मिथिलाक लोककला मे ‘सिक्की कला’ केर स्थान आ महत्व

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आलेख

अनुवाद – प्रवीण नारायण चौधरी, मूलः हिन्दी आलेख, साभारः मिथिला कनेक्ट

दहेज मुक्त मिथिलाक एक प्रशाखा ‘जानकी वाहिनी’ जेकर उद्देश्य मिथिलाक ग्रामीण घरेलू-कामकाजी महिला लोकनिक खाली समयक उपयोग कय मिथिलाक लोककला व अन्य दक्ष शीप सँ संभव उत्पादन बढाकय ओकर बाजार-वितरणक व्यवस्था आर एहि तरहें उपलब्ध आमदनी सँ महिला लोकनि केँ स्वाबलंबी-स्वरोजगारी बनबैत महिला सशक्तीकरणक पुनीत लक्ष्य राखल गेल अछि। एहि सन्दर्भ मे आइ मिथिलाक प्रसिद्ध सिक्की कला पर एकटा नीक आलेख भेटल जेकरा अनुवाद करैत राखि रहल छी। मूल आलेख केर लेखक प्रणम्य छथि जे एतेक नीक सँ एहि कलाक सम्बन्ध मे हमरा सभक ज्ञान लेल लिखि छोड़लनि। विदिते अछि जे २०१४ केर भारतीय गणतंत्र दिवस पर बिहार केर झाँकी मे यैह सिक्की कला मे व्यस्त एक महिला देखाओल गेल छलीह जे पुरस्कृत सेहो भेल छल। तहिना अन्तर्राष्ट्रीय ट्रेड फेयर – प्रगति मैदान दिल्ली मे वैह वर्ष मिथिलाक लोककला मे मिथिला पेन्टिंग तथा सिक्की कला केँ देखैत बिहार केँ बेस्ट पैवेलियन अवार्ड सेहो भेटल छल। खैर! एखन हमरा सभक लक्ष्य अछि जे जानकी वाहिनी सँ वा अन्य अनेकानेक प्रयास जे मिथिलाक महिला मे आत्मबल बढबय तिनका सभक लेल ई लेख ज्ञानदायक हो, ओ सब आगू बढैत अपना लेल एकटा सम्बल ठाढ करथि। मिथिलाक नवतुरिया बेटी सभ अपन पुरुखाक देल ई कला केँ अपनाबथि। 

अनुवादित आलेख

सिक्की घास सँ घरेलु उपयोग केर सामान जेना डलिया, डोलची, आरो अनेकों सामान बनायल जाइत छैक जे देखय मे बड़ा सुन्दर और मनमोहक लगैत छैक। शहर मे तऽ बड़का-बड़का घर सभ मे सजावट केर सामान केर रूप मे सिक्की घास द्वारा निर्मित सामान सभ आलमीरा आ देवाल पर एना कय सजायल जाइत अछि जे घर मे प्रवेश करिते आगंतुक लोकनिक ध्यान ओही दिश चलि जाइत छैक।

वस्तुतः सिक्की कला मिथिलाक गरीबी केर सौंदर्य थिक। मिथिलाक लोकक कठिन परिस्थिति मे रहयवला जीवन एवं कार्यशैली सँ सिक्की कला प्रमुख रूप सँ उभैर कय निकलल अछि। मिथिलांचल केर ग्रामीण क्षेत्र मे सिक्की घास, मुंज घास और खर सँ विभिन्न प्रकारक सामान केर निर्माण कय ओहि सँ शादी-विवाहक अवसर पर बेचि कय जीविकोपार्जन करैत अछि। गरीब और दलित वर्गक महिला पोखरि, दियारा आर ताल (झील) मे उपजल घास केँ काटि कय हाट-बाज़ार मे बेचैत छथि, संगहि एहि सँ बनल अनेको प्रकारक कलाकृति केँ बाजार मे बेचि कय महिला लोकनि अपन आमदंनीक स्रोत केर एक नव जरिया बनबैत छथि।

