शान्ति एना भेटैत छैक – मैथिली लघुकथा

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शान्ति एना भेटैत छैक

– Vandana Choudhary

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एकटा कहबी छैक न जे जेकर किओ नहि तेकर भगवान् होइत छथिन। यैह बात चरितार्थ भेलैक रोहनक जीवन मे। बड बच्चा रहय तखनहि बाप जानलेबा बीमारीक शिकार बनि गेल रहैक। माय कोना-कोना रोहन सहित ३ भाइ-बहिन केँ पोसलक, पढेलक-लिखेलक आ योग्य बनाकय मनुष्यलोक मे अपन भागीदारी खूब नीक सँ निभेलक।

रोहनक बाप मैर गेलाक बाद माय पहिने तऽ असीम चिन्ता मे डूबि गेल छल, लेकिन रोहनक एक बात ओकर करेजा केँ पाथर बना देलकैक। ठोह भरिक बच्चाक मुंह सँ निकललैक, “माय, तों कनिको चिन्ता नहि कर। बाबू जतेक काज करथि ओ सबटा हम कय लेब। मालजाल, खेतीपाती, मेहनति-मजूरी – सब काज हम कय लेब माय।”

एक दिश बापक लहास, दोसर दिश धियापुताक लहालहोट अवस्था, तेसर दिश समाजक लोक सभक आँखि मे छूछ दयाक भाव, रोहनक माय पर पहाड़ टूटल रहैक – मुदा रोहनक मुंह सँ एतबा आवाज ओकरा एतेक बल देलकैक मानू जेना ओकरा काल केर चोट सँ अचके मे जीवनक सही मार्गदर्शन भेटि गेल छलैक। ओ आँखिक नोर पोछि पतिक लहास केँ अपनहि सँ झाँपि समाजक लोक सभ केँ इशारा करैत अन्तिम क्रिया लेल बढबाक बात बाजल। रोहन सेहो पूरा तेजी सँ उठि पित्तीक हाथ सँ कोहा मे आगि लैत मशानक दिशा मे बढबाक लेल कहलक।

पिताक असामयिक मृत्यु केँ रोहन आ ओकर माय हँसैत स्वीकार कय समाज मे अपन कर्तव्यपरायणता सँ एक नीक उदाहरण बना देलक। एकटा चाहक दोकान खोलि भोर-साँझ चाह बेचिकय रोहनक माय अपन बच्चा सभ केँ पोसय। रोहन नित्य अपन पिताक समान कुट्टी काटिकय घरक पशुधन केँ पोसय। जहिना बाप हर जोतिकय देहारी कमाइ, तहिना रोहनो अपन पित्ती सभक सहयोग सँ लोकक खेत मे काज करय चलि जाय।

रातिक समय ओ जागि-जागिकय पढैत छल। छोट भाइ आ बहिन केँ प्रतिदिन विद्यालय पठबय, अपने सेहो कहियो-कहियो विद्यालय जाय। रोहनक दिन-राति मेहनति सँ परिवार पर टूटल विपत्ति नहि जानि कतय परा गेल छल। कतेको गरीब परिवार एकरा लोकनिक उदाहरण दैत सबलताक सीख लैत छल।

रोहन सदिखन अपन छोट भाइ-बहिन सँ कहय जे बाबू मरलाह नहि, हुनकर शरीर शान्त भऽ गेलनि। बाबू हमरा-तोरा आ माय केँ देखिकय सदिखन हँसि रहलाह अछि। ओ थाकि गेल छलाह काज करैत-करैत। आराम करबाक बेर भऽ गेल छलन्हि। हमरा सब अपन-अपन हिस्साक काज कम करैत रही हुनका रहैत। भगवान् ताहि लेल हुनका शान्त कय देलखिन। आब हमर-तोहर काज करबाक बेर अछि। तूँ सब खूब मोन लगाकय पढल कर, हम आ माय सबटा काज करब। फेर माय या हम थाकिकय शान्त भऽ जाय तऽ तूँ सब सेहो सबटा काज करिहें। लोक मरैत नहि छैक। शान्त भऽ जाइत छैक। शान्ति सब केँ चाही आ से सब केँ भेटैत छैक। गरीब किओ नहि होइत अछि। जे अपन कर्तव्य करत से एहि संसार मे सब सुख भोगत।

समय तेजी सँ बीतल। रोहनक भाइ आ बहिन दुनू योग्य प्रशासक बनल। माय वृद्ध भऽ गेल छलैक, लेकिन आइयो ओ ओतबे कर्मठ छल। अपन भागक काज ओ अपनहि सँ करब पसीन करय। रोहनक विवाह सेहो भऽ गेलैक। घर मे सुशीला पुतोहु एलैक, ओहो अपन भागक काज करय। पतिक संग ओहो उचित योगदान दैत चाह दोकान आ घर-गृहस्थी दुनू सम्हारि रहल छल। एक दिन माय सेहो चलिते-फिरिते शान्त भऽ गेलैक। आब एहि परिवारक सबलता समाज आ मानवता लेल सेहो कय टा कीर्ति ठाढ केलक। कतहु अनाथाश्रम बनल, कतहु माय-बाबूक नाम सँ धर्मशाला बनल। आब भाइ-बहिन सभक परिवार बसि गेलैक। सब शान्ति मे अछि। जीवनहु मे शान्ति, जीवनक बादहु शान्त! यैह त खासियत रहलैक रोहनक परिवारक। कर्तव्यपरायणताक पालन करैत ई परिवार हमरा-अहाँ सभक लेल एकटा प्रेरणा दैत अछि, जीवन मे अनुकरण योग्य मार्गदर्शन दैत अछि।

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ई कथा सखी-बहिनपा पर चलि रहल प्रतियोगिता लेल मिथिलानी वन्दना चौधरी द्वारा पठाओल गेल अछि।

हरिः हरः!!

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