उदारता – अत्यन्त पठनीय, मननीय व अनुकरणीय लेख

स्वाध्याय आलेखः

उदारता

– पं. श्रीलालजीरामजी शुक्ल
 
(स्रोतः कल्याण, अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी)
 
मनुष्यक व्यक्तित्व केँ आकर्षक बनबयवाली जँ कोनो वस्तु अछि तऽ ओ उदारता थिक। उदारता प्रेमक परिष्कृत रूप थिक। प्रेम मे यदा-कदा स्वार्थभावना छुपित रहैत छैक। कामातुर मनुष्य अपन प्रेयसी सँ प्रेम करैत अछि, मुदा जखन ओकर प्रेम-वासनाक तृप्ति भऽ जाइत छैक, तऽ ओ ओकरा बिसरा दैत अछि। जाहि स्त्री सँ कामी पुरुष ओकर यौवनकाल आर आरोग्य-अवस्थामे प्रेम करैत अछि, ओकरे वृद्धावस्था मे या रुग्णावस्था मे तिरस्कारक दृष्टि सँ देखय लगैत अछि। पिताक पुत्र केर प्रति प्रेम, मित्र केर अपन मित्र प्रति प्रेम तथा देशभक्त केर अपन देशवासीक प्रति प्रेम मे स्वार्थ-भाव छुपित रहैत छैक। जखन पिता केँ पुत्र सँ, भाइ केँ भाइ सँ, मित्र केँ मित्र सँ तथा देशभक्त केँ देशवासी सँ कोनो प्रकारक स्वार्थ-साधन नहि होएछ तखन ओ अपन प्रियजन आदि सँ उदासीन भऽ जाइत अछि। प्रेमक आधार उदारता होएत छैक, मुदा जाहि प्रेमक आधार उदार होएत छैक ओ एहि तरहें नष्ट नहि होएछ। उदार मनुष्य दोसर सँ प्रेम अपन स्वार्थसाधनक लेल नहि करैत अछि, वरं ओकर कल्याणक लेल मात्र करैत अछि। उदारता मे प्रेम सेवाक रूप धारण करैत अछि। प्रेम केर एहि तरहें दैवी रूप प्रकाशित होएत अछि।
 
उदार मनुष्य दोसरक दुःख सँ दुःखी होएछ। ओकरा अपन दुःख-सुख केर ओतेक चिन्ता नहि रहैछ जतेक कि दोसरक दुःख-सुख केर रहैत छैक। भगवान् बुद्ध अपन दुःखक निवृत्ति लेल संसारक त्याग कय जंगल नहि गेल छलाह वरं संसारक सब प्राणी केँ दुःख सँ विमुक्त करबाक विचार सँ राजप्रसाद छोड़ि जंगल केँ गेल छलथि, एहेन व्यक्ति नरश्रेष्ठ कहाइत अछि।
 
उदारता सँ मनुष्यक मानसिक शक्ति केँ अद्भुत विकास होएत छैक। जे व्यक्ति अपन कमायल धन केँ जतेक बेसी दान करैत अछि, ओ अपना अन्दर आरो धन कमा सकबाक ओतबे बेसी आत्मविश्वास पैदा कय लैत अछि। सच्चा उदार व्यक्ति केँ अपन उदारताक लेल कहियो अफसोस नहि करय पड़ैत छैक। उदार व्यक्ति केँ आत्मभर्त्सना नहि होएछ। सेवाभाव सँ कयल गेल कोनो कार्य मानसिक दृढता लय अनैत अछि। एकरा कारण सब प्रकारक वितर्क मन मे उथल-पुथल पैदा नहि कय केँ शान्त भऽ जाइत अछि। अनुदार व्यक्ति अनेक प्रकारक आगाँ-पाछाँ सोचैत अछि। उदार व्यक्ति एहि प्रकारें आगाँ-पाछाँ नहि सोचैत अछि। भलाई केर परिणाम भला होएछ, चाहे ओ कोनो व्यक्तिक प्रति कियैक नहि कयल गेल हो। एहि मे एक दिस भला विचार केर संचार उदारताक पात्रक मोन मे होएत छैक, आर दोसर दिस अपन विचार सेहो भला बनैत अछि।
 
