कथा महिषासुर मर्दिनीक – भाग १

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स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

ॐ श्री दुर्गायै नमः!!
 
भगवतीक विभिन्न स्वरूप केँ अपन हृदय मे जतेक आनि रहल छी, सचमुच नव शक्ति प्रवेश होयबाक भान भऽ रहल अछि। विगत करीब दुइ मास सँ शक्तिदात्री माताक लीलादिक कथा सब पढैत-बुझैत-गुनैत बेर-बेर इच्छा करैत अछि जे एहि अलौकिकता सँ अपने लोकनि नित्य-पाठक केँ सेहो जोड़िकय राखी। ओनाहू एक मानवक रूप मे आर ताहू मे जाहि कुल-परिवार मे हमर जन्म भेल अछि तेकरो सार्थकता एहि तरहक स्वाध्याय आ आध्यात्मिक प्रसाद जे अपना भेटय से सब केँ बाँटय मे बुझैत ई अपन कर्तब्य सेहो मानैत छी। धर्म मार्ग नामक एक समूह केर स्थापना हम सब २००७ ई. २७ मई केँ कयने रही। ओतय ई नियम छलैक जे हरेक मानव किछु न किछु अलौकिक अनुभूति करैत रहैत अछि आर ताहि सँ सहयात्री मानव समुदाय केँ सेहो जोड़िकय राखत त धर्मक रक्षा होएत हमरो-अहाँक रक्षा होयब सुनिश्चित अछि। कहल जाएत छैक न “धर्मो रक्षति रक्षितः”, अतः हमहुँ अपन कर्तब्य पूरा करैत आगू बढि रहल छी।
 
भगवतीक प्रथम आ मध्यम चरित्र मे सेहो विभिन्न दैत्य केँ वध करबाक अनुपम कथा-चरित्र गान कयल गेल अछि। विगत मे प्राधानिकं रहस्यम् आ वैकृतिकं रहस्यम् आदिक पाठ कयने रही, भावानुवाद रखने रही। तहिना भगवतीक सप्तशती पाठ सँ उत्तरचरित्र अन्तर्गत शुम्भ-निशुम्भ वध केर पाठ एवं भावानुवाद सेहो कयने रही। आब आइ सँ इच्छा भेल अछि प्रथम आ मध्यम चरित्रक विस्तृत विवरण देखबाक। आउ, आरम्भ करी, पार्ट-पार्ट मे!
 
विनियोगः
ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः, नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम्, ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकाली प्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः।
 
प्रथम चरित्रक ब्रह्मा ऋषि, महाकाली देवता, गायत्री छन्द, नन्दा शक्ति, रक्तदन्तिका बीज, अग्नि तत्त्व और ऋग्वेद स्वरूप थिक। श्रीमहाकाली देवताक प्रसन्नताक लेल प्रथम चरित्रक विनियोग कयल जाएत अछि।
 
ध्यानम्
ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्॥
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥१॥
ॐ नमश्चण्डिकायै!!
 
भगवान् विष्णु केर सुति रहलापर मधु आ कैटभ केँ मारबाक लेल कमलजन्मा ब्रह्माजी जिनकर स्तवन कयने छलाह, ताहि महाकाली देवीक हम सेवन करैत छी। ओ अपन दसो हाथ मे खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि, मस्तक आ शङ्ख धारण करैत छथि। हुनक तीन नेत्र अछि। ओ समस्त अङ्ग मे दिव्य आभूषण सँ विभूषित छथि। हुनक शरीरक कान्ति नीलमणिक समान छन्हि तथा ओ दस मुंह आर दस पैर सँ युक्त छथि। चण्डिकादेवी केँ हमर नमस्कार अछि।
 
मार्कण्डेयजी कहैत छथि –
 
सूर्यक पुत्र सावर्णि जे आठम मनु कहल जाएत छथि, हुनकर उत्पत्तिक कथा विस्तारपूर्वक कहैत छी, सुनू। सूर्यकुमार महाभाग सावर्णि भगवती महामायाक अनुग्रह सँ जाहि तरहें मन्वन्तरक स्वामी भेलाह, ओ प्रसङ्ग सुनबैत छी।
 
