महागौरी – कृपालुताक महाभंडार आराध्या सभक लेल सुलभ जगन्माता

आध्यात्म

स्रोतः कल्याण (अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी)

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।

महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥

माँ दुर्गाजीक आठम शक्तिक नाम महागौरी थिकन्हि – ‘महागौरीति चाष्टमम्’। हिनक वर्ण पूर्णतः गोर छन्हि। एहि गौरताक उपमा शंख, चन्द्र आर कुन्द केर फूल सँ देल गेल छन्हि। हिनक आयु आठ वर्षक मानल गेल छन्हि – ‘अष्टवर्षा भवेद् गौरी’। हिनक समस्त वस्त्र व आभूषण आदि सेहो श्वेत रंगक छन्हि। हिनक चारि गोट भुजा (हाथ) छन्हि। हिनक वाहन वृषभ (वसहा) छन्हि। हिनक ऊपर केर दाहिना हाथ मे अभय मुद्रा (आशीर्वाद देबाक अवस्था) मे तथा नीचाँ वला दाहिना हाथ मे त्रिशूल छन्हि। ऊपर वला बायाँ हाथ मे डमरू और नीचाँक बायाँ हाथ मे वर-मुद्रा (वरदान देबाक अवस्था) मे छन्हि। हिनक मुख-मुद्रा अत्यन्त शान्ति छन्हि।

अपन पार्वतीरूप मे ई भगवान् शिव केँ पति-रूप मे प्राप्त करबाक लेल बड़ा कठोर तपस्या कएने छलीह। हिनक प्रतिज्ञा छलन्हि जे ‘व्रियेऽहं वरदं शम्भुं नान्यं देवं माहेश्वरात्’ (नारद पांचरात्र) – हम सिर्फ शम्भु केँ वर रूप मे वरण करब, महेश्वरक अलावे कोनो अन्य देव नहि। गोस्वामी तुलसीदास जीक अनुसार सेहो ई भगवान् शिव केँ वरण हेतु कठोर संकल्प लेने छलीह –

जन्म कोटि लगि रगर हमारी।

बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥

एहि कठोर तपस्याक कारण हिनक शरीर एकदम कारी झामर भऽ गेल छल। हिनक तपस्या सँ प्रसन्न आर सन्तुष्ट भऽ कय जखन भगवान् शिव हिनक शरीर केँ गंगा जीक पवित्र जल सँ रगैड़कय धोलनि तखन ओ विद्युत प्रभा समान अत्यन्त कान्तिमान् – गोर भऽ गेलीह। तहिये सँ हिनक नाम ‘महागौरी’ पड़ि गेल। यैह महागौरीक शरीर सँ तीनू लोक केर आधारभूता आर शुभ्भादि दैत्य सभ केँ नाश करयवाली भगवती महासरस्तवीक प्राकट्य भेल छल –

गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-

पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥

दुर्गापूजाक आठम दिन महागौरीक उपासनाक विधान अछि। हिनक शक्ति अमोघ आर सद्यः फलदायिनी अछि। हिनक उपासना सँ भक्त केर समस्त कल्मष (पाप) धोयल जाइत छैक। ओकर पूर्वसंचित पाप सेहो विनष्ट भऽ जाइत छैक। भविष्य मे पाप-संताप, दैन्य-दुःख ओकरा पास कहियो नहि अबैत छैक। ओ सब प्रकार सँ पवित्र और अक्षय पुण्य केर अधिकारी भऽ जाइत अछि।

माँ महागौरीक ध्यान-स्मरण, पूजन-आराधन भक्तक लेल सर्वविध कल्याणकारी अछि। हमरा लोकनि केँ सदिखन हिनकर ध्यान करबाक चाही। हिनकहि कृपा सँ अलौकिक सिद्धिक प्राप्ति होइत छैक। मन केँ अनन्यभाव सँ एकनिष्ठ कय मनुष्य केँ सदैव हिनकहि पादारविन्दक ध्यान करबाक चाही। ई भक्तक कष्ट निश्चित रूप सँ दूर कय दैत छथि। हिनक उपासना सँ आर्तजन केँ असम्भव कार्य सेहो सम्भव भऽ जाइत छैक। तैँ हिनकर चरणक शरण पेबाक लेल हमरा सब केँ सर्वविध प्रयत्न करबाक चाही। पुराण मे हिनक महिमाक प्रचुर आख्यान कयल गेल अछि। ई मनुष्यक वृत्ति सब केँ सत् केर दिशा मे अग्रसर कय केँ असत् केर विनाश करैत छथि। हमरा लोकनि केँ प्रपत्तिभाव सँ सदैव हिनक शरणागत बनबाक चाही।

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