद्दापर चुप्पे मरल होइथ से बताओ। अमर वैह छथि जे अपन मातृभूमि-मातृभाषा के गान कयलन्हि। तखन अहाँ किनका महान्‌ मैथिल मानैत छी जे मिथिला के मुद्दा पर चुप होइथ। अहाँ किछु नाम लेलहुँ – जेना शरद यादव… जगन्नाथ मिश्र… पं. ताराकान्त झा… हम सभ के पहचान आ क्रियाकलाप सऽ तऽ परिचित नहि छी। मुदा जगन्नाथ बाबु अमर शहीद ललित बाबु के भाइ के नाते पद आ प्रतिष्ठा सभ कमौलनि… लेकिन वास्तवमें मैथिली के नैया ओ डूबेलैन से सुनैत छी। पं. ताराकान्त बाबु एक कर्मठ मैथिल छलाह, छथि आ रहता। हाँ, हालहि बिहार विधान परिषद्‌ के सभापति के रूपमें हुनक मिथिला सँ विकर्षण भेल ई आरोप लागि रहल अछि। परन्तु हम स्वयं व्यक्तिगत रूपमें एहि नेता के कर्मठ कार्य मिथिला लेल सौराठ में देखलहुँ, ताहि सँ प्रभावित छी, प्रेरित छी। शरद यादव जी मधेपुरा क्षेत्र सऽ छथि शायद… बेसी नहि पता अछि।

हँ, नाम कुकर्म केला सऽ सेहो महान् होइत छैक.. एहेन लोक के उदाहरण जुनि देखाउ जे कुकर्मे नाम करय लेल मैथिली-मिथिला के बर्बाद कयलाह तिनकर बात कि कहू! 

ओहिठाम जे लड़निहार बेटा छथि ओ आखिरकार मैथिली लेल भारतीय संविधान के अष्टम्‌ अनुसूची में दर्जा दियौलनि, जेकर कमी के कारण कहाँ दैन १९५३ ई. मे मिथिला राज्य के माँग नहि मानल गेल छल। ओहि सऽ पहिने १९३६ ई. में सेहो डा. अमरनाथ झा के सिफारिश मैथिली लेल रहितो ओकरा डा. राजेन्द्र प्रसाद एवं अन्य द्वारा समस्त भारत लेल हिन्दीके सपना देखैत अपनहि क्षेत्रक मातृभाषा सभ के अष्टम्‌ अनुसूचीमें स्थान नहि राखि हिन्दी के प्राथमिकता देल गेल छल। जौँ १९३६ ई. में मैथिली के संग न्याय कैल गेल रहैत तऽ १९५३ ई. में स्वतन्त्र भार में मिथिला राज्य जरुर बनि गेल रहैत।

आब कूकर्मी के यदि अहाँ अमर मानी – महान्‌ मानी तऽ एहेन बहुत लोक मिथिला-मैथिली सऽ सटल कूकर्मी नजैर आयत जे बनल मैथिली-भाषा में आ गायन करत अन्य के… नेपाल एकर सर्वोत्तम उदाहरण बनल अछि। कखनहु मैथिली के ब्राह्मणक भाषा कहि तऽ कखनहु अन्य भाषिका के मूल भाषा बनाबय के मोह में … एतय तक जे नेपाल में सेहो मैथिली पर हिन्दी के छरपाबय के कहानी पुनरावृत्ति भऽ रहल छैक। एहि सऽ मधेस एक प्रदेश बनत से सपना हम सभ देखिये रहल छी.  Tadaapi, Maithili haarayvaali nahi chhathi. Kaaran O sakshaat Sita – Jagajjanani thiki. 

मैथिली-मिथिला लेल ब्राह्मण जाति मात्र चिन्तित, किऐक?

अहाँके एहि प्रश्न के उत्तर में बहुत हद तक हम अहाँके संग छी। आ एहि बात लेल सहमत सेहो छी जे ब्राह्मण के समाज के अगुआ के भूमिका निर्वाह करय पड़ैत छैक। सीता स्वयंवर में जखन श्रीराम धनुष भंग कय देलखिन तेकर बाद के परशुराम भूमिका स्मरण करू। लक्ष्मण-परशुराम संवाद स्मरण करू। पुनः श्रीराम के ओ वचन आ उपस्थित समस्त राजागण – रनिवास आ एक-एक प्राणी के वचन स्मरण करू। ब्राह्मण प्रथम छथि। आगुओ रहता। लेकिन केवल ब्राह्मणक कोइख सऽ उत्पन्न ब्राह्मण टा नहि, बल्कि ब्रह्मचर्य धारण केनिहार विष्णु मंडल होइथ, ओसिन मियां होइथ, परमेश्वर कापड़ि होइथ, श्याम सुन्दर पथिक होइथ… मीना देव होइथ, उषा पासवान होइथ… जे प्रखर आ मेधावी छथि ओ मैथिली के अंग लगौने छथि। मैथिली के संग छथि। फूसिये के झगड़ा आ रगड़ा में अपन जीवन नाहक नहि बितबैत छथि। जातिवादिता के झगड़ा तऽ लदौआ प्रकृति के थिकैक जाहि के बले बिहार आ मधेस के सूत्र निर्माण होइत छैक। बिहार – मधेस विशाल रहितो मिथिलाके विशालता के अपन भीतर शायद धारण करऽ जोग नहि छैक, कारण बिहार अपन १०० वर्ष पूरा कयला के बावजूद मिथिला के गरिमा के आदर तक करब नहि सिखलकैक। आइयो जातिवादिता के बुनियाद पर कतय सऽ कतय पहुँचि गेल से हमरा नहि कहय पड़त। 

Harih Harah!!

Krishnanand Choudhary Roshan Kumar Jha Abhishek Kumar Jha Abhi Anand Mishra Pankaj Jha Manoj MuktiKaruna Manoj Jha Mukti Manoj Kumar Jha Rajan Mukti

(Apane lokani ke gavaah rakhait vishay par bina kono poorvaagrah ke vichaar raakhay lel anurodh karait chhi).

