बिकायल विद्वान् द्वारा मिथिलाक इतिहास संग खुराफात, चोरी रंगे हाथ पकड़ल गेल

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प्रसंग: मिथिलाक इतिहास पर जानि-बुझिकय प्रश्नचिह्न लगेबाक कुत्सित प्रयास

एखन नेपाल मे नव-नव संघीयताक स्थापन भेल अछि। एतय कोसी सँ गंडकी धरिक एक भूखण्ड केँ प्रदेश २ केर  रूप मे मान्यता देल गेल अछि। नामकरण व राजकाजक भाषा लेल प्रदेश संसद पर भार अछि। चूँकि ऐतिहासिकता सँ लैत भाषा, संस्कृति आ प्राचीनता मे मिथिलाक अवधारणा चिर-परिचित अछि; परञ्च मिथिलाक प्राचीन राजधानी सिमरौनगढ केर नव वासिन्दा अपन भाषा मे आयल परिवर्तन आ नव‍-नामकरण मे बज्जिका, भोजपुरी आदि सँ अतिशय प्रेम बढि गेलाक कारण मूल भाषा-संस्कृति केँ पुनर्स्थापित भेला सँ अपना पर गैर-जरूरी खतरा देखि रहल छथि किछु एहने आशंका देखल जा रहल अछि। नामकरण मे ‘मध्य-मधेश’ – यानि न तोहर न हमर नीति भले पसीन करैत छथि, मुदा अपन मौलिकताक पृष्ठपोषण करैत प्राचीनता-ऐतिहासिकता केँ सम्मान देबय मे हुनका असोकर्ज बुझना जा रहल छन्हि। किछु लोक मैथिली केँ ब्राह्मणक भाषा आ मिथिला केँ ब्राह्मणक भूगोल बुझि ब्राह्मणविरोध मे सेहो मिथिला केँ पुनर्स्थापित होइ सँ अपन नुकसान मानैत छथि। एहि सब शंका-उपशंकाक बीच हिनका लोकनिक वितृष्णा मिथिला प्रति दुर्भावनाक प्रसार गलत कुतथ्य आ कुतर्कपूर्ण बनावटी बात सब सामाजिक संजाल सँ जनमानस मे मतिभ्रम उत्पन्न करय लेल कयल जा रहल अछि। लगभग प्रतिदिन एक न एक नव शिगूफा छोड़ैत देखा जाइत छथि स्वयं मिथिला प्रति भ्रम मे रहल कमजोर अध्ययनक लोक। एक मित्र समाजशास्त्रक छात्र आर तैँ समाजशास्त्री, धरि मिथिला प्रति हिनका मे देखा रहल ज्ञान सँ ‘कचैल समाजशास्त्री’क उपनाम दी तँ कोनो बेजा नहि होयत, श्री भरत साह अपन फेसबुक स्टेटस सँ नित्य गलत आ भ्रामक दाबी करैत मिथिला प्रति कूप्रचार करैत छथि आर हिनका व हिनक एक निहित उद्देश्य (कुप्रचार आ मतिभ्रम सँ मिथिलाक बदनामी मे लागल फेसबुकिया लोक) संग मैथिली-मिथिला हितचिन्तक, कवि, लेखक, अभियानी, सोशल एक्टिविस्ट सब प्रतिक्रिया आदि दैत एकटा अजीबोगरीब माहौल बनौने छथि।

