घोघन महराज – मिथिलाक लोकदेवक रूप मे पूज्य

मिथिलाक ऐतिहासिक लोकपुरुषः घोघन महराज

– प्रवीण नारायण चौधरी

मधेपुरा जिलाक गोलमा गाम केर यादवकुल मे १७म शताब्दी मे एक गोट महान् लोकपुरुष केर जन्म भेलन्हि जिनका घोघन महराज नाम सँ परिचिति सौंसे इलाका मे भेटलन्हि। गो-सेवा तथा शिव-भक्ति – हिनक आत्माक ई दुइ गोट चेतन विन्दु कहैत छथि डा. लक्ष्मी प्रसाद श्रीवास्तव। घोघन महराज अपन गाय केर दूध बाबा सिंघेश्वर केँ नित्य चढबैत छलाह। बिना बाबा सिंघेश्वरक पूजा कएने आ दूग्धाभिषेक कएने हिनका सन्तोष नहि भेटैत छलन्हि, एहि वास्ते ओ आतूर रहैत छलाह आ केहनो विघ्न सँ संघर्ष करय लेल उद्यत् सेहो रहैत छलाह। एहेन कतेको रास कथा-गाथा हिनका बारे मे प्रचलित अछि जे गो-दुग्ध सँ बाबाक अभिषेक मे बाधा बनल तेकरा ओ अपन रस्ता सँ वीरतापूर्वक हँटा देलनि।

एक बेर घोघन महराज केर सोझाँ एक चिन्तामणि नामक व्यक्ति जे हिन्दू सँ मुसलमान धर्म परिवर्तन कएने छल ओ सिंघेश्वर मंदिर मे दूध चढेबाक विषय मे विवाद कयलक आ निर्णय लेल मल्लयुद्ध करबाक ललकारा देलक। कहल जाएछ जे घोघन महराज केँ कतबो बुझेला पर जखन ओ नहि मानलक त फेर ओहि दुष्ट आ हठी केँ ओ अपन एक मुक्काक प्रहार मे प्राण निकालि देलनि। तहिये सँ हुनका लोक ‘गाजी घोघन’ केर नाम सेहो धेलकनि। चिंतामणिक कब्र सिंघेश्वर मंदिरक दक्षिण भाग मे आइयो विद्यमान् अछि।

किछु समय बाद घोघन महराजक गाम गोलमा मे कचहरी स्थापित कयल गेलाक बाद हुनकर साधना मे विघ्न बेसिये उपस्थित होबय लागल। तखन ओ ओहि गाम सँ हँटिकय ‘घोघनपट्टी’ गाम बसौलनि। पिपरा (धबौली) गाम मे एकटा बाघ केँ ई मारि देलखिन, दुःखी बाघिन बदलाक भावना सँ हिनका ऊपर आक्रमण कय देलकनि। ओ ओहि नारी बाघिन सँ युद्ध करनाय उचित नहि मानलाह तैँ अपन कंगुरिया आंगूर ओकरा दिस बढा देलखिन। बाघिन केर हबक्का सँ घायल भेलाक बाद ओहि घावक प्रतीकात्मक पीड़ा सँ घोघन महराजक मृत्यु भऽ गेलनि। हुनक मृत्यु भाद्रपद शुक्ल चौथ केँ भेल छलन्हि, एहि तिथि केँ एतय प्रतिवर्ष मेला लगैत अछि।

घोघन महराजक मृत्यु-स्थानपर हुनक स्मृति-मन्दिर अछि, जाहि मे हुनकर लाठी आ पटकन दुनू चीज आइयो राखल अछि। असाध्य चर्मरोग सँ कल्याण हेतु ओतय एकटा वर्तन मे सरिसोक तेल राखल रहैत अछि। ई तेल मालिश कय केँ श्रद्धालू रोगी चंगा भऽ जाएत अछि। हिनकर सेवक आ ‘भगता’ विग्रह ‘भाह’ मे लोक-कल्याण लेल वाक्-खाक् सेहो देल करैत छथिन। हिनकर नाम लय केँ भोज-भात (भंडारा) मे खायवला समान मे तुलसीदल देला सँ भोज्य पदार्थक कमी नहि होएत छैक। हिनकर नामपर एकटा महाविद्यालय सेहो घोघनपट्टी मे चलि रहल छन्हि।

मिथिलाक सभ्यता मे कोनो महापुरुष अपन विशिष्टता सँ आगामी संतति लेल कल्याणकारक होएत छथि आ हुनका लेल तरह-तरह केर पूजा आ हविष्य (भगताइ, भाह, आदि) प्रदान कयल जाएत छन्हि।

हरिः हरः!!

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