मैथिली बालकथा – बुधियार डाक्टर

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मैथिली बालकथा – बुधियार डाक्टर

– सुजीत कुमार झा, जनकपुर

‘दाई एकरा खिस्सा नहि कहिए ?’

‘किए रे !’

‘ई हमरा मारलक अए ।’

‘हँ गै मुन्नी, भैयाके मारलिहए ? ’

‘भैया हमर फित्ता तानि देलन्हि अछि ।’

‘अएँ रे टिंकु तो बहिनके फित्ता तानि देलिहए, आ उल्टे कहैत छए मारलकौए ?’ दाई कनि तमसाईत बजलीह ।

‘मुन्नीकेँ माथमे फित्ता ओझरा गेल छलैक । वएह कहने छल सरिया देबए लेल…’

‘…दाई गे सरियाबएके अर्थ थोरहे होईत छैक जे नोचि देब,’ बीचेमे मुन्नी बाजल ।

‘दूनु गोटे चुप्प भऽ जो । आई तोरासभकेँ रोचक खिस्सा सुनबैत छिऔक ।’

‘ब्राह्मणबला कहबिही दाई गे ?’

‘दाई भगवानबला कहए ने ?’

दूनुक बातके नजरअन्दाज करैत दाई बाजल, ‘आई तोरासभकेँ गोनु झाबला खिस्सा कहैत छिऔक ।’

‘अएँ गोनु झा केँ रहैक ?’ टिंकु प्रश्न कएलक ।

हरबराईते मुन्नी बाजल, ‘गे दाई, भैयाके गोनु झा केँ रहैक से नहि बुझल छन्हि……. गोनु काका नहि छथिन अपन गामक ।’

‘अपन गामक गोनु काकाकेँ खिस्सा बनतैक पगली …….. खिस्सा तऽ बड़का लोककेँ बनैत छैक ने, ’ टिंकुक तर्क छल ।

मुन्नी दाईके देह हिलबैत प्रश्न कएलक, ‘दाई ककर खिस्सा बनैत छैक, एकबेर भैयाकेँ कहिदही ने ?’

‘चुप्प छौड़ी तो आब बजलेए तऽ कल्ला अलगा देबौक ।’

दाईकेँ फेरसँ देह तनैत मुन्नी बाजल, ‘देखैत छिही दाई भैया डतैत छथि ।’

‘तोसभ अपनामे झगड़ा नहि कर । हम एहन खिस्सा कहबौक जाहिमे गोनु झा कमला महारानीकँे कोना कऽ ठकि लेलन्हि, ’ दाई बजलीह ।

‘अएँ गे दाई, कमला तऽ गोनु काकाकेँ बहिन नै छथिन आ तो कहैत छिही महारानी, ’ मुन्नी मूँह चम्काबैत बाजल ।

‘चुप्प छौड़ी फेरसँ फित्ता नोचि लेबहुँ ।’

‘दाई देखैत छिही भैयाकेँ …. ।’

‘तोसभ अहिना बजैत रहबए तऽ हम सुति रहबौ’ , दाई बजलीह ।

‘आरे बल्ली तो सुतबिही तऽ भोजन केँ करतैक ?’

‘हम आई नहि करब ।’

‘नहि करबिही तऽ बुझल नहि छौक, एक चिरईकेँ माउस उडि़ जाईत छैक… नहि यौ भैया, बाबा ओहि दिन नहि कहलखीन ? ’ मुन्नी बाजल ।

‘हँ मुदा बड़काकेँ थोरहे उड़ैत छैक बच्चाकेँ मात्रे ।’

‘दाई गे हमरा पेसाब लागि गेल तो कनिक रुकि जो तब कहिहए,’ कहैत टिंकु ओछायनपरसँ उतरिगेल ।

‘दाई गे जाधरि भैया पेसाब करए गेलखिन हेँ, ताधरि हमरा खिस्सा सुना दे ने ।’

‘भैयोके आबए दही तब दूनुकेँ कहबौक ।’

‘बुढि़या बीचमे तो खिस्सा कहि तऽ नहि कहि देलही ई झोट्टाबाली गुब्दी हनने छौक, ’ ओछायनपर बैसैत टिंकु बाजल ।

‘नहि कहलिए रे बौवा ! आब शान्त भऽ जो तखन कहबौक ।’

‘दाई गे प्लीज एकटा बात कही दे पहिने, गोनु झा अपने गामक रहथिन वा कोनो बाहर ठामके ?’