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एहि चिन्ता के शायद केओ नहि पकैड़ रहल अछि जे आखिर मैथिली-मिथिला के काज करनिहार के संख्या में एतेक कमी किऐक अछि… लेकिन ई चिन्ता बहुतो के खेने जा रहल छैक जे – जे केओ मैथिली-मिथिला के सेवा में छथि ओ विपन्न नहि सम्पन्न छथि। ओ सम्पन्नता के पूँजी पर अपन महानता देखबैत काज कय रहल छथि। ओ भले डा. धनाकर ठाकुर होइथ, ओ बैद्यनाथ चौधरी बैजु होइथ, ओ प्रो. कृपानन्द झा होइथ, ओ डा. एस. एन. झा होइथ, ओ प्रा. परमेश्वर कापड़ि होइथ, ओ प्रा. अमरकान्त झा होइथ, ओ श्री विष्णु मंडल होइथ…. ओ डा. भुवनेश्वर गुरमैता होइथ… ओ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि होइथ… ओ डा. अमरेश ना. झा होइथ… ओ श्रीमती करुणा झा होइथ, ओ श्री देवेन्द्र मिश्र होइथ, ओ श्री श्याम सुन्दर यादव होइथ, ओ ओसिन मियां होइथ, ओ मो. रिजवी होइथ, ओ जे केओ छथि, हुनकर मैथिली-मिथिला के अलख केवल आन्तरिक शक्तिके आधार पर जाग्रत छन्हि। ईश्वर हुनका कोनो वस्तु के कमी नहि देने छथिन। हुनका चन्दा के पैसा गवन करब या टोपीबाजी करै के कोनो शौख नहि छन्हि। एहि दर्द के ओ लोक बुझैत छैक जे हृदय सँ लगन लगा कऽ मैथिली-मिथिला के सेवामें लागल छैक। हमर चुनौती अछि जे केओ हमरा ई प्रमाणित कय दियऽ जे मैथिली-मिथिला के कर्णधार आइ धैर कतहु बेईमानी केने हो आ ओकरा एहि लेल सजाय नहि भेटल हो।

जनकपुर में बम ब्लास्ट भेल… प्राध्यापक परमेश्वर कापड़ि बजलाह एक बात जे एकरा राजनीति सऽ जुनि जोड़ू – ई हमरा लोकनिक धर्म सेहो थीक। धर्म विरुद्ध यदि मिथिला के मटियामेट करय लेल सोचब तऽ क्षमा याचना करय जोग पर्यन्त नहि रहि जायब। हम हुनका एहि भावना के सार्वजनिक करय लेल बेर-बेर नमन्‌ करैत छी।

हरिः हरः!

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१९ जून २०१२
Sochiyau besi nay sarakaar
Chaliyau nij karamahi ke dhaar!!
Bhetat haq-adhikaarak bhaag paanik ret sa
Kariyau mehnat sadikhan apan chet sa!!Karu apan hissa ke kaaj,
Kayam hoyat Mithila Raaj
Ber-ber mangiyau nai adhikaar anakar khet sa…
Kariyau mehanat sadikhan apan chet sa!!
Harih Harah!!

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२० जून २०१२
स्थायी:
पी! मैथिल पी! हिन्दी पी कि ईङ्गलिश पी!
पी! पी! पी मैथिल पी! हिन्दी-ईङ्गलिश पी!
—————————————--अन्तरा १:
रहय छै – रहय छै कि हिन्दी बजै छै
पी जौँ लै छै तऽ ईङ्गलिश बजै छै!

अन्तरा२:
भीतर कोकनल बाहर फों-फों करै छै
माथ में मिरगी कोना नाच सजै छै!

अन्तरा३:
बिसरिके निकहा बानी गली हुलै छै
केकरो कि सुनत ओ कहियो लजै छै!

अन्तरा४:
बुझय गुण बौर फेर रसियारी जै छै
संगी धकियाबय बल निजे मजै छै!

अन्तरा५:
अपने बुद्धि के हरदम दाबी रटै छै
टोकि जौं देलक केओ झट तजै छै!

पुनरावृत्ति अन्तरा ६:
रहय छै – रहय छै कि हिन्दी बजै छै!
पी जौँ लै छै तऽ ईङ्गलिश बजै छै!!

चियर्स! 

हरिः हरः!

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२१ जून २०१२
देखियौ खौंझाइ कोना सुनि गाम
शहर के चस्का जे लगलय!मन खसय सुनि मिथिला के नाम
पर देशक तिमन चखलय!

निकहो मालिक गाम छोड़लकै
मोह माया सभ तोड़ि के!

जकरे देखि पूरा गाम बनेलकै
नेहक पाती जोड़ि के!

बीतल जानि कतेको साल
हवेली सून्न जे पड़लय!

देखियौ…

Harih Harah!

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२१ जून २०१२

सौराठ सभा की परंपरा फिर जियेगी…

लेकिन तब तक जब तक यहाँ फालतू राजनीति करनेवाले अपने गलत मंशा से बाज नहीं आते…

तब तक जब तक इसे केवल पुराने परंपरा के स्वरूप में मात्र मूल्यांकन करते और आगे भी केवल वैसा ही स्वरूप के साथ संवर्धन चाहते…

तब तक जब तक दहेज की माँग स्वरूप को मिथिला से लोग स्वच्छ भावना साथ त्याग न देते…

तब तक जब तक लोगों में अपने इलाके की विकास के लिये सच्ची भावना जाग्रत न हो जाती….

तब तक जब तक अतिक्रमण छोड़ आगे बढनेकी रास्ते को लोग प्रशस्त न करते….

सौराठ सभा या युँ कहें कि मिथिला का किसी भी संस्थान का विकास संभव नहीं हो सकता और परंपरा मिटती नजर आयेगी। हर साल आप जैसे बड़े और समझदार लोग केवल आँसू बहाते नजर आयेंगे। कहानियाँ कही-सुनी जायेंगी। और कुछ नहीं हो सकता।

सुधार के लिये दहेज मुक्त मिथिला ने अपने एक वर्ष धरोहर संरक्षण अभियान को चलाते हुए यहाँ काफी प्रयास किया… अपनी समझ से – सूझबूझ से राय दिये कि

१. यहाँ वैवाहिक सम्बन्धों का निर्धारण के लिये अब जातीयता का बन्धन को खोल दिया जाय।

२. सभी जाति-वर्गके अपने-अपने उसुल हैं, आप अपने जातिगत धर्मोंका निर्वाहको व्यक्तिगत समझकर अपने-अपने परम्पराओंके अनुसार वैवाहिक सम्बन्ध निर्धारण करें।

३. यहाँ सभा-बास के समय विद्वत्‌ सभा का आयोजन किया जाये और पूरे मिथिला से विद्वानोंको आमंत्रित करके हर क्षेत्रोंसे चुने हुए युवा-विद्वानों से शास्त्रार्थ कराया जाय और मिथिलाकी ऐतिहासिक गरिमाओंके साथ-साथ सुनहरे भविष्य को संरक्षित रखनेके लिये विभिन्न विषयोंपर बहस हो, पर्यटकीय मेला लगाया जाय, मिथिलाकी संस्कृति और कला का बखूबी प्रदर्शन हो, देश-विदेश से लोगोंको बुलाया जाय और मैथिलोंका विशेषता से सारे संसार को रुबरू कराया जाय। ऐसे और भी बहुत लाभदायक परिणाम होंगे, इस तरफ सरकारी, गैर-सरकारी, सांस्कृतिक, समाजिक संघ-संस्था व व्यक्तियोंका जुड़ाव बने और जल्द ही सौराठ सभा अपनी पुरानी गरिमा को प्राप्त करेगी।

