व्यंग्य प्रसंगः फल्लाँ बाबू मैथिल केर कथा

व्यंग्य प्रसंग

– प्रवीण नारायण चौधरी

फल्लाँ बाबू मैथिल
 
कहियो-कहियो फल्लाँ बाबू मैथिल हमरा लंबा-लंबा गप दैत भेटि जाइत छथि। गप एहि द्वारे जे सब दिन ओ गपे टा मारलनि। काजक बेर ओ पतनुकान लय लेलनि। जे सिर्फ बाजय आ करय किछो नहि तेकरे न गप्पी कहल जाइत छैक। गप्पीक गप सुनय मे बड आनन्द अबैत छैक। होइत छैक जे यैह सब बात बुझैत अछि आर एकरे सँ समाजक हित होयत। मुदा ओ गप्पी थिकैक से गप जखन बुझा जाइत छैक तखन फेर ओकरा सँ लोक-समाज केँ घृणा होबय लगैत छैक। फल्लाँ बाबू ओना पेशा सऽ अध्यापक छथि, सरकारी तनखा मोटे भेटैत छन्हि। जहिया कहियो कोनो आम जनहितक बात होयत, फल्लाँ बाबू मैथिल आगुए-आगु अपन नाम लिखा देता जे हम ई योगदान देब, हमर नाम लिखू। लोक सब भरोस करैत हुनकर नाम ऊपरे मे लिखैत छथि। काज जेना-तेना करा लेल जाइत छैक। जखन भुगतानी करबाक बेर अबैत छैक आ फल्लाँ बाबू केँ तकादा कयल जाइत छन्हि जे सरकार अपनेक नाम सँ एतेक पैसा अपनहि द्वारा लिखायल छल से कनी पठा दितियैक… पहिने तँ फल्लाँ बाबू आइ-काल्हि मे पठबा देब, चिन्ता जुनि करू कहिकय सन्तोष दैत छथिन्ह, मुदा गछल समय बितलो पर कोनो तरहक योगदान नहि पठबैत छथिन। एम्हर लोक सब हुनका पर विश्वास करैत रहैत छथि जे आब पठेता, तब पठेता… मुदा फल्लाँ बाबू मैथिल बाद मे फोनो तक उठेनाय बन्द कय दैत छथिन। लोक सब भेटय लेल घर पर पहुँचल त गेटक बाहरे सँ अंगनावाली कहैत छथिन जे फल्लाँ बाबू मैथिल एखन समाजक अन्य काज सँ बाहर गेल छथि। कियो जबरदस्ती घर मे हुलुक-बुलुक कय केँ घरहि मे देखि लैत छन्हि तखन फल्लाँ बाबूक असली रंग खुलैत देखि घरवाली सम्हारि लैत छथिन। घरवाली बीच-बचाव करैत कहैत छथिन, “ईह बड़ा एला ह समाजक हित करनिहार सब, आर फल्लाँ बाबू केँ चिन्हलखिन हँ नहि एखन धरि…! हमरा जे जबानी मे नथिया गछने छलाह से त एखन धरि देले नहि पार लगलनि हँ, आर हिनका सब केँ जे २-४ मास पहिने गछि लेलखिन से आइये असूलि लेता ई सब। जाय-जाउ हमरा घर सऽ, पहिने कहियौन जे नथिया कीनिकय अनता तेकर बादे हिनकर हाथ सँ किछु भेटत।”
 
