गुरुद्रोहक परिणतिः नैतिक पाठ, अवश्य पढी

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गुरुद्रोह केर परिणति
 
(एक नैतिक कथाः साभार अखिल विश्व गायत्री परिवार – अखण्ड ज्योति)
 
अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी
 
भूमिकाः
सर्वप्रथम गुरुदेव – गुरुतुल्य – गुरुचरण केँ प्रणाम! ई कथा जरुरत मे राखि रहल छी, जेकरा पढिकय कतेको गुरुद्रोह कयनिहारक आँखि खुजैत अछि। वर्तमान समय मे एहि तरहक नैतिकताक सीख सिखनाय सभक लेल बहुत आवश्यक अछि, कारण दंभ आ घमंड कखन कोन द्वार सँ हमरा लोकनिक मनक भीतर प्रवेश करैछ ई कहब बड मोस्किल काज अछि। अस्तु, सीधे चली कथा मे।
 
कथाः
गुरु अर्जुनदेव जी विनम्रताक मूर्ति छलाह। हुनक शब्द-कीर्तन मे जे कियो योगी-कीर्तनकार भाग लैथ, ओ हुनकर पूरा सम्मान करैथ। एहने दुइ योगी, जिनकर कीर्तन सँ नहि सिर्फ समाँ बन्हा जाएक बल्कि भक्तिक वातावरण तेहेन अद्भुत बनि जाएक जे नास्तिकहु सब किछु समय ओतय बैसबाक लेल राजी भऽ जाएक, ओ सत्ता आ बलवंड छलाह, जे गुरुजीक सत्संग मे कीर्तन करैथ। प्रतिभा जाबत धरि समर्पित रहैत छैक – गुरुक प्रति निष्ठावान् होएत छैक एवं ओकरामे श्रद्धा-समर्पणक भाव रहैत छैक, ताबेधरि ओहिमे प्रभावोत्पादक सामर्थ्य होएत छैक। जखनहि ओकरा घमंड भेल – अपनहि केँ ओ सब किछु मानि लेबाक विषवृति ओकरा धय लेलक, ओत्तहि सँ ओकर पतन-सर्वनाश आरम्भ भऽ जाएत छैक।
 
अहिना किछु सत्ता-बलवंडक संग सेहो भेलैक। ओ गुरुनानक केर दरबार मे हुनकर चहेता कीर्तनकार आ शिष्य रहल मर्दाना केर वंशज छल। किन्तु ओकर दुर्बुद्धि एक दिन ओकरा सँ किछु एहेन कहबा देलक, जे ओकर महानाशक कारण बनि गेल। गुरुजीक बजेलोपर ओ दरबार मे नहि पहुँचलापर गुरु अर्जुनदेव स्वयं पैदल चलि पड़ला। डेरा पर गुरुजी आगू-आगू आ पाछू सँ शिष्य समुदाय। जाहि गुरुक एक झलक पेबाक लेल देवतो लोकनि नर रूप धारण कयकेँ नरसेवा मे भाग लेबय आयल छलाह, तिनका द्वार पर पहुँचिकय आवाज लगेलोपर ओ दुनू कीर्तनकार बहार नहि निकलल। दू-तीन बेर आवाज देल गेलापर बाहर एबो कयल त गुरु केर चरण केर नमन करबाक बले तानिकय ठाढ होएत कहय लागल कि अहाँ हमरा सभक संग धोखा करैत छी। चढ़ावाक सब रकम संगत राखि लेलक एवं हमरा सभक कीर्तन मे किछु गानल-चुनल व्यक्ति भेजिकय हमरा सभक अपमान सेहो करेलहुँ।
 
गुरुजी बड़ा विनम्र स्वर मे कहलखिन जे भाइ! अहाँ तँ हमर आदरणीय छी, कियैक तँ अहाँ गुरुनानकक घर कीर्तन करयवलाक ओतय जन्म लेलहुँ अछि। चढ़ावाक रकम संगत केँ देल जाय से तऽ अहींक आग्रह छल। यदि अहाँ चाहैत छी त वापस लय लेब। राशि कम हो तऽ आरो लऽ लेब। गर्वोन्नत दुनू बाजय लागल, अरे! हमरा सभक बिना संगत कहियो भऽए नहि सकैछ, फेर ई अपमान करबाक हिम्मत कोना केकरो भेल? ई तऽ हमरहि सभक प्रताप थिक ( कीर्तन-संगीत-शब्दपाठ केर ) कि अहाँकेँ लोक गुरु मानैत अछि अन्यथा अहाँकेँ के पूछत? हम जेकरा चाहब गुरुपदपर बैसा देब, गुरुनानकजी केँ सेहो हमरहि पूर्वज मर्दाना त कीर्तन कयकेँ गुरु बनेने छलाह, नहि तऽ हुनका के पूछैत!
 