पूर्वकालक बात थिकैक, स्वारोचिष मन्वन्तर मे सुरथ नामक एक राजा भेलाह, जे चैत्रवंश मे उत्पन्न भेल छलाह। हुनक समस्त भूमण्डल पर अधिकार छल। ओ प्रजा केँ अपन औरस पुत्र जेकाँ धर्मपूर्वक पालन करथि; तथापि ओहि समय कोलाविध्वंसी नामक एक क्षत्रिय हुनकर शत्रु बनि गेलन्हि। राजा सुरथक दण्डनीति बड़ा प्रबल छल। हुनका शत्रुक संगे संग्राम भेलन्हि। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्या मे कम छल, तैयो राजा सुरथ युद्ध मे ओकरा सँ परास्त भऽ गेलाह। तखन ओ युद्धभूमि सँ अपन नगर घुरि अयलाह आर मात्र अपन देशक राजा बनिकय रहय लगलाह। समूचा पृथ्वी सँ हुनक अधिकार जाएत रहलन्हि, मुदा हुनकर अपनो नगर पर ओ प्रबल शत्रु सब ताहि समय महाभाग राजा सुरथ पर आक्रमण कय देलक।
 
राजाक बल क्षीण भऽ गेल छलन्हि; ताहि कारण हुनकर दुष्ट, बलवान् आ दुरात्मा मन्त्री सब हुनकर राजधानी मे राजकीय सेना आ खजाना केँ हथिया लेने छल। सुरथक प्रभुत्व नष्ट भऽ चुकल छलन्हि, अतः ओ शिकार खेलेबाक बहन्ने घोड़ापर सवार भऽ ओतय सँ असगरे एक घना जंगल मे चलि गेलाह। ओतय ओ विप्रवर मेधा मुनिक आश्रम देखलनि, जाहि मे कतेको रास हिंसक जीव अपन स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़िकय परम शान्तभाव सँ रहैत छल। मुनिक बहुत रास शिष्य ओहि वन केर शोभा बढा रहल छलाह। ओतय गेलापर मुनि राजा सुरथक सत्कार कयलनि आर ओहो ताहि मुनिश्रेष्ठक आश्रम पर एम्हर-ओम्हर विचरन करैत किछु समय बितेलनि। फेर ममता सँ आकृष्टचित्त होएत ओतय एहि तरहें चिन्ता करय लगलाह –
 
“पूर्वकाल मे हमर पूर्वज जेकर पालन कएने छलाह, वैह नगर आइ हमरा सँ रहित अछि। पता नहि, हमर दुराचारी भृत्यगण ओकर धर्मपूर्वक रक्षा करितो अछि या नहि। जे सदा मदक वर्षा करयवला और शूरवीर छल, ओ हमर प्रधान हाथी आब शत्रु सभक अधीन भऽ कय नहि जानि कि भोग भोगैत होयत? जे लोक हमर कृपा, धन आर भोजन पाबिकय सदैव हमर पाछू-पाछू चलैत छल, ओ निश्चय टा आब दोसर राजाक अनुसरण करैत होयत। ओहि अपव्ययी लोक सब द्वारा खर्च होएत रहबाक कारण अत्यन्त कष्ट सँ जमा कयल गेल हमर खजाना खाली भऽ जायत।”
 
ई आ आरो कतेको तरहक बात राजा सुरथ निरन्तर सोचैत रहैत छलाह। एक दिन ओ ओतय विप्रवर मेधाक आश्रमक नजदीक एकटा वैश्य केँ देखि ओकरा सँ पुछलाह –
 
“भाइ, तूँ के छह? एतय तोहर एबाक कि कारण छह? तूँ कियैक शोकग्रस्त आ अनमनायल सन देखाएत छह?”
 