प्रकृति केर ई अटल नियम छैक जे कि केकरो त्याग व्यर्थ नहि जाइछ। जानि-बुझिकय कयल गेल त्याग सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्ति केर रूप मे अपनहि मोन मे संचित भऽ जाइछ। ई शक्ति एक गोट प्रामिसरी नोट केर समान होएछ, जेकरा कखनहुँ भजायल जा सकैत अछि। सब मनुष्य केँ भविष्यक डर सदिखन लागल रहैत छैक। ओ अही चिन्ता मे डूबल रहैत अछि जे जखन ओ किछु काज नहि कय सकत तखन अपन बाल-बच्चा केँ कि खुआओत अथवा अपन आजीविका कोना चलाओत। कतेको लोक केँ अपन शान बनल रहबाक चिन्ता सतबैत रहैत छैक। उदार व्यक्ति केँ एहि तरहक चिन्ता नहि सतबैछ। जखन ओ गरीबो रहैछ तखनहुँ ओ सुखी रहैछ। ओकरा भावी कष्टक भय रहिते नहि छैक। प्रसिद्ध अंग्रेजी नाटककार शेक्सपियरक ई कथन मनन योग्य अछि जे “कायर पुरुष मरय सँ पहिनहुँ अनेक बेर मरैत अछि आर वीर पुरुष जीवन मे एक्के बेर टा मरैत अछि। वीर पुरुष काल्पनिक मृत्युक शिकार नहि होएछ।” तहिना उदार पुरुष केर मोन मे तेहेन अशुभ विचार नहि अबैत छैक जे सामान्य लोक केँ सदिखन पीडित कयल करैछ।
 
जँ कियो मनुष्य अपने-आप गरीबीक अनुभव करैत अछि तऽ एकर चिन्ता सँ मुक्त होयबाक उपाय धन-संचय करय मे लागि जाएछ। धन-संचयक प्रयत्न सँ धनक संचय तऽ होएत छैक मुदा मनुष्य धनक चिन्ता सँ मुक्त नहि भऽ पबैत अछि। ओ धनवान भइयोकय निर्धन बनल रहैत अछि। जखन धन-संचय भऽ जाइत छैक तऽ ओकरा मोन मे अनेक प्रकारक अकारण भय होमय लगैत छैक। ओकरा भय भऽ जाइत छैक जे कहीं ओकर सम्बन्धी, मित्र, पड़ोसी आदि ओकर धन केँ हड़ैप नहि लियए आर ओकर बाल-बच्चा ओकरा मरलाक बाद भूखे नहि मरय। ओ अपन अनेक कल्पित शत्रु उत्पन्न कय लैत अछि, जेकरा सँ रक्षा हेतु विभिन्न उपाय सोचैत रहैछ। धन-संचय मे अधिक लगन भऽ गेलापर ओकर स्वास्थ्यक विनाश भऽ जाइत छैक। ओकर संतानक शिक्षा नीक जेकाँ नहि भऽ पबैत छैक आ ओ निकम्मा एवं चरित्रहीन बनि जाइत छैक। एहि तरहें ओकर धन-संचयक प्रयास एक दिस ओकरा मृत्युक समीप बजा लैछ आ दोसर दिस धनक विनाशक कारण सेहो उपस्थित कय दैत छैक। अतएव धन-संचयक प्रयत्न अन्त मे सफल नहि भऽ कय विफल टा होएत छैक।
 
जे व्यक्ति गरीबीक अनुभव करैत अछि, ओकरा लेल अपन गरीबी केर मानसिक स्थितिक विनाशक उपाय अपना सँ बेसी गरीब लोकक दशापर चिन्तन करब आर ओकरा प्रति करुणाभाव केर अभ्यास करब मात्र थिक। अपना सँ अधिक गरीब लोक केर अपन धन सँ सेवा कयला सँ अपन गरीबीक भाव नष्ट भऽ जाइत छैक। फेर मनुष्य अपन अभाव केँ नीक-बेजा नहि कहिकय अपना आप केँ भगवान् मानय लगैत अछि। ओकर भविष्यक व्यर्थ चिन्ता नष्ट भऽ जाइत छैक। ओकरा मे आत्मविश्वास बढि जाइत छैक। एहि आत्मविश्वासक कारण ओकर मानसिक शक्ति सेहो बढि जाइत छैक। मनुष्यक संकल्प केर सफलता ओकर मानसिक शक्ति पर निर्भर करैत छैक। अतएव जे व्यक्ति उदार विचार रखैत अछि, ओकर संकल्प सफल होएत छैक। ओकर मोन प्रसन्न रहैत छैक। ओकर स्वास्थ्य सेहो नीक रहैत छैक; आर ओ जाहि काज केँ हाथ मे लैत अछि, ओकरा पूरा करय मे सेहो समर्थ होएत अछि। ओकर अकारण मृत्यु सेहो नहि होएछ। दीर्घजीवी होयबाक कारण ओकर संतान दोसरक आश्रित नहि बनैछ।
 