काल्हि श्री साह द्वारा वृहद्विष्णुपुराण केर आधार पर आर्काइव सँ पोथीक पन्ना निकालि फेसबुक पर सार्वजनिक करैत एकटा तेहने गैर-वाजिब आ कुप्रचारक कुतर्क राखल गेल। ई पहिनहि सँ जानल सत्य जे वृहद्विष्णुपुराण मे मिथिलाक नाम तीरभुक्ति (तिरहुति, तिरहुत, आदि) सेहो कहल गेल अछि; श्री साह अपन बहुल्य अल्प-साक्षर, कुतर्क सँ मोक्षक दर्शन कयनिहार मूढ प्रवृत्तिक लोक तथा ब्राह्मण जाति केर सुशिक्षा-सुसंस्कार आदि केँ ओकरा लोकनिक वर्चस्ववादी होयबाक हीनताबोध सँ ग्रस्त लोक सब लेल लिखलनि जे ‘मिथिला केवल एक नगर केर नाम छल, जखन कि देश (राजक) नाम तीरभुक्ति (तिरहुत) छल। हिनका सँ कहल गेल जे मिथिला, तीरभुक्ति, तिरहुत, विदेह, बज्जि, वृज्जि आदि एक्के प्रदेशक विभिन्न कालखंड मे विभिन्न नाम रहबाक कारण ई सब मिथिलाक पर्यायवाची शब्दक रूप मे स्थापित अछि। परञ्च श्री साह अपन आदति मुताबिक अपनहि दाबी केँ बेर-बेर मिथिला पर उपलब्ध इतिहास आ साहित्य केँ गलत आरोपित करैत, पूर्वक काज मे मैथिल विद्वान लोकनि चालाकी सँ ई सब कुतथ्य देबाक पर्यन्त आरोप मढैत अपन पीठ अपनहि सँ ठोकैत ई दाबी कयलनि जे ‘मिथिला केँ वृहद्विष्णुपुराण मे सिर्फ एक नगर’ कहल गेल अछि। तदोपरान्त हिनकहि राखल सन्दर्भित पोथीक जखन पूर्ण पाठ हिनका समक्ष राखैत श्लोक ६१-६३ मे स्पष्ट कयल गेल शब्द जे मिथिला एक देश थिक, एकरा तिरहुत कहबाक कारण जे एतुका लोक नदी-पोखरिक तीर (तट) पर वास लैत छथि, हिनका सब तरहक भोग आ मोक्ष आदि एहिना प्राप्त होइत छन्हि, ई सब बात बुझलाक बाद विद्वान् साह केर त बोलती बन्द भेबे कयल, ताहि बीच एकटा परम विद्वान् आ शोधकर्ता श्री भवनाथ झा केर प्रवेश होइत अछि आर ई एक अलगे बाँसुरी बजबैत अपन आर्टिकल पढेबाक बेचैनीक संग अबैत छथि। हिनका चेतना देल जाइत छन्हि जे विद्वान् जी अहाँ सन्दर्भ पर किछु बाजू, अपन बाँसुरी बजेबाक काज त अपने लोकनि करिते रहैत छी… तथापि ई अपनहि सुर-ताल मे नचैत बाँसुरी सँ फेर अपनहि आर्टिकल केर बीन बजबैत नागिन नाच देखय लेल उत्सुकता प्रकट करैत छथि। तखन आरम्भ होइत अछि ‘नागिन नाच’। आब आउ, देखल जाउ विद्वान् जी कोन बीन बजा रहला अछि। चूँकि अपन आर्टिकल केँ ई ‘कापी’ करय सँ बंधित कएने रहैत छथि, ताहि हेतु हिनकर वेबसाइट पर जा कय पढय पड़त:

