कथा ओहि गामक जे एक समय बड सुन्दर छल मुदा आब…..

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फोटो क्रेडिटः अशोक कुमार सहनी

कथाः उजैड़ गेल ओ सुन्दर गाम

 प्रवीण नारायण चौधरी

ओहि गाम केँ लोक सब सुन्दर आ बेसी लोक शिक्षित होबक बात तहियो कहैक, आइयो कहैत छैक। मुदा आब ओ गाम उजैड़ गेल, विरान अछि। लोक रहितो ओतय दिने मे श्मसान जेकाँ लगैत छैक। जतय पहिने सब कियो हँसैत-खेलाइत देखाइत छल, ओतय एहि तरहक सुनसान लागब कल्पना योग्य छैक जे कतेक खराब लगैत हेतैक। गाम कोनो एक्के दिन दुर्घटना सँ उजड़लैक से बात नहि, टुकड़ा-टुकड़ा मे पीढी-दर-पीढी ओतुका सुन्दरता केँ बचाकय रखबाक बदला उल्टे अपन समृद्धिक घमन्ड मे अपने सँ अपन विशिष्टता केँ ग्रास बना लेलक। पहिने जतय एक-दोसरक श्रेष्ठता केँ सम्मान भेटैत रहैक, तेकरा ईर्ष्या मे बदैल लेलक। जे राजा छलैक तेकरा सँ डाह कय पीठ मे छूरा मारिकय हत्या कय देलकैक। अपन गामक स्वशासन अपनहि हाथ सँ दोसर केँ ओदौदक कारण सौंपि देलक। विचित्र अवस्था मे पहुँचेबाक लेल एकटा अहंकार ओहि गामक सब सुन्दरता केँ लिल गेल।

आइ ओहि गाम मे बहरियाक शासन छैक। बहरिया बाहरे रहैत ओहि गाम पर शासन चला रहल अछि, कारण बहरियाक दलाल ओकर शासन पद्धति मे आकंठ डूबल अछि। “फूट डालो, शासन करो” ‍- ई कोनो ब्रिटिश रूलर मात्र केर रूलिंग पद्धति रहय से बात नहि छैक। यैह पद्धति आइ धरि भारतवर्षीय कतेको समृद्ध सभ्यता केँ अपन ग्रास बना लेलक। ओहि सुन्दर गामक समृद्धि बिलेबाक बड़ा रोचक गाथा छैक, जे हम सब आइयो पढैत-बुझैत छी एक मोन होइयऽ कि भोकासी पाड़िकय खूब कानी…. मुदा फेर तुरन्त भितुरका मोन मुठ्ठी कसैत अपना केँ बुझबैत अछि जे कानब त अपाहिज लोकक काज हेतैक…. वैह ओ गीदर बनिकय इन्द्र भगवान् जे ऋषिपुत्र केँ आत्महत्याक समय गीदर शरीर मे रहैत बोन-झाड़क काँट-कुस देह मे गड़ैत रहबाक आ हाथ नहि रहबाक कारण तेकरा निकालियो नहि सकबाक एकटा अत्यन्त प्रेरणास्पद वृत्तान्त कहिकय आत्महत्या त हारल मनुक्खक पापपूर्ण कार्य कहने रहथिन…. ठीक तहिना मोन बुझबैत अछि जे गलती कतय भेलैक, केना भेलैक, गाम कियैक उजैड़ गेलैक ताहि पर समस्त गाम केर लोक केँ ढंग सँ मनन करबाक चाही, तोरा भोकासी पाड़िकय आ कि सिसकी मारिकय कनने कि हेतौक प्रवीण…. छौ तागत त जो ओहि गाम आ बुझो लोक केँ। “हँ-हँ!! हम तहिना करब।” आत्मज्ञान कहैत अछि। करब तहिना। निश्चित। बस मोन पाड़ैत छी किछु बात…..

ओहि गामक लोक त छोड़ू सुग्गा सेहो संस्कृतहि मे बात करय। संस्कृत मातृभाषा विद्वान व्यक्तिक रहैक आ विद्वान् समाज सँ सब जुड़ल छल। सभक अगुवाई वैह श्रेष्ठ विद्वान् लोकनि अपन सुन्दरतम बुद्धि सँ करथि। श्रेष्ठक सम्मान सब करय, तहिया आइ जेकाँ ‘संख्याबल’ अनुसार राज्यक मोजरे मोजर, से बात नहि रहैक। शिक्षाक सामग्री संस्कृतहि मे रहैक। एक बेर एकटा अत्यन्त कुशाग्र आ सदिखन लोकहित केर प्रखर चिन्तन कयनिहार गामक बेटा कहलकैक जे शिक्षापर सभक अधिकार हो, संस्कृत सँ बेसी सुलभ आमजनक बोली “जनवाणी – जन-जन केर बोली अवहट्ट” मे नीक रहतैक। अवहट्ट रहैक प्राकृत मिश्रित संस्कृत वाणी। आइ-काल्हि एहि भाषाक वर्तमान स्वरूप केँ मैथिली कहल जाएत छैक। शिक्षा सब लेल अनिवार्य हो, सब पढय आ सुसंस्कृत बनय। सौंसे गामक लोक जोरदार ताली पिटलक। ई बात एक दोसर विद्वान् केँ पसीन नहि पड़लैक। ओ संस्कृत मे जे सब पढबाक अधिकारी अछि वैह टा पढत ताहि सँ समाजक बेसी हित हेतैक, वर्णाश्रम धर्म अनुरूप सब अपन श्रमदान लेल अपन वर्गीय श्रम मे लागत। जँ शिक्षा पर सभक अधिकार हेतैक त फेर ई श्रम आधारित वर्ग विभाजन मे संकरता आओत। समाज छहोंछित भऽ जायत।

