लोकवार्ता आ जीवनमूल्य – एक अत्यन्त पठनीय आ मननीय लेख

लोकवार्ता आ जीवनमूल्य

– डा. श्रीराजेन्द्ररंजनजी चतुर्वेदी, डी. लिट.

 (अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी – जीवन मे अनिवार्य रूप सँ पढल जाय योग्य लेख)
 
भौगोलिक तथा सामाजिक परिवेश केर संग समायोजनक उद्देश्य सँ समाजक द्वारा आचरण केर किछु आदर्श या मानदण्ड निश्चित आ प्रतिष्ठित कयल जाइछ। हर्सकोवित्स केर शब्द मे सामाजिक मान्य-माप केर मनोवैज्ञानिक आधार लोकक सम्पर्कक फलस्वरूप समान चिन्तन-आधार केर रचना थिक। एक बेर लोक मे एहेन चिन्तन-आधार स्थापित और अन्तर्निहित भऽ गेलापर ओ ओकर प्रतिक्रिया आदि केँ निर्धारित या संशोधित करबा मे महत्वपूर्ण कारक होइत अछि। मैलिनोवस्कीक मुताबिक सांस्कृतिक मूल्य ओ स्थायीभाव थिक, जे परम्परा तथा संस्कृति केर प्रभावस्वरूप मानकित भऽ गेल अछि।
 
जे लोक केकरो निन्दा-स्तुतिक परवाह नहि करैछ, वैह टा आत्माक आवाज अथवा कानशेंस (आत्मज्ञान) सँ मार्गदर्शन प्राप्त करैत अछि। ई कानशेंस वास्तव मे उचित-अनुचित केर सामाजिक विचार सँ उत्पन्न स्थायीभाव आर विवेक थिक, जे मूल प्रवृत्ति केर दमन, नियम आर उन्नयन करैत अछि। त्रिलोकचन्द तुलसीक शब्द मे सांस्कृतिक प्रशिक्षण व्यक्तिक सहज प्रवृत्ति केँ एना स्थायीभाव मे ढालि सकैत अछि, जे ओकरा समाज मे मिलिजुलिकय रहबाक योग्य बनबैत छैक, जाहि आचरण केँ सामाजिक जीवनक लेल वांछनीय बुझल जाइछ, ओकरे आस-पास पुण्यक स्थायीभाव संघटित कयल जाइत अछि आर जाहि आचरण केँ सामाजिक सहयोग केर पथ मे बाधक बुझल जाइत अछि, ओकर आसपास पापक स्थायीभाव केर पहरा लगा देल जाइत छैक। यैह स्थायीभाव नैतिक मूल्य थिक। ई एहेन आन्तरिक प्रहरी थिक जे व्यक्तिक मोन मे पैसिकय बैसल रहल जासूस थिक, जे ओकरा समाज द्वारा मानकित पथपर चलेबाक चेष्टा करैत अछि।
 
वास्तव मे जीवनमूल्य केर स्थापना मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया थिक। मैक्डुनल केर अनुसार ‘व्यक्ति आ समाज केर चरित्र ओ आचार केर लेल स्थायीभावक विकास सबसँ बेसी महत्वक होइछ, वैह भावात्मक आ संकल्पात्मक जीवनक संगठन थिक।’ स्थायीभाव केर संस्कृति सँ घनिष्ठ सम्बन्ध होइछ तथा समाज मे एकर प्रतिष्ठा धर्मक रूप मे होइछ। स्थायीभाव नहि होयत तँ जीवन-मूल्य ऊपर थोपल गेल जेकाँ लागत। स्थायीभाव अन्तश्चेतना मे रहैत छैक तथा बाह्य आवश्यकता केँ आन्तरिक बनबैत छैक।
 