http://brahmipublication.com/thesiteofmithila.html

मिथिला क्षेत्र मे पुरातात्विक महत्वक विभिन्न खोज आ शिलालेख आदिक प्राप्तिक स्वयं एक अध्येता विद्वान् भवनाथ झा अपन लेख आरम्भ करैत एकटा कपोलकल्पित तर्क रखलनि अछि “मिथिला क्षेत्र की मिट्टी बहुत कोमल है और यहाँ बाढ के कारण बहुत तबाही हुई है। पहाड नहीं होने के कारण कच्ची मिट्टी, लकड़ी, घास-फूस से यहाँ घर बनाने की परम्परा रही है अत: यहाँ अधिक पुराने अवशेष पुरातात्विक साक्ष्य के रूप में मिलना असंभव है।…” आदि-आदि। मूल लिंक पर देखू। ई बिसैर गेलाह जे बलिराजगढ केर किलाक अवशेष एतहि प्राप्त भेल अछि। हालहि द्वालख गामक हरेश्वरनाथ मन्दिर केँ संरक्षित क्षेत्र घोषित कयल गेल अछि। डा. फणिकान्त मिश्र जे स्वयं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षणक एक उच्चाधिकारी सेहो रहलाह अछि, हुनके द्वारा एकटा डायरेक्ट्री प्रकाशित कय कम सँ कम १०० सँ अधिक पुरातात्विक स्थलक वर्णन-विवरण केर बात टाइम्स अफ इंडिया द्वारा प्रकाशित समाचार मे पढने रही। कन्दाहा (सहरसा) केर सूर्य मन्दिर, उग्रतारा महिषी, फुलहर, कोइलख, मंगरौनी, भीठ भगवानपुर सहित मधेपुरा, पूर्णिया, आदि विभिन्न जिलाक व्योरेवार चर्चाक बात पढने रही। आब कुल ४२ संरक्षित स्थल मे मिथिला मे कय गोट अछि हाल धरि ईहो बात भवनाथ झा सँ छुपल नहि हेबाक चाही। तखन एहेन कमजोर तर्क दैत मिथिलाक प्रतिष्ठित इतिहास केर बुनियाद मे कीड़ा लगेबाक मनसाय आखिर कोन कारण सँ? सीताक जन्मस्थान सँ लैत मिथिला राजधानीक नाम छल कि राष्ट्रक नाम, ताहि सब पर दुविधा छन्हि हिनका।

ई अपन कल्पनाशक्ति सँ मिथिलाक इतिहास मे प्रवेश करैत छथि, लेकिन मिथिलाक ऐतिहासिक आ पुरातात्विक महत्वक संग चोरी, डकैती, लूटपाट लेल मशहूर ‘पटना’ केर निमक खाइत ‘बुद्ध आ बिहार’ केँ सुदृढ रखबाक लेल मिथिला केँ मृत्युदान देबाक मिशन केँ पूरा करय लेल ‘वृहद्विष्णुपुराण’ किंवा कोनो भी पुराण (विष्णुपुराण, शिवपुराण, श्रीमद्भागवतकथा, श्रीमद्देवीभागवतकथा, रामायण, महाभारत, आदि महत्वपूर्ण हिन्दू धर्मशास्त्र समान आधार सन्दर्भ ग्रन्थ केँ छुबैत तक नहि छथि आर सीधे भारतवर्ष मे अमान्य-अस्वीकार्य आ घोर कुत्सित मानसिकता सँ सनातन धर्म केर विनाश लेल रोपल गेल बिया ‘बौद्ध साहित्य’ जे ‘बुद्ध केर तथाकथित समर्थक सत्ताभोगी राजा एवं ताहि राजाक पालित कुत्सित-कुतर्की विद्वान् घुमन्ते शोधकर्ता’ आदिक द्वारा लिखल गेल अछि तेकर सन्दर्भ सँ तर्क राखब शुरू करैत छथि, धरि निष्कर्ष “मिथिला का उल्लेख दो प्रकार से मिलता है – १. राजधानी के रूप में २. पूरे राष्ट्र के रूप में” से पहिने लिखि दैत छथि। देखू लिंक पर!

अथ खो उत्तरो माणवो सत्तन्नं मासानं अच्चयेन विदेहेसु येनमिथिला तेन चारिकं पक्कामि। (ब्रह्मायु सुत्त)

मिथिला च विदेहानं, चम्पा अङ्गेसु मापिता। बाराणसी च कासीनं, एते गोविन्दमापिताति॥ (महागोविन्द सुत्त)