दुनू विद्वान् अपन-अपन तर्क सँ गामहि केर लोक लेल अति-चिन्तनक विन्दु धरि पहुँचि गेलाह। गामक लोक दुनूक तर्क सुनैत-सुनैत आखिरकार आम वर्गक चिन्ता करैत शिक्षा केँ अवहट्ट भाषा मे अनिवार्य करबाक विन्दु पर सहमति देलक। व्यवस्था मे परिवर्तन आबि गेल। सभक हितचिन्तन मे लागल विद्वान् काफी लोकप्रिय भऽ गेलाह। हुनकर एक आवाज पर चारूकातक सब वर्ण, सब धर्मक लोक जमा भऽ जाय। किछु वर्षक बाद हुनकर मृत्यु भऽ गेलनि। सौंसे गामक लोक हुनकर स्मारक बनबौलक। सब किछु भेलैक। गामक बच्चा-बच्चा पढि रहल छल। लेकिन लगभग १०० वर्षक बाद दोसर विद्वानक भविष्यवाणी सेहो सच होमय लागल। पढल-लिखल लोक आब घरैया लुरि – परम्परा सँ करैत आबि रहल श्रम देबय सँ लजाय लागल। गलत प्रतिस्पर्धा होमय लगलैक। आब नित्य प्रतिदिन श्रमदान सँ पहिने लोक अपना संग रहल शैक्षणिक डिग्री देखय। रोजी-रोटी लेल शिक्षा आधारित अवसर त ओतेक बढि नहि पेलैक, नहिये कियो ताहि तरहें भौतिक संरचनाक विकास कय सकल छल जे गामक सब पढल-लिखल लोक केँ रोजगार भेटैक…. विद्यालय मे पढेबाक अवसर, निजी तौर पर पढेबाक अवसर, गोटेक कोस दूर धरिक गाम आदि मे पर्यन्त ओहि गामक बच्चा-बच्चा जा कय दोसरो गामक सब वर्ग-धर्मक लोक केँ पढेनाय शुरू केलक। आब एक गाम सँ दोसर गाम धरि विद्याक प्रवेश होएत गेल। धीरे-धीरे सब बुधियार कहाय लागल। लेकिन वैह, श्रम आधारित वर्गक अवस्था मे घोर समस्या आबि गेल। रोजी-रोटी लेल कियो अपन पारम्परिक कर्म करय नहि चाहय, लेकिन आर्थिक अवस्था बनाकय रखबाक लेल कर्म मे संकरताक प्रवेश कराकय जेना-तेना गुजर केर वातावरण बनय लागल।

एक-दोसर मे अविश्वास, एक-दोसर सँ ईर्ष्या, डाह आ जलन… ई सब आम बात भऽ गेलैक। जखनहि अविश्वास एलैक तऽ श्रद्धा खत्म आर गाम मे दरिद्राक प्रवेश होमय लगलैक। पुनः-पुनः वीर सपुत सब ओहि गाम मे जन्म लैत रहल, कियो सल्हेश, कियो दीना, कियो भदरी…. सब रोजी-रोटी लेल संघर्ष केर समाधान ताकबाक जी-तोड़ प्रयास करय लागल – मुदा ओ कोनो प्रयास ता धरि सफल नहि भऽ सकलैक जा धरि खरातक अन्न सँ लोक तात्कालिक समाधान, अकालक हल आ गाम छोड़ि अन्यत्र पलायन कय नहि जाय लागल। आइ, लगभग ओहि गामक ९५% लोक प्रवासक दुनिया मे रहैत अछि। बड़ नीक लोक कहेनिहार उच्चवर्गक लोक त दुनियाक कोण-सान्हि धय लेलक। कने दिन पहिने एकटा ओहने पैघ लोकक ठठरी डेढ वर्षक बाद नोएडाक फ्लैट मे भेटलैक, कारण ओकर बेटा वैज्ञानिक बनिकय आब न्युयोर्क मे रहैत छैक, बापक मरलाक बाद घुरियोकय देखय नहि एलैक। आइ ओहि गाम मे ५-१० मैनजन, किछु स्त्रीवर्गक लोक, किछु कूपोषित बच्चा आ चौक-चौराहा पर सजल किछु लटखेनाक दोकान टा बाँचि गेल छैक। खेतक हरियरी पार छैक। बिग्घाक-बिग्घा परतिये पड़ल छैक। आमक गाछ पटेनिहार तक नहि। पुरुखाक सारा पर पैनसल्लो लगेनिहार कियो नहि। गिद्ध सेहो एहि गामक आकास मे आब नहि देखाएत छैक…. पशुपालन खत्म, सब किछु बर्बाद! गाम पूर्णरूपेण उजैड़ गेलैक। कालान्तर मे ओतय बाहरी शासक द्वारा आपसी विभाजन जातिक आधार पर कय केँ अपने मे तेना लड़ा देल गेलैक जे आब जातीय अहंकार मे लोक अपन दिन कटैत रहैत अछि…. ओहि गाम केँ आब कतहु चर्चो तक नहि होएत छैक। किछु लोक संस्मरण आदि लिखिकय गामक चर्चा करैत अछि… लेकिन…. गाम त उजैड़िये गेलैक।

हरिः हरः!!

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