परिवेश मे परिवर्तन भेलापर मानव-सम्बन्ध मे परिवर्तन होइत छैक आर मानव-सम्बन्ध केर परिवर्तनक संग समायोजनक लेल मूल्य मे सेहो परिवर्तन होइत छैक। भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक परिस्थिति मे भिन्न-भिन्न स्थायीभाव विकसित होइत छैक तथा परिस्थितिक अनुसार ओहि मे संशोधन सेहो होइत छैक, मुदा प्रत्येक जाति अपन मूल्य केँ शाश्वत ओ ईश्वर-निर्मित मानबाक सन्तोष प्राप्त कय सकैत अछि। परिवर्तनीय होयबाक संग एतेक निश्चित छैक जे जीवनमूल्य आर स्थायीभाव केर कार्य प्रत्येक परिस्थिति मे मूल प्रवृत्ति केर दमन, उन्नयन आर समायोजन टा होइत छैक। व्रज-लोकवार्ता मे स्थायीभाव आर मूल प्रवृत्ति मे सुन्दर सामंजस्यक वर्णन प्राप्त होइत अछि।
 
मूल प्रवृत्ति केर समाजीकरण – वित्तैषणा (धन प्राप्तिक लोभ), रति, आत्म-गौरव, रक्षा, भूख, सिसृक्षा (परिवार-भावना), प्रभुत्व-कामना व शारीरिक आयाम – ई मानवक मूल प्रवृत्ति थिक। सब कियो एकरे इच्छा करैत अछि; मुदा एकर प्राप्तिक लेल यदि आपस मे संघर्षक स्थिति उत्पन्न भऽ जाय तँ सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचा बिगैड़ जेबाक सम्भावना बनत। एहेन परिस्थिति नहि उत्पन्न हो ताहि लेल ब्रज केर लोकसंस्कृति एहि मूल प्रवृत्ति केर समाजीकरण पर जोर दैत अछि। लोकगीत व लोककथा आदि मे एकर उदाहरण भेटैत अछि, जेना –
 
१. वित्तैषणाक समाजीकरण लेल ब्रज-जीवन मे सूम (कृपण) केर कहानी प्रचलित अछि, जाहि मे लोभी व्यक्ति केर उपहास कयल गेल छैक आर दान, त्याग तथा ईमानदारी – जेहेन उच्च-नैतिक मूल्य केर प्रतिष्ठा कहल गेल अछि। एहि तरहें लोकगीतक माध्यम सँ सेहो लोभी व्यक्तिक उपहास करैत ओकरा खेत मे ठाढ कयल गेल ‘बिझूका’ केर तुल्य मानल गेल छैक, बिझुका माने खेतक जजात केर पहरा लेल बनायल गेल कठपुतरा, जेना –
 
लोभी दान न कर सके जीवत जस नहिं लेय।
खड़ौ बिझुका खेत में खाय न खावन देय॥
 
२. काम (रति) सेहो मानवक मूल प्रवृत्ति थिक, लेकिन एकर संतुष्टिक लेल समाज मे दाम्पत्यक विधान अछि। पुरुषक लेल ब्रह्मचर्य आर स्त्रीक लेल पातिव्रत्य पर जोर देल गेल अछि। ब्रज केर लोकजीवन मे प्रचलित एक लोकगीत मे अपन पत्नी केँ छोड़ि परस्त्रीक चिन्तन करयवला पुरुष नपुंसक भऽ जाइत अछि आर द्वार-द्वार पर नचैत फिरैत अछि –
 
घर की नारी छोड़ के नार विरानी जे तकते।
जिन पापन ते भये हींजरा घर-घर नाचत ते फिरते॥
 
३. आत्म-गौरवक प्रवृत्ति सब मे होइत छैक, मुदा जखन ई प्रवृत्ति गर्वक रूप मे परिणत भऽ जाइत छैक तऽ ओ समाज केँ तोड़यवाली प्रवृत्ति बनि जाइत छैक, तैँ लोकजीवन मे समानताक भाव प्रतिष्ठित भऽ सकय, एकरा लेल एकटा लोकगीतक माध्यम सँ ई सन्देश देल गेलैक अछि जे “हे मनुष्य! ऊँच-नीच केर खियाल मोन मे नहि आनू” –
 
‘बंदे ऊँच नीच मत सोचै
तोय ऐसौ राम दबोचै।’
 