४. हमारी माँगें थी कि सौराठ सभा को ऐतिहासिक धरोहर के रूपमें अब पर्यटन-केन्द्रके रूपमें विकास करें। इसे राष्ट्रीय धरोहर भी घोषित करें।

५. यहाँ अतिक्रमण को हंटाकर भूमि को संरक्षित करनेके लिये चहारदिवारी और कुछ नये रचनात्मक कार्य कराये जायें। जैसे बिहार सरकारकी कला-संस्कृति विभाग ने यहाँ का अति प्राचिन कलाकृतिका अनूठा नमूना माधवेश्वरनाथ महादेव मन्दिर का जीर्णोद्धार के लिये जिम्मा लिया है, उसी तरह कुछ और नये रचनात्मक – सृजनात्मक काम किये जायें।

यह सभी उपायोंका ईमानदारी से अनुसरण करनेपर सब कुछ अच्छा होगा, ऐसा हमारा विश्वास है।

http://www.jagran.com/jagran/article_display.page?locale=1&id=9388620

हरिः हरः!

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२२ जून २०१२
लाज करू यौ बौआ-नुनू – बिसैर रहल किऐ मैथिली
नहि चमकत कहियो नभ तारा बाजैत अनकर बोली
यौ बाजु! – बाजु अपन माय केर बोली – २परम दुलारू माय के बेटा मम्मी-मम्मी बाजय
माइयो केहेन भेल छै जाहिल बेटाके सनकाबय
अपनो ठोकि सुताबय छौड़ा गाबि के हिन्दी लोरी
कोना के बनतय मैथिल बजतय कोना के मैथिली
यौ बाजु! – बाजु अपन माय केर बोली – २

कौआ मोरक पाँखि पहिर न नाचल जेना मयूर
खसल तार के गाछ सऽ फेरो अटकल गाछ खजूर
अनट-बनट जे बाजय बोली नवसिखुआ नवटोली
नम्हर टा के डेग बिना दम केना उठेबय मैथिली
यौ बाजु! – बाजु अपन माय केर बोली – २

विद्यापति संस्कृत छोड़ि लिखला देसिल वयना
याचना के त्यागि अयाची निपला मिथिला अंगना
मंडन केर मंथन सँ चमकल सगरो दुनिया मैथिली
तैयो अहाँ किऐ बुद्धि बिगाड़ी बाजि के अनकर बोली
यौ बाजु! – बाजु अपन माय केर बोली – २

लाज करू यौ बौआ-नुनू – बिसरै रहल किऐ मैथिली!
नहि चमकत कहियो नभ तारा बाजैत अनकर बोली
यौ बाजु! – बाजु अपन माय केर बोली – २

Harih Harah!!

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हमर अन्तर्ब्रह्म प्रसन्न भेलाह जे अपने लोकनि आध्यात्मिक ज्ञानवर्धन हेतु गीता व अन्य धार्मिक-मार्मिक ज्ञान सऽ भरल पोस्टके चाव सऽ पढैत छी, मनन करैत छी आ तदनुसार जीवनधन के वास्तविक लाभ उठबैत छी। आउ, आइ एक अति महत्त्वपूर्ण जीवनधन ‘दानशीलता’ पर किछु अध्ययन करी।

दान-सुभाषितावली

यद्ददाति विशिष्टेभ्यो यच्चाश्नाति दिने दिने।
तच्च वित्तमहं मन्ये शेषं कस्यापि रक्षति॥

जो विशिष्ट सत्पात्रों को दान देता है और जो कुछ अपने भोजन-आच्छादनमें प्रतिदिन व्यवहृत करता है, उसीको मैं उस व्यक्तिका वास्तविक धन या सम्पत्ति मानता हूँ, अन्यथा शेष सम्पत्ति तो किसी अन्यकी है, जिसकी वह केवल रखवाली मात्र करता है।

यद्ददाति यदश्नाति तदेव धनिनो धनम्‌।
अन्ये मृतस्य क्रीडन्ति दारैरपि धनैरपि॥

दानमें जो कुछ देता है और जितनेमात्रका वह स्वयं उपभोग करता है, उतना ही उस धनी व्यक्तिका अपना धन है। अन्यथा मर जानेपर उस व्यक्तिके स्त्री, धन आदि वस्तुओं से दूसरे लोग आनन्द मनाते हैं अर्थात्‌ मौज उड़ाते हैं। तात्पर्य यह है कि सावधानीपूर्वक अपनी धन-सम्पत्तिको दान आदि सत्कर्मोंमें व्यय करना चाहिये।

किं धनेन करिष्यन्ति देहिनोऽपि गतायुषः।
यद्वर्धयितुमिच्छन्तस्तच्छरीरमशाश्वतम्‌॥

जब आयुका एक दिन अन्त निश्चित है तो फिर धनको बढाकर उसे रखनेकी इच्छा करना मूर्खता ही है, वह धन व्यर्थ ही है, क्योंकि जिस शरीरकी रक्षा के लिये धन बढानेका उपक्रम किया जाता है – वह शरीर ही अस्थिर है, नश्वर है, इसलिये धर्मकी ही वृद्धि करनी चाहिये, धनकी नहीं। धनके द्वारा दान आदि करके धर्मकी वृद्धिका उपक्रम करना चाहिये, निरन्तर धन बढानेसे कोई लाभ नहीं।

अशाश्वतानि गात्राणि विभवो नैव शाश्वतः।
नित्यं संनिहितो मृत्यु कर्तव्यो धर्मसंग्रहः॥

शरीरधारियोंके शरीर नश्वर हैं और धन भी सदा साथ रहनेवाला नहीं है; साथ ही मृत्यु भी निकट ही सिरपर बैठी है – ऐसा समझकर प्रतिक्षण धर्मका संग्रह -धर्माचरण ही करना चाहिये; क्योंकि कालका क्या ठीक कब आ जाय, अतः अपने धन एवं समयका सदा सदुपयोग ही करना चाहिये।

यदि नाम न धर्माय न कामाय न कीर्तये।
यत्‌ परित्यज्य गन्तव्यं तद्धनं किं न दीयते॥

जो धन धर्म, सुखभोग या यश – किसी काममें नहीं आता और जिसे छोड़कर एक दिन यहाँसे अवश्य ही चले जाना है, उस धनका दान आदि धर्मोंमें उपयोग क्यों नहीं किया जाता?

क्रमशः….

एक बेर पूरा अध्याय पढी तदोपरान्त सारांश अपन माय के बोली अनुरूप बूझब, सभ बात सहज स्मृतिमें बैसि जायत। ताबत धरि एतबी जे अपन जरुरत सऽ फाजिल जे किछु रहय, तेकरा संग्रह नहि कय के बस आवश्यकता में रहनिहार लेल दान करी। 

हरिः हरः!

