किछु कहै छै हिया

गजल

– राजीव रंजन मिश्र, कोलकाता

किछु कहै छै हिया सदि घड़ी लोककेँ
नै सुनय छै कहल से कमी लोककेँ

सोह रहलै कहाँ कि सही कि गलत
बोल अखड़ा बनल सरजमीं लोककेँ

बात धारक चलल फानि चटपट उठल
पानि देखल लगै कनकनी लोककेँ

मोल कि थिक तपस्याक दरकार कि
कोन निर्वाणकेँ धरफड़ी लोककेँ

युग जमाना तँ ‘राजीव’ बड पारखी
कि तथागत बुझेतै कथी लोककेँ

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