राजा सुरथक ई प्रेमपूर्वक कहल बात सुनिकय वैश्य बहुत विनीत भाव सँ हुनका प्रणाम कय केँ कहलनि –
 
“राजन! हम धनिक कुल मे जन्म लेल एक वैश्य थिकहुँ। हमर नाम समाधि अछि। हमर दुष्ट स्त्री-पुत्र सब धनक लोभ सँ हमरा घर सँ बाहर निकालि देलक अछि। हम एहि समय धन, स्त्री आ पुत्र सब सँ वञ्चित छी। हमर विश्वसनीय बन्धु लोकनि हमरहि धन लय केँ हमरा दूर कय देलक अछि, ताहि सँ दुखी भऽ हम वन मे आबि गेल छी। एतय रहिकय हम एहि बात केँ नहि जनैत छी जे हमर पुत्रक, स्त्रीक आ स्वजनक कुशल-मंगल ठीक अछि या नहि। एहि समय घर मे ओ सब कुशलपूर्वक रहि रहल अछि या ओकरा सब केँ कोनो कष्ट छैक? ओ हमर पुत्र केना अछि? कि ओ सदाचारी अछि या दुराचारी भऽ गेल अछि?”
 
राजा पूछलखिन, “जाहि लोभी स्त्री-पुत्र आदि धनक कारण तोरा घर सँ निकालि देलकह, तेकरा प्रति तोहर चित्त मे एतेक स्नेहक बन्धन कियैक छह?”
 
वैश्य कहलकनि, “अहाँ हमरा विषय मे जे कहि रहल छी से बात ठीक अछि। लेकिन हम कि करू, हम मन निष्ठुरता नहि धारण कय सकैछ। जे धनक लोभ मे पड़िकय पिताक प्रति स्नेह, पतिक प्रति प्रेम तथा आत्मीयजनक प्रति अनुराग केँ तिलाञ्जलि दय हमरा घर सँ निकालि देलक अछी, ओकरे सभक प्रति हमर हृदय मे एतेक स्नेह अछि। महामते! गुणहीन बन्धु लोकनि प्रति सेहो हमर चित्त एहि तरहें प्रेममग्न भऽ रहल अछि, ई कि थिक – से बात केँ हम जनितो नहि जानि पाबि रहल छी। ओकरे सभक लेल हम लंबा साँस लय रहल छी और हमर हृदय मे बहुत दुःख भऽ रहल अछि। ओकरा सब मे प्रेमक सर्वथा अभाव छैक; तैयो ओकरा सभक प्रति हमर निष्ठुर नहि भऽ पबैछ, ताहि लेल हम कि करू?”
 
मार्कण्डेयजी कहैत छथि, “ब्रह्मन्! तदनन्तर राजा सब मे श्रेष्ठ सुरथ और ओ समाधि नामक वैश्य दुनू संगे-संगे मेधा मुनिक सेवा मे उपस्थित भेलाह आर हुनका संग यथायोग्य न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करैत बैसलाह।
 
राजा कहलखिन, “भगवन्! हम अपने सँ एकटा बात पूछय चाहैत छी, से कने बताउ। हमर चित्त अपना अधीन नहि रहबाक कारण ई बात हमरा मन केँ बहुत दुःख दैत अछि जे हमर राज्य हमरा हाथ सँ चलि गेल अछि, ओहि मे आर ओकर सम्पूर्ण अङ्ग मे हमर ममता बनले अछि। मुनिश्रेष्ठ! ई सब बात जनितो जे आब ओ सब हमर नहि थिक, अज्ञानी जेकाँ हमरा ओहि सब लेल दुःख होएत अछि। ई सब कि थिक? एम्हर ई वैश्य सेहो अपन घर सँ अपमानित भऽ कय आयल अछि, एकर पुत्र, स्त्री आ भृत्य सेहो एकरा छोड़ि देलकैक अछि… स्वजन सेहो एकर परित्याग कय देलकैक अछि, तैयो ई ओकरा सभक प्रति अत्यन्त हार्दिक स्नेह रखैत अछि। एहि तरहें ई आ हम दुनू बहुत दुःखी छी। जाहि मे प्रत्यक्ष दोष देखल गेल अछि, ओहि विषयक लेल सेहो हमरा लोकनिक मन मे ममताजनित आकर्षण उत्पन्न भऽ रहल अछि। महाभाग! हम दुनू बुझनुक लोक छी, तथापि हमरा सब मे जे मोह उत्पन्न भऽ रहल अछि, ई कि थिक? विवेकशून्य पुरुषक भाँति हमरा मे आर एकरा मे ई मूढता प्रत्यक्ष देखा रहल अछि।
 
ऋषि जबाब देलखिन…. क्रमशः…. ऐगला दिन!!
 
हरिः हरः!!
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