४. भूख प्रत्येक प्राणी केँ लगैत छैक, भोजन सभक लेल आवश्यक अछि, मुदा जीहक पातर बनब नीक नहि। एकटा लोकगीत मे जीह केँ पातर (जीभ केँ चटोरी ब्रजभाषा मे) बनेनाय ठीक नहि कहल गेल छैक। एकटा लोकगीत मे चटोरी जीभवाली स्त्रिगणक निन्दा करैत कहल गेल छैक –
 
‘मेरी चट्टी है गई जीभ
जलेबी लाय दे लांगुरिया।’
 
५. मनुष्य अपन पैघ परिवार (पुत्र-पौत्र) केर वृद्धि केँ देखिकय हर्षित होइत अछि, एहि प्रवृत्ति केँ ‘सिसृक्षा’ कहल जाइत छैक। मुदा ब्रज केर लोक-संस्कृति ओकरा वसुधा केँ कुटुम्ब मानबाक लेल कहैत छैक। संगहि अपन पुत्र-पौत्र मे मोह नहि रखबाक प्रेरणा सेहो दैत छैक। ओ कहैत छैक जे मनुष्य असगरे टा आयल अछि आर असगरे मात्र जायत –
 
‘आया था अकेला बंदा जायेगा अकेला’
 
६. मनुष्य प्रभुत्वक कामना करैत अछि, लेकिन ओ ई नहि सोचैत अछि जे जखन ओकर अपनहि अस्तित्व ओसक बूँद जेहेन तखन ओकर प्रभुत्व कतय सँ स्थायी भऽ सकत। लोकसंस्कृति ओकरा एहि दिश एकटा लोकगीतक माध्यम सँ सोचबाक लेल विवश करैत छैक –
 
‘जैसे मोती झरै ओस कौ
ब्यार चलौ ढहि जातौ।’
 
७. शारीरिक आराम आ विलासितापूर्ण जीवन आइ प्रतिष्ठाक पर्याय बनल जा रहल अछि, जेकर दुष्परिणाम दिश संकेत करैत एकटा लोकगीत केर माध्यम सँ आध्यात्मिक सन्देश देल गेल अछि –
 
‘चौं सोय रह्यौ पाँय पसार,
तेरे सिर पर मंजिल धरी है,
तेरी कौने अकल हरी है।’
 
लोकमानस मे जीवनमूल्य केँ पाप आर पुण्यक व्यवस्थाक रूप मे देखल जाइत अछि। ब्रज-लोकवार्ता केर विश्वास ई छैक जे पुण्य सँ संसारसागर सँ उद्धार होइत अछि, सुख आ स्वर्गक प्राप्ति होइत छैक तथा पाप सँ नरक-दुःख भोगय पड़ैत छैक तथा पशु, पक्षी, कृमि आर सरीसृप तथा वृक्ष केर योनि मे पुनर्जन्म भेटैत छैक।
 
मूल्यविरुद्ध आचरण – पाप – पापक जन्म सेहो मोनहि मे होइत छैक, एकरा बादे ओ कार्यरूप मे परिणत होइछ। अनेक पाप मानसिक सेहो होइत छैक। पाप नुकाकय कयल जाइत छै, ताहि लेल सेहो ओ समुदाय या राज्य जेहेन संस्थाक पकड़ मे नहि आबि पबैत छैक। एकरा लेल लोकवार्ता सावधान करैत छैक जे तू अऽढ (ओट) मे नुकाकय पाप करैत छँ, मुदा तोरा स्वर्ग मे ईश्वर देखथुन –
 
‘ओटक में तू पाप करै तोय ईसुर देखै सुरग में।’
 
देवीक गीत मे गायल जाइत छैक –
 
‘देख पराये नाह मन न डुलाइयै हो माय।
जो मन डुगलन हार, भैया कहि केँ बोलियै माय॥’
 
तहिना पुरुष सँ कहल जाइत छैक –
 
‘देख परायी नार मन न डुलाइयै हो माय।
जो मन डुगलन हार भैना कहि कैं बोलियै हो माय॥’
 