सिक्की कलाक वर्तमान स्थिति

उत्तरी बिहारक सीतामढ़ी, मधुबनी आर दरभंगा जिलाक महिला समाज मिथिला पेटिंग और सिक्की कलाक कार्य करैत छथि। एतुका मिथिला पेंटिंग केँ तऽ देश-विदेश मे प्रचार-प्रसार कय सम्मान भेटल जखन कि सिक्की कला एहि समस्त अभाव एवं अन्य कारण सँ पिछड़ले अछि। मिथिला मे सदियों सँ सिक्की कला एक पीढ़ी सँ दोसर पीढ़ी धरि फलैत फूलैत रहल। लेकिन बेरोजगारी और गरीबीक कारण पैछला पचीस-तीस वर्ष सँ मिथिलाक लोकक भारत केर बड़का-बड़का शहर सभ मे पलायन होएत आबि रहल छैक जेकरा कारण एतुका सिक्की कला दम तोड़बाक स्थिति मे आबि गेल छैक।

वर्तमान समय मे ई कला सम्पूर्ण मिथलांचल सँ सिमैट कय मात्र रैयाम, सरिसवपाही, उमरी बलिया, यद्दुपट्टी, एयर करुणा मल्लाह गाँव जे दरभंगा, मधुबनी और सीतामढ़ी जिला में स्थित अछि, एतहि तक रहि गेल अछि। पैछला किछु दिन मे सिक्की कला केँ सरकार द्वारा व्यावसायिक आधार भेटलैक अछि जेकरा कारण सिक्की कला सँ जुड़ल महिला लोकनिक आर्थिक स्थिति मे सुधार आयल अछि।

कि होएत छैक सिक्की ?

Sikki is a kind of wild grass found in abundance by the side of pond or swamp in Mithila region of Bihar.

सिक्कीक उपजा नदी, पोखरि सभक किनारा मे दलदल वला जमीन पर होएत छैक। सम्पूर्ण मिथिलांचल मे एकर प्रचूरता छैक। एतय सँ पलायन करयवला लोक-समुदाय केँ रोकि एहि कला सँ निर्मित होयवला वस्तु केँ स्थान देश केर अन्य भाग मे बनयवाली कला कृत्य मे एक विशिष्ट स्थान राखि सकैत छैक।

सिक्की कला मे सिक्की घास केर संग मूँज और खर केर सेहो प्रयोग होएत छैक। समयक संग-संग सिक्की कला अपना आप केँ विविधताक तौर पर हाथ पंखा, पौती (ट्रे), टेबुलमेट, आईनाक फ्रेम, मौनी और खिलौना केर रूप मे अपना आप केँ ढालि लेलक अछि। मिथिलांचल मे जाहि घर सँ बेटी बियाहक बाद अपन नैहरा सँ सासूर विदाह होएत अछि तऽ संग मे सिक्की कला सँ बनायल गेल बहुतो रास सामान सभ देल जाइत छैक जाहि सँ ओ नया घर परिवार सुसंस्कृत और कला प्रति समर्पित राखि सकत।

सिक्की कलाक औजार

कारीगर सभ सिक्की केँ पहिने कतेको रंग मे रंगैत अछि आर फेर टकुआ जे लोहाक एक मोट सुइया जेहेन होएत छैक तेकरा संगे कैंची सँ बहुतो तरहक आकृति बनबैत अछि। मिथिला पेंटिंग मे जेना दुर्गा, आँखि, गुलदान, शिव, नाग-नागिन, कछुआ, आमक गाछ, कदम्ब, सूर्य, माछ आदिक चित्र बनायल जाइत छैक, तहिना सिक्की कला मे सेहो एहि चित्र सभकेँ उकेरल जाइत छैक। बाजार मे सिक्की आर्ट सँ बनल सामानक मांग बढ़ल अछि। आब कारीगर लोकनि बाजार मे मांग भेल मुताबिक कलाकृति सभ बनबय लागल अछि।