‘बौवा रे, से तऽ हमरा नहि बुझल अछि । मुदा अपने लग पासक गामक ओ छलथि । मुदा हुनका लोक धूर्त कहैत छल आ घर–घरमे लोक हुनकर खिस्सा सुनैत अछि ।’

‘अएँ गे दाई, बाबूओ जी खिस्सा सुनने रहथिन ?’

‘तोहर बाबूजीकेँ कि हुनको बाबूजी सेहो गोनु झाकेँ खिस्सा सुनने रहथिन ।’

‘हुनकर बाबूजी के भेलैक दाई गे ?’ मुन्नी बाजल ।

‘ई छौड़ी किछु नहि बुझैत छैक । बाबा नहि भेलखिन’, टिंकु मुहँ चमकबैत बाजल ।

‘बाबा कोना भेलखिन ?’

‘बाबा भेलखिन …. । ’

‘बाबा नहि भेलखिन….. ।

‘दाई भैया हमरा बिठुआ कटैत छथि ।’

‘मुन्नी तो एहिकात चलि आ, तोरा चयनसँ नहि रहए देतहुँ ।’

‘दाई खिस्सा कहि दे ने ?’

‘ले सुन ..’

‘…कमला नदीमे एकबेर बड़का बाढि़ आएल रहैक …… ’

‘दाई गे नहि तमसबए तऽ एकटा बात पुछियौक कतेक बड़का ? अपन चार एतेकटा … ’

‘चुप्प छौड़ी चार एतेकटा नहि, सिसो गाछ ओतेकटा । ’

‘दाई, तो चुप्प किएक भऽ गेलए ?’

‘तोसभ अपनामे लड़ए लगबए तऽ हम खिस्सा कोना कहबौ ?’ दूनुकेँ शान्त करैत बजलीह ।

‘हम तोरासँ कोनो बात पुछैत छिऔक तऽ भैया कथिलाए अवरोध करए लगैत छथि, हुनका चुप्प रहल किएक नहि होईत छन्हि ?’ मुन्नी अवाजपर जोड़दैत बाजल ।

‘तो बजबिही आ हम चुप्प रहूँ ? टिंकुक मुँहपर तामस अबिगेल छल ।

‘दूनु गोटे एक शब्द नहि बाज, ’ दाई दूनु गोटेक सम्झबैत बजलीह ।

‘पहिने दाई एकटा बात कहि दे ! कमलामे चार एतेकटा बाढि़ आएल रहैक कि सिसो गाछ एतेकटा… ?’

‘बाढि़मे खूब पानि अबैत छैक जाहिसँ खेतमेका धान, गाछवृक्षसभ दहा दैत अछि ।’

‘दाई गे हमसभ सेहो दहा जेबैक ? ’ मुन्नीक बालपन जिज्ञासा छल ।

‘तो गाछवृक्ष छिही से दहा जेबिही ? तोरा कोनो दोड़ए नहि अबैत छौक ? ’ टिंकुक तर्क छल ।

‘हँ गे दाई, दौड़ जेबै तऽ नहि दहेबैक, ’ मुन्नी माथपर जोड़दैत बाजल ।

‘नहि ।’

‘अच्छा छौड़ी तो नहि बजिहीए । जल्दि–जल्दि कहएदही, हमरा निन्द लगैत अछि । दाई जल्दि– जल्दि कहअ, ’ टिंकु बाजल ।

‘कमलामे बाढि़ बढ़लैक तऽ नदी लग जाकऽ गोनु झा कमला महारानीकेँ पूजा कएलन्हि आ कहलन्हि, हमर खेत नहि दहाएत तऽ एक हजार जीवकेँ बलि देब…, ’

‘…दाई गे कोन जीव ?’

‘स्थिरसँ सुन छौड़ी … दाई तो कहैत जो । ’

‘जीवकेँ विषयमे बादमे कहबौक । गोनु झाकेँ पूजा कएलासँ कमला माहारानी बाढि़ समेट लेलन्हि । एकरबाद गोनु झाक खेत नहि डुबल । आ

नदीबला पानि अएलासँ खूब धान भेल ….एकरबाद बुझलहि टिंकु ? ’

‘कह ने जगले छिऔक, मुन्नी सुति रहतौक तखने हम सुतबौ ? ’

‘आई पहिने भैया सुतथिन, तखने हम सुतबै ।’ मुन्नी चुनौती देलक ।

‘अपनामे तेना नहि बात करए लगैत छैक जे हमर खिस्सो बिसरा जाईत अछि ।’

‘अच्छा आब नहि बजबौक ।’

‘जखन खूब धान भेल आ कटनी सेहो भऽ गेल । खेतसँ बोझा बन्हाकऽ धान दलानपर सेहो चलि अएलन्हि । एकरबाद दौनीकेँ तैयारीएमे रहथि गोनु बाबू कि हुनकर कनियाँ कमला महारानीकेँ पूजाबला बात याद पारलन्हि….’