भीम केँ चाण्डाल पुरुष केर लक्षण बतबैत धर्म कहैत अछि कि जे कुल-वृद्ध लोकनि सँ कुवचन कहैत अछि, जेकर गाय अनकर खेत मे चरी करैत अछि, जे बिना अपराध अपन पत्नी केँ छोड़ि दैत अछि, घरक पैघ भेलोपर जे कुटुम्ब सँ छल कय केँ धन जोड़ैत अछि, साधु आर गाय केँ संकट मे देखिकय जे मुंह फेर लैत अछि, जे खाटक छाँह मे बैसैत अछि, आगि मे पैर रखैत अछि, जल मे कुरूर करैत अछि तथा सूर्यक सामने लघुशंका करैत अछि तथा जे बेटीक धन खाइत अछि, ओ चाण्डाल थिक आर ओ अपन परलोक केँ नष्ट कय लेलक अछि।
 
एक दोसर गीत मे कहल गेल छैक जे पति सँ दगा करयवाली स्त्री पापिन थिक –
 
‘तिरिया, तीनों पन बिगरौगी जो तुम पति ते दगा करौगी।’
 
एहेन स्त्री पहिने चील केर योनि मे जायत आर फेर गधैया बनत तथा तेसर जन्म मे टहलनी बनिकय काज करैत-करैत मरत।
 
‘पहले पन तुम चील बनौंगी आधे सरग उड़ौगी।
दूजे पन तुम बनौ गधैया तिरिया पराई गौनि लदौगी।
तीजे पन तुम बनौ टैहलनी करि-करि काम मरौगी।
जो तुम पति ते दगा करौगी…..’
 
जँ स्त्री अपन पतिक आज्ञा नहि पालन करत तऽ ऐगला जन्म मे ओकरा वेश्याक योनि प्राप्त हेतैक –
 
‘घर मे नार करकसा तिरिया कहा पुरुष का नहीं करती।
जा गुनसे वो बनी वेश्या अपनी लाज गमाती है।’
 
ब्रजलोकवार्ता मे गाय आर ब्राह्मणक हत्या महापाप थिक। बहिन आर बेटीपर कुदृष्टि राखयवला तऽ तत्काले कोढी बनि जाइत अछि।* (नवलदे गाथा)
 
छोट भाइ केर स्त्रीपर कुदृष्टि रखबाक कारणे राम द्वारा बलि केर बध कयल गेल छल।
 
झूठ बाजब वाचिक पाप थिक। जे झूठ गवाही दैत छैक, झूठे टा बजैत अछि आर झूठे टा सुनैत अछि, ओ ऐगला जन्म मे कुकूर केर योनि प्राप्त करैत अछि।*
 
‘झूठी कहते झूठी सुनते झूठी साखें जे भरते,
इन पापन से भये कूबरा घर घर भूँसत जे फिरते।’
 
‘नौते बामन न जिमाना, भानजके मान मारना,
प्यासी गौ बिड़ारना तथा जल में दोष लगाना,
जो जल में दोष लगावैगौ तोय बरुन बाँध लै जावैगौ।’
 
अर्थात् नोतल ब्राह्मण केँ भोजन नहि करेनाय, भगिनमानक अंश खा गेनाय, प्यासल गाय केँ भगेनाय तथा जल मे दुष्कर्म केनाय – एहि सब केँ पाप मानल गेल अछि। माया, मद आ अभिमान – ई सब अधर्म थिक।
 
व्रजलोकवार्ता मे हमरा लोकनि निम्नलिखित जीवन-मूल्य केँ प्रतिष्ठित देखैत छी –
 
सत्य – ‘जागरण’ मे गायल जायवला एक सुरही तथा हरिश्चन्द्र केर गाथा वास्तव मे सत्यक महिमाक आख्यान थिक। हरिश्चन्द्र केर सत्य केँ डिगेबाक लेल विश्वामित्र अबैत छथि। ब्राह्मण केँ दक्षिणा देबाक लेल ओ राजपाट त्यागिकय पत्नी केँ आ स्वयं केँ बेचि दैत छथि। पत्नी तारामती मिश्रक घर पर पानि भरैत छथि तथा स्वयं ‘चक्रवर्ती राजा’ डोमराजाक कर असूली करैत छथि। जखन रोहतास केँ साँप काटि लैत छैक आर रानी ओकर लाश केँ झँपबाक लेल अपन आधा साड़ी फाड़िकय श्मशान पर पहुँचैत छथि तखनहुँ राजा हरिश्चन्द्र विचलित नहि होइत छथि तथा डोमराजक कर केर माँग करैत छथि। ताहि समय भगवान् प्रकट भऽ कय राजाक हाथ पकड़ि लैत छथिन। तैँ कहाबत छैक –
 