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२२ जून २०१२

दान सुभाषितावली (क्रमशः सऽ आगू):

जीवन्ति जिवते यस्य विप्रा मित्राणि बान्धवाः।
जीवितं सफलं तस्य आत्मार्थे को न जीवति॥

जिस व्यक्तिके जीने ब्राह्मण, साधु-सन्त, मित्र, बन्धु-बान्धव आदि सभी जीते हैं – जीवन धारण करते हैं, उसी व्यक्तिका जीवन सार्थक है – सफल है; क्योंकि अपने लिये कौन नहीं जीता? पशु-पक्षी आदि क्षुद्र प्राणी भी जीवित रहते ही हैं, अतः स्वार्थी न बनकर परोपकारी बनना चाहिये।

क्रिमयः किं न जीवन्ति भक्षयन्ति परस्परम्‌।
परलोकाविरोधेन यो जीवति स जीवति॥

कीड़े-मकोड़े भी एक-दूसरे का भक्षण करते हुए क्या जीवन धारण नहीं करते? पर यह जीवन प्रशंसनीय नहीं है। परलोकके लिये दान-धर्मपूर्वक जिया गया जो जीवन है, वही सच्चा जीवन है।

पशवोऽपि हि जीवन्ति केवलात्मोदरम्भरा:।
किं कायेन सुपुष्टेन बलिना चिरजीविनः॥

केवल अपने पेटको भरकर पशु भी अपना जीवन धारण करते ही हैं। पुष्ट होकर तथा बली होकर भी जो लम्बे समयतक जीता है, धर्म नहीं करता – ऐसे निरर्थक जीवन से क्या लेना-देना! वह तो पशुके समान ही जीना है।

ग्रासादर्धमपि ग्रासमर्थिभ्यः किं न दीयते।
इच्छानुरूपो विभवः कदा कस्य भविष्यति॥

अपने भोजनके ग्रासमें से भी आधा या चतुर्थ भाग आवश्यकतावालों या माँगनेवालोंको क्यों नहीं दे दिया जाता; क्योंकि इच्छानुसार धन तो कब किसको प्राप्त होनेवाला है, अर्थात्‌ अबतक तो किसीको प्राप्त नहीं हुआ है और न आगे किसीके पास होगा। यह नहीं सोचना चाहिये कि इतना धन और आ जायगा तो फिर मैं दान-पुण्य करूँगा। अतः जितना भी प्राप्त हो, उसीमें संतोषकर उसीमें से दान इत्यादि सब धर्मोंका अभ्यास करना चाहिये।

शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः।
वक्‍ता शतसहस्रेषु दाता भवति वा न वा॥

शूरवीर व्यक्ति तो सौ में से खोजनेपर एक प्राप्त हो जाता है, हजारमें ढूँढनेपर एक विद्वान्‌ व्यक्ति भी मिल जाता है, इसी प्रकार एक लाख में सभापर नियन्त्रण करनेवाला कोई वक्ता भी प्राप्त हो जाता है, किंतु असली दाता खोजनेपर भी मिल जाय, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता, अर्थात्‌ दानी व्यक्ति संसारमें सबसे अधिक दुर्लभ है।

न रणे विजयाच्छूरोऽध्ययनान्न च पण्डितः।
इन्द्रियाणां जये शूरो धर्मं चरति पण्डितः॥

शूरवीर वही है जो वास्तवमें इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करता है, युद्धमें विजय प्राप्त करनेवाला असली शूरवीर नहीं है। मात्र शास्त्रोंका अध्ययन करनेवाला ज्ञानी नहीं है, बल्कि तदनुकूल धर्माचरण करनेवाला ही सच्चा ज्ञानी है।

सर्वेषामप्युपायानां दानं श्रेष्ठतमं मतम्‌।
सुदत्तेनेह भवति दानेनोभयलोकजित्‌॥

दान सभी उपायोंमें सर्वश्रेष्ठ है। यथोचित रीतिसे दान देनेसे मनुष्य दोनों लोकोंको जीत लेता है।

न सोऽस्ति राजन्‌ दानेन वशगो यो न जायते।
दानेन वशगा देवा भवन्तीह सदा नृणाम॥

रा्जन्‌! ऐसा कोई नहीं है, जो दानद्वारा वशमें न किया जा सके। दानसे देवतालोग भी सदा के लिये मनुष्यों के वश में हो जाते हैं।

दानमेवोपजीवन्ति प्रजाः सर्वा नृपोत्तम।
प्रियो हि दानवाँल्लोके सर्वस्यैवोपजायते॥

नृपोत्तम! सारी प्रजाएँ दानके बलसे ही पालित होती हैं। दानी मनुष्य संसारमें सभीका प्रिय हो जाता है।

क्रमशः….

हरिः हरः!

**
म सोचकर हैरान होगी मेरी जाँ – तुम्हारी वफामें आखिर ये दम कैसा है!
मना ले रब को वो जो बस एक बार – बता फिर तू कि जहाँ में गम कैसा है!मालूम है घूरती तुम मुझे बार बार – तौलती हो तेरी मुहब्बत रंग कैसा है!
रखे जहाँगीर हमको छाँव अनूठा प्यार, बता फिर बाकी मसला जंग कैसा है!

जाओ! अपनी सुरतको जरा सम्हालो मेरी जाँ! क्यों मुझे समझाने के चक्करमें पड़ी हो! मेरे महबुबा! मैंने खुदा का बन्दगीको है अपना लिया – बस मुझे उसकी मुहब्बत की नशा में डूब जाने दो। मुझे मत पुकारो – तेरी बाँहों में वो अब न आये बस यही दुआ करो।

तुम्हारा नहीं बल्कि उनका!

वफा!

हरिः हरः!

**
२३ जून २०१२

हमरो गर्व अछि जे हम मैथिल छी,

अपन मैथिलपन के जोगबय लेल हम प्रतिबद्ध छी,

कदापि बाजिटा के रहय पड़ैछ तऽ शर्म-बेहयापन में स्वयं के डूबल देखैत छी।

मैथिली के आधुनिक स्वरूप जाहि में अंग्रेजी, हिन्दी, नेपाली, भोजपुरी, वा अन्य कोनो विकसित भाषा के शब्द के मिश्रण के नव प्रयोग हम एहि लेल समर्थन करैत छी जे कतेको मैथिल अपन मैथिली के स्वरूपमें कनिकबो परिवर्तन सऽ ओकर नव नामांकन करैत भाषिका – उप-भाषा के नाम छोड़ि स्वयंके नव-भाषी कहैत पहचान स्थापित करय के एक गलत फैशन चलेलैथ अछि जेकर सुधार उपरोक्त language fusion के बढावा देला सऽ संभव हेतैक। In the meantime, मैथिल के एना नहि बुझेतैन जे आधुनिकता के वयारमें हम सभ पाछू आ वैह पुरान रूढिवादी सोच के लोक बनल छी। बेशक! भाषा में नव तेज के प्रवेश लेल किछु लचीलापन अख्तियार करब जरुरी छैक, ठीक जेना हिन्दी में उर्दू आ फारसी आ अंग्रेजी के संग-संग विभिन्न भारतीय उपभाषा सभक शब्दके मिश्रण संग भेलैक। आइ हिन्दी अपन सम्मान अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बनेलक एहि में ई सूत्र के संग-संग हिन्दी सिनेमा के मुख्य भूमिका छैक।

हमहुँ सभ मैथिली के सिनेमा, संगीत, मिडिया, व आधुनिकता सोशियल साइट आदिके निर्माण पर अपन प्रखर नजैर जरुर राखी।

शुभकामना के संग – अहाँ सभक प्रवीण ‘किशोर’

हरिः हरः!