जाहि व्यक्तिक विचार उदार होएत छैक आर जे सदिखन अपना आप केँ दोसरक सेवा मे लगाकय रखैत अछि, ओकरा आसपासक लोक केर विचार सेहो उदार भऽ जाइत छैक। स्वार्थी मनुष्यक संतान निकम्मा टा नहि, वरं क्रूर सेहो होएत छैक। एहेन संतान माते-पिता केँ कष्ट दैत छैक। एकर प्रतिकूल उदार मनुष्यक संतान सदैव माता-पिता केँ प्रसन्न रखबाक काज करैत अछि। जखन उदारताक विचार मनुष्यक स्वभावक अंग बनि जाइछ अर्थात् ओ ओकर चेतन मन मात्र नहि वरं अचेतन मन केँ सेहो प्रभावित कय दैछ, तखन ओ अपन प्रभाव छोट बच्चा आर दोसर सम्बन्धी लोकनि पर सेहो दैछ। एहि तरहें हम सब अपन आसपास उदारताक वातावरण बना लैत छी आर एहि सँ हमरा लोकनिक मोन मे अद्भुत मानसिक शक्तिक विकास भऽ जाइत अछि।
 
विद्याक विषय मे कहल जाइत अछि जे ओ जतबा बेसी दोसर केँ देल जाइछ, ततबा बेसी बढैत अछि। देला सँ कोनो वस्तुक बढब – ई मात्र विद्या केर विषय मे सत्य नहि छैक, वरं धन आ सम्मान केर विषय मे सेहो सत्य छैक। युधिष्ठिर महाराज केर राजसूय-यज्ञ मे विदाई आर दानक भार दुर्योधन केँ देल गेल छलन्हि आर श्रीकृष्ण द्वारा स्वयं लोक सब केँ स्वागत करबाक भार लेल गेल छल। कहल जाइत अछि जे दुर्योधन केँ ई काज एहि लेल देल गेल छलन्हि जे ओ मनमाना धन सब केँ देता; मुता जतेक धन ओ विदाई मे दोसर केँ दैत छलाह, ताहि सँ चौगुना धन तुरंत युधिष्ठिरक खजाना मे आबि जाइत छल। श्रीकृष्ण सब अतिथि लोकनिक स्वागत करैत समय हुनका लोकनिक चरण पखारथि। तेकर परिणामस्वरूप ओ अपन सम्मान कम नहि कयलथि, वरं आरो से बढा लेलनि। जखन राजसभा भेल तऽ एक शिशुपाल केँ छोड़ि सब राजा श्रीकृष्ण केँ सर्वोच्च आसन लेल प्रस्तावित कयलनि। जे अपना आपकेँ जतेक दोसरक हित मे लगबैत अछि, से ओकरा ओतबे बेसी अपना लेल भेटैत छैक आर जे अपन मान-अपमानक परवाह नहि करैछ, वैह संसार मे सबसँ बेसी सम्मानित होएछ।
 
स्वार्थभाव मोन मे क्षोभ उत्पन्न करैत छैक आर उदारताक भाव शील उत्पन्न करैत छैक। जँ हम सब अपना जीवनक सफलता केँ आन्तरिक मानसिक अनुभूति सँ नापब तऽ हम सब उदार व्यक्तिक जीवनहि टा सफल पायब। मनुष्यक स्थायी सम्पत्ति धन, रूप अथवा यश नहि थिकैक; ई सबटा नश्वर थिक। ओकर स्थायी सम्पत्ति ओकर विचार टा थिक। जाहि व्यक्ति केर मोन मे जतेक अधिक शान्ति, सन्तोष आर साम्यभाव लाबयवला विचार अबैत छैक, ओ ओतबे बेसी धनी अछि। उदार विचार मनुष्यक ओ सम्पत्ति थिक जे ओकरा लेल आपत्तिकाल मे सहायक होएत छैक। अपन उदार विचारक कारण ओकरा लेल आपत्तिकाल आपत्तिक रूप मे अबिते नहि छैक, ओ सब परिस्थिति केँ अपना अनुकूल देखय लगैत अछि।
 
