दान-पुण्य तथा भगवती वन्दना

स्वाध्याय

दान-पुण्य

(श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ वीतराग स्वामी श्रीदयानन्दगिरीजी महराज केर विचार)

हमरा संसारक रस्ते तऽ चलबाक नहि अछि, हमरा तऽ धर्मक रस्ते चलबाक अछि, तखन एहेन रीति सँ जँ अहाँ अपन ‘हम’ केर त्यागि देब तऽ ई महादान भऽ गेल। अहाँक अन्दर जतेक मात्रा मे एहि त्याग केर बल आओत, ओतबहि मात्रा मे अहाँक बाहरी जीवन सफल होयत, शान्त होयत आर संसार सँ भय सेहो नहि लागत। भय केर स्वरूप कि छैक? भय केर ई स्वरूप छैक जे बाहर तऽ दुःखे दुःख अछि, दुःखक आगि जैर रहल अछि। लोकक बर्ताव सही नहि अछि। ई सब एहेन भाव कियैक होइत अछि? कियैक तऽ अपने सँ ठीक नहि बनि पबैत अछि, तखन ई बल प्राप्त कएने बिना बाहरो नीक जीवन नहि बनि पबैत अछि।

देश, काल आर पात्र देखिकय धन, अन्न, वस्त्र, स्वर्ण, भूमि, औषधि आदि वस्तु केर दान देनाय तऽ ठीके छैक; मुदा ई दान दैत काल अपन ‘हम-भाव’ अथवा ‘अहं-भाव’ केँ मोन मे नहि आबय दी अर्थात् कोनो भी तरहक मोन मे ‘हम-भाव’ नहि आबक चाही। जँ कियो लोक अपन ‘हम-पन’ केँ कोनो भी धर्मक्रिया मे नहि आबय दियए, तऽ बुझि जेबाक चाही जे ओ व्यक्ति ‘हम-भाव’ केर उत्तम दान कय देने अछि। कोनो क्रिया करैत समय या वचन बजैत समय अपन ‘हम अर्थात् अहंकार’ भाव केँ नहि प्रकट होबय दौक बल्कि सब ईश-प्रेरणा सँ मात्र भऽ रहल अछि, एहने भाव राखय, ‘हम’ करय-करबयवला नहि बनी। एना केला सँ आरो नीक-नीक गुण ओहि मनुष्य मे प्रवेश कय जायत। जे ‘हम’ केर बलिदान कय दैत अछि, भगवान् केर दृष्टि मे ओ बहुत प्रिय बुझल जाइत अछि।

पुण्य मोन केर ओहि धर्मक नाम थिक जे कि मनुष्य केँ सुख उपजबैत अछि। सुख उपजाबयवला या भविष्य मे जे-जे भी कर्म सुख उपजायत, ओ सब पुण्य कर्म कहल जाइत अछि। एहि तरहें पुण्य केर एक एहेन सूक्ष्म अवस्था छैक जे कि मोक्ष केर सुखक दिशा मे अग्रसर करैत छैक, जाहि मे शरीर, इन्द्रिय, मोन आ बुद्धिक संयम सम्मिलित अछि। एहि पूर्ण संयम सँ जे पुण्य उदय होइत अछि, ओ अन्ततः मोक्षप्राप्तिक कारण होइत अछि, मुदा एहेन पुण्य करयवला केँ जँ कोनो सांसारिक सुख पेबाक इच्छा अथवा संकल्प या कामना नहि हो तँ ओ बड़ा आराम सँ सब पाप केँ समाप्त करैत मोक्ष-मार्गपर अग्रसर भऽ जायत आर अन्त मे मोक्ष केँ प्राप्त करत।

भगवती वन्दना

नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायैयस्याः प्रभावमखिलं न हि वेद धाता

नो वा हरिर्न गिरिशो न चाप्यनन्तः।
अंशांशका अपि च ते किमुतान्यदेवा-
स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायै॥
यत्पादपङ्कजरजः समवाप्य विश्वं
ब्रह्मा सृजत्यनुदिनञ्च बिभर्ति विष्णुः।
रुद्रश्च संहरति नेतरथा समर्था –
स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायै॥

जिनक सम्पूर्ण प्रभाव केँ ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा भगवान् शेष तक ढंग सँ नहि जानि सकलाह, जखन कि ओ हुनकहि अंशज सेहो छथि, तखन भले दोसर देवता हुनका केना जानि सकैत छथि? एहेन ओहि भगवती जगदम्बिका केँ हमर निरन्तर प्रणाम अछि। जिनकर चरण-कमल केर धूलि पाबिकय ब्रह्मा समस्त संसार केर रचना करैत छथि, भगवान् विष्णु निरन्तर पालन करैत छथि आर रुद्र संहार करैत छथि; दोसर कोनो उपाय सँ ओ अपन-अपन कार्य करने मे समर्थ नहि भऽ सकैत छथि – एहेन ओहि भगवती जगदम्बिका केँ हमर निरन्तर प्रणाम अछि।

हरिः हरः!!

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