सत मत छोड़ै सूरमा सत छोड़ै पत जाय।
सत की बींधी लच्छमी फेर मिलैगी आय॥
 
अतिथि सेवा – ‘मोरध्वज राजा’ केर गाथा एवं ‘नारद कौ घमंड दूर कर्‌यौ’ कहानी अतिथि-सेवाक आख्यान अछि। राजा मोरध्वज अपन एकमात्र पुत्र केँ आरा सँ चीरिकय अतिथिक सत्कार करैत छथि आर ‘नारद कौ घमंड दूर कर्‌यौ’ केर किसान दुनू बरद, लड़का तथा पत्नीक मरियो गेला पर आतिथ्य धर्म नहि छोड़ैछ। ब्रज मे कहावत छैक – ‘बैरी आवै द्वार बैठना दीजै ग्वाऊ।’
 
परोपकार – राजा विक्रमाजीत केर कहानी परोपकार केर महिमाक आख्यान अछि। राजा विक्रमाजीत दोसरक दोष आ अपराध केँ सेहो अपना सिरे लय लैत अछि, ओ शनिग्रह सँ सेहो संघर्ष करैत अछि। ‘ओघद्वादशी’ केर कहानी मे राजा जनताक भलाई लेल पोखैर खुनबाबैत छथि आर ओहि मे जल-प्लावनक लेल अपन बहू-बेटाक पर्यन्त बलिदान कय दैत छथि।
 
अहिंसा – अहिंसाक भाव ब्रज-लोक मानस मे गहींर धरि व्याप्त अछि। अन्जान (भूलवश) मे वा प्रमादवश पैर पड़ला सँ एकटा चुट्टियो केर मरला सँ हत्याक पाप लगैत अछि आर ताहि वास्ते प्रायश्चितक लेल महादेवजी केँ दीप जराकय देखायल जाइत अछि आर कोनो भीखारी केँ चुटकी भरिकय चून देल जाइत अछि। श्री देवेन्द्र सत्यार्थी रचित सुरहीक कथा ‘अहिंसाकी विजयगाथा’ कहल गेल अछि। मुदा ब्रज-लोकवार्ता अहिंसाक महिमाक संग ईहो स्वीकार कयलक अछि जे –
 
‘हन्ते कूँ हनियै न पाप दोस गिनियै’
 
अर्थात् हिंसक (मारनिहार) केँ मारब पाप नहि थिक।
 
मातृपितृभक्ति – ‘सरमन’ गाथा तथा गणेश केर प्रथम पूज्य होयबाक कहानी वास्तव मे मातृपितृभक्ति केर आदर्शक प्रतीक थिक। श्रवणकुमारक पत्नी केँ वृद्ध सासु-ससुर नहि सोहाइत छलन्हि, ओ अपना वास्ते तऽ खीर बनबथि लेकिन सासु-ससुर लेल खट्टा महेरी (घोरजाउर)। जखन श्रवणकुमार केँ ई ज्ञात भेलन्हि तखन ओ पत्नी केँ छोड़ि दैत छथि आर कन्धापर काँवर राखि अपन बूढ आर आन्हर माता-पिता केँ तीर्थयात्रापर लय जाइत छथि। एहि यात्रा मे माता-पिता केँ प्यास लगलापर ओ जलाशयपर जाइत छथि, ओत्तहि दशरथक बाण सँ हुनकर मृत्यु भऽ जाइत छन्हि। श्रावणी पूर्णिमाक दिन ‘सरमन’ केर पूजा कयल जाइत छन्हि।
 