उदार मनुष्यक मोन मे भला विचार अपना-आपे उत्पन्न होएत छैक। यैह भला विचार सभक कारण हरेक तरहक निराशा नष्ट भऽ जाइत छै आर उदार मनुष्य सदिखन उत्साहपूर्ण रहैत अछि। उदार मनुष्य आशावादी होएत अछि। निराशावाद आर अनुदारताक जाहि प्रकार सहयोग छैक, ताहि प्रकार उदारताक सहयोग आशावाद आर उत्साह सँ छैक। जखन मनुष्य अपना-आप मे कोनो प्रकार निराशाक वृद्धि होएत देखैत अछि तऽ ओकरा बुझबाक चाही जे कतहु-न-कतहु ओकर विचार मे उदारताक कमी भऽ गेलैक अछि; अतएव एकर प्रतिकारस्वरूप ओकरा उदार विचारक अभ्यास करबाक चाही। अपना नजदीक रहनिहार व्यक्ति सभक संग ई प्रारम्भ करय। ओ देखत जे थोड़बेकाल मे ओकर आसपास दोसरे प्रकारक वातावरण उत्पन्न भऽ गेलैक अछि। ओकरा मोन मे फेर आशावादी विचार आबय लागत। जेना-जेना ओकर उदारताक अभ्यास बढत, ओकर उत्साह सेहो ताहि तरहें बढैत जायत। एहि सँ ई प्रमाणित होएत छैक जे मनुष्य उदारता सँ किछु नोक्सान नहि करैछ, किछु-न-किछु प्राप्ते करैछ।
 
कतेको लोक कहल करैत अछि जे दोसर लोक हमरा सभक उदारताक लाभ उठबैत अछि। वास्तव मे ओ उदारता उदारते नहि थिक जेकरा लेल पाछाँ पश्चाताप करय पड़य। स्वार्थवश देखायल गेल उदारताक पाछाँ मात्र एहि तरहक पश्चाताप होएत छैक। सच्चा हृदय सँ देखायल गेल उदारता कहियो पश्चातापक कारण नहि होएछ, ओकर परिणाम सदिखन भला मात्र होएत छैक। जँ कियो व्यक्ति हमरा लोकनिक उदार स्वभाव सँ लाभ उठाकय हमरे सब केँ ठकैत अछि तऽ एहि सँ हमरा सभक आध्यात्मिक पतन नहि होएछ, बल्कि लाभ मात्र होएत अछि। ई आध्यात्मिक लाभ किछुए समय मे भौतिक सफलताक रूप धारण कय लैत अछि। मनुष्यक सांसारिक दिवालियापन ओकर आध्यात्मिक दिवालियापन केर परिणाममात्र थिक। अतएव अपना ठकेलाक डर व्यर्थ आर मूर्खतापूर्ण थिक। जाहि तरहें दुइ आ दुइ मिलिकय चारि होएत छैक, तीन नहि होएत छैक, ओहि तरहें कोनो सद्भावना सँ प्रेरित कार्य केर परिणाम भला मात्र होएत छैक। ओ कदापि बदतर (खराब) नहि होएत छैक। कोनो कार्यक दुइ तरहक परिणाम होएत छैक – एक बाह्य आर दोसर आन्तरिक। अपन कार्यक मूल्य बाह्य परिणाम सँ आँकब एक प्रकारक नादानी (बचकाना) थिक। शुभ कार्यक बाह्य परिणाम कखनहुँ अनुकूल होएछ, कखनहुँ प्रतिकूल होएछ; मुदा ओकर आन्तरिक परिणाम सदैव भला (नीक) मात्र होएछ। ई परिणाम ओहि कार्यक हेतु (जैड़े) मे निहित अछि। भला (नीक) उद्देश्य सँ कयल गेल कार्य मोन मे भलाई टा उत्पन्न करैछ आर अपन मन केँ भला बनेनाय, अपन विचार सभ केँ सुधारनाय भेल आर यैह पुरुषार्थ थिक।
 
हरिः हरः!!
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