‘दाई गे एकबेर मुन्नीसँ पुछिलही तऽ कथिकेँ गोनु झा कबुला कएने रहथिन ? ’ टिंकु बाजल ।

‘अहि कहिऔ तऽ भैया अपने बिसरि गेलाह आ हमरासँ पुछैत छथि ।’

‘हम कहि दियैक दाई ?’ टिंकु बाजल ।

‘हँ कह तऽ ?’ दाई टिंकुदिस तकैत बजलीह ।

‘बाढि़ नहि आएत तऽ, एक हजार जनावरकेँ बली देब । ’

‘…… हा हा हा बुझलही दाई ! भैया जनावर कहैत छथिन, ओ तऽ जीवकेँ बलीकँे बात कहने रहथिन ।’

‘जीव आ जनावर एकहि भेलैक ने दाई ?’

‘एकर अर्थ एखन हम नहि कहबौक ?’

‘कथिला दाई गे ?’

‘एहि खिस्सामे एहने होईत छैक ।’

‘बबोसभ सुनने हेथिन तऽ हुनकर दाई अहिना कहने हेथिन ?’

‘हुनकर दाई कहा छैक गे छौड़ी ? ’ टिंकु प्रश्न कएलक ।
‘तऽ के कहने रहथिन ?’

दाईके देह डोलबैत टिंकु बाजल, ‘हुनको दाईए कहने रहथिन ?’

‘तो गे दाई ?’

‘नहि हुनकर दाई !’

‘हुनकर दाई कहाँ छैक ? हमरा तऽ आश्चर्य लगैत अछि हुनकर दाई रहितैक तऽ हम नहि देखितियैक ? अहाँ देखैत छियैक भैया !’ मुन्नी टिंकुकेँ देह झकजोरैत बाजल ।

‘ओ स्वर्गमे चलि गेलखिन, दाई जिज्ञासा शान्त करबाक हिसाबसँ बजलीह ।

मुदा बालमोन अहिना शान्त होबएबला कहाँ छल । फेर प्रश्न कएलक, ‘कतए छैक स्वर्ग गे दाई ?’

‘पहिने खिस्सा सुनि ले तखन स्वर्ग आ नर्क बुझिहए ?’ दाई बहस करएके पक्षमे नहि छलीह ।

‘पहिने बाबाकेँ दाईके देखा दे ?’ मुन्नी बाजल ।

‘पहिने खिस्सा सुन छौड़ी मम्मी तोरा सुताबए लेल लऽ जेतौक ।’

‘कह गे दाई ?’

‘कतएधरि गेल छलियैक ईसभ तऽ बिसराईओ दैया ’ दाई दिमागपर जोड़ दैत बजलीह ।

मुन्नी दाई दिस तकैत बाजल, ‘हम याद पारि दिऔ दाई ?’

‘हँ कह तोही ? ’ केश कुरियबैत दाई बजलीह ।

‘हम कहैत छिऔक दाई भैयाकेँ बिसरा जाईत छन्हि । गोनु झाकेँ कनिया स्मरण पारि देलकन्हि जे एक हजार जीवकेँ बली देबाक अछि ।’ मुन्नी बाजल ।

‘हँ तखन गोनु झा असमन्जसमे पडि़ गेलाह । फेर ओ तऽ धूर्त महाराज रहथि हुनकालग तुरन्ते समस्याके समाधान सेहो चलि आएल । भेल एना जे अपन पुत्रके पढ़ाबए लेल ओ बैसौने रहथि, ओहिठाम बहुत मच्छर कटैत छल । गोनु बाबू कनिक देरक लेल एक गोटेसँ बतियालेल सड़कदिस गेलथि, ताधरि हुनक पुत्र मच्छरसभकँे पकडि़ कऽ झोरामे जम्मा करए लागल । ओम्हरसँ घूमिकऽ गोनु बाबू अएलाह कि हुनकर कनियाँ बेटापर बिगरि रहल छल ……’