यौन-पवित्रता – ब्रज-लोकवार्ता मे पातिव्रत, सतीत्व, ब्रह्मचर्य आदिक महिमा सँ सम्बन्धित अनेकों कहानी अछि। सावित्री, सिड़रिया, चोखापद्मिनी, चन्द्रावली तथा मानो गूजरी अपन सतीत्वक रक्षाक लेल प्राणोत्सर्ग करय सँ पर्यन्त नहि हिचकैत छथि। सावित्रीक सतीत्वक आगाँ यम केँ हारि मानय पड़ि जाइत छन्हि। सिड़रिया अपन मन्त्र-शक्ति सँ पति थुंदई जोधा केँ जीवित कय लैत छथि। पति कोढी हो, वेश्यागामी हो वा पंगु, मुदा पत्नीक लेल ओ भगवान् थिक आर ओकर सेवा करब टा ओकर धर्म थिक।
 
मैत्री – बुध, वासुकि, वजीरक छोटका बेटा, बढई केर बेटा तथा जाहरपीर मित्रताक रक्षा केर सजीव उदाहरण अछि। बढई केर बेटा अपन मित्रक रक्षाक लेल अनेकों खतरा केर सामना करैत अन्त मे पत्थर बनि जाइत अछि तथा ‘राजाक बेटा’ सेहो अपन वादाक अनुसार अपन पहलौटीक लड़काक बलि दय केँ बढई केर बेटा केँ शापमुक्त करैत अछि। ‘यार की यारई’ कहानी मे बादशाह केर लड़का अपन मित्र वजीरक लड़का केँ खाना मे विष मिलेबाक कारण अपन स्वप्नसुन्दरी केँ मन सँ परित्याग कय दैत अछि।
 
प्रेम – राधा, हीरराँझा, मोतिनी, दुभैंती, घसखुदाराजा, सिरियल जाहर, नवलदे तथा हरदौल प्रेमक लेल अपन जीवन केँ कठिनाइ मे झोंकि दैत अछि। हरदौल तँ भौजाई केर प्रेमक पवित्रताक रक्षा लेल हँसैते-हँसैत विष मे सेकल गेल पूड़ी खा लैत अछि। हीर जात-बिरादरी आ कुल केर समस्त मर्यादा केँ तक्खापर राखिकय राँझा सँ प्रेम करैत अछि। घसखुदाराजा तमोलीक छोरी (बेटी) केर रूप-माधुर्य केर वशीभूत भऽ घास काटय तक लेल तैयार भऽ जाइत अछि।
 
वीरता – लोकमानस वीर केर आश्रय मे आश्वासन प्राप्त करैत अछि। वीरता लोकनायकक पहिल आ सर्वश्रेष्ठ गुण थिक। वीर टा प्रेम-कथाक नायक बनैत अछि आर ओकर व्यक्तित्व संग कतेको मिथ जुड़ि जाइत छैक। कृष्ण आ जाहरपीर वीर नायक छथि। यैह बात जगदेवक सम्बन्ध मे कहल जा सकैत अछि। जगदेवसिंह दानवक वध कय केँ जनसमाज केँ भयमुक्त करैत अछि। आल्हा-ऊदल, राजा अमरसिंह राठौर तथा जवाहरसिंह केर गाथा वीरतारूपी जीवन-मूल्यक प्रतीक थिक।
 
धर्म – धर्म सब कार्य केर साक्षी थिक। धर्म-बहिन आ धर्म-बेटीक अनेको प्रसंग ब्रज-लोकगाथा सभ मे भेटैत अछि। गंगा-जमना-त्रिबेनीक स्नान, माता-पिता-गुरुक आज्ञा, सासु-ससुर आ पतिक सेवा, कुकूर-बिलाड़ि केँ टूक देब, भूखल केँ अनाज तथा प्यासल केँ पानि पियाअब, सासु-ननैद केर मान आ बहिन-भागिन केर सम्मान, हरिक ध्यान धर्म मानल गेल अछि। धर्मे रक्षक थिक, धर्महि सँ राज्य भेटैत छैक, धर्महि सँ वंश चलैत छैक तथा धर्महि सँ संसार-सागर सँ उद्धार होइत अछि। धर्मक कथा मे एकटा साधु महात्मा राजाक पास जा कय सवाल करैत छथि जे राजा या त अपन धर्म दय देथि अथवा अपन राजपाट दय देथि। राजा राजपाट दय केँ वन मे चलि जाइत छथि।
 
