महिषासुरक उत्पात आ सेनापति सहित ओकर वध गाथाः महामायाक लीला वर्णन

Pin It

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

सेनापति सहित महिषासुरक वध
 
महामायाक प्रादुर्भाव उपरान्त आर हुनका द्वारा देवता व इन्द्र, वरुण, आदिक खस्ता हाल मे स्तुति सुनैत अट्टहास कयला उत्तर समस्त दैत्य-दुर्जन हजारों-हजार सेना सहित देवी संग युद्ध आरम्भ कय चुकल अछि। आजुक प्रकरण थिक – कोना देवी सेनापति सहित महिषासुरक वध कयलीह।
 
ध्यानम्
ॐ उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां
रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं
देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्देऽरविन्दस्थिताम्॥
 
ॐ ऋषिरुवाच – ऋषि कहैत छथि, दैत्य सभक सेना केँ एहि तरहें तहस-नहस होएत देखि महादैत्य सेनापति चिक्षुर क्रोध मे भरिकय अम्बिका देवी सँ युद्ध करबाक लेल आगू बढल। ओ असुर रणभूमि मे देवीक ऊपर एहि तरहें बाण बरसौलक जेना बादल मेरुगिरिक शिखर पर पानिक धारा बरसा रहल हो। तखन देवी द्वारा अपन बाण सँ ओकर बाणसमूह केँ अनायासे काटिकय ओकर घोड़ा आ सारथि केँ सेहो मारि देल गेल। संगहि ओकर धनुष तथा अत्यन्त ऊँच ध्वजा केँ सेहो तत्काल काटि खसायल गेल। धनुष कैट गेलापर ओकर अङ्ग केँ अपन बाण सँ बींध देलनि। धनुष, रथ, घोड़ा और सारथि केर नष्ट भऽ गेलापर ओ असुर ढाल आ तलवार लय केँ देवीक दिशि दौड़ल। ओ तीख धारवाली तलवार सँ सिंह केर माथ पर चोट कय केँ देवीक बायाँ बाँहि पर सेहो बड़ा वेग सँ प्रहार केलक।
 
राजन! देवीक बाँहिपर पहुँचिते ओ तलवार टूटि गेल, फेर त क्रोध सँ लाल आँखि कय केँ ओ राक्षस अपना हाथ मे शूल लय लेलक आर ओहि सँ ओ महादैत्य भगवती भद्रकाली ऊपर प्रहार केलक, ओ शूल आकाश सँ खसैत समय सूर्यमण्डलक भाँति अपन तेज सँ प्रज्वलित भऽ उठल। ताहि शूल केँ अपना दिशि आबैत देखि देवी द्वारा सेहो अपन शूल संधान कयल गेल जाहि सँ राक्षसक शूल केर सैकड़ों टुकड़ा भे गेलैक, संगहि महादैत्य चिक्षुरक सेहो धज्जी उड़ि गेल, ओ ओत्तहि अपन प्राण सँ हाथ धो लेलक।
 
महिषासुरक सेनापति ओहि महापराक्रमी चिक्षुरक मारल गेलापर देवता सब केँ पीड़ा दयवला चामर हाथी पर चढिकय आयल। ओहो देवीक ऊपर शक्तिक प्रहार केलक, मुदा जगदम्बा ओकरो अपन हुंकारहि मात्र सँ आहत आ निष्प्रभ कय केँ तत्काल पृथ्वीपर खसा देली। शक्ति टूटिकय खसल देखि चामर केँ बड़ा क्रोध भेलैक। आब ओहो शूल चलौलक, मुदा देवी ओकरो अपन बाण सँ काटि खसेली। एतबे मे देवीक सिंह ताहि हाथीक माथ पर कूदि चढल आ ओहि दैत्यक संग जोरदार बाहुयुद्ध करय लागल। ओ दुनू लड़ैत-लड़ैत हाथी सँ पृथ्वीपर आबि गेल आर अत्यन्त क्रोध मे भरल एक-दोसरपर बड़ा भयंकर प्रहार करब सेहो शुरू कय देलक। तदनन्तर सिंह बड़ा वेग सँ आकाशक दिशि कूदल आ फेर खसैत काल अपन पंजाक मारि सँ चामरक सिर धड़ सँ अलग कय देलक। तहिना उदग्र सेहो शिला आर वृक्ष आदिक मारि खाकय रणभूमि मे देवीक हाथे मारल गेल तथा कराल सेहो दाँत, मुक्का आ थापड़क चोट सँ धराशायी भऽ गेल।
 
क्रोध मे भरल देवी गदाक चोट सँ उद्धतक कचूमर निकालि देली। भिन्दिपाल सँ वाष्कल केँ तथा बाण सँ ताम्र और अन्धक केँ मृत्युक घाट उतारि देली। तीन नेत्रवाली परमेश्वरी द्वारा त्रिशूल सँ उग्रास्य, उग्रवीर्य तथा महाहनु नामक दैत्य केँ मारि देल गेल। तलवारक चोट सँ विडालक मस्तक धड़ सँ काटि खसायल गेल। दुर्धर आ दुर्मुख – एहि दुनू केँ सेहो अपन बाण सँ यमलोक पठा देलीह।
 