**

दान सुभाषितावली (क्रमशः सऽ आगू)…

न केवलं दानपरा जयन्ति, भूर्लोकमेकं पुरुषप्रवीराः।
जयन्ति ते राजसुरेन्द्रलोकं सुदुर्जयं यो विबूधाधिवासः॥

दानपरायण पुरुषश्रेष्ठ केवल एक भूलोकको ही अपने वशमें नहीं करते, प्रत्युत वे अत्यन्त दुर्जय देवराज इन्द्रके लोकको भी, जो देवताओंका निवासस्थान है, जीत लेते हैं। 

अदत्तदानाच्च भवेद्‌ दरिद्रो दरिद्रभावाच्च करोति पापम्‌।
पापप्रभावान्नरके प्रयाति पुनर्दरिद्रः पुनरेव पापी॥

दान न देनेसे प्राणी दरिद्र होता है। दरिद्र हो जानेपर फिर पाप करता है। पापके प्रभावसे नरकमें जाता है और नरकसे लौटकर पुनः दरिद्र और पुनः पापी होता है। 

यदैव जायते श्रद्धा पात्रं सम्प्राप्यते यदा।
स एव पुण्यकालः स्याद्यतः सम्पत्तिरस्थिरा॥

जब कभी भी श्रद्धा उत्पन्न हो जाय और जब भी दानके लिये सुपात्र प्राप्त हो जाय, वही समय दानके लिये पुण्यकाल है; क्योंकि सम्पत्ति अस्थिर है।   

यानि यानि च दानानि दत्तानि भुवि मानवैः।
यमलोकपथे तानि ह्युपतिष्ठन्ति चाग्रतः॥

पृथ्वीपर मनुष्योंके द्वारा जो-जो दान दिये जाते हैं, यमलोकके मार्गमें वे सभी आगे-आगे उपस्थित हो जाते हैं। 

गृहादर्था निवर्तन्ते श्मशानात्सर्वबान्धवाः।
शुभाशुभं कृतं कर्म गच्छन्तमनुगच्छति॥

धन-सम्पत्ति घरमें ही छूट जाती है। सभी बन्धु-बान्धव श्मसानमें छूट जाते हैं, किंतु प्राणीके द्वारा किया हुआ शुभाशुभ कर्म परलोकमें उसके पीछे-पीछे जाता है।   

पितुः शतगुणं पुण्यं सहस्रं मातुरेव च।
भगिनी दशसहस्रं सोदरे दत्तमक्षयम्‌॥

पिताके उद्देश्यसे किये गये दानसे सौ गुना, माताके उद्देश्यसे किये गये दान से हजार गुना, बहनके उद्देश्यसे किये गये दानसे दस हजार गुना और सहोदर भाईके निमित्त किये गये दान से अनन्त गुना पुण्य प्राप्त होता है।   

अहन्यहनि यान्तमहं मन्ये गुरुं यथा।
मार्जनं दर्पणस्येव यः करोति दिने दिने॥

दिन-प्रतिदिन याचना करनेवालेको मैं उस गुरुके समान समझता हूँ, जो दर्पणकी भाँति प्रतिदिन शिष्यका मार्जन करता रहता है, अर्थात्‌ जैसे धूलराशिसे दर्पण मलिन रहता है, वैसे ही शिष्यका अन्तःकरण भी मलिन रहता है, गुरु अपने ज्ञानरूपी प्रकाशसे उसके अन्तःकरणको स्वच्छ कर देता है, वैसे ही याचक भी याचना करते हुए व्यक्तिको यह बोध करा देता है कि यदि दान नहीं दोगे तो मेरी (भिक्षुक) – जैसी स्थिति होगी, अतः दान देते रहना चाहिये। याचक सच्चे एवं हितैषी गुरु के समान है।

आयासशतलब्धस्य प्राणेभ्योऽपि गरीयसः।
गतिरेकैव वित्तस्य दानमन्या विपत्तयः॥

सैकड़ों कठिन प्रयत्नोंद्वारा प्राप्त तथा प्राणोंसे भी अधिक प्रिय धनकी केवल एकमात्र गति है – दान, उसकी अन्य गतियाँ अर्थात्‌ दान छोड़कर उसका अन्य उपयोग करना विपत्ति ही है।

किं धनेन करिष्यन्ति देहिनो भङ्गुरश्रियाः।
यदर्थं धनमिच्छन्ति तच्छरीरमशाश्वतम्‌॥

क्षणभरमें ही विनष्ट हो जानेवाले शरीररूपी सम्पदासे सम्पन्न मनुष्य धनसे क्या करेंगे; क्योंकि जिस शरीरके लिये वे धनकी अभिलाषा रखते हैं, वह शरीर तो अशाश्वत है, रहनेवाला ही नहीं है।

न दानादधिकं किञ्चित्‌ दृश्यन्ते भुवनत्रये।
दानेन प्राप्यते स्वर्गः श्रीर्दानेनैव लभ्यते॥

तीनों लोकोंमें दानसे बढकर कुछ दिखायी नहीं देता। दानसे दिव्य लोककी प्राप्ति होती है, लक्ष्मी दानके द्वारा ही प्राप्त होती है।

धर्मार्थकाममोक्षाणां साधनं परमं स्मृतम्‌।

दानको धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष – इस चतुर्वर्गकी प्राप्तिका श्रेष्ठ साधन बताया गया है। 

क्रमशः…

बस एखन उपरोक्त एक-एक श्लोक के महत्त्वके नीक सऽ मनन करैत चलू! …

हरिः एव हरः!

