मिथिलाक जीवनशैली आ कोहवर केर महत्व

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विमर्श

– प्रवीण नारायण चौधरी

जिज्ञासा जानकार सज्जन सँः विषय कोहवर आ मिथिलाक लोकपरम्परा

विवाहोपरान्त वर-कनियां केर प्रथम मिलन लेल निर्मित पवित्र स्थल, एतय सृष्टि-चक्र केर भित्ति-चित्र अंकित करबाक परम्परा अछि मिथिला संस्कृति मे।
 
गर्व करबाक विषय ई भेल जे ‘सृष्टि-चक्र’ केँ दरसाबैत कोहवरक देवालपर चित्रक अंकन कोनो-न-कोनो रूपमे नवविवाहित जोड़ीकेँ विवाहोपरान्त सन्तानोत्पत्तिक अधिकार दैत सृष्टि केँ निरन्तरता प्रदान करबाक महत्वपूर्ण कार्यक उपदेश करैछ। ई बात हमरा लोकनिक पुरुखाक बौद्धिक समृद्धि आर एक पीढी सँ दोसर पीढीमे ताहि बातकेँ संचरण हेतु चित्रक सहारा लेब, बहुत मर्मस्पर्शी आ संवेदनशील समझ-शक्तिक निरूपण करैत अछि।
 
हमर जिज्ञासाक विषय ई भेल – जानकार सज्जन यथा, Bhavanath बाबू, S.C. Suman भाइ, ओ मिथिला संस्कृति, चित्रकला, ललितकला, वैवाहिक संस्कार आदिक मामिलामे वृहत् जानकारी रखनिहार समस्त अग्रज मैथिल समाज सँ – ई सृष्टिचक्र केर चित्रमे कलात्मक प्रस्तुति कि सब रहैछ आर ओकर प्रभाव नवविवाहिता किंवा ताहि अवसर उपस्थित भेनिहार परिजन-पड़ोसी-समाजक लोकक मनसा केना प्रभावित होएछ – से जानकारी हमरो सबकेँ दैथ। एहि विन्दुपर एकटा संछिप्त टिप्पणी वा आलेख उपलब्ध भऽ सकत त आरो नीक।
 
डा. लक्ष्मी प्रसाद श्रीवास्तव कोहवरक वर्णन करैत लोकसंस्कृतिकोशमे लिखलनि अछि जे सखी लोकनि नवविवाहिता वर ओ कनियाँकेँ कोहवर सनक पवित्र स्थानपर अनैत छथि तथा अनेक रीति-रस्म निबाहैत एक-दोसरकेँ स्पर्श करबैत स्त्री-पुरुषक बीच सम्बन्धक संकोचकेँ मेटबैत छथि। वर केर घर मे सेहो एहने रचना कयल जाएत अछि आर वर ओ कनियाँ सृष्टिचक्रक पूजन कय लोकरीतिक निर्वाह करैत छथि। विवाहक साल पुरलापर एक मास धरि उत्सव मनाकय भित्ति-चित्र केँ दूध सँ नीपल जाएत अछि।
 
कल्पना करैत छी – सृष्टिचक्रक पूजा पुनः हमरा लोकनिक मिथिलाक परम्परा मे तंत्र पूजन पद्धति रहबाक यथार्थ केँ सिद्ध करैछ। जहिना ठाउं, पीढी, अहिपन, माटिक पीरीरूपमे कुलदेवी-देवताक आवरण आदि अनेकानेक पद्धति ईश्वरशक्तिक पूजा-विधान प्रति हमरा सभक गहिंर आस्थाकेँ देखबैत अछि, तहिना जीवन-पद्धतिमे जखन एक पुरुष एक नारी संग विवाह सम्बन्ध बनबैछ त आगाँ सृष्टि कोना निरन्तरता पाओत ताहि दिशामे सृष्टिचक्रक पूजन-परम्परा आ विधि-विधानपूर्वक कोहवर निर्माण आ पुनः साल पुरलापर ओकर दूध सँ नीपेबाक विधान – ई सब बात वैह सत्यकेँ सिद्ध करैछ जे याज्ञवल्क्य संहितामे उल्लेख कयल गेल छैक – मिथिलाक लोक-आचारमे वेद जीवित अछि… एकर संस्कृत सूत्र (श्लोक) हमरा ध्यान सँ उतैर गेल अछि।
 
अस्तु! जानकार सँ जानकारी प्राप्त करबाक प्रतिक्षामे, हम मुमुक्षु – प्रवीण!
 
हरिः हरः!!
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