कियो सहिये कहने अछि जे विनाशकाल मे बुद्धि विपरीत भऽ जाएत छैक। गीताकार सेहो कहलनि अछि –
 
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः॥
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥२-६३॥
 
अर्थात् क्रोध सँ अत्यंत मूढ़भाव (मूर्खता, मोह) उत्पन्न भऽ जाएत छैक, मूढ़ भाव सँ स्मृति मे भ्रम भऽ जाएत छैक, स्मृतिभ्रम सँ बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति केर नाश भऽ जाएत छैक, और बुद्धि केर नाश भऽ गेला सँ ओ पुरुष अपन स्थिति सँ गिर जाएत अछि।
 
गुरुजी त दुनू अहंकारी द्वारा कयल गेल अपन अपमान केँ तऽ बर्दाश्त कय लेने छलाह, परन्तु हुनकासँ अपन जगद्गुरु नानकदेव जीक प्रति कहल गेल ओ शब्द बर्दाश्त नहि भेलनि। हुनकर मुंह सँ निकैल पड़लनि – तूँ दुनू द्रष्टाक सीमा पारकय गुरुनानकजीक प्रति कुवचन कहैत छँ, अहंकारक वशीभूत तूँ द्रष्टाक चरम सीमा पर पहुँच गेलें। जा! तोरा कोंढ़ फूटि जाउक। कियो तोहर सुधि नहि लेतौक। एतेक कहिकय गुरुजी अपन सिखक संग वापस लौटि गेलाह। जे कहियो वाद्य-यंत्र छुनहियो नहि रहय, तेकरा सँ बजेबाक लेल कहलनि आर एहेन दिव्य संगीत बाजल कि लोक सत्ता आ बलवंड केँ बिसैर गेल आ मंत्रमुग्ध भऽ गेल। गुरुजी एकटा बात आरो बजलाह जे कीर्तन आब कोनो विशेष कुल-घरानाक थाती नहि थिक, सब एकरा सिखय। सारा शिष्य सबकेँ शब्द-कीर्तन-गुरुवाणीक अभ्यास होबक चाही। सत्ता-बलवंड केर सिफारिश तक कियो लय केँ नहि आबय, अहु बातक विशेष ध्यान राखक लेल कहि देल गेल।
 
गुरुजीक श्रापक समाचार जन-जन धरि पहुँचि गेल। दू दिन तक तऽ सत्ता-बलवंड प्रतीक्षा करैत रहल जे शायद गुरु अर्जुनदेव केकरो मार्फत बुलावा पठौता, फेर ओकरा सभक कीर्तन चलि पड़य, मुदा कियो नहि आयल। तेसर दिन ओकर सम्पूर्ण शरीर पर चकत्ता देखाय देलक, जे कि गलित कुष्ठ केर चेन्ह छल। चारिम दिन ओहिमे पीज भैर गेल आर एक हफ्ताक भीतर कियो ओकरा सबकेँ चिन्हियो नहि सकैत छल जे वैह सब सत्ता -बलवंड थिक, जे कहियो गर्व सँ कीर्तन मे गाबय आ लोक ओकर आवाज पर झूमैत छल। जतय ओ रहैत छल, दुर्गन्धक मारे लोक ओम्हर निकलनाइयो छोड़ि देलक, अन्न-वस्त्र समाप्त भऽ गेलैक। दवाइ करेबाक पैसा सेहो नहि बचलैक। स्त्री-बच्चा भूख सँ मरय लगलैक। गुरुनिन्दक केर पास के जायत?
 
इतिहास कहैत अछि जे ई दुनू गुरुद्रोही केँ सच्चा पश्चातापक अग्निमे जरैत देखिकय लाहौरक भाई लद्धाजी द्वारा उबारल गेल। ई हुनकहि हिम्मत छल जे गुरु अर्जुनदेव केर शब्दक मान रखैत हुनकासँ क्षमा माँगय ओ अपमानित स्थितिमे हुनका पास गेलाह आ बेर-बेर एहि दुनू गुरुनिन्दक केँ क्षमा करबाक भीख माँगलनि। क्षमाभूषण-भक्तवत्सल गुरुजी केर कृपा सँ दुनूक कष्ट तऽ समाप्त भऽ गेल, मुदा ओ फेरो ओ स्थान नहि पाबि सकल जतय ओकर गुरुक नाम ओकरा सबकेँ पूर्वमे पहुँचा देने छलय। गुरुद्रोह केर कि परिणति भऽ सकैत अछि, ई सभक लेल एक सबक थिक।
 
हरिः हरः!!
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