फल्लाँ बाबू मैथिल दाँत बिदोरैत रहैत छथि। घरवाली भनभनाइत रहैत छथिन। अन्त मे धीरे सऽ फल्लाँ बाबू लोक सब केँ इशारा सँ घर सँ बाहर जाय लेल कहि कोहुना पिण्ड छोड़बय चाहैत छथि। किछु थेथर लोक तैयो हुनकर लिखेलहा योगदान बिना असूलने नहि जायब कहैत अछि तखन हुनकर घरवाली कानब-बाजब शुरू कय दैत छथिन। मरय-तरय के नाटक करय लगैत छथिन। फल्लाँ बाबू तखन जोर सँ फटकारैत बजैत छथिन, “यौ जी! अहाँ सब हमरा घर मे कूफर करबायब? आब ई मैरिये जेती त कहू जे हम समाजक हित मे कि कय सकब? अहाँ सब जाय न जाउ एखन। हम अपने आबिकय पहुँचा देब।” बेचारा समाजक लोक! ई सब नौटंकी देखि हरान-परेशान अपना-अपना घर दिस लौटि जाइत छथि। फल्लाँ बाबू मैथिल एहि तरहें लगभग सभक पाय धारने छथिन। तेकर बादो निर्लज्ज जेकाँ अपन ताल ठोकैत सभा सब मे पहुँचिकय महकारी बनिकय गप देब नहि छूटैत छन्हि। जँ कियो सभा मे ठाढ भऽ हुनका पर सवाल टा उठेलक कि बदला मे फल्लाँ बाबू मैथिल ओहि व्यक्ति आ ओकर नेतृत्व मे भेल समाजिक क्रियाकलाप केर नियत पर सवाल ठाढ करैत पुनः अपन अध्यापक शैली मे लोक सब केँ माथ उल्टे सन्देह आशंकाक माहौल बना दैत छथिन। समाजक लेल काज कयनिहार आब बुझि जाइत अछि जे एहि महकारीलाल फल्लाँ बाबू मैथिल सँ सकब मोस्किल अछि। ओ अपनहि सँ अपन कान हाथ दैत शपथ लैत अछि जे फल्लाँ बाबू मैथिल केँ हुनकहि हाल पर छोड़ि दी। ई सिर्फ खरखाँही लूटय लेल जन्म लेलनि अछि। हिनका सँ कतहु केकरो कल्याण नहि होयत। ई अपन कल्याण अपनहि कय लेता वैह बड पैघ बात होयत। फल्लाँ बाबू मैथिल निर्लज्ज कन्हुआकय ओहि समाजसेवीक मनोदशा बुझैत मोने-मोन खूब प्रसन्न होइत छथि। ओ फेर चुटकी लेबयवला अन्दाज मे कहैत छथिन, “हे सुनू समाजसेवी जी! ऐगला कोनो काज करब त हम एडवांसे मे अपन योगदान अहाँ केँ देब। पैछुलका हिसाब अहाँक ठीक नहि रहल। आब ओकरा बिसैर जाउ।” ओ बेचारे समाजसेवी कपार हाथ धय हुनका गोर लगैत कहैत छन्हि, “सरकार! अपनेक योगदान हमरा सब केँ बिना भेटनहिये भेट गेल। भाभट टा समेटू सरकार।” फल्लाँ बाबू दाँत बिदोरैत ठहक्का मारि हँसैत छथि। फल्लाँ बाबू समान आरो कतेको गप्पी सब खूब आनन्द लैत अछि।
 
एहि गप्पक खेतीक कारण आब धान-गहुँम उपजब बन्द भऽ गेल मिथिला मे। गप्पहि केर चास, गप्पहि केर बिहनि, गप्पहि केर उपजा! भगवान् करथि, मिथिला आशीर्वादित हो आ एतय गप्पहि सऽ मनुष्यक पेटो कहियो भरब शुरू भऽ जाय! कहब से अतिश्योक्ति नहि होयत, सैकड़ा मे ९० गो गप्पी फल्लाँ बाबूक कारण आइ मिथिला शिथिला भेल अछि। गप्पहि सँ हावामहल बनैत अछि। शाहजहाँ वला ताजमहल मिथिला मे हरेक दिन बनैत अछि। आब फल्लाँ बाबू मैथिल सेहो रिटायर भऽ गेला। नित्य बैसार होएत अछि। गप्पक अम्बार लगैत अछि। सभक पेट मे दाना टा जेबाक चाही। अंगनावाली सब धरि गप्पक सीधा लगौती से संभव नहि अछि, ताहि लेल बेसाहेवला चाउर होउक या बँटेदारक बाँटि कय देलहा कूटल-छाँटल घरैया चाउर… भोजन धरि फल्लाँ बाबू मैथिल लोकनिक अहगर कय चाही।
 
दाना पहुँचल पेट मे,
माथ मे पहुँचल सूझ!
गप्प देबौ से मनक-मन
बुझि सकें से बुझ!!
 
रे, तोहर गप्प एक मनक
त हमर गप्प दस मन,
नै सुनि सकलें मोन सँ
सुनय पड़तौक बेमोन!
 
चल-चल गप मारि ले
गप्पहि दुनिया मस्त,
भाँड़ मे जाय लोक समाज
कतबू कियो हो त्रस्त!
 
हम गप्पी आ तूँ गप्पी
गप्पहि केर संसार,
के देखलक भविष्य के
एखनहि जी ले सार!!
 
कतबू दुनिया फझेत करौ
दे नहि कान ध्यान,
अपन काज छी गप देनाय
गपहि थिक भगवान!
 
हरिः हरः!!
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