ई दुइ गोट बौद्ध साहित्यक सन्दर्भ देलनि अछि विद्वान् पं. भवनाथ झा, आर कहलनि अछि जे ‘यहाँ स्पष्ट रूप से मिथिला एक क्षेत्र का नाम है, जो राजधानी थी।’ – हमरा संस्कृत केर ज्ञान अत्यल्प अछि धरि ई ‘राजधानी थी’ केर निष्कर्ष ई कोन शब्द सँ निकालि लेलनि एहि पर दुविधा मे छी। मिथिला विदेह नामक भूगोल मे मानल गेल अछि से बुझय मे आबि रहल अछि, हिनका सँ विदेहक सीमा पूछल, ई मौन छथि। वृहद्विष्णुपुराण केर सन्दर्भ कियैक नहि लेल त कहला जे सन्देह अछि एहिपर कारण एकर कोनो पान्डुलिपि कतहु नहि प्राप्त भेल आ संभवत: १९म शताब्दी मे एकर रचना कयल गेल अछि। यौ जी! ई जे अहाँ ब्रह्मायु सुत्त आ महागोविन्द सुत्त केर सन्दर्भ देल, ई कहिया आ कतय-कतय मान्य सन्दर्भ ग्रन्थक रूप मे उपलब्ध अछि। देखाउ पान्डुलिपि! टाँय-टाँय-फिस्स! कहैत छथि, संपादक (स्वयं) आधारग्रन्थक उल्लेख कय देने छथि। यानि ग्रन्थक उल्लेख कय देला सँ हमर जिज्ञासा अहींक तर्कक कसौटी पर पूरा भऽ गेल?

आगू देखू, ई कि लिखैत छथि – वाल्मीकि रामायण केर साक्ष्य केर वर्णन करैत कि कहैत छथि से देखल जाउ। “वाल्मीकि रामायण में मिथिला की अवस्थिति का एक ही साक्ष्य है जिसमें कहा गया है कि गंगा और सोन के संगम पर नदी पार कर विश्वामित्र राम और लक्ष्मण के साथ विशाला नामक नगरी पहुँचे और वहाँ से पहले मिथिला गये। इसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के ४९वें अध्याय के अन्त में इस प्रकार है –

रामं संपूज्य विधिवत् तपस्तेपे महातप:॥२१॥…..”

हिनका एहि सँ पूर्वहि ४८वाँ अध्याय मे विशाला केर राजा सुमति सँ सत्कृत भऽ एक राति ओतहि बितेबाक आ तदोपरान्त ओहि विशाला सँ आगू मिथिलापुरी बढबाक जिकिर, मिथिला मे प्रवेश करैत ओतुका ‘जनकस्य पुरीं’ कहबाक आ फेर गौतम-अहिल्याक आश्रमक स्थिति आदिक बात नहि देखेलनि। विद्वान् छथि, पटनाक नून किछु बेसिये प्रिय छन्हि एना प्रतीत भऽ रहल अछि। आब देखथिन जे विशाला देश सँ निकललाक बाद मिथिला, जनकपुरी आदिक संग एकर भूगोल, प्रकृति, आदिक स्थिति कोन तरहें आदिकवि वाल्मीकि वर्णन आरम्भ कयलनि अछि। पं. भवनाथ झा नूनक कीमत तेना चुकेलनि अछि जे ई बिसैर गेलाह आ गलत सन्दर्भ लिखलनि अछि। सही सन्दर्भ एना अछि:

अतिथी परमं प्राप्तौ पुत्रौ दशरथस्य तौ।

पूजयामास विधिवत् सत्काराहौं महाबलौ॥बालकाण्ड ४८-८॥

तत: परमसत्कारं सुमते: प्राप्य राघवौ।

उष्य तत्र निशामेकां जग्मतुर्मिथिलां तत:॥४८-९॥

आर फेर देखू कुतर्क हिनकर! लिखैत छथि, “अर्थात् गौतम ऋषि ने श्रीराम का सत्कार किया और श्रीराम ने भी गौतम की पूजा की और तब मिथिला गये। यहीं पर सर्ग समाप्त हो जाता है। अहल्यास्थान से मिथिला की दिशा का कोई उल्लेख नहीं है। अगले सर्ग के प्रथम श्लोक में कहा गया है कि मिथिला से चलकर उत्तर-पूर्व कोण की ओर चलकर राजा की यज्ञ-स्थली पर पहुँचे।