सहनशीलता, सन्तोष – कष्ट मे सुखक भाव – ब्रजलोकवार्ता मे जीवनदर्शन केर मूल मे आनन्दक स्रोत छैक – ‘जो दिन जाय अनंद सों जीवन कौ फल सोय।’ अपन परिवेश केँ आनन्दमय बनेबाक लेल प्रेम घोरबाक जरूरत अछि। सभक संग हिलिमिलिकय चलबाक सीख छैक –
 
हँसि बोल बखट कटि जायगौ । जानें को कित कूँ रमि जायगौ ॥’
 
कष्टहु मे मोन केँ प्रसन्न बनेने रहबाक युक्ति छैक धैर्य केँ नहि छोड़ब –
 
‘काटे ते कटि जायगी विपदा थोरे दिन की पातरिया।’
 
ब्रज-लोकवार्ता केँ बुझल छैक जे सुख-दुःख आ हार-जीत केर कारण मात्र मोन थिक –
 
‘मन के हारें हार है मन के जीतें जीत।’
 
तथा –
 
‘जो मन चंगा तो कठौती में गंगा।’
 
आनन्द माया मे नहि छैक, ताहि हेतु ब्रज-लोकवार्ताक सीख छैक जे –
 
‘लल्लो चप्पो में कहा धरौऐ इमली के पत्ता पै मौज करौ।’
 
लोकोक्ति छैक –
 
रूखा सूखा खाइ कै, ठंडा पानी पीव।
देखि बिरानी चोपड़ी, मत ललचावै जीव॥
 
सुखक स्थिति तँ एहि मे छैक जे ‘ऊधौ कौ लैन न माधौ कौ दैन।’
 
ब्रज-लोकवार्ता मे पापक कमाई केँ धिक्कारल गेलैक अछि। ई माया केकरहु संग जायवाली नहि –
 
मैं जानूँ माया संग जायगी न्याँ की न्यँईं रह जायगी।
 
सांसारिकता सँ विरक्ति – संसार मे मनुष्य असगरे अबैत अछि आ असगरे जाइत छैक। कियो केकरो साथी नहि छैक। सब स्वार्थक संग अछि। एकटा लोककहानी मे जोगी द्वारा चेला केँ प्राणायाम करब सिखायल गेलैक आर परिजन लोकनिक परीक्षा लेबय लेल कहल गेलैक। चेला प्राणायाम साधिकय मृतकतुल्य प्रतीत होमय लागल, तखन बाबा कहलखिन कि पत्नी, माँ, पुत्र मे सँ कियो अपन प्राण दय सकय तँ ई जीवित भऽ सकैत अछि। सब कियो अपन-अपन समस्या बताकय योगी सँ कहलकनि जे हे भगवन्! अहाँ तऽ परमार्थी छी, अहीं अपन प्राण दय दियौक। तखन चेला केँ वास्तविकता केर पता चललैक। 🙂
 
प्रवीणक नोटः ई पूरा लेख मे ब्रज लोकगाथाक वर्णन स्रष्टा लेखक श्री राजेन्द्ररंजनजी चतुर्वेदी द्वारा भेल अछि, परञ्च वर्णन कयल गेल एक-एक बात आ दृष्टान्त मे हम मिथिलावासी सेहो ओतबे सजग आ जागरुक छी – ई अनुभव केलहुँ। लोकजीवन लगभग एक्के रंग सब ठाम अछि, कनी घुमल-फिरल भले हो। हर तरहें ई लेख बहुत शिक्षाप्रद लागल। पाठकजन केँ सेहो एकर भरपूर लाभ भेटत ई आशा करैत छी।
 
हरिः हरः!!
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