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कलियुग कि थीक: सत्य दर्शन

कलियुग कि थीक: सत्य दर्शन

युगक सामान्य समझ नीक समय जे बीत गेल से कहायल सत्ययुग, अंधकारक युग केँ कलियुग कहल जा रहल अछि। मान्यता अनुसार युग केर चर्चा अपना जगह पर अछिये। मान्यता बनैत छैक मानवक अपनहि अनुभूतिक आधार पर। परंपरागत रूप मे दर्शन मुताबिक परिकल्पना सँ सेहो एना विभिन्न युग केर स्मृति बनाओल जा रहलैक अछि। जेना-जेना समय […]

अंग प्रदर्शन करब सुन्दरता कोना?

अंग प्रदर्शन करब सुन्दरता कोना?

नारी सुंदरताक दुरुपयोग समाज लेल अकल्याणकारी सुन्दरताक परिभाषा भारतवर्षीय संस्कृति मे सत्य तथा शिव सँ जुड़ल अछि। ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ – अर्थात् जे सत्य अछि वैह शिव अछि आ जे शिव अछि वैह सुन्दर अछि। वर्तमान अपसंस्कृतिकाल मे जाहि तरहें वस्त्र आ आभूषण सँ झाँपय योग्य अंग केँ बेसी सँ बेसी प्रदर्शन करबाक धुनकी लोकमानस मे […]

कलियुगक कल्पवृक्ष – दान

कलियुगक कल्पवृक्ष – दान

– आध्यात्मिक आलेख : A must read Article            – महामण्डलेश्वर स्वामी श्रीबजरंगबलीजी ब्रह्मचारी धन्य अछि ओ देश, धन्य अछि ओ प्रदेश, धन्य अछि ओ धरती और धन्य अछो ओ भारतीय संस्कृति तथा रीति-नीति एवं जीवन-यापनक पद्धति जतय धनसँ अधिक धर्मक, भोगसँ अधिक योगक, स्वार्थ सँ अधिक परमार्थक और धर्मक चारू […]

रामचरितमानस: रूपक आ माहात्म्य – “महाकवि तुलसीदास केर अपूर्व प्रस्तुति’

रामचरितमानस: रूपक आ माहात्म्य – “महाकवि तुलसीदास केर अपूर्व प्रस्तुति’

रामचरितमानस मिथिलावासीक लेल खास कियैक सनातन धर्म मे ईश्वर अनेक छथि, परन्तु राम तथा कृष्णक महत्त्व बहुत खास अछि। खास होयबाक कारण जे एहि दुइ अवतार केँ मनुष्य अपनहि रूप मे देखि मानुसिक क्रियाकलापक संग महापुरुषक आचार-विचार जुड़ल देखि दुनू चरित्रक अनुकरण सँ अपन जीवन केँ सफल बनेबाक चेष्टा करैत अछि। मनुष्यरूप मे रहैत सीता […]

पापनाशक आ शक्तिवर्धक तपश्चर्या

पापनाशक आ शक्तिवर्धक तपश्चर्या

(मूल आलेख ‘पापनाशक और शक्तिवर्धक तपश्चर्याएँ’ – अखिल विश्व गायत्री परिवार केर साहित्यालेख केर मैथिली अनुवाद) आइगक उष्णता सँ संसारक समस्त पदार्थ या तऽ जरि जाइत अछि, या बदैल जाइत अछि या गैल जाइत अछि। एहेन कोनो वस्तु नहि जे आइगक संसर्ग भेला पर परिवर्तित नहि होइत अछि। तपस्याक आइग सेहो एहने होइत छैक। ई […]

श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् : एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उपनिषद स्तोत्र – देवी उपासना (मैथिली भावार्थ सहित)

श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् : एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उपनिषद स्तोत्र – देवी उपासना (मैथिली भावार्थ सहित)

कनेक मनन करू! दुर्गा सप्तशती मिथिलाक हर घर लेल एक आवश्यक पोथी मानल जाइत अछि। जे कियो भक्ति साधना सँ जुडल छी, तिनका सभकेँ जरुर देवी उपासनाक महत्त्व बुझल होयत। एक चर्चा हम एतय करय लेल जा रहल छी ओ अछि श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् केर मादे – अथर्ववेद मे देल गेल महिमा अनुरूप आ स्वयं हमरा लोकनि […]

भजन: निलकंठ मधुकर पदावली

भजन: निलकंठ मधुकर पदावली

– पंडित मधुकान्त झा ‘मधुकर’, ग्राम: चैनपुर, सहरसा, मिथिला जनकपुर स्थित कमनीय अनुपम कोबर मे सीताराम के। शक्तिब्रह्म समक्ष माय सीताक अनुचरी के उक्ति॥ दूलहा राम के प्रति: हिऔ मिथिला के दूलहा कमाल करै छी। दीन दुखिया बेहाल के नेहाल करै छी॥ हिऔ मिथिला…… हम जानै छी, हम जानै छी, कृपा सिया के महिमा बखानै […]

धर्म, संन्यास, कर्तब्य, अकर्तब्य, लोक-आस्था, कर्तव्यपरायणता: गंभीर आह्वान

धर्म, संन्यास, कर्तब्य, अकर्तब्य, लोक-आस्था, कर्तव्यपरायणता: गंभीर आह्वान

मैथिली जिन्दाबाद पर प्रकाशित ‘विशेष संपादकीय’ मे पुरी मठकेर शंकराचार्य आ हुनक मूल परिवारजनक दयनीयता पर मैथिली-हिन्दी कवि एवं अभियानी ‘उमाकान्त झा बक्शी’ केर भावुक लेकिन यथार्थ उद्बोधन करयवला मनोभावना आ सार्वजनिक आह्वान – राज्य सरकार, केन्द्र सरकार, समाजसेवी, बुद्धिजीवी एवं समस्त मैथिली-मिथिला अभियानी सँ। जरुर पढू!! स्वयं श्री बक्शी केर शब्द मे: अनंत श्री […]

स्वधर्म केँ जुनि बिसरू मैथिल

स्वधर्म केँ जुनि बिसरू मैथिल

श्रेयान् स्वधर्मो विगुण: परधर्मात् स्वनु्ष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:॥३५॥ अपन धर्म श्रेयस्कर होइत अछि। अनकर अति मनोरम व्यवहृत धर्मे सँ अपन अपूर्णो धर्म बेसी नीक होइत छैक। अपन धर्म मे मरनाय सेहो नीक होइत छैक, आन धर्म भयावह (भय सँ आक्रांत) होइत छैक। गीताक तेसर अध्याय मे प्रयुक्त एहि श्लोक सँ एकटा पैघ सीख […]

शरणागतवत्सल केर शरण मे अर्पित भक्ति-पुष्प

शरणागतवत्सल केर शरण मे अर्पित भक्ति-पुष्प

प्रात:स्मरणीय भगवान् विष्णुकेँ सुमिरन करी पहिले: अथ ध्यानम् शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।। जिनक आकृति अतिशय शांत अछि, जे शेषनागक शैयापर शयन कय रहल छथि, जिनक नाभिमें कमल अछि, जे देवता सभकेँ सेहो ईश्वर आ समस्त जगत केर आधार छथि, जे आकाश जेकाँ सर्वत्र व्याप्त […]