एहि तरहें अपन सेनाक संहार होएत देखि महिषासुर द्वारा महींषक रूप धारण कय केँ देवीक गण सब केँ त्रास देनाय आरम्भ केलक। केकरो थूथुन सँ मारिकय, केकरो ऊपर खुर सँ प्रहार कय केँ, केकरो-केकरो पूँछ सँ चोट पहुँचाकय, किछु केँ सींग सँ विदीर्ण कय केँ, किछु गण सब केँ वेग सँ, किछु केँ सिंहनाद सँ, किछु केँ चक्कर दय केँ आर कतेको केँ निःश्वास-वायुक झोंका सँ घराशायी कय देलक। एहि तरहें गण सभक सेना केँ गिराकय ओ असुर महादेवीक सिंह केँ मारय लेल झपटलक। एहि सँ जगदम्बा केँ बड़ा क्रोध भेलनि। ओम्हर महापराक्रमी महिषासुर सेहो क्रोध मे भरल धरती केँ खुर सँ कोरय लालग तथा अपन सींग सँ ऊँच-ऊँच पर्वत सब केँ उठाकय फेंकय आ गर्जन करय। ओकर वेग सँ चक्कर देलाक कारण पृथ्वी सेहो क्षुब्ध भऽ फाटय लगलीह। ओकर पूँछ सँ टकराकय समुद्र सब दिशि सँ धरती केँ डूबाबय लगलीह। हिलैत सींगक आघात सँ विदीर्ण भऽ कय बादल सभक टुकड़ा-टुकड़ा भऽ गेल। ओकर श्वासक प्रचण्ड वायुक वेग सँ उड़ैत सैकड़ों पर्वत आकाश सँ खसल लागल।
 
एहि तरहें क्रोध मे भरल ओ महादैत्य अपना दिशि अबैत देखि महादेवी चण्डिका ओकर वध करबाक लेल महान् क्रोध केलनि। ओ पाश फेंकिकय ओहि महान् असुर केँ बान्हि लेलनि। ओहि महासंग्राम मे बन्हा गेलापर ओ भैंसक रूप त्यागि देलक। आर तत्काल सिंहक रूप मे ओ प्रकट भऽ गेल। ओहि अवस्थामे जगदम्बा जहिना ओकर मस्तक कटबाक लेल उद्यत भेलीह, तहिना ओ खड्गधारी पुरुषक रूप मे देखाय देबय लागल। तखन देवी द्वारा तुरंते बाणक वर्षा कय केँ ढाल आ तलवारक संग ओहि पुरुष केँ बींध देल गेल। ततबा मे ओ महान् गजराजक रूप मे परिणत भऽ गेल आर अपन सूँड़ सँ देवीक सिंह केँ खींचय आ गर्जय लागल। खींचैत समय देवी द्वारा ओकर सूँड़ काटि देल गेल। तखन ओ महादैत्य फेर भैंसक शरीर धारण कय लेल गेल आर पहिने जेकाँ चराचर प्राणी सहित तीनू लोक केँ व्याकुल करय लागल। तखन क्रोध मे भरल जगन्माता चण्डिका बेर-बेर मधुक पान करैथ आ लाल आँखि कय केँ हँसय लगलीह। ओम्हर ओ बल आ पराक्रमक मद सँ उन्मत्त भऽ राक्षस गर्जय लागल और अपन सींग सँ चण्डीक ऊपर पर्वत सब फेंकय लागल। ताहि समय देवी अपन बाणक समूह सब सँ ओकर फेकल गेल पर्वत केँ चूर्ण करैत बजलीह – बजैत समय हुनकर मुंह मधुक मद सँ लाल भऽ रहल छल आर बाणी सेहो लड़खड़ा रहल छल –
 
देव्युवाच।
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम्।
मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः॥३-३८॥
 
ओ मूढ! जाबत काल धरि हम मधु पिबैत छी, ताबत काल धरि तूँ क्षण भरि वास्ते गरैज ले। हमरा हाथ सँ एत्तहि तोहर मृत्यु भेलाक बाद आब जल्दिये देवता सब सेहो गर्जन करता।
 
एतबा कहिकय देवी कुदली आर ओहि महादैत्यक ऊपर चैढ गेलीह। फेर अपन पैर सँ ओकरा दबाकय ओ शूल सँ ओकर कण्ठ मे आघात केलनि। देवीक पैर सँ दबल रहलाक बादो महिषासुर अपन मुख सँ (दोसर रूप मे बाहर होमय लागल) एखन आधे बाहर निकैल सकल छल कि देवी द्वारा अपन प्रभाव सँ ओकरा रोकि देल गेल। आधा निकलल रहलोपर ओ महादैत्य देवी सँ युद्ध करय लागल। तखन देवी बड़का तलवार सँ ओकर मस्तक केँ काटि खसेली, फेर तऽ ओ हाहाकार करैत दैत्यक समस्त सेना भागि गेल तथा सम्पूर्ण देवता अत्यन्त प्रसन्न भऽ गेलाह।
 
देवता लोकनि दिव्य महर्षि लोकनिक संग दुर्गादेवीक स्तवन कयलनि। गन्धर्वराज गाबय लगलाह तथा अप्सरा सब नृत्य करय लगलीह।
 
आगाँ अछि – देवता द्वारा देवीक स्तवन, जे हम भक्त-पाठक सब लेल काफी अनुकरणीय होयत। अस्तु!
 
हरिः हरः!!
पूर्वक लेख
बादक लेख

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

9 + 4 =