भगवान् आ बच्चाक बीच समानता – मीमांसक पं. रुद्रधर झा केर अत्यन्त प्रेरणास्पद लेख

स्वाध्याय आलेख

‘गूढ तत्त्व समीक्षा’ नामक महत्वपूर्ण पोथी मे पंडित रुद्रधर झा केर अनेकों मननीय लेख मे सँ एक मूल्यवान् लेख आइ एतय राखि रहल छी। भगवान् केर स्वभाव बच्चा जेकाँ होइत छन्हि, एहि पंक्ति केँ मीमांसक पं. रुद्रधर झा कोना सिद्ध करैत छथि, आर एकरा पढला-मनन केला सँ हमरा लोकनि कोन तरहक शिक्षा ग्रहण करैत छी से सुन्दरता प्रभावित करैत अछि।

भगवान् बालस्वभाववान्

– पं. रुद्रधर झा (मैथिली अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी)
 
वेदान्त, पुराण तथा इतिहास केर अध्ययन सँ ज्ञात होइत छैक जे भगवान् बच्चा जेहेन स्वभाववला छथि। एकर साधक पुराण आदिक निर्माता नारायणावतार भगवान् व्यास केर ब्रह्मसूत्र अछि – ‘लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्’। जेना लोक मे बच्चा बिना प्रयोजनहु सिर्फ विविध खेल सदिखन खेलाइत रहैत अछि, ओहिना भगवान् सेहो निष्प्रयोजनहि सिर्फ सर्जन, पालन आ संहरण रूप खेल (लीला) सदिखन खेलाइत रहैत छथि।
 
‘ईश्वरः सर्वभूतानि भूतैः सृजति हन्त्यजः।
आत्मसृष्टैरस्वतन्त्रैर्निरपेक्षोऽपि बालवत्॥’
 
– अध्यात्म रामायण, युद्धकाण्ड १२/१४
 
बच्चाक समान निष्प्रयोजनहि अजन्मा भगवान् अपन बनायल जड़ परतन्त्र आकाश आदि पाँच भूत सँ सब प्राणीक शरीर, इन्द्रिय आर भोग्य विषय केँ बनबैत छथि आर नष्ट करैत छथि।
 
‘सम्प्रयोज्य वियोज्यायं कामकारकरः प्रभुः।
क्रीड़ते भगवान् भूतैर्बालः क्रीड़नकैरिव॥’
 
– महाभारत वनपर्व ३०/३७
 
जेना बच्चा खेल साधन आदि सँ खेलाइत अछि, तहिना मनमाना कार्य करयवला समर्थ ई भगवान् प्राणी सँ प्राणी केँ मिलबैत आ विलगाबैत खेलाइत रहैत छथि।
 
‘पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च पुरूषोत्तमः।
विचेष्टयति भूतात्मा क्रीड़ान्निव जनार्दनः॥’
 
– महाभारत उद्योगपर्व ६८/१०
 
दुष्टजन सभ केँ सतबयवला पुरूषोत्तम भगवान् खेलाय जेकाँ पृथिवी, आकाश तथा स्वर्ग मे क्रमशः रहनिहार मनुष्य, पशु ओ पक्षी आदि, सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्र आदि, आर देव, गन्धर्व तथा अप्सरा आदि केँ विविध चेष्टा सभ सँ युक्त करैत रहैत छथि।
 
‘जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बालकेलिसम विधि मति मोरी॥’
 
– रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा २८१
 
बच्चा लोकनिक खेल जेकाँ, जे भगवान् प्राणी सभक शरीरादि केँ बनाकय पोसैत छथि आर नष्ट कय दैत छथि, एहि सँ बुझल जाइत अछि जे हुनकर बुद्धि बच्चाक बुद्धिक समान विवेकरहित अछि।
 
‘मनसा भावयेन्नित्यं लीलाः सर्वाः क्रमाक्रमाः’
 
– बड़ा शिक्षा पत्र १/२
 
भगवान् केर कतहु क्रम सँ तथा कतहु अक्रम सँ युक्त सब लीला (खेल) केँ मोन सँ सदैव भावना करू।
 
भगवान् केर बाल स्वभाव भेला सँ हुनका संग खेलायवला सन्त लोकनिकेँ शास्त्र मे निर्देश देल गेल छन्हि जे ‘बाल्येन तिष्ठासेत्’ बचपन (बालभाव) सँ रहबाक इच्छा करथि। यथा बच्चा केना प्रसन्न रहत, ई जानब कठिन छैक तथा बच्चाक स्वभाववला भगवान् केना प्रसन्न हेता, सेहो बुझनाय कठिन अछि। अतएव गोस्वामी बिन्दुजी अपन गीत मे लिखलनि अछि – ‘न जाने कौन से गुण पर दयानिधि रीझ जाते हैं’। तथापि भगवान् रामचन्द्रजी रामचरितमानस केर उत्तरकाण्ड मे कहलनि अछि –
 
‘सोइ सेवक प्रियतम मम सोई, मम अनुसासन मानै जोई।’
 
तहिना सुभाषितानि मे श्लोक आयल अछि –
 
‘श्रुतिस्मृति ममैवाज्ञे यस्ते उल्लंघ्य वर्तते।
आज्ञाभङ्गान्मम द्वेषी न मद्भक्तो न मे प्रियः॥’
 
वेद आर स्मृति हमरहि (भगवानहि केर) आज्ञा थिक, जे ओकरा त्यागिकय मनमानी बरतैत अछि, ओ आज्ञा केँ भङ्ग कयनिहार हमर द्वेषी थिक, ओ नहिये हमर भक्त थिक आर नहिये हमर प्रिय।
 
अतः भगवान् केर प्रिय बनबाक इच्छुक केँ सदैव शास्त्र सँ विहित कार्य केँ करैते बरतबाक (कोनो कार्य दिश प्रवृत्त हेबाक) चाही।
 
‘येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः।
तेन यायात् सतां मार्गं मार्गस्थो नावसीदति॥’
 
– मनुस्मृति
 
(पोथी मे ई श्लोक एना भेटल –
 
येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः ।
तेन यायात्सतां मार्गं तेन गच्छन्न रिष्यति ॥मनुस्मृति ४.१७८॥)
 
जाहि सन्मार्ग सँ एकर (मानव केर) पिता आर पितामह चललाह, ओहि सन्मार्ग सँ ई चलय, कियैक तँ सन्मार्ग सँ चलैत कियो पीड़ित नहि होइत अछि।
 
‘यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥’
 
– भगवद्गीता १६/२३
 
जे मनुष्य शास्त्र केर विधान केँ त्यागिकय मनमाना बरतैत (व्यवहार करैत) अछि, ओ नहिये सिद्धि केँ नहिये सुख केँ आर नहिये मोक्ष केँ पबैत अछि।
 
हमर नोटः पं. रुद्रधर झा केर पोथी ‘गूढ तत्त्व समीक्षा’ सँ लेल गेल हरेक लेख मे लेखन शैलीक विलक्षणा अत्यन्त प्रभावित करैत अछि। कोनो निष्कर्ष पर लेखक तखन पहुँचैत छथि जखन अनेकों शास्त्रोक्त वचन केर मीमांसा करैत हमरा लोकनि वास्ते सहज शैली प्रस्तुत करैत छथि। एकर लाभ हमरा लोकनि सिर्फ पढियेकय नहि, जीवन मे बरतैत ग्रहण करब ई उद्देश्य अछि।
 
हरिः हरः!!
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