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कहानियों में न सिमटे सौराठ सभागाछी – इसके लिये युवाओंको जागृति पाना होगा। दहेज मुक्त शादी करनी होगी। सभागाछीको पर्यटन केन्द्र बनाना होगा। इसे मिथिला क्षेत्र की सबसे बड़ी राष्ट्रीय धरोहर बनाना होगा। और यह तभी संभव है जब हम इसपर सभी धर्म और जातियोंका हक मानेंगे। भले विवाह के लिये मैथिल ब्राह्मणोंका ही एकाधिकार रहे… लेकिन स्थल के रूपमें इसकी पवित्रता सभी के लिये एकसमान है।

इसके लिये मिहिर जैसे युवाओंको सामने आना होगा। बेशक! उसने सीना ठोककर यह कहा कि मिथिलाकी इस गरिमामय धरोहर को जिन्दा रखनेके लिये मैं अपनी शादी यहीं से और वो भी पूर्ण दहेज मुक्त करूँगा।

दहेज मुक्त मिथिला बस यही जागृति के लिये सभी से आह्वान करते आ रही है कि माँग कर दहेज क्या लेते हो जब स्वेच्छा से कोई अपनी बेटी तुम्हारे लिये दान देती है – कन्यादान को अश्वमेध यज्ञ के समान स्वच्छ और पवित्र माना गया है… फिर कन्यादान करनेवालोंको तुम यदि किसी तरह भी दबावमें दिये तो क्या तुम्हारे प्रारब्ध अच्छे बन पायेंगे? कभी नहीं। क्या तुम जीवनसंगिनी के साथ खुश रह सकोगे? कभी नहीं। दहेज मुक्त विवाह का सबसे बड़ा शक्ति को ग्रहण करो कि तुम्हारे छोटे से त्याग के कारण इतना बड़ा प्रारब्ध बनेगा जिसके बदौलत जीवन भर तुम्हारी आत्मबल मजबूत रहेगा। कभी यह नहीं सुनोगे-देखोगे कि तुमपर दहेजरूपी विपत्तिका कहर टूटे।

Harih Harah!

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ऊपर सऽ अहाँ सुन्दर छी
भीतर छी मलिन
संगत सऽ अहाँ सम्हरैत छी
बनैत छी प्रवीण!

कहय-सुनय लेल कतेक बात छैक
अन्दर सत्यके वास
एक-दोसर संग आश बान्हि हम
बिगड़ी सुन्दर साँस!

करब वैह जे मन अछि अहाँके
हमर मों तऽ तोड़ि देलहुँ
निर्लोभी संसार में सदिखन
कर्तब्य सऽ मुँह मोड़ि लेलहुँ।

हरिः हरः!

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२४ जून २०१२
प्रिय दहेज मुक्त मिथिला के समस्त सदस्यगण, आदरणीय श्रेष्ठजन आ मित्र-बंधुगण!

क्षमाप्रार्थी बनैत अहाँ सभ के समक्ष हमर किछु व्यक्तिगत विचार राखि रहल छी जे सौराठ सभागाछी के धरोहर संरक्षण प्रति अछि।

क्षमाप्रार्थी एहि लेल जे ओतय विगत जानकी नवमी के दिन जेना अप्रत्याशित ढंग सऽ हमरा सभ के लगन पर कुठाराघात भेल तेकर बाद पुनः ओतय काज करय लेल नहि जायब से निर्णय के प्रति परिवर्तन लाबय लेल….

हलाँकि ई मात्र आ मात्र हमर व्यक्तिगत निर्णय अछि आ एहि में संस्थागत रूपमें आगू बढय लेल बिना अहाँ सभ के समर्थन हम नहि बढब।…

लेकिन काल्हि जेना सौराठ सभा विकास समिति – सचिव आदरणीय शेखर चन्द्र मिश्र एक बेर फेर संग चलबाक आह्वान कयलनि अछि तऽ हमर कोमल हृदय द्रवित अछि आ कठोर मन फेर आगू बढय लेल कहैत अछि। इहो कहैत अछि जे फोकट के राजनीति कयनिहार के आगू झूकी नहि। येस!

हम आइ प्रस्थान कय रहल छी आ अहाँ सभ के अग्रिमे अपन विचार राखि के जा रहल छी – यदि एहि विचार पर कार्यदल गठन होयत, कार्य करय लेल प्रतिबद्धता भेटत तऽ एक बेर फेर अहाँ सभ सऽ हम भीख माँगि आदेश लेब जे दहेज मुक्त मिथिला सौराठ सभागाछी धरोहर के संरक्षण में पुनः कार्यरत हो। एहि सन्दर्भ में अहाँ सभ के फोन लेल हम इन्तजार करब – हमर नंबर रहत ९४३१२२८२९३ – अहाँ सभ ४ बजे उपरान्त फोन जरुर करब। आइ लव यू अल! 

हमर विचार:

१. जुलाई १ तारीख सऽ सौराठ सभागाछी के बाइस (२२) एकड़ जमीन के घेराबन्दी करैत सभागाछी सऽ अतिक्रमण मुक्ति करौनाइ।

२. घेराबन्दी उपरान्त सभास्थल मे एस्कावेटर वा अन्य उपकरण सऽ सतहीकरण करौनाइ।

३. सभागाछी में वर्तमान रचनाकृत घर, इनार, मन्दिर, गाछ आदि के सुव्यवस्थित केनाइ।

४. सभागाछी में वर्तमान कोनो एक गृह में सभा सम्बन्धित आलेख पुरान या फेर नया बनबा कऽ संग्रहित केनाइ, जेकरा मिनी म्युजियम के रूपमें संवर्धित कैल जा सकैत छैक।

५. बिहार सरकारक वन विभाग सऽ सभागाछी में आवश्यक बगीचा-बागवानी लगबौनाइ – एहि लेल आवश्यक निवेदन दैत कार्य के आगू बढेनाइ।

६. कला-संस्कृति-विभाग-बिहार द्वारा स्वीकृत माधवेश्वरनाथ महादेव मन्दिर के जीर्णोद्धार के कार्य प्रगति के समीक्षा केनाइ।

एतेक एजेन्डाके संग हम ओहि ऐतिहासिक स्थल पर जा रहल छी आ जनवरी ८, २०११ के निर्मित कार्य समिति यदि एतेक कार्य करबावय लेल गछता तऽ हम सभ संग देबनि आ मिथिला के नव-निर्माण में हम सभ सहभागी बनब।

काल्हिके मिटींग पूर्व अहाँ सभ के कमेन्ट-प्रतिक्रिया अनुरूप हम ओतय प्रतिनिधित्व करब, ताहि लेल अपन विचार जरुर लिखी।

एक बेर पुनः अपन हठ आ जिद्द के लेल अहाँ सभ सऽ क्षमा माँगैत –

प्रवीण

हरिः हरः!