सिक्की घास केँ गर्म पानि मे उबालिकय ओकरा विभिन्न रंग मे रांगल जाइत छैक आर ओहि सँ भिन्न-भिन्न प्रकारक सामान बनायल जाइत छैक। सिक्की कला केँ विकसित करय मे मुस्लिम महिला कारीगर केर सेहो मुख्य भूमिका भऽ रहलैक अछि। नाजो ख़ातून तऽ देवी काली और भगवान शिव केर मूर्ति सेहो सिक्की घास सँ बनेबाक महारत हासिल केने छथि। शहर सभ मे तऽ एहि कला केर नीक कद्रदान हेबाक कारण कारीगर द्वारा बनायल गेल वस्तु सभक बिक्री ५०० रु० से १००० रु० तक भऽ जाइत अछि। लेकिन गाम मे ई धंधा फायदेमन्द नहि छैक।

बाहर सम्मानित लेकिन घरहि मे उपेक्षित

People from the country and abroad have shown interest in the skikki work but lacks local patronage.

सिक्की कलाक विशेषता ई छैक जे एहि सँ घर आ देवाल सजैत छैक। ओतहि एहि सँ बनल वस्तुक प्रयोग मसाला, गहना, फूलपत्ती, ड्राईफ्रूट्स राखक काज मे आनल जाइत छैक। एहि कलाक प्रख्यात कलाकार विन्देश्वरी देवी और कुमुदनी देवी केँ राष्ट्रीय पुरस्कार देल गेल छन्हि। विन्देश्वरी देवीक परिवारक महिला आर एहि गामक ३५-४० महिला एखनहुँ धरि सिक्की कला सँ जुड़ल छथि। पैछला वर्ष सँ बिहार सरकार ग्रामीण क्षेत्र सभ मे गरीब महिला लोकनिक उद्धारक लेल ‘जीविका’ नामक एकटा योजना शुरू केलक अछि। एहि योजना द्वारा सिक्की आर्ट केँ एक पैघ बाजार उपलब्ध करायल गेलैक अछि। एहि गामक कलाकार आब तऽ अपन कला सँ निर्मित अनेकों तरहक कलाकृति सभ लय केँ गोवा, कोलकाता, दिल्ली और चेन्नई आदि शहर मे होयवला प्रदर्शनी सभ मे भाग लेबय लागल अछि। एहि सभक पाछाँ ‘जीविका’ योजनाक मुख्य भूमिका छैक।

मिथिलांचल मे विवाहक बाद द्विरागमनक समय धरि सिक्की घास सँ बनल अनेकों प्रकारक मौनी-पौती आदि वस्तु दहेज़क रूप मे साँठल जेबाक प्रथा आइयो धरि कायम छैक। कलाकार सभक कहब अछि जे एहि कला मे जतेक रुचि मितिला सँ मिथिला सँ बाहर देश-विदेश केर लोक मे देखाइत छैक, ओतेक रुचि अपन लोक मे नहि अछि। बिहारक १०० वर्ष पूरा भेलापर दिल्ली मे एकटा प्रदर्शनी लगायल गेल छलैक जाहि मे बिहारक विभिन्न कला केर रूप सभक झांकी देखायल गेल छलैक, मुदा ताहि मे सिक्की कलाक कोनो स्थान नहि छलैक।

सिक्की कारीगर समुदाय केर स्थिति

Sikki artists in Mithila are struggling to save the existence of this craft.

मधुबनी जिलाक सरहद शाहपुर, सरसोपाही, उमरी और लहेरियागंज मे सिक्की कला केर अनेको कारीगर छैक जेकरा सरकारक दिश सँ कोनो सहायता नहि भेटलैक अछि। यदि सरकार केर दिश सँ एहि कारीगर सभ केँ सरंक्षण और सहायता भेटय तऽ ई कला काफी बेहतर तरीका सँ विकसित होयत आ देश एवं विदेशो मे लोकप्रिय बनि जायत। सिक्की कलाक आधुनिक कारीगर आधुनिक समयक अनुसार एकरा कला स्वरुप दय रहल अछि। आब ओ सिक्की घास सँ कुषण, पेन स्टैंड, पेपर वेट, फूलदान, अंगूठी, कान केर बाली, छुरिया आदि बनाकय सिक्की कला केर स्वरुप केँ बचाबय मे लागल अछि।

पूर्वक लेख
बादक लेख

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