मिथिला विवाह संस्कार और मिथिला चित्रकलाः प्रसंग नवविवाहितों के लिये कोहबर सजाना

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आलेख

– राकेश झा ‘क्राफ्टवला’

मिथिला चित्रकला पर मिथिला की महिलाओं का एकाधिकार है। वे अपने आंगन की दीवारों को लीप पोत के उनपर अपनी कल्पनाओं को उकेर उनमें रंग भर जीवंत बना देती है । यह कला एक प्रकार का पारंपरिक चित्रकला है जो स्थानीय लोगों के जीवन शैली, परंपरा और संस्कृति सहित प्राकृतिक वातावरण को दर्शाती है। मिथिला की यह कला धार्मिक समारोहों, विशेष रूप से वैदिक वैवाहिक संस्कारों के साथ जुड़ी परंपराओं एवं विधी व्यवहारों का चित्रांकन है जो महिलाओं द्वारा की जाती है जो देवी देवताओं दुर्गा, काली और गौरी को समर्पित है।

विवाह समारोह के दौरान दुल्हन और दूल्हे को गौरी देवी को समर्पित कर महिलाओं द्वारा सभी तरह के विधियों को सम्पन्न करवाया जाता है जिसमें दूल्हे के अलावा अन्य पुरुषों की भागीदारी ना के बराबर होती है। गौरी वह देवी है जिसे दुल्हन ने बचपन से प्रार्थना की है कि उसे एक अच्छे पति ला सके। देवियों की पेंट की गई छवियों से पहले कई प्रकार की प्रतिकात्मक आकृतियों को घर के आंगन में बनाया जाता है। ये प्रतीकात्मक आकृतियाँ ब्रह्मांड की मौलिक ऊर्जा के विभिन्न रूपों को दर्शाती हैं । जैसा कि मैथिली सम्प्रदाय में विवाह एक विशेष अवसर होता है, जिसे नवदम्पति के लिए और खास बनाया जाता । इनके लिए घर के भीतर एक अलग कमरे को कई तरह कलाओं के साथ सुव्यवस्थित रूप से सजाया जाता है जिसे “कोहबर” कहा जाता है, यह पेंटिंग कोहबर घर (हनीमून हाउस) के अंदरूनी बाहरी दीवारों में किया जाता है।

मिथिला चित्रकला का सबसे विशिष्ट रूप इसी कोहबर घर में देखने को मिलता है । इस घर की सजावट में मिथिला चित्रकला का प्रयोग एक लोकप्रिय सामाजिक प्रथा के रूप में किया जाता है, इस चित्रकला में बनने वाली विभिन्न पेड़-पौधे और जीव-जन्तुओं ( बांस, केला, कछुवा-मछ्ली आदि) की आकृतियाँ नव दुल्हा और दुल्हन दोनों की दिर्घायु एवं खुशहाल वैवाहीक जीवन के साथ सन्तानों की उत्पत्ति हेतु यौन शक्ति और प्रजनन क्षमता वृद्धि का सांकेतिक रूप में होती है। संग ही देवी-देवताओं का चित्रण नव दम्पति को उनका आशीर्वाद प्राप्ती का संकेत करती है ।

यह विशेष चित्र तीन घरों में घर की दीवारों पर की जाती है: गोसाऊन घर (परिवार का पूजा घर), कोहबर घर (हनीमून कक्ष) और कोहबर घर कोनीया (कोहबर घर के अंदर- बाहर का कोण)। इन चित्रों को मिथिला की अनपढ़ महिला द्वारा शानदार तरीके से चित्रित किया जाता है, जो देखने में काफी आकर्षक होते हैं। ये इन महिलाओं की कलात्मक भावनाओं और कौशल को व्यक्त करता है ।

कोहबर की बाहरी दीवारों को ग्रामीण जीवन की पेंटिंग से सजाया जाता है जैसे कि दुल्हन और वाहक के साथ एक पालकी, आम, केला, कदंब और अशोक की तरह छायादार फलों के पेड़ के साथ-साथ भगवान कृष्ण के प्रेम-दृश्यों को भी गोपीयों और राधा के साथ पेंट करते हैं। मिथिला कला में विवाह विशेष विषयों में साँप की देवी (विशहरा) शामिल है, जिन्हें पूजा जाता है । दुर्गा देवी अपने बाघ सवार हो संभवत: सबसे शक्तिशाली रूप में नव दम्पति की रक्षा और बल का प्रतीक है । इसी तरह तालाब में गिरा दिया गया एक एकल बीज कई कमल के फूल पैदा करता है, जो दूल्हा-दुल्हन के वंश वृद्धि का संकेत है।

पुरुष देवताओं में राम, कृष्ण, गणेश और शिव को सामान्यतः अधिक चित्रित किया जाता है । पेड़ों, पक्षियों और जानवरों का व्यापक रूप से अन्य धार्मिक अनुष्ठानों और धार्मिक चित्रों के साथ संयोजन मिथिला चित्रकला की विशिष्टता है।

इस विवाह विशेष चित्रकला की शैली एक जाति से दूसरे जाति में थोड़ी भिन्न होती है। इसका मुख्य कारण धार्मिक अनुष्ठान है । जहाँ ब्राह्मणों और कायस्थ की कला धार्मिक अनुष्ठान में समानता से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है, अतः इसमे समानता मिलती है । पर जहाँ इन धार्मिक अनुष्ठानों में अंतर आती है इनकी शैली भी थोड़ी बदल जाती है । #craftvala #mithila #madhubani

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