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२५ जून २०१२
दहेज मुक्त मिथिला परिवार के तरफ सऽ मिथिला के असल हिरो जे नहि सिर्फ दहेज मुक्त विवाह कयलाह बल्कि मिथिला के अकाट्य धरोहर सौराठ सभागाछी सँ बाकायदा विधिवत्‌ सभ प्रक्रिया पूरा करैत एहिठाम सऽ विवाह हेतु प्रस्थान कयलनि। मिहिर एवं कल्याणी के ई जोड़ी मिथिला के इतिहास में नव पन्ना जोड़लनि। दहेज मुक्त मिथिला अपन यशगान के क्रम में एहिठाम उत्साहपूर्वक २४ जुन के हिस्सा लैत दूल्हा मिहिर जी के जी-भैर सराहना कयलनि आ संगहि उपस्थित विशिष्ट विद्वत्‌ वर्ग डा. धनाकर ठाकुर एवं डा. कमलाकान्त झा के मुखारविन्द सऽ दूल्हा-दूल्हिन के आशीर्वचन के कार्यक्रम राखल गेल। तदोपरान्त अंकुरित महादेव सोमनाथ व सभागाछी के अधिपति माधवेश्वरनाथ महादेव के दर्शन करैत आचार्य शंभुनाथ जी एवं सभा-संचालक शेखर चन्द्र मिश्र जी सँ आशीर्वाद लैत पहिल पंजीकृत दहेज मुक्त मिथिला के सौराठ सभा सँ विवाह सम्पन्न भेल।

वर-वधुके एक बेर फेर सहृदय धन्यवाद।

हरिः हरः!

http://www.jagran.com/bihar/madhubani-9402446.html

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रुचिगर प्रसंग:

मिथिला के एक वर:

दहेज़ मुक्त मिथिला के मेम्बर सबहक मिथिला कए दहेज़ मुक्त करबाक कोशिस देखि क लैग रहल अच्छी जे आब कियो कन्यागत दहेज़ लेल पुछ्बो नै करत ! ……..
मनक सब टा अरमान मने में रही जायेत !
बचपन स ल क आई तक बड़का भाई सबहक पहिरल अंगी आ पैंट पहिर्लौ कहियो माँ बाबु जी नबका खरीद क नै देलक …होली बीतल दिवाली बीतल सब टा पावैन बीतल मुद्दा नबका अंगी आ पैंट ल मन लागले रहल …सोचने रही जे विवाह करब त ससुर कए संगे दरभंगा बाज़ार जा क अपन मन पसंद कपडा खरीदैब !
अपन माँ बाबूजी त कहियो साइकिलो नै खरीद देलक …सोचलौ जे विवाह में ससुरक रुपैया स एक त मोटरसाइकिल किनब मुद्दा दहेज़ मुक्त मिथिला सदस्य सबहक कारन आब हमर ऐहो मनक बात मने में रहत !
सब दिने स हमर बाबु जी तारी आ देशी दारू पिलाह ….हम हुनको लेल कीछ सोचने रही मुद्दा आब बुइझ परै अच्छी जे अपन सौख त मने में रहल मुद्दा दहेजक रुपैया स बाबूजी कए इंग्लिश दारू पियेबाक सपना आ अपनों पियै कए सेहो सपना आब पूरा नै हैत !

समस्त दहेज़ मुक्त मिथिला वाशी धन्य छि अहाँ सब इ सब करै स पहिने कनी बिन वियाहल हमरा सन सन बच्चा सबहक लेल किछो त सोचितौ पहिने सर जी …………धन्य छि सब गोटे बच्चा के संगे संगे बच्चा के बाबु जी सबहक मन तोर देलौ अहाँ सब …………….मुद्दा चलू जे भेल स भेल …आबो अहाँ सब कनी धिया पुता लेल कनी सोचू महाशय सब ….कनियो पोस्ट के मतलब समझे के कोशिस करू सरकार ! :):):):):):):):)

दहेज मुक्त मिथिला के जबाब:

बड़ पैघ बात लिखने छी – लेकिन दहेज मुक्त मिथिला के ई सही परिचय नहि भेल। लोक सभ अपने हरकैत अछि, नामहि सुनि के। 

अहाँ कि व्यवहार चाहैत छी, अहाँ करू। ओहि सऽ संस्था के कोनो लेना-देना नहि। यदि अहाँ दहेज मुक्त विवाह करैत छी तऽ हम सभ अहाँके मुक्त कंठ सऽ आ अपन यथासंभव साधन सऽ समूचा दुनिया के अहाँके त्याग के यशगान मात्र गायब। आ दोसर बात जे हम सभ विभिन्न गाम के युवा-शक्ति अपन-अपन गाम के धरोहर आ मिथिलाके धरोहर के संरक्षण लेल इकट्ठा भेल छी।

के कि करैत अछि ताहि लेल नहि, बल्कि एहि लेल जे अहाँ सभ दहेज मुक्त विवाह करू। यदि अहाँ दहेज मुक्त विवाह केलहुँ, या करब तऽ हमरा सभ संग जुड़ू आ एक स्वच्छ समाज के निर्माण में सहायक बनू। ओकर नाम थिकैक दहेज मुक्त मिथिला!

www.dahejmuktmithila.org

धन्यवाद!

हरिः हरः!

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जिबू-जिबू लाल मिहिर अहाँ नाक मिथिला के रखलहुँ।

एहि धरा पर जे बनल विशिष्ट मैथिल परंपरा सभागाछी के,
जे मेटा गेल लगभग मैथिल ब्राह्मणक आजुक संस्कृति से,
फाँड़ बान्हि अहाँ पाग पहिरि के रखलहुँ लाज मिथिला के,
कल्याणी संग गठजोड़ बान्हि पुण्य केलहुँ आदर्श युवा हे,

जिबू-जिबू लाल मिहिर अहाँ नाक मिथिला के रखलहुँ।

दहेज में मानल धर्मपत्नी जे पुत्री प्रखर मैथिल पिता के,
निज कुल मर्यादा बचा अहाँ संग लयलहुँ निज मिताके!
के नहि देलक आशीष अहाँके ई देखि जे त्याग केलहुँ,
जितब सभ नाम मिथिला के इतिहास पुरुष जे भेलहुँ।

जिबू-जिबू लाल मिहिर अहाँ नाक मिथिला के रखलहुँ।

हरिः हरः!

सप्रेम भेंट – दहेज मुक्त मिथिला परिवार!

मिथिला के हर युवा लेल उपरोक्त ऐतिहासिक उदाहरण अनुकरणीय हो!

दहेज मुक्त मिथिल के निर्माणार्थ अहाँ सभ के सहयोग हेतु आभारी – प्रवीण!

हरिः हरः!