बच्चा सभ सुति तऽ नहि रहल दुनूकात अलटि पलटिकऽ देखैत ओ फेरसँ खिस्सा आगा बढ़ौलीह, ‘पढ़एके साँती मच्छर मारैत अछि एहिपर गोनु बाबू हुनका रोकैत कहलन्हि, आहिरो बा अहाँकेँ बुझाइत अछि जे ई मच्छर मारैत अछि आ हमरा तऽ बड़का समस्याकेँ समाधान कऽ देलक…ई सुनिकऽ दूनु माय बेटा हुनकादिस ताकए लागल ….ओ दीर्घ श्वास छोड़ैत बजला, ‘ताकु नहि अहुँ सहयोग करु मच्छर पकरएमे… ’
‘किएक ??’ पत्नीद्वारा जिज्ञासा रखलापर ओ कहलन्हि, ‘माथपरका बहुत बड़का बोझ हटत .. ’ .तिनू गोटे अबेर रातिधरि मच्छर पकड़ैत रहलथि । भोरे गोनु बाबू एक झोरा मच्छर लऽ कऽ कमला नदीमे भसा देलन्हि । कहलखिन, ‘हे भगवती ! अपनेकेँ एक हजार जीवकेँ बली देबाक जे कबुला कएने छलहुँ से आई दऽ रहल छी, संख्याक हिसाबसँ एक हजारसँ बेसीए एहिमे हएत… जे गल्ती सल्ती भेल हएत माफ करब…’

‘अएँ गे दाई, पानिमे तऽ मच्छरसभ छतला गेल हेतैक ?’

‘छतलेतैक कोना ओ मच्छरसभ डुबि गेल हेतैक, ’टिंकु बहादुरी हिसाबसँ बाजल ।

‘तोसभ सुनैत रहए । एकरबाद गोनु बाबू फिर्ता चलि अएलाह । रातिमे प्रेमसँ भोजन कऽ सुति रहलथि…रातिमे हुनका कमला महारानी सपनामे कहलखिन, ‘तो हमरा ठकलए अछि, तोरा एक छिट्टासँ बेसी एहिबेर धान नहि हेतौक …प्रात भेने गोनु झा जनसभके दरबज्जाक बगलमे रहल एकटा खेतके कोरएलेल कहलन्हि, आ छिट्टाकेँ पेनी काटि देलन्हि…’

‘मुन्नी तो सुतलएह तऽ नहि ?’

‘नहि, मुदा उंघी लागि रहल अछि । कनिक पानि पिबतौहुँ ।’

‘रे टिंकु ! कनिक पानि दही ।’

निचामे रहल गिलासमेसँ पानि दैत टिंकु बाजल , ‘आब खिस्साकालमे एकरा नहि रखिहए मेने समयमे भंग कऽ दैत अछि ?’

‘दाई कह ने खिस्सा, ’ टिंकुक बातके नजरअन्दाज करैत मुन्नी बाजल ।

‘तखन जहिना–जहिना दौनी होईत गेल, गोनु झा छिट्टामे धान रखैत गेलाह आ ओहि छिट्टबाटे बड़का खदियामे धान जम्मा होईत गेल । धानसँ ओ खदिया भरि गेल छल । गोनु झा सन्तुष्ट छलथि । हुनकर मुहँपर प्रसन्नता ओहिना देखल जा रहल छल …रातिमे फेरसँ कमला महारानी सपनामे गोनु झाकेँ दर्शन देलन्हि आ कहलन्हि, ‘तो ठीकेमे बहुत बुद्धिमान छएँ तोरा किओ नहि हरा सकैत छौह….’
गोनु झा महारानीके प्रणाम कएलन्हि ।

‘बुझलही कतेक गोनु झा चलाक छलैक से ?’

‘हमहुँ बड़का हेबै तऽ हुनके जँका चलाक बनबै,’ दाईके देह तनैत टिंकु बाजल ।

‘भैया, बाबूजी कहैत छथि जे दूनु गोटेकेँ डाक्टर जे बनबाक अछि,’ मुन्नी टिंकुके सचेत करौलक ।

‘कि बनबैक गे दाई ?’

‘बुद्धियार डाक्टर ।’

‘बुझलियै ने भाईजी । गोनु झा जँका चलाक सेहो आ बाबूजी कहैत छथिन डाक्टर बनएकेँ लेल तऽ डाक्टर सेहो ।’

दूनु भाईबहिनकेँ आँखिपर निनियादेवी एखनोधरि नहि आएल छल । दाई किछु देर गुब्दी हानि लेलीह । ओ सोचि रहल छलीह जे जल्दि ईसभ सुति रहए जे भोजन करए जईतहुँ ।

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One Response to मैथिली बालकथा – बुधियार डाक्टर

  1. बहुत नीक खिस्सा

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