संस्कृत नीति श्लोक – भाग २ः अत्यन्त पठनीय आ मननीय

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स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

पूर्व मे आरम्भ कयल संस्कृत नीति श्लोकक संग्रह मैथिली मे अर्थ सहित एतय राखि रहल छी…. आगाँ भाग २ केर रूप मे। एहि सँ आगू अन्य भाग मे ई निरन्तरता मे रहत।

लुब्धमर्थेन गृणीयात् क्रुद्धमञ्जलिकर्मणा।

मूर्खम् छन्दानुवृत्त्या च तत्त्वार्थेन च पण्डितम्॥

लालची मनुष्य केँ धनक लालच दय केँ वश मे कयल जा सकैत छैक। क्रोधित व्यक्ति संग नम्र भाव राखि ओकरा वश मे कयल जा सकैत अछि। मूर्ख मनुष्य संग ओकरे अनुरूप व्यवहार कय केँ वश मे कयल जा सकैछ। तथा, ज्ञानी व्यक्तिकेँ मूलभूत तत्त्व बताकय वश मे कयल जा सकैत अछि। 

आरोप्यते शिला शैले यत्नेन महता यथा।

पात्यते तु क्षणेनाधस्तथात्मा गुणदोषयोः॥

शिला (पाथर) केँ पर्वतक ऊपर लय जायब कठिन कार्य होएछ मुदा पर्वतक ऊपर सँ नीचा ठेलब त सहज अछि। तहिना मनुष्य केँ सद्गुणसँ भरब कठिन काज होएछ, दुर्गुण सँ भरब त सहज काज छैक।

असभ्दिः शपथेनोक्तम् जले लिखितमक्षरम्।

सभ्दिस्तु लीलया प्रोक्तम् शिलालिखितमक्षरम्॥

दुर्जन द्वारा लेल गेल शपथ सेहो पानिक सतहपर लिखल समान क्षणभंगूर होएछ। संत द्वारा सहजहि कहल गेल वचन शिला ऊपर लिखल गेल समान रहैत अछि।

न प्राप्यति सम्माने नापमाने च कुप्यति।

न क्रुद्धः पुरुषं ब्रुयात् स वै साधुत्तमः स्मृतम्॥

संत त वैह होएछ जे मान देलापर हर्षित नहि होएछ आ अपमान देलापर क्रोधितो नहि होएछ, संगहि अपनो क्रोधित भेलापर कठोर शब्द नहि बजैछ।

साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः।

तृणं न खादन्नपि जीवमानः तद्भागधेयं परमं पशूनाम्॥

जाहि व्यक्तिकेँ कला तथा संगीत मे रुचि नहि होएछ ओ त पूँछ आ सींग बिनाक पशु मात्र थिक। तखन एहेन पशुक भाग्य एतबा जे ओ घास नहि खाएछ।

गुणेषु क्रियतां यत्नः किमाटोपैः प्रयोजनम्।

विक्रीयन्ते न घण्टाभिः गावः क्षीरविवर्जिताः॥

स्वयं मे नीक गुणक बढोत्तरी करबाक चाही। देखाबा केला सँ लाभ नहि होएत छैक। दूध नहि दयवाली गायकेँ ओकर गलामे टांगल घण्टी देखा केँ नहि बेचल जा सकैछ।

सर्वनाशे समुत्पन्ने हमर्धं त्यजति पण्डितः।

अर्धेन कुरुते कार्यं सर्वनाशो हि दुःसहः॥

जखन सर्वनाश निकट आबि जाएत छैक त मनुष्य अपना पास रहल सम्पत्तिक आधा गमा देबाक तैयारी रखैत अछि। आधाक आधो सँ काज चलायल जा सकैत छैक, मुदा सबटा गमायब बहुत असहनीय होएत छैक।

को न याति वशं लोके मुखे पिण्डेन पुरितः।

मृदंगो मुखलेपेन करोतु मधुरध्वनिम्॥

मुंह मे केकरो कौर देलापर केकरा नहि वश मे कयल जा सकैछ? मृदंग केँ सेहो आँटाक लेपन केलेपर मधुर ध्वनि (स्वर) निकलैत छैक।

परिवर्तिनी संसारे मृतः को वा न जायते।

स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नितम्॥

(स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् ।
परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ॥)

जेकर जन्म सँ वंश केर उन्नति हो वैह जन्मल कहल जा सकैत अछि; अन्यथा परिवर्तित होयवला एहि संसार मे मरयवाला कोन लोक नहि जन्म लैछ?

सर्वार्थसंभवो देहो जनितः पोषितो यतः।

न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मत्र्यः शतायुषा॥

सौ वर्ष केर आयु प्राप्त केलो सँ माता-पिताक ऋण सँ उऋण नहि भेल जा सकैछ। वास्तव मे जे शरीर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष केर प्राप्तिक प्रमुख साधन थिक, ओकर निर्माण तथा पालन-पोषण जिनका द्वारा भेल अछि, हुनकर ऋण सँ मुक्त होयब कठिनाहे टा नहि असंभव सेहो अछि।

शरदि न वर्षति गर्जति वर्षति वर्षासु निःस्वनो मेघः।

नीचो वदति न कुरुते न वदति सुजनः करोत्येव॥

शरदॠतु मे बादल केवल गर्जन करैत छैक, लेकिन बरसैत नहि छैक और वर्षाॠतु मे जे बादल बरसैत छैक ओ गरजैत नहि छैक। ठीक तहिना अधम मनुष्य केवल बजैत टा छैक, लेकिन (कार्य) नहि करैत छैक। जखन कि उत्तम पुरुष बजैत नहि छैक, सिर्फ (कार्य) करैत छैक।

निरन्तरता मे….

हरिः हरः!!

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