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विचार संप्रेषण लेल भाषा के सहारा लेल जाइत छैक। जाबत भाषा नहि – भाषा में सेहो उत्कृष्टता नहि, स्पष्टता नहि, शुद्धता नहि, तऽ शायद सार्थकता सेहो नहि देखल जा सकैत छैक। धिया-पुता जेकाँ अपनहि सऽ अपने अपन पीठ नहि थपथपाबी। स्थापित मान्यता के मोजर देल करियैक। मन के भावना के अभिव्यक्त करय लेल लोक भाषा के प्रयोग करैत छैक। भाषा सन्दर्भे जाहिठाम जे शोहबत रहय ताहि तरहक भाषा के प्रयोग कैल करी। उदाहरणार्थ – ई मिथिला लेल बनल मैथिल बाहुल्य सदस्य केर संग मैथिली भाषा में बेसी प्रयोग करय लेल बनल छैक। एतय यदि हम अधिकांश पोस्ट हिन्दी-अंग्रेजीमें करब तऽ उपेक्षित मैथिली आरो उपेक्षा के शिकार हेतैक। एहि संसार में कतेको भाषा उपेक्षा के कारण मृत भऽ गेलैक। मिथिलाक्षर आइ यैह उपेक्षा के कारण मृत भऽ गेल छैक। भाषा ऊपर सेहो अत्याचार चौतरफा छैक, कहियो बिहार सरकार के द्वारा मैथिली के द्वितीय राजभाषा के दर्जा नहि दऽ के तऽ कहियो नेपाल सरकार द्वारा मैथिली के अन्दर विभेद उत्पन्न कऽ के – मैथिली पर अत्याचार दोसर के जे भेल से भेल… कम से कम जे स्वयं मैथिल छथि ओ किऐक अत्याचार करता…. आ जौँ करता तऽ हुनका एहि लेल किछु समाजिक दंड के भागी बनय पड़तन्हि।

ओनाहू ओझा के लेखें गाम बताह आ गामक लेखें ओझा बताह… तऽ बताह के से बुझब असहज नहि।

हरिः हरः!

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२७ जून २०१२
दान सुभाषितावली (क्रमशः सऽ आगू) …

दानं कामफला वृक्षा दानं चिन्तामणिर्नृणाम्‌।
दानं पुत्रकलत्राद्यं दानं माता पिता तथा॥

दान अभिलषित फल देनेवाले वृक्षोंके समान है, दान मनुष्योंके लिये चिन्तामणिके समान है अर्थात्‌ जिस वस्तुका चिन्तन किया जाय, वह (दानसे) तत्काल सुलभ हो जाती है। दान पुत्र, स्त्री आदि है तथा दान ही माता-पिता है। 

पापकर्मसमायुक्तं पतन्तं नरके नरम्‌।
त्रायते दानमेकं तु पात्रभूते द्विजे कृतम्‌॥

नरकमें पड़े हुए पापी व्यक्तिको एकमात्र दान ही बचा सकता है, बशर्ते कि वह दान सत्पात्र ब्राह्मणको दिया गया हो।

न्यायेनार्जनमर्थानां वर्धनं चाभिरक्षणम्‌।
सत्पात्रप्रतिपत्तिश्च सर्वशास्त्रेषु पठयते॥

सभी शास्त्रोंको पढकर यही देखा गया है कि न्यायपूर्वक धनका अर्जन करना चाहिये, सत्प्रयत्नसे उसकी वृद्धि करनी चाहियेऔर उसकी रक्षा भी इसीलिये करनी चाहिये ताकि सत्पात्रमें उसका विनियोग किया जा सके।

यस्य वित्तं न दानाय नोपभोगाय देहिनाम्‌।
नापि कीर्त्यै धर्माय तस्य वित्तं निरर्थकम्‌॥

जिसका धन न तो दानमें प्रयुक्त होता है, न लोगोंके उपयोगमें आता है, न यशके लिये होता है और न धर्मार्जनमें विनियुक्त होता है, उसका धन निरर्थक है, निष्प्रयोजन है।

गौरवं प्राप्यते दानान्न तु वित्तस्य सञ्चयात्‌।
स्थितिरुच्चैः पयोदानां पयोधीनामधः स्थितिः॥

गौरवकी प्राप्ति दानसे होती है, वित्तके संचयसे नहीं। निरन्तर वर्षा आदिका दान करनेसे बादलोंकी स्थिति ऊपर होती है और जलका संगह करनेवाले सागरोंकी स्थिति नीचे रहती है।

उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्‌।
तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्‌॥

जिस प्रकार उपार्जित की गयी धन-सम्पदाका त्याग ही उसकी रक्षा है, उसी प्रकार तालाब आदिमें भरे हुए जलका प्रवाह ही उसका रक्षण है।

दानेन भूतानि वशीभवन्ति दानेन वैराण्यपि यान्ति नाशम्‌।
परोऽपि बन्धुत्वमुपैति दानैर्दानं हि सर्वव्यसनानि हन्ति॥

दानसे सभी प्राणी वशमें हो जाते हैं, दानसे वैर भी शान्ति हो जाते हैं, दानके द्वारा पराया भी बन्धु बन जाता है और दान सभी प्रकारके व्यसनोंको दूर कर देता है।

कर्णस्त्वचं शिबिर्मांसं जीवं जीमूतवाहनः।
ददौ दधीचिरस्थीनि नास्त्यदेयं महात्मनाम्‌॥

महादानी कर्णने अपनी त्वचाका दान कर दिया, शिबिने अपने शरीरका मांस दानमें दे दिया, जीमूतवाहनने अपने प्राणोंका दान कर दिया, महर्षि दधीचिने अस्थियोंका दान कर दिया – महात्माओंके लिये कुछ भी अदेय नहीं है। 

द्वारं द्वारमटन्तीह भिक्षुकाः पात्रपाणयः।
दर्शयन्त्येव लोकानामदातुः फलमीदृशम्‌॥

भिक्षाका पात्र हाथमें लिये हुए भिक्षुक लोग दरवाजे-दरवाजे घूमते हुए लोगोंको यही दिखाते हैं कि दान न देनेका ही यह फल है। यदि पहले दान दिया होता तो आज घर-घर भटकते हुए भीख न माँगनी पड़ती, अतः जिसे भीख न माँगनी हो, उसे दान अवश्य ही देना चाहिये। 

स्नानं दानं जपो होमो स्वाध्यायो देवतार्चनम्‌।
यस्मिन्‌ दिने न सेव्यन्ते स वृथा दिवसो नृणाम्‌॥

जिस दिन स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय तथा देवतार्चन नहीं होता, मनुष्योंका वह दिन व्यर्थ हो जाता है। 

यथा वेदाः स्वधीताश्च यथा चेन्द्रियसंयमः।
सर्वत्यागो यथा चेह तथा दानमनुत्तमम्‌॥

जैसे वेदोंका स्वाध्याय, इन्द्रियोंका संयम और सर्वस्वका त्याग उत्तम है, उसी प्रकार इस संसारमें दान भी अत्यन्त उत्तम माना गया है।

(व्यासस्मृति, मत्स्य तथा गरुड़ आदि पुराण और महाभारत से संग्रहीत।)

हरिः हरः!

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