तत: प्रागुत्तरां गत्वा राम: सौमित्रिणा सह।

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य यज्ञवाटमुपागम्॥१.५०.१॥

अर्थात् इसके बाद पूर्वोत्तर दिशा की ओर यज्ञस्थल पर पहुँचे। इसका अर्थ है कि यज्ञस्थल मिथिला से पूर्वोत्तर कोण में अवस्थित था। फलत: इस प्रसंग से हमें मिथिला के स्थान निर्धारण में कोई सहायता नहीं मिलती है।

वाल्मीकि रामायण में मिथिला के उपवन में ही अहल्या का आश्रम बतलाया गया है। तथा वैशाली से मिथिला की ओर प्रस्थान करते समय दिशा का कोई उल्लेख नहीं है।”

ई निर्णय लैत स्वघोषित संपादक (लेखक भवनाथ झा) पुन: बिना समुचित सन्दर्भ उल्लेख कएने उपरोक्त प्रथम चर्चित मिथिला ४८वाँ अध्यायक ९म श्लोक केर उत्तरार्ध केँ १० श्लोक केर संग जोड़ैत गलत संख्या आबद्ध करैत १२ श्लोक केर पूर्वार्ध धरि लिखैत मिथिलाक वास्तविक चर्चाक बात कयलनि अछि।

विद्वानक काज पाठक केँ भ्रमित कय अपन गोटी लाल करब कखन होइत छैक, जखन ओ बिकायल लोक हुअय आ अपन विद्वताक प्रयोग कोनो ठेक्का लेल अशुद्ध बात केँ शुद्ध साबित करबाक लेल दुरुपयोग करय। एतय पं. भवनाथ झा केर चोरी प्रत्यक्ष ढंग सँ पकड़ायल अछि। गुरु विश्वामित्र संग राम-लखन जखन प्रस्थान करैत छथि आ गंगा-सोन नदीक संगम पर अवस्थित विशाला नगर मे राजा सुमतिक आतिथ्य ग्रहण कय एक राति विश्राम कय ओतय सँ चलता, यानि गंगाक उत्तर आ मिथिलापुरी जे निरन्तरता मे अहिल्यास्थान सँ उत्तर-पूब कोण केर दिशा मे लिखलनि अछि वाल्मीकि जी, जेकरा भवनाथजी ‘मिथिला सँ उत्तर-पूब कोण’ केर गलत निर्णय रखैत अपन गोटी लाल करैत मिथिलाक पौराणिक इतिहास केँ पर्यन्त अपन मनगढंत व्याख्या सँ गलत ढंग सँ रखबाक कुचेष्टा कयलनि अछि। देखल जाउ, वाल्मीकि रामायण मे वर्णित ५०वाँ अध्यायक पहिल श्लोक आ ओकर अनुवाद गीताप्रेस, गोरखपुर केर संस्करण मे:

तत: प्रागुत्तरां गत्वा राम: सौमित्रिणा सह।

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य यज्ञवाटमुपागमत्॥१.५०.१॥

“तदनन्तर लक्ष्मणसहित श्रीराम विश्वामित्रजी को आगे करके महर्षि गौतम के आश्रम से ईशानकोण की ओर चले और मिथिलानरेशके यज्ञमण्डप में जा पहुँचे।”

आजुक धनुषाधाम जतय अदौकाल सँ ओ धनुषक अवशेषक प्रतीकचिह्न सेहो दर्शनीय बनल राखल अछि, हाल दरभंगा जिलाक अहिल्यास्थान सँ उत्तर-पूब कोण मे जनकपुर सेहो अवस्थित अछि, आर वृहद्विष्णुपुराण मे सेहो यैह बात सुस्पष्ट ढंग सँ वर्णित अछि। कतय अछि सन्देह? तखन ई विद्वान् लोकनि आखिर कोन मनसाय सँ एहि तरहें मिथिलाक अपन दावेदारी आ सुस्पष्ट रेखांकित इतिहास केँ वक्रोक्ति एवं कुतर्क सँ प्रश्नचिह्न मे राखय चाहैत छथि? सचेत रहबाक आवश्यकता अछि एहि तरहक दुष्प्रवृत्ति सँ मिथिलावासी। अस्तु! समय बहुत लेल!

